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उडन तश्तरी ....

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16 Jun 2010
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राम मिलन: इन्टरनेशनल ब्लॉगर मीट

राम त्यागी शिकागो से क्या आये और ऐसी इन्टरनेशनल ब्लॉगर मीट कर गये कि तबसे अब तक समय का ही आकाल पड़ गया है. व्यस्तता की हद ऐसी कि अपना प्रिय टिप्पणी दर्ज करने का भी शौक पूरा नहीं कर पा रहा हूँ तो मिलन कथा क्या लिखूँ. वैसे मिलन का पूरा वृतांत तो राम लिख ही
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पुरुस्कार!!

बहुत सुन्दर कालोनी है. करीब ८० मकान. अधिकतर लोग, जिन्होंने यह मकान बनवाये थे रिटायर हो गये हैं. कुछ के बेटे बहु साथ ही रहते हैं तो कुछ अकेले. कौशलेश बाबू की बहु बहुत मिलनसार, मृदुभाषी एवं सामाजिक कार्यों में बहुत रुचि लेती है. कालोनी में रह रहे बुजुर्गों
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चाँद: वो बचपन वाला!!

बचपन में गर्मियों में छत पर सोया करते थे. देर रात तक चाँद देखते. उसमें दिखती कभी बुढ़िया की तस्वीर, कभी रुई के फाहे, कभी बर्फ के पहाड़, कभी छोटा होता चाँद और न जाने क्या क्या? एक कल्पना की उड़ान ही तो होती थी बालमन की. मेरे लिए एक खिलौना ही तो था बचपन का
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बेवजह की शोध: फिजूल खर्ची!!

एक समाचार पढ़ता था...अब आ गई सिगरेट छुड़ाने वाली मशीन दिल्ली के दो सरकारी अस्पतालों और इनके तंबाकू से निजात दिलाने वाली क्लिनिकों में कंपनयुक्त एक्यूप्रेशर तकनीकी की जल्द ही शुरुआत हो सकती है। जर्मन निर्मित बायो-रेसोरेंस [कंपन चिकित्सा] उपकरण, शरीर के
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कविता का मौसम

कविता का मौसम बस मुहाने पर ही है. गरमी तो वैसे भी कविता का पौधा सूख जाता है और बारिश के साथ लहलहा उठता है. सावन, बारिश, बरखा, मोर, मोरनी, झूला, छतरी, बदरी का आज भी, याने ए सी के जमाने में भी, बोलबाला बरकरार है. यहाँ तो खैर शाम से ही बारिश हो रही है, तब
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Jun 03 2010 06:32 AM
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हे प्रभु!! ये कैसी दुनिया तेरी!

कमर का दर्द, वैसे तो अब काहे की कमर, कमरा ही कहो, हाय!! बैठने नहीं देता और ये छपास पीड़ा, लिखूँ और छापूँ, लेटने नहीं देती. कैसी मोह माया है ये प्रभु!! मैं गरीब इन दो दर्दों की द्वन्द के बीच जूझता अधलेटा सा - दोनों के साथ थोड़ा थोड़ा न्याय और थोड़ा थोड़ा
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दाल, भात और भाटे पालक की भाजी!!!

”अम्मा, खाना लगा दे” ”क्या हुआ, आज जल्दी जायेगा क्या स्कूल?” ”हाँ अम्मा, वो क्लास के पहिले सुदेश की गणित किताब से कुछ प्रश्न उतारने है. उसके पास अंग्रेजी स्कूल की किताब भी है न.” अम्मा जल्दी जल्दी भाप छोड़ते भात, अधपकी छितरी राहर की दाल और लगभग पक गई भाटे
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यशस्वी ब्लॉगर भवः !!

आज दिल्ली में ब्लॉगर मीट हो चुकी है. तरह तरह के विचार रखे गये. ऐसे वक्त में किसी भी और विचार से ज्यादा जरुरी यह विचार हो जा रहा है कि जब लोग इस बारे में कल अखबार में पढ़ेंगे तो ब्लॉग खोलना चाहेंगे. इसी बात को मद्देनजर मैने यह बताता चलूँ कि आजकल जमाना बदल
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बहता दरिया है शब्दों का!!

जबलपुर प्रवास में शायद ही कोई ऐसा सप्ताह गुजरता हो जब हमारी और बवाल की अकेले महफिल न जमें. फिर लगभग हर दूसरे तीसरे दिन कहीं न कहीं महफिल जमीं रहती, कभी लोक गीतों की, कभी गज़लो की तो कभी कव्वालियों की तो कभी कविताओं की, उसमें तो खैर बवाल और संजय तिवारी
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मैं कृष्ण होना चाहता हूँ!!

कोशिश करता हूँ कि जब बारिश होने लगे तब घर के बाहर न निकलूँ. छाते पर बहुत भरोसा बचपन से नहीं रहा, खास तौर पर जब बारिश के साथ तेज हवाएँ भी चलती हों. शायद कोई अनुभव ही रहा होगा जो घर कर बैठा है. भीगने से तो उतना डर नहीं लगता जितना कीचड़ की छ्प छ्प में पतलून
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मेरा लेखन कचरा है!!

दो दिन हो गये सारा घटनाक्रम देखते. ढ़ेर प्रशंसक/ चहेते/मित्र सामने आये माननीय ज्ञानदत्त जी की पोस्ट  पर मेरे विषय में टिप्पणी देखकर. जान पाया सबका प्यार. अभिभूत हुआ, लोगों को इस पर नाराजगी भी हुई कि मैं क्यूँ असभ्यता से किये गये विरोध के बावजूद भी
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अंधड़....

  जब भी सोचता हूँ मैं कुछ पल पा जाऊँ चैन के और सो सकूँ एक रात बिना किसी विचार के बिना किसी इन्तजार के... अपने में सिमटा मैं... तब   जाने कैसे हवा का एक झोंका जान लेता है मेरे इरादों को और आ जाता है बन कर अंधड़ मेरी सोच के घोंसले को उजाड़ने
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बुक्का फूटा..बुक्क!!!

हमारे पास आँखे हैं तो देखने की सुविधा है. मगर हम बस दूसरों को देख सकते हैं. काश!! अपनी आँखों से हर वक्त खुद को भी देख पाते. दर्पण इज़ाद कर लिया है लेकिन दर्पण कब हमेशा साथ रहता है? दिन में एक या दो बार दर्पण देखते हैं वो भी मात्र खुद को निहारते ही हैं.
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४०० वीं पोस्ट और एक गज़ल

आज सुबह किसी कार्यवश ओकविल (मेरे घर से करीब १०० किमी) जाना हुआ. जिस दफ्तर में काम था, उसके समने ही मेन रोड थी, जिस पर साईड वाक बनने का कार्य जोर शोर से चल रहा था. पूरी मिट्टी के जो ढेर लगाये गये थे, उन्हें  बड़ी बड़ी मशीनों से लेवल किया जा रहा था.
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मजदूर दिवस के मजबूर

मजदूर दिवस पर भाषण देने दिल्ली से नेता जी गांव आये. मजदूरों के वर्तमान हालात और उसके सुधार एवं मजदूरों के उत्थान के लिए सरकार की भावी योजनाओं पर खुल कर बोले और वापस चले गये. नन्दु और उसके दो भाई, जिन्होंने तीन दिन रात लग कर सभा स्थल पर मंच का निर्माण
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साहित्य के ध्रुव

एक गांव में सरपंच जी ने बैठक बुलवाकर घोषणा की कि अब अगले माह तक हमारे गांव में बिजली आ जायेगी. पूरे गांव में खुशी की लहर दौड़ पड़ी. उत्सव का सा माहौल हो गया. हर गांववासी प्रसन्न होकर नाच रहा था. देखने में आया कि गांव के कुत्ते भी खुशी से झूम झूम कर नाच रहे
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दिखावे की दुनिया..

अर्थी उठी तो काँधे कम थे, मिले न साथ निभाने लोग बनी मज़ार, भीड़ को देखा, आ गये फूल चढ़ाने लोग... दुनिया दिखावे की हो चली है. कोई भी कार्य जिसमें नाम न मिले, लोग न जाने- कोई करना ही नहीं चाहता. दिखावा न हो तो बस फिर मैं!! जिस भी कार्य में मेरा फायदा हो, वो
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मजहबी विवाद, संप्रदायिकता और ब्लॉग जगत!!

वैसे तो ऐसे मुद्दों पर मैं कभी नहीं लिखता और न ही मुझे इन विषयों में कोई दिलचस्पी है. मगर इधर काफी सारे आलेख पढ़े, हलचल देखी और जाना उन ब्लॉग्स के बारे में जो मजहब और संप्रदायिकता के नाम द्वेष फैला रहे हैं. मेरा कभी इन ब्लॉगस पर जाना नहीं होता, इसलिए
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वैल्यू ऑफ न्यूसेन्स वैल्यू

शाम हो चली. मौसम तो खैर जैसा भी हो, माकूल ही होता है पीने वालों के लिए. सर्दी हो, गरमी हो या बरसात. एक गिलास में मुश्किल से १०% स्कॉच, बाकी पूरा पानी और बर्फ (पानी ही तो है). पिओ और झूमो नशे में. सब कहते हैं शराब के नशे में है. डॉक्टर कहता है जितना हो
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शब्दों के अर्थ: करे अनर्थ

पड़ोस, याने दो घर छोड़ कर एक ग्रीक परिवार रहता है. मियां, बीबी एवं दो छोटी छोटी बेटियाँ. बड़ी बेटी ऐला शायद ४ साल की होगी और छोटी बेटी ऐबी ३ साल की. अक्सर ही दोनों बच्चे खेलते हुए घर के सामने चले आते हैं और साधना से काफी घुले मिले हैं. साधना बगीचे में काम
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एक स्पॉसर्ड आलेख और बिकाऊ कविता

सर्दी की सुबह. घूप सेकने आराम से बरामदे में बैठा हुआ अखबार पलट रहा था गरमागरम चाय की चुस्कियों के साथ. भाई साहब, जरा अपने स्वास्थय का ध्यान रखिये. इतने मोटे होते जा रहे हैं.ऐसे में किसी दिन अनहोनी न घट जाये, आप मर भी सकते हैं. ये बात हमसे तिवारी जी कह
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ये लिजिये विडियो और गिलहरी

रोज सुबह जागकर जब खिड़की के पास आकर बैठता हूँ तो छम्म से एक गिलहरी आकर खिड़की के पास बैठ जाती है. आंगन में खेलती है और थकती है तो फिर खिड़की के पास आकर सुस्ता लेती है. पहले जैसे ही उसकी तरफ देखता था, भाग जाती थी और खेलने लगती थी. फिर थोड़ी देर में आ जाती थी.
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ब्लॉगर मीट- परिवारिक मीट-संगीत संध्या

  कल याने ३ अप्रेल को स्वप्न मंजुषा शैल याने अदा जी का अपने पतिदेव संतोष शैल जी और बिटिया प्रज्ञा के साथ आना हुआ. मात्र ४०० किमी की दूरी तय करने में निर्धारित कार्यक्रम से बस २ घंटे देरी से (रेल्वे के हिसाब से तो राईट टाईम ही कहलाया) आप लोग आये. :)
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समेटना बिखरे भावों का- भाग २

अभी १० दिन पहले ही इसका भाग १ प्रस्तुत किया था. देखता हूँ तो पाता हूँ कि अपने भावों को इतना बिखेर चुका हूँ यहाँ वहाँ कि समेटने में भी समय लगेगा. कुछ और समेट लाये बिखरे भावों को और प्रस्तुत है आपके लिए.   चुप रहना भी कोई, मेरी मजबूरी तो नहीं, हर बात
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प्रेरणा कैसी कैसी!!

  कभी किसी को देख सुन कर वो आपको इतना अधिक प्रभावित करता है कि आपका प्रेरणा स्त्रोत बन जाता है. आप उसके जैसा हो जाना चाहते हैं. ठीक ठीक उसके जैसा न भी हो पाये तो आपको आगे बढ़ने और अभ्यास करने हेतु वो प्रेरणा तो होता ही है. कितने ही गायको के प्रेरणा
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निंदिया न आये-जिया घबराए

  देर रात गये सोने की कोशिश मे हूँ. नींद नहीं आती तो ख्याल आते हैं. अकेले में ख्याल डराते है और इंसान अध्यात्म की तरफ भागता है भयवश. यह इन्सानी प्रवृति है, मैं अजूबा नहीं. आधुनिक हूँ तो आधुनिक तरीके अपनाता हूँ अध्यात्म के. बड़े महात्मा जी का
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समेटना बिखरे भावों का- भाग १

भावों और विचारों का क्या है? वक्त बेवक्त किसी भी रुप में चले आते हैं. कभी दर्ज कर लिया, कभी छूट गये. दर्ज कर लिया तो एक दस्तावेज के रुप में सहेजने का दिल हो आता है. कुछ छोटी छोटी पंक्तियाँ अपनी ही तस्वीरों पर दर्ज कर के कभी ऑर्कुट पर, कभी फेस बुक पर
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शब्दचित्र कलाकृति हैं..

कहते हैं शब्दचित्र कलाकृति हैं, हृदय में उठते भावों के रंग से कलम की कूचि से कागज पर चित्रित. कवि, शब्दों को चुनता है, सजाता है, संवारता है और उन्हें एक अनुशासन देता है कि शब्द अपने वही मायने संप्रषित करें जिनकी उनसे अपेक्षा है. हर शब्द नपा तुला, रचना को
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सो कॉल्ड एलीट ग्रुप

सो कॉल्ड एलीट ग्रुप- तथाकथित अभिजात्य वर्ग. आम लोगों की पहुँच से बाहर. आम जन के मानस पर हर वक्त यह छाया रहता है कि जाने कैसी दुनिया होगी उनकी. एलीट वर्ग में कोई यूँ ही तो नहीं आ जाता-जरुर व्यस्त रहते होंगे. आम जन के बीच बैठ समय बिताने लगें तो फिर काहे के
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इकतारे की धुन...

टू ऊ ऊं ऊं ऊं..टू ऊ ऊं ऊं ऊं.. मन डोले मेरा तन डोले... दिल का गया करार रे.. ये कौन बजाये बांसुरिया इकतारे पर यह धुन बजाता जब वो घर के सामने से निकलता..तो वाकई मन डोल जाता. मिट्टी के दिये का बना वो इकतारा...बचपन से उसकी घुन लुभाती आई. जब भी वो गुजरता,
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यूँ बीत गया समय...

इधर मैं कुछ लिख नहीं रहा हूँ. बिल्कुल चुप! मैं तब भी चुप था, जब उसकी शादी होना तय हुआ था. उस रात चाँद खामोश था और मैं अपनी छत से कूद उसके छतरी वाले कमरे में उसका हाथ थामें बस उसे मौन देखता रहा था. हमारे बीच एक घुप्प सन्नाटा पसरा था और उस छतरी वाले कमरे
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गीला रंग मोहे लगाई दो!!

पिछले साल होली पर यह गीत लिखा था किन्तु इस साल अदा जी की आवाज और संतोष जी की म्यूजिक नें इस गीत में चार चाँद लगा दिये. बिना किसी की भूमिका के आप आनन्द उठायें.   चढ़ गया रे फागुनी बुखार, गीला रंग मोहे लगाई दो!! रंग लगा दो, गुलाल लगा दो, गालों पे मेरे
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Mar 02 2010 05:30 AM
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ऑपरेशन कनखजूरा

बड़े आदमी की पूछ है, छोटे को कौन पूछे. -यही चलन है. पी एम साहब का घुटना मायने रखता है क्षण क्षण की रिपोर्ट मीडिया दिखाता है. अमरीका से डॉक्टर आता है. आज आराम मिला, आज घुटना बदला, कल से काम पर लौटेंगे, हर बात की रिपोर्ट जारी होती है और एक आम आदमी भूख से
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आओ!! तुम्हें सम्मान दिला दूँ!!

अरे साहब, आज की इस भागती दौड़ती जिन्दगी में सुकून कहाँ? समय ही नहीं मिल पाता. आजकल यह जुमला बड़ा आम हो गया है और सभी को अपनी नाकामियों और गल्तियों को छुपाने में साहयक सिद्ध हो रहा है. मैं समझ नहीं पाता कि फिर इतनी भागती दौड़ती जिन्दगी में इन्सान लड़ने झगड़ने
Feb 22 2010 05:30 AM
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सहेजने का महत्व: विल्स कार्ड भाग ९

पहले की तरह ही, पिछले दिनों विल्स कार्ड भाग १ , भाग २ , भाग ३ ,भाग ४ , भाग ५ भाग ६ भाग ७ और भाग ८ को सभी पाठकों का बहुत स्नेह मिला और बहुतों की फरमाईश पर यह श्रृंख्ला आगे बढ़ा रहा हूँ. (जिन्होंने पिछले भाग न पढ़े हों उनके लिए: याद है मुझे सालों पहले, जब
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Feb 18 2010 04:19 PM
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शाही स्नान: मुक्ति घाट पर

शायद इन्सानी फितरत है. हर इन्सान मुक्ति चाहता है. हर इन्सान शांति चाहता है और इसी तलाश में और अधिक उलझता चला जाता है. क्या हमें सही मार्ग ज्ञात नहीं? हो सकता है कि सही मार्गदर्शक न मिल पाता हो. अव्वल तो हम ठीक ठीक परिभाषित ही नहीं कर पाते कि हम चाहते
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Feb 15 2010 07:47 AM
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एक कहानी: एक कविता

जाने किस आहट से नींद खुल जाती है.कोई थकान नहीं, शायद नींद पूरी हो गई. खिड़की के बाहर झांकता हूँ. सफेद रात. जहाँ तक नजर जाती है, बरफ ही बरफ और रुई के फाहे की तरह गिरती लहराती बरफ अभी भी थमी नहीं है. घड़ी पर नजर डालता हूँ. ३ बज कर १० मिनट. अब फिर से सोने की
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Feb 11 2010 05:30 AM
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बिजली रानी, बड़ी सयानी

  अन्तर्राष्ट्रीय पत्रिका “हिन्दी चेतना” , हिन्दी प्रचारणी सभा कनाडा की त्रेमासिक पत्रिका है. साहित्य जगत में अग्रणी स्थान रखने वाली इस पत्रिका के संरक्षक एवं प्रमुख सम्पादक श्री श्याम त्रिपाठी, कनाडा एवं सम्पादक डॉ सुधा ओम ढींगरा, अमेरीका हैं. हाल
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महिला सशक्तिकरण: गजब हो गया!

नारी सशक्तिकरण-यह आंदोलन और सोच विश्वव्यापी है. अफगानिस्तान जैसा देश, जहाँ यह एक आम नजारा है कि एक पुरुष आगे चले और उसकी ४-४ बेगमें उस पुरुष का अनुगमन करती उसके पीछे बुरका पहने एक लाईन में चलती दिखें . महिला अधिकार, महिला सशक्तिकरण, नारी मुक्ति जैसे
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ज्ञानदत्त जी की पगली पोस्ट से पगलिया तक

मैने पाया है कि श्री ज्ञानदत्त पाण्डे जी की मानसिक हलचल  उनके लिए मानस में चाहे जो भी हलचल मचाती हो मगर उसका एक रुप दूसरे के मन में हलचल मचाने का हमेशा रहता ही है. कभी मुझे लगता है कि अगर वो ब्लॉग और रेल नौकरी की बजाय राजनीति में हाथ आजमाते तो आज
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