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I'm Vikash & this is my world...!

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19 May 2010
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अंत की शुरुआत

१वक्त के साथ साथखोते जाते हैं सपने.बेचकर आशायें,खरीद लिये जाते हैं अनुभव.लड़का ठहर जाता हैआदमी होने के बीच में कहीं.और लड़की बन जाती है औरतऔरत हो जाने के बहुत पहले.आशाओं को बेच खरीदा गया अनुभवरहता है ताकता, मूक बधिर सा.२एक टुकडा जीवन में,सच के दो
 
विकास कुमार
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ब्लौग, सोशल मीडिया और क्या क्या

सुबह सुबह उठते ही सबसे पहला काम आप क्या करते हैं? - इसका जवाब अगर कम्पयुटर स्टार्ट करने से स्टार्ट ना होता हो तो आज के जमाने में वैसे भी इज्जत का फ़ालूदा समझिये. इसलिये जब सुना कि सुधांशु ब्लौगर हो गया है तो कुछ खासा आश्चर्य नहीं हुआ. आखिर बच के जाते
 
विकास कुमार
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कुछ तस्वीरें

सारी तस्वीरों को बड़े साइज में देखने के लिये चित्र पर क्लिक करें.
 
विकास कुमार
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चाह

तुम्हारे साथ सिर्फ़ गीली संवेदनायें नहीं,सुलगते विचार भी बाँटना चाहता हूँ.प्रेम का कोमल, कुचला जा सकने वाला अहसास ही नहींबौद्धिकता का कठोर धरातल भी साझा करना चाहता हूँ.और चाहता हूँ थोड़े हिसाब से खुद को खर्च करनाऔर चाहता हूँ खरीदना - तुम्हें किस्त दर
 
विकास कुमार
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डूबते सूरज की कुछ तस्वीरें

Behind the bushes, originally uploaded by vikash716.सम्पूर्ण सेट यहाँ देखें
 
विकास कुमार
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वातावरण की आवाज

अकेले में खुद को हँसते सुनकर वो काँप गया. वो खुद से ही डरने लगा. लेकिन कोई खुद से कैसे बचे? उसे बहुत हड़बड़ाहट हुई. किसी से बात करने की एक अजीब तड़प, जरूरत. जल्दी जल्दी में उसके हाथ से फोन भी नीचे गिर गया. फोन खरीदे हुए उसे एक ही महीने हुये थे. ज्यादातर
 
विकास कुमार
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नहीं लड़की, तुम मुझे कवि ना कहना

नहीं लड़की, तुम मुझे कवि ना कहनाकवि मैं दूसरों के लिये रहूँगा.तुम्हारे लिये तो एक पागल आशिक ही हूँ -जो कविताओं में बातें करता है, हरदम करूँगा.पर कवि? मैं दूसरों के लिये रहूँगा.मेरी कविताएँ, तुम्हारे साथ किये गये मूक संवाद हैंशब्द तुम्हारी प्रेरणा से
 
विकास कुमार
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यो हो हो हो

बहुत देर तक वह उस अधलिखी कविता को ताकती रही. कब और कैसे जीवन इस ओर घूम गया, इस बात का अफ़सोस नहीं होने का अफ़सोस उसे खाये जा रहा था. अब अपना चेहरा भी अनजाना सा लगता है.आईने के अंदर की औरत मैं हूँ -का विश्वास शीशे की तरह टूट गया लगता है. अंदर से मुझे घूर
 
विकास कुमार
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तीन अधूरी लिखवाइयाँ

1एक पल जो नहीं गुजरा - उस पल को जीयूँ कैसे?वो मय जो नहीं ढलका - उस मय को पीयूँ कैसे?तुम जब भी आती हो, एक हूक सी उठती है.तुम पास नहीं हो क्युँ, ये जख्म सीयूँ कैसे?2टुकडा टुकडा दुःख समेट के, फटा हुआ विश्वास लपेटेबेचैनी की चादर ओढे़, तुम भी सोयी - हम भी
 
विकास कुमार
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वो औरत...

औरत अपनी बेटी का हाथ थामे सड़क के किनारे खड़ी थी। बच्ची से ज्यादा उत्सुकता उसकी आँखों में थी। बच्ची अभी इतनी बड़ी नहीं थी कि उसे माँ का आश्चर्य समझ आये। लेकिन औरत अपने अनुभवों की मारी थी। औरतों का काम तो रोटी बनाना होता है। कभी कभी सहेलियों से बातें कर के
 
विकास कुमार
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भेद

अगर तुम यहाँ नहीं हो मेरे पास -तो किसकी बातों में उलझकरउबलता दूध छूट जाता है उबलता. किसकी गरम महक आती है कमरे मेंऔर वो कौन है जो अचानक आकरपकड़ लेती है मुझेऔर काट खाती है मेरे कान? किसकी साँसें मेरी गर्दन पर खेलती हैंऔर किसकी नमी से भींगते हैं मेरे कपोल?
 
विकास कुमार
Mar 07 2010 04:03 AM
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ऊबा हुआ उत्साह

ऊबे हुए उत्साह से बैठा हुआ इंसान ताकता है अपने लेख की ओर, मोहित होता है खुद ही और फिर खुद ही हँस देता है अचकचा कर शर्मा कर। ठहर ठहर के बढती उम्र अटक जाती है अचानक कहीं, जैसे अटक जाता हो कंप्यूटर धूल और वक्त खाकर। आलमारी पर पड़ी किताबें कभी कभी एक उदास
 
विकास कुमार
Mar 03 2010 08:54 PM
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लेना देना

मेरा तुम्हें खुशियाँ देनाऔर तुम्हारा खुश हो जाना -दोनों बिल्कुल अलग अलग बातें हैंक्योंकि 'देना' -'लेने' की अनिवार्य शर्त है,पर्याप्त नहीं.
 
विकास कुमार
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आदमी और कहानी

दो दिनों की टोटल मेहनत कैसे ३ मिनटों में सिमट आती है, देखिये!
 
विकास कुमार
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झील वाली कहानी - दूसरा हिस्सा

(...पिछले अंक से जारी)थोड़ी देर तक लड़की झील से दूर चली गयी. किसी अज्ञात अंधेरे में अपने सिरे तलाशने जैसी कोई मुस्कान उसके चेहरे पर आयी. तत्क्षण ही चेहरे से उसे पोंछकर वो फिर से निर्विकार हो गयी. लड़का सहमा हुआ सा अपने बगल पड़े कंकड़ों में अपने हाथ फेरने लगा.
 
विकास कुमार
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तुम्हारी गलियों में घूमते-घूमते

तुम्हारी गलियों में घूमते-घूमते बहुत कुछ याद आता है। वो कौफ़ी का पहला प्याला, तुम्हारे हाथ का पहला निवाला, तुम्हारी मासूम सी हँसी की गहराई, और तुम्हारे मुहल्ले वाले सूरज की परछाई, और वो हर छोटी चीज, जिससे तुम्हारा नाता है। तुम्हारी गलियों में घूमते-घू
 
विकास कुमार
Dec 29 2009 11:40 AM
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हम लोग

हम वृत्त की परिधि पे खड़े हुए लोग हैं और हमारा जीवन - केन्द्र तक पहुँचे जा सकने की अलसाई, मुरझाई जद्दोजहद। फीके अभिमान और बासी अवचेतन के साथ जीते - हम, अपनी लिप्साओं की विकल विवशता और अनुरोधों के मृदु अवरोधों के बीच परिधि से परिधि तक की दूरी तय किए जा
 
विकास कुमार
Dec 29 2009 11:40 AM
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झील वाली कहानी

पहले तो वह उसे चोरी से देखता रहा. सावधानी से. ऐसे जैसे उसकी देह को उसके नजरों की छुअन महसूस ही ना हो. फिर धीरे धीरे ढीठ सा हो गया. अब वह सामने पड़ी झील में चीड़ों की परछाई नहीं देख रहा था. वो सुंदर थी. ढलते सूरज की चमक उसके कंधे से झूल रही थी. जनवरी की
 
विकास कुमार
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तो मैं भी

कलम उठाने से कवितायें लिखी जा सकती या फिर पैदा किये जा सकते विचार या लहलहायी जा सकती एक क्रांति या फिर सहेजा जा सकता कोई चिंतन - तो उठा लेता मैं भी. बस कह भर देने से आ सकता परिवर्तन या उड़ेली जा सकती समझ या बाँटी जा सकती संवेदना या साबित किया जा सकता
 
विकास कुमार
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उसका सोचना

बहुत दिन हुए उसे कुछ भी लिखे हुए। ऐसा नही था कि उसके दिमाग में हमेशा उठती रहने वाली कुलबुलाहट बंद हो गई थी। ऐसा भी नहीं था कि उसका मन उचट गया था, लिखते रहने से। सब कुछ पहले जैसा ही था - एग्जैक्ट्ली सेम । उसने बहुत बार कोशिश की थी कुछ लिखने की। कई बार
 
विकास कुमार
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उसकी कविता

याद है? तब हम दोनों कवितायें लिखा करते थे. और तुम हमेशा डरती थी कि तुम्हारी कवितायें मेरी कविताओं सी नहीं होती. और मैं समझाया करता था कि तुम्हारी कविताओं का तुम्हारी कविताओं जैसा होना बहुत आवश्यक है. अब देखो ! तुम्हारी कवितायें तुम जैसी ही हैं पर मेर
 
विकास कुमार
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हिन्दी के हाइकू

१.अंधेरी रातनैन बाण लहकेप्रेम पनपा.२.सफ़ेद खादीनमक की गरमीबापू अमर३.कहो ना कुछ?मौन की अभिव्यक्तिमैं नासमझ.४.मैं पतझड़प्रियतमा वसंतसुहाना समां.५.गर्म चुंबनलिपटे हुए तुमठंढे आदर्श.
 
विकास कुमार
Sep 21 2009 04:38 PM
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पिंक्कीया की पिनक

"कहते कहते माथा फिराया ना, त चट्ट से दू लप्पड़ धर देंगे. "चिचियाते रह जाएगी. "ओतना देरी से बोल रहे हैं कि जा के ललटेन जला के संझौत देखा दो. "एक्को बात पियार से माने इ लैकी, त अदमिये बन जाये.रोज जैसे इ भाषण सुन सुन के अब पिंकीया पर कोई असर नहीं होता. सब
 
विकास कुमार
Sep 16 2009 01:12 AM
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अपने जन्मदिवस पर

जिंदगी के पच्चीस साल बिता चुकने वाले मित्र -तुम्हें बधाई देता हूँ.उपलब्धियों का पिटारा भले ही खाली मिले,लेकिन उनके ऊपर बधाईयों की रंगीन रिबन का अधिकारतुमने निःसंदेह अर्जित किया है – जीवन को जीते रह कर.और फिर – तुम मेरे सुख दुःख के साथी रहे हो,मेरे संग
 
विकास कुमार
Sep 04 2009 07:34 PM
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मेरी खिड़की वाली दुनिया

मेरी खिड़की से जो दुनिया दिखती है -वो गोल नहीं है.उसका आकार अनियमित सा है.(समय के संदर्भ में)एक वक्त ये सपाट सी जमीन बन जाती है,दूर तक जिसका विस्तार होता हैऔर अगले ही क्षण सिमट कर रह जाती हैजिसे देख सकना भी दुश्वार होता है.मेरी खिड़की वाली दुनिया में
 
विकास कुमार
Sep 03 2009 11:02 PM
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समझने योग्य

मुझे तुम्हारे कंक्रीट के जंगल से कोई शिकायत नहीं और ना ही नफ़रत है तुम्हारे लगाव से. और ना ही गुस्सा हूँ तुम पर, तुम्हारे चुनाव से. लेकिन मैं ये पेड़-पौधे, ये दूब, ये कांटे नहीं छोड़ पाऊँगा जो कुछ जन्म से मेरा है, प्राकृतिक है वो जमीनी बंधन ’मैं’ नही
 
विकास कुमार
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एक वादा

अब तुम अपने साथ किये गये वादों का हिसाब मत माँगना. पहले ही जिम्मेदारियों के बोझ तले मेरे कंधे टूट गये और दबाव से ये हृदय, प्रेम सहित पिस गया है. पहले ही सारे आँसुओं का स्टौक खतम कर बैठा हूँ. और दिमाग का पूरा गणित धुल गया है उनके साथ. समझोगी कभी? कि न
 
विकास कुमार
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पागलपन

जब मैं जागूँ और तुम्हारा हँसता हुआ गीला चेहरा मयस्सर हो. तुम्हारे बालों से टपकती बूँदे, मेरे गालों को चूमती दिखें. और बिछावन की सिलवट पर कल रात वाला गुलाब सूखता हो. और तुम्हारी आँखों में प्यार भरी शिकायत हो - कि ठंडी होती चाय बनाने के लिए तुमने कितनी
 
विकास कुमार
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गोधूलि

गोधूलि में, जब कभी यह एकाकी मन - नीड़ों की ओर लौटते पंछियों के उल्लास में भी, देखता है थकन. जब शाम का सूरज बूढ़ा नजर आता है और पवन के झोंकों से मन, बोझिल सा हो जाता है. बाहर होता है कुछ और, और अंदर? अंदर कुछ और ही सूरत होती है, ठीक उसी अंधियारे में मुझ
 
विकास कुमार
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एक और अभिनेता

पीस दिया गया उसी चक्की में, एक और अभिनेता। वही, आपकी जानी-पहचानी चक्की - जिसमें अच्छे अच्छे यूँ ही पीस दिए जाते हैं। भौतिक जरूरतों के जोर और अपनों की अभिलाषाओं के शोर ने लील ली, एक और की कलात्मक लिप्सा। अब ये भी अपने घर के एकांत अंधेरे में आईने के सम
 
विकास कुमार
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तुम्हें याद है प्रिये

तुम्हें याद है प्रिये - उस व्यस्त सड़क का सुनसान किनारा? जहाँ तुम्हारे हाथों में मेरा हाथ ऐसा चिपका था जैसे हम सोख लेना चाहते हों - एक दुसरे को. जहाँ मैंने घूरते हुए लोगों को नज़रंदाज करने की कला सीखी थी और तुम्हें अपनी ओर इस बेताबी से खींच लिया था -
 
विकास कुमार
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ना लिखे जाने का लिखा जाना

मेरे अन्दर बहुत कुछ लिखे जाने योग्य है और बहुत कुछ ऐसा है - जिसका ना लिखा जाना ही बेहतर होगा। मेरे अपनों के लिए, मेरे सपनों के लिए, मेरे परिचितों और मेरे समाज के लिए। और फिर जो कुछ कुत्सित है - उसे लिख कर और प्रदर्शित करते रहना, नग्नता की तस्वीरें -
 
विकास कुमार
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याद

जब - सब अपने नगमों की नुमाइश लगाते हैं और बदले में औरों की वाहवाही पाते हैं तो - मुझे तुम्हारी जबरदस्त याद आती है क्यूंकि तुम बिन मेरी कवितायें खो जाती हैं और - नज्म हो भी तो नुमाइश का मन नहीं होता तुम बिन तो वाहवाही में भी वजन नहीं होता
 
विकास कुमार
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बदला

अक्सर होता है कि मैं कहता कुछ और हूँ लेकिन मेरे और तुम्हारे बीच की हवा - गद्दारी कर देती है और तुम सुनती कुछ और हो. दोष - मेरी भाषा का भी हो सकता है. या मेरा - मैं और तुम्हारा - तुम होना भी बाधक हो सकता है. मेरे और तुम्हारे शब्द नहीं मिलते. और उससे भ
 
विकास कुमार
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तुम होती तो देखती

जानती हो मम्मी यहाँ बड़े ऊंचे ऊंचे मकान हैं और एक एक मकान में सैकडों परिवार रहते हैं. मैं जहां रहता हूँ वो २५-मंजिला फ्लैट है. बहुत ऊंचा- तुमने आज तक इतना ऊंचा कुछ ना देखा होगा. बस यूं समझ लो, कि अगर हमारा घर यहाँ होता और मैं अपनी खिड़की से तुम्हारा
 
विकास कुमार
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An offense to readers

Don’t kid yourself!You do not love me.You can not.Loving the poemand loving the poetare two different concepts - you forgot.You are just a confused personwho is ignorant of the differences.And yet you try to judge mewith social stances, moral lenses.Just
 
विकास कुमार
May 11 2009 01:09 AM
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ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है?

मुझे यह गाना बहुत पसंद आया. सुन सुन के लिख रहा हूँ. आप भी सुनें. सुन नहीं सकते तो पढ़ें. फिल्म ’गुलाल’ से लिया गया गीत है. ओ री दुनिया, ओह री दुनिया, ये सुरमई आँखें के प्यालो की दुनिया ओ दुनिया! सुरमई आँखें के प्यालो की दुनिया ओ दुनिया! सतरंगी रंगों ग
 
विकास कुमार