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विनय पत्रिका

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04 Jun 2010
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बेटी उदास है और माँ के हाथ कठोर

दो कविताएँदिनों देश के दो बड़े दैनिक अखबारों में मेरी दो कविताएँ छपीं। एक कविता विष्णु नागर जी ने नई दुनिया में और दूसरी गीत चतुर्वेदी ने दैनिक भास्कर में छापी। इन कविताओं पर कई मित्रों और कुछ नए पाठकों के मेल आए। लोग बताते हैं कि इन अखबारों के करोड़ों
 
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होरी का पुतला

बस आज फिर होरी दिखा। वह पहले भी कहीं दिखा था। या जो दिखा वह शायद होरी का अपना कोई सगा था। वह बुंदेलखंड से आया था या बिदर्भ से था। उसे किसी ने नहीं देखा। वह चोर की तरह देख रहा था सब कुछ। हारा फटेहाल। उसे मैंने भीनहीं देखा। हम उसे देख कर क्या कर लेते। बस
 
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माँ तो माँ है वह तो प्यार करेगी ही

अपनी माँ को प्यार करेंआज मदर्स डे है। इस अवसर पर अपने पहले संग्रह सिर्फ कवि नहीं से तीन कविताएँ यहाँ छाप रहा हूँ। मैं मुंबई में हूँ। माँ गाँव में है। निरपेक्ष हो कर सोचने पर न खुद को लायक पाता हूँ न सुपुत्र। मुझे और उसे साथ-साथ होना था। लेकिन नहीं हूँ।
 
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इनमें क्या है जो धड़कन में लिए फिरता हूँ

कबीर के पाँच दोहे जिन्हें गाता जा रहा हूँकभी-कभी ऐसा होता है कि आप के मन पर कुछ बातें छा जाती हैं। मेरे मन पर कबीर साहब के कुछ दोहे छाए हुए हैंमैं मन ही मन इन दोहों में भटकता रहता हूँ। मेरी आदत है मुझे शब्दों का सहारा चाहिए। मैं कभी अंदर से खाली रह नहीं
 
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एक सहपाठी से बात चीत का अंश

कहाँ बदे निकला रहे कहाँ उतिराने कल अपने एक सहपाठी पुट्टुर से बात हुई। उस बाच चीत का एक अंश यहाँ छाप रहा हूँ। इसके लिए पुट्टुर से अनुमति ले ली है। पुट्टुर और मैं 8वीं तक एक साथ पढ़े हैं। जब मन करता है मैं पुट्टुर से बतियाता हूँ। पुट्टुर और मेरा गाँव पहले
 
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अपने अश्क जी याद हैं आपको

लोग कितने भुलक्कड़ हैउपेन्द्र नाथ अश्क जी को आप भूल गए। हाँ वही अश्क जी जो लगातार लिखते रहे। हिंदी उर्दू के बीच पुल बने रहे। वही जो इलाहाबाद की धुरी थे। गौरांग से, तिरछी टोपी लगाए। एकदम अपने घरेलू बुजुर्गों की तरह अपने से दिखते थे। 2010 में उनकी जन्म शती
 
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करे कोई भरूँ मैं...ऐसा क्यों है

कल क्या होगा पिछले तीन महीने से फोन पर मुझे सृजित कह कर गालियाँ दी जा रही हैं। बैंक का कोई रिकवरी एजेंट मेरे घर के नंबर पर फोन करता है और मुझसे कहता है कि मैं सृजित हूँ और मुझ पर उसके बैंक का बकाया है। वह रिकवरी एजेंट मुझसे कहता है कि मैं बैंक के क्र
 
बोधिसत्व
Dec 29 2009 11:41 AM
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मैं बचा हूँ कुशल से हूँ

मैं सही सलामत हूँ मैं इसलिए बचा हूँ क्योंकि मैं घर में बैठा हूँ..... यदि मैं भी वहाँ होता गेटवे या ताज पर तो आप सब मेरा शोक मना रहे होते। मैं इसलिए बचा हूँ क्योंकि मैं वहाँ नरीमन हाउस में नहीं था ओबरॉय में नहीं था जहाँ गोलियाँ चल रही थीं.... जहाँ मौत
 
बोधिसत्व
Dec 29 2009 11:41 AM
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शिरीष मौर्य को लक्ष्मण प्रसाद मंडलोई सम्मान

पृथ्वी पर एक जगह को मिला सम्मान शिरीष कुमार मौर्य हिंदी कविता का एक युवा और सधा स्वर हैं। उनका एक काव्य संकलन प्रकाशित है। वे वर्तमान युवा कविता के कुछ उन कवियों में से हैं जिनकी कविता से हिंदी का भविष्य उज्वल दिखता है। युवा कविता के लिए प्रगतिशील वस
 
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नामवर के होने का अर्थ

नामवर को जानो भाई जब 17 अक्टूबर की शाम में नामवर जी से फोन पर बात हुई थी तो यह तय हुआ था कि मैं और वे 23 अक्टूबर को इलाहाबाद में गले लग कर भेटेंगे । भेटने का प्रस्ताव मेरा था जिसे नामवर जी ने भावुकता भरे स्वर में स्वीकार कर लिया था। यह भेटना औपचारिक
 
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खेल संस्कृति नहीं खल संस्कृति

उषा क्यों नाराज हो पी.टी.उषा तुम्हारे साथ मध्य प्रदेश जो हुआ उसे सुन कर बस एक ही बात ध्यान में आई कि देश में खेल संस्कृति नहीं बल्कि खल संस्कृति का राज है।
 
बोधिसत्व
Oct 14 2009 07:37 PM
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श्री कृष्ण बोले तो खानदानी चोर

मोरे अवगुन चोरी करो श्री कृष्ण को चोर वे ही कहते हैं जो उन्हें बेहद प्यार करते हैं। तभी तो राजस्थानी के एक कवि ने उन्हें बड़े गौरव के साथ चोर कह कर पुकारा है कि आओ और मेरे अवगुन चुराओ। आजकल एक राजस्थानी किताब पढ़ रहा हूँ वीर विनोद। स्वामी गणेशपुरी(पद
 
बोधिसत्व
Oct 05 2009 05:24 AM
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मैंने अपना नाम फिर बदल लिया है

अगर अमर होना है तो नाम बदल लो कबीर साहेब को अमर होने के लिए राम के नाम का सहारा था लेकिन भानी तो अपने नाम के सहारे ही अमर होने का सूत्र पा गई हैं। भानी मेरी पाँच साल की बेटी है। कल वह मेरे पास आई और बोली पापा मैं कभी मरूँगी नहीं, क्योंकि जिनका नाम भा
 
बोधिसत्व
Oct 02 2009 06:53 PM
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तीस साल तक क्या गुलाम थे विष्णु खरे जी

इतना चुप रहेंगे तो कैसे कहेंगेहिंदी में कम ही पुरस्कार हैं जिन्हें भारत भूषण अग्रवाल स्मृति पुरस्कार के जैसा आला दर्जा हासिल है। किसी के कुछ कहने भर से इस पुरस्कार की मर्यादा कदापि कम न होगी। भले ही पुरस्कार पर सवाल उठाने वाला व्यक्ति इस पुरस्कार की
 
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भारतीय साहित्य में क्या खाक रखा है ?

पराए पत्तल का भात अच्छा लगता है भाईमैं अपने साथ के किसी भी लेखक कवि आलोचक से कत्तई नाराज नहीं हूँ। मेरा नाराज होने का कोई हक भी नहीं बनता। यदि भारतीय कविता या साहित्य में कुछ है ही नहीं तो वे क्या करें। बेचारे। विपन्न जो ठहरे। वे लोग यदि बात बात पर अपने
 
बोधिसत्व
Aug 15 2009 09:30 PM
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जीना केहिं बिधि होय

घर में कैद हैंपिछले कई महीनों से बड़ी मुश्किल में हूँ। घर परिवार के अलावा भोजन और भटकन के आस-पास जीवन का रस जुटा था। वहाँ भी सेंध लग गई है। मिठाई खाता रहा हूँ लेकिन जब से नकली मावा और खोया बड़े पैमाने पर पकड़े गये मिठाइयों का स्वाद कम हो गया। बेसन के
 
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दीना की याद

लगता नहीं कि दीना नहीं है हम और दीना नाथ ज्ञानपुर में एक साथ पढ़ते थे। जब हम मिडिल स्कूल बनकट में पढ़ते थे तब दीना नाथ दुबे और दीना नाथ पाल ये दो दीना हमारे अच्छे मित्रों में से थे। आज मैं दीना नाथ पाल को याद कर रहा हूँ। मेरे सहपाठियों में दीना पाल स
 
बोधिसत्व
May 30 2009 08:44 PM
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नाम के लिए हत्या

अब तो नाम लोगे आलोचक सिर्फ हिंदी के लिए देह धारण करनेवाले आज कितने होंगे। जी हाँ, मात्र हिंदी को समर्पित एक कवि महान कवि, कहानीकार, समीक्षक, संपादक, प्रवक्ता त्तर प्रदेश में हैं किंतु बेहद दुखी और परेशान हैं। अपनी उपेक्षा से तंग आकर उन्होंने अपना नाम
 
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चिद्-विलास : पिता के साथ पुरखों का इतिहास

अपने पूर्वजों पर लोग क्यों नहीं लिखते लेखक लोग अक्सर अपने घर परिवार कुल वंश के बारे में आधी-अधूरी बातें करके छुट्टी पा लेतें हैं। कोशिश करते हैं कि अपनों के बारे में जितनी कम बातें करके काम चल जाए उतना ही कुशल है। क्योंकि घर परिवार पर लिखना फायदे का
 
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फिल्म सरपत का असर और दाम्पत्य

साथ-साथ हैं तीन चार दिन हुए, मित्र अभय की फिल्म सरपत देखी। फिल्म का ऐसा प्रभाव रहा कि घर आकर एक कविता लिखी। मैंने ऐसी बहुत कम कविताएं लिखी हैं जो कि किसी रचना से प्रभावित हो या प्रेरित हो। लेकिन सरपत ने तो मन को चीर दिया। फिल्म देखने के बाद मैं वहाँ
 
बोधिसत्व
Apr 11 2009 06:05 PM
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तेरी किताब की ऐसी तैसी

रहूँगा न मैं घर के भीतर घर किताबों से भर सा गया है। हर तरफ मेरी किताबें...मेरे लिए किताबें। थक रहा हूँ किताबों से। ऊब सी न हो जाए उसके पहले सोच रहा हूँ कि किताबों की खरीद पर रोक लगा दूँ। मेरे पास जिनकी किताबें हैं उन्हें बजिद लौटा रहा हूँ। प्रकाशकों
 
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बहुत कठिन है अकेले रहना

बिन बच्चों घर भूत का डेरा सालों बाद ऐसा हुआ है कि घर में अकेला हूँ। तीन दिन से प्रेत की तरह इस कमरे से उस कमरे में घूम रहा हूँ। लगातार किसी ना किसी से फोन पर बात कर रहा हूँ। या फोन का, किसी के आने की राह देख रहा हूँ। आभा और बच्चे गाँव गए हैं । इसके प
 
बोधिसत्व
Mar 27 2009 01:59 PM
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सुदिन की याद नहीं चाहती थीं पांती काकी

पांती काकी के लिए प्राथना करें आखिर हम सब की पंता या पांती काकी विदा हुई । खूब धूमधाम से उनके सारे संस्कार किए गए। ब्रह्म भोज हुआ। महापात्र विदा हुए। दो तीन बार गऊ दान हुआ। एक तीन बाई डेढ़ की वैकल्पिक वैतरनी बनाकर गऊ की पूछ पकड़ काकी के स्वर्ग पहुँचन
 
बोधिसत्व
Mar 25 2009 05:45 PM
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नहीं रहीं मेरी काकी

मैं तुम्हें देख नहीं पाया काकी मेरी पान्ती काकी का 9 मार्च को देहान्त हो गया। उनके न रहने की सूचना मैंने आप सब को होली के चलते नहीं दी। काको लगभग 77 साल की थीं। वैसे वे मेरी ताई थीं। लेकिन हम सारे बच्चे उनको काकी ही कहते थे। जीवन के तमाम अकल्पनीय दुख
 
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कुछ भी खोने का साहस नहीं बचा है मन में

उगना रे मोर कितै गेला परसों घर से किताब लेकर निकला। हालाकि किताब और कलम लेकर निकलना मेरी आदतों में शामिल हो गया है। जब से होश सम्हाला है मुझे याद नहीं कि कभी घर से बिना किताब या कलमे के निकला होऊँ। मुझे याद नहीं कि कभी किसी से कलम माँग कर कुछ लिखा हो
 
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Feb 27 2009 03:12 PM
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मिलना केहिं बिधि होय

मिलने न मिलने के बीच परसों मित्र अभय से बात हुई। मिलने की हुड़क जगी। लेकिन मिल नहीं पाया। हम अक्सर चाहते हुए भी मित्रों से नहीं मिल पाते। जिनसे मिलना अच्छा लगता है उनसे मुलाकात नहीं हो पाती । अभय के घर से बस हजार मीटर के फासले पर मैं था लेकिन मिलाप न
 
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Feb 01 2009 03:33 AM
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जितेन्द्र की अलग आवाज

आप भी सुने टांड की आवाज किसी ने कहा है कि कवि को लुभा सकती है तारों की चमक और वह मोहित हो सकता है जंगल में हिलती एक पत्ती से भी। कवि के लिए हर आवाज मायने रखती है। जीतेन्द्र चौहान ऐसे ही कवि हैं जो हर बड़ी छोटी आवाजों को सुनते हैं और अपने तरीके से उसे
 
बोधिसत्व
Jan 11 2009 12:03 AM
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भूलना चाहता हूँ

कुछ भी भूलता क्यों नहीं बचपन से सुनता आ रहा हूँ कि बीती ताहि बिसारि दे, आगे की सुधि ले। लेकिन न जाने कितनी बातें, कितनी घटनाएँ हैं हैं जो चाह कर भी नहीं भुला पाया हूँ अब तक। पढ़ी हुई सैकड़ों कहानियाँ, कविताएँ, देखे हुए हजारों चेहरे मिटते नहीं दिमाग स
 
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क्या होगा कल नया जो अब तक नहीं था

२००८ विदा 2009 से कुछ घंटे की देरी पर हूँ। आप भी उतनी ही दूरी पर है। हम सब के जीवन से ३६५ दिन या यूँ कहें कि एक और साल गया। अगले साल को लेकर न कोई बड़ी उलझन है न कोई बड़ी योजना। बस कुछ छोटी योजनाएँ हैं कुछ छोटे सपने जिन्हें पूरा करने की फिराक में जा
 
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Dec 31 2008 09:49 PM
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प्रभु जी काहे दिए गुरु कपटी

गुरु महिमा हर किसी के जीवन में गुरु का बहुत महत्व है...मेरे जीवन में भी है....मैं अपने गुरुओं का बहुत ऋनी हूँ....और सदैव श्रद्धा से स्मरन करता हूँ.....किन्तु बहुत से चेले ऐसे होते हैं जिन्हें अच्छे गुरु नहीं मिलते। एक कहावत है पानी पिओ छान के , गुरु
 
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भानी हिंदी हैं.....

तुमको सुनना पड़ेगा.... भानी की छुट्टियाँ हैं...दीपावली की.....मेरा घर में काम करना मुश्किल हो गया..है...। थोड़ी-थोड़ी देर पर वह यमदूत की तरह हाजिर होती है और अपनी बात सुनने को कहती है...मेरी मजाल की मैं भानी की बात न सुनूँ....न सुनने पर कहती है कि तु
 
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Oct 25 2008 04:32 AM
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शायर बेटे को खुसरो की नसीहत

आम लोगों के रूह की आवाज सुनो शायर कवि संगीतज्ञ सूफी संत अमीर खुसरो ने अपने जीवन के अंतकाल में अपने बेटे गयासुद्दीन अहमद को कुछ नसीहतें दी थीं...हो सकता है खुसरो की नसीहतें आपके भी काम आए... पहली नसीहत यह है गयास बेटे मैंने हिंद की खाक को अपनी आँखों क
 
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राम और सीता के जीवन में किसने आग लगाई........

अशोक वनिका में खुश थे राम-सीता यह प्रसंग बड़ा ही रोचक, जगानेवाला और दुख दाई है । कथाओं से ऐसा लगता है कि राम और सीता ने सुख के दिन देखे ही नहीं। जबकि वास्तव में ऐसा नहीं था। रामायण में ऐसा लिखा है कि राम और सीता लंका से लौट कर बड़े आनन्द से रह रहे थ
 
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दिमाग के दीमकों का क्या करूँ

मोहित मुर्दाबाद जयंत जिंदाबाद दीवार में लगे दीमक को तो हटाया जा सकता है लेकिन दिमाग में लगे दीमक का क्या करें...किसी को एक सिरे से बुरा कहना भी दिमाग में दीमक लगने की निशानी है। क्या आप नहीं मानते। मामला थोड़ा उलझा हुआ है । तो जाने और बताएँ कि मुझे
 
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कौन बनाता है छिनाल...

छिनाल के जन्म की चर्चा हुई । अजित भाई के शब्दों का सफर में । लेकिन वहाँ छिनाल के साथ जन्म लेने वाले छिनरा पुरुष की चर्चा रह गई । अवध में जहाँ मैं पैदा हुआ वहाँ जिस और जिन संदर्भों में छिनाल की चर्चा होती है उन्हीं संदर्भों में छिनरा व्यक्ति की भी चर्
 
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मैं काशीवाला नहीं हूँ

काशी के घाट बुलाते हैं... काशी यानी बनारस से मेरा थोड़ा अजीब सा नाता है....वैसे मैं पैदाइशी बनारसी यानी काशीवाला नहीं हूँ....लेकिन काशी जनपद का तो हूँ....जीवन में पहलीबार किसी शहर गया तो वह था बनारस......बनारस के घाट न
 
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Jun 17 2008 11:32 PM
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बछड़े और बेटियों का वध कर देते हैं वे

देखने में यह बात अजीब है। लेकिन उन लोगों को बेटियों और बछड़ों की जरूरत नहीं है...। उनके लिए वह महिला कुलबोरन है कुलक्षिनी है जो बेटियाँ पैदा करती है...ऐसी बहुए अक्सर दुरदुराई जाती हैं लात खाती हैं....जो बेटियाँ पैदा करती हैं...वहीं वे बहुए लक्ष्मी है
 
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प्रमोद और प्रत्यक्षा उर्फ साधु वचन का मर्म

वो एक बात बहुत नागवार गुजरी है.....जिसका फसाने में कोई जिक्र नहीं था....मेरी कुछ बातों के जरिए प्रमोद जी और प्रतयक्षा जी को अपनी हीनता उजागर करने का मौका मिला है और दोनो बुद्धिजीवी मित्र निकाल भी रहे
 
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चपे रहो प्रहरी प्रमोद जी

मैं लिखना नहीं चाहता था लेकिन लिख रहा हूँअजदकेश प्रमोद जी करुणा के अवतार हो गए है....अवधर दानी हो गए हैं.....मुंबई में रहते हैं सिनेमा टीवी के लिए लिखते भी हैं.....और न लिख पाने पर छटपटाते भी
 
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ब्लॉग जगत में भी दुर्दशा के शिकार साहित्यकार

साहित्यकारों की दुर्दशा क्यों भाइयों...हिंदी के जमें जमाए साहित्यकार ब्लॉग की दुनिया में भी पटखनी खाए पड़े हैं...तो दूसरी ओर वे ब्लॉगर जम कर पढ़े और सराहे जा रहे हैं जो साहित्यकार नहीं रहे हैं...यहाँ
 
बोधिसत्व
May 20 2008 09:00 PM