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20 May 2010
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मैं कवि बन गया ......

तुम ग़ज़ल बन के जो,आ गयी सामने |बस तुम्हे पढके ही,मैं कवि बन गया |तेरी हर इन्द्रियाँ,यूँ थी अनुपात में |देखते देखते ही,नज़म गढ़ दिया |तेरे यौवन कि मदिरा,बही इस तरह |घूरते-घूरते मैं,कहीं बह गया |होंठ से दाँत कि,जंग को देख कर,क्या बताऊँ तुम्हे,मैं कहाँ खो
 
Tapashwani Anand
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TAPASHWANI

जो कुछ भी हूँ बस तुमसे हूँ, तुमरे बिन मेरा कौन सहारा |धन्य हुआ यह जीवन पा के,गर कुछ कर पाऊं भाग हमारा |मदर's day ki hardik shubh kamnaye...HAPPY MOTHER'S DAY
 
Tapashwani Anand
May 09 2010 01:51 AM
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कुछ अधूरे पन्ने

1: चैन से सोते थे हम,जब घर में दरवाज़ा ना था |जब से पहरेदार रखे,नींद भी आती नहीं |2: देख  कर  उनको  कदम ,रुकने  लगें  क्या बात  है |सोचने  को  हैं  विवश,क्या  यार  तुममे  खास  है
 
Tapashwani Anand
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मैं भुला नाम अपना भी

किताबों को लगा दिल से,वो पहली बार जब आई |मैं भुला नाम अपना भी,चली कुछ ऐसी पुरवाई |वो चलना यार झुक कर के,हवा के वेग के जैसा |मैं भुला नाम अपना भी,वो जब भी सामने आई |बहुत चंचल हुआ करता था,मैं भी उन दिनों में पर |नहीं कुछ बोल पाया मैं,वो जब भी सामने आई |
 
Tapashwani Anand
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क्या धाकुं क्या तोपूँ

किसी कि भावना को आहत करने या किसी को उपदेश देने का मेरा कोई इरादा नहीं है |ये पंक्तियाँ आज के परिवेश में फैशन कि वो तस्वीर दिखाना चाहती है जिससे हम मुह तो फेर सकते है पर नकार नहीं सकते. अगर किसी समूह या समुदाय को मेरी बातें ठीक ना लगे तो उन्हें अपना
 
Tapashwani Anand
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भावनाए

भावनाए .............धन्यवाद् 
 
Tapashwani Anand
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भीड़ जो अच्छी लगी, मैं यार उसमे खो लिया

मन में झांके हर किसी के,यार ये मुमकिन ना था |तन से जो सुन्दर लगा,हम यार उसके हो लिए |एक घडी में हर किसी को,जान ले मुमकिन ना था |एक नजर में जो जँचा'हम यार उसके हो लिए |वो जो प्यार का  था रास्ता,मेरे लिए तो  नया ही था |चले डगमगा के जिधर
 
Tapashwani Anand
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हमको कोई खतरा नहीं??????

गंध बारूदों कि अब,आने लगी हर मोड़ से |कह रहा है हर कोई,हमको कोई खतरा नहीं |यहाँ धर्म भाषा जाति कि,चिन्गारियाँ  बिखरी हुई  |पर कह रहा है हर कोई |मुझको कोई खतरा नहीं |अब पडोसी तक दखल,देता है हर एक बात में |पर कह रहा है रहनुमा,उनसे
 
Tapashwani Anand
Mar 07 2010 03:49 PM
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पिताजी के आँखों से बनारस कि सैर

वैभव नाथ शर्मा जी के आँखों से बनारस देख कर मुझे अपने पिताजी कि कुछ पंक्तियाँ याद आ गयी | पिताजी के सामने मेरी बिसात कुछ भी नहीं है एक  अदना सा प्रयास पिताजी के भावों और जस्बातों को अपने ब्लॉग पर उड़ेलने कि | आईये पिताजी के नज़रों से आप सभी को बनारस
 
Tapashwani Anand
Feb 27 2010 10:43 AM
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कितनी दूर निकल आया ?

पाँव जमीं पर रख करके,कल ही तो चलना सीखा था |नन्हे नन्हे कदमो से मै,कितनी दूर निकल आया |गुड्डे गुड़ियों के किस्से,मानो कल कि ही बातें थी,मै अपनो के दामन  से,ये कितनी दूर निकल आया |नींद  नहीं आती थी  मुझको,माँ कि
 
Tapashwani Anand
Feb 21 2010 05:38 PM
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TAPASHWANI

गूगल पर देख कर खुद को,जो फूटें गुलगुले दिल में |बताऊँ हाल क्या अपना,लगे हफ्तों उबरने में  |
 
Tapashwani Anand
Feb 20 2010 11:37 PM
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तेरे इस बाज़ार में मौला

तेरे इस बाज़ार में मौला,बस चिकनी चीजे बिकती है |मन चंचल हो जाये जिससे,बस वो सूरत ही दिखती है |यहाँ बेच रहा है हर कोई,अब तेरे मेरे सपनों को |हो सौदा यहाँ मुनाफे का,फिर वस्तु चाहे  जैसी हो |विज्ञापन से आज यहाँ,सब मुमकिन हो जाता है|जब
 
Tapashwani Anand
Feb 11 2010 08:41 PM
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कैसे लिखूं और क्या लिखूं

कैसे लिखूं और क्या लिखू,ये कौन बतलाता मुझे |सोच में है क्या कमी,ये कौन  समझता मुझेदोस्त दुश्मन और खुद मै,खुद से इतना दूर था |जो लिख रहा हूँ वो सही है|कैसे समझ आता मुझे |कहने को तो मौके कई,आए स्वतः ही सामने |अहमियत हर बात कि,फिर कौन समझाता मुझे
 
Tapashwani Anand
Feb 07 2010 09:33 AM
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वो पौध घर के साथ हमने ही लगायी थी |

एक पेड़ के छांया ने फिर हमको पनाह दी,जिस पेड़ के जड़ ने मेरी दिवार ढाई थी |टुटा जो मेरा आसियाँ गलती न थी उसकी,वो पौध घर के साथ हमने ही लगायी थी |फिर मुस्कुरा के जी सकूँ इतनी से चाह ले,आ गया सब छोड़ कर इसकी पनाह में | सिकवा गिला नहीं न कोई रंजिसे
 
Tapashwani Anand
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बाँट लो अपना घरौंदा

फायदा क्या साथ रहने में,यहाँ फिर बे-सबब |जब लगे बर्तन खनकने,यार हो जाओ अलग |जब सिर्फ अपनी बात ही,सबको सही लगने लगे|बाँट लो अपना घरौंदा,ताकि हंस कर मिल सके |बात एक दूजे कि जब,कान में चुभने लगे,मौन ब्रत धर  लो वहां,ताकि सुकून से
 
Tapashwani Anand
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ये गहरी खाइयाँ क्यूँ है |

ख़ुशी के समन्दर में,ये गम के बुलबुले क्यूँ है |अपनों के इस  भीड़ में,हम यहाँ तन्हा क्यूँ है|यूँ तो सूरज रोज आता है, मेरे दर पर हर सुबह| फिर भी मेरे दर पर, ये घोर अँधेरा क्यूँ है |साथ चलने से यूँ
 
Tapashwani Anand
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समस्या ही समस्या है

समस्या ही समस्या है, कहो कैसे गिनाए हम | यूँ ही काग़ज़ पर लिख दे, या मौखिक ही सुनाए हम | जो भी आता है बस, वादों की गठरी बाँध जाता है| बहुत कुछ है भरा इसमे, कहो कैसे उठाए हम | हमारे गाँव मे भी है , गड़े बिजली के कुछ खंबे | इनायत हो अगर उनकी , तो कुछ र
 
Tapashwani Anand
Dec 29 2009 11:46 AM
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देवदास सा मैं पागल

न मदिरा कि प्यास मुझे, ना काम बिना मदिरा चलता | न देवदास सा मैं पागल  , न बिन पारो ही मन लगता | ग्वालाये रास नहीं आती, नाही राधा ही मन भाती | न कोई स्वर्ग कि चाह मुझे, न बिना मेनका आँख लगे | व्यथा मेरी सुनकर अक्सर, संसार ये कहता है हंस
 
Tapashwani Anand
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अब प्रयोगों से ही पैदा, हो रहा है आदमी

आदमी औरत का संगम, दशकों  पुरानी बात है | अब प्रयोगों से भी, पैदा हो रहा है आदमी | जोडियाँ बनती हैं ऊपर, वर्षों पुरानी बात है | आज कल तो मर रहा है, आदमी पर आदमी | मूर्खता कह लो इसे, या प्रेम कि पराकास्ठा | भौतिक सुखों कि चाह ले, दुनियाँ
 
Tapashwani Anand
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अब इंतज़ार किसका है

क्यूँ इंतजार है हमें, रहनुमा का अब भी | खून से लतफत, ये देश हमारा भी है | कब तलक फिर  दोष, हम  देते  रहेंगे उनको  | कीचड़ में सना देश, आखिर तो हमारा भी है | अधिकार सिरोधार्य है , जब नागरिक है हम | सर गर्व से ऊँच
 
Tapashwani Anand
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दुनिया बदलने वाली है

मन तरंगों संग हिलोरे , ले रहा है आज कल | कौन जाने कौन सी, दुनिया सवरने वाली है| | घुप्प अँधेरे रात में, बिजलियों की ये चमक | ये इशारा कर रही है, रात छटने वाली है | | बाग में पीपल के पत्ते, गिर गए तो क्या हुआ, अब कपोलों की छटा, हर और दिखने   वाली
 
Tapashwani Anand
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डर क्यूँ है?

अकेला ही चला था, साथ अपनो का तज के| जो मेरे साथ न था, फिर उससे शिकायत क्यूँ है? जब मैं यहाँ हर मोड़ पर, अपनो से बचता आया हूँ| आज इस मोड़ पर , अपनों कि जरूरत क्यूँ है? जब नहीं सोचा कि, अंजाम क्या होगा इसका | आज उसी सोच से, आनंद मुझे घिन्न क्यूँ है? छु
 
Tapashwani Anand
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मर्यादा और संसद

जुते चप्पल चला रहे हैं, न्याय के ठेकेदार यहाँ | मर्यादा का चिर हरण, है सदनों का पर्याय यहाँ | शर्म नहीं जिनके अन्दर ये ऐसे बड़े कलंदर है | जो फूंके घर खुद अपना, ये वो कलाबाजी बन्दर हैं | स्तर उठा रहे संसद का, ये अमर्यादित वचनों से | फूंक रहे जनता कि
 
Tapashwani Anand
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नाम फैशन का

जब से दुनियाँ आपको , आधुनिक कहने लगी | बस उसी पल से तुम्हारी , बिजलियाँ गिरने लगी | तन ढाका करता था पूरा, जब तलक आभाव था | अब बचे कतरन से दौलत , बे-सबब बहने लगी | मेरी सराफत भी उन्हें , अब चाल सी लगाने लगी | जब से घर की लाज बाहर, रात तक रहने लगी | दा
 
Tapashwani Anand
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सपथ ग्रहण या ' ग्रहण '

फ़ुट रहे हैं लड्डू दिल में, ख़त्म हुआ मतदान | सरे मुद्दे भूल के आओ , हम फिर टकराए जाम | सही गलत की चर्चा छोडो, यहाँ से नोचो वहाँ पे जोडो | पांच साल का समय बड़ा है, गठबंधन से धन गठीयालो | तुमने मुझपर मैंने तुम पर, कीचड़ खूब उछाला है | चलो बदल लें कूर्
 
Tapashwani Anand
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किसका कुर्ता है सफेद,

किसका कुर्ता है सफेद, ये भेद बताने आया हूँ मेरा कुर्ता सबसे सफेद, ये तुम्हे बताने आया हूँ | चोर उच्च्को की टोली ले इस चुनाव मे आया हूँ | राम राज़ का सपना अपना, मैं तुम्हे दिखना आया हूँ | बंद करूँगा केस सभी, जो खुले हुए है थाने मे | दबा के रखूं मैं पै
 
Tapashwani Anand
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चुनाव और मुद्दा

किसी को बाबरी का गम, कोई मस्जिद बना रहा | है वक़्त वादों का सो, हर कोई सपने दिखा रहा | तुरत रंग बदलने का हुनर, यहाँ अब पास है सबके | जो कल तक साथ था , वो ही यहाँ खंजर चला रहा | है जिसका सोचने का काम, वो बस सोचता रहे | उन्हें फुर्सत नहीं इतनी , की वो
 
Tapashwani Anand
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इश्वर या खुदा

क्या हुआ मस्जिद गिरा के, जब न मंदिर बन सका | तेरे आपसी षडयंत्र से , बिन छत के मौला रह गया | मेरे लिए जो राम है, तेरे लिए रहमान है | अंतर था केवल नाम का, जिससे खुदा तक बँट गया | सोचा न था उसने कभी, जिसने दिया था जन्म फिर, क्यूँ हाँथ में तलवार ले , भाई
 
Tapashwani Anand
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नीरज: बिजलियां टूटी कहां हैं आपके घर पर अभी

नीरज: बिजलियां टूटी कहां हैं आपके घर पर अभी
 
Tapashwani Anand
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विनोद दूआ LIVE

है रूतबा और गुण भी है, सच बोल सके ये दम भी है | बस 20 मिनट,हफ्ते मे 4 दिन, शायद समय थोड़ा कम है | इस बड़े भारत देश मे, हर मोड़ बदलता ज़ायक़ा | कौन है जो कम समय मे, फैला सके इतना रायता ? परिवर्तन की आँधी है ये, लुक्का छुप्पि बहुत हुआ | आने वाला कल बेह
 
Tapashwani Anand
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बिष उगलता आया हूँ

में नदी के नीर सा, बहता गया एक ओर अनगिनत सपनों से होकर, मैं बहा किस ओर | मैं बहा किस ओर , मुझको क्या ख़बर है, मंजिल की दिल में चाह, सिने में सबर है | उद्गम में जो उन्माद था, कुछ थम सा गया है | अंत का साया भी, कुछ गहरा गया है हर किनारे पर कई सपने सजा
 
Tapashwani Anand
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अच्छा लगा ...आनंद

हर गली हर मोड़ पर जो भी मिला अच्छा लगा बंद कलियाँ भी मिली कोई फूल सा खिल के मिला कुछ फूल काँटों संग मिले कुछ फूल बिन काटों मिला पर इस कड़कती धुप में जो भी मिला शीतल लगा | कुछ मिले धब्बो के संग कुछ लोग रंगों संग मिले पर इस मतलबी भीड़ में जो भी मिला हंस
 
Tapashwani Anand
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कुछ ऐसी ग़ज़ल बनाओ

सब भाव यहाँ मिल जाएँगे, शब्दों के जाल बनाओ अब | जिससे भर जाए आंखे , कुछ ऐसी ग़ज़ल बनाओ अब | तेरा मेरा है अजर-अमर , रिस्तो के बाँध बनाओ अब | जिससे सज जाए अम्बर, एक ऐसा गाँव बसाओ अब | हर दुआ असर दायक होगी, मन्नत का दौर चलाओ अब, जिससे भर जाए दामन , कुछ
 
Tapashwani Anand
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शब्दों का षडयंत्र

कभी-कभी ये शब्द मेरे, मुझसे बेईमानी करते है| ख़ुद को इधर उधर करके, कुछ अनचाहा सा गढ़ते है | भाव का होता है आभाव, रस अलंकार से लड़ते है | कभी कभी पन्ने मेरे , कुछ चितकबरे से दिखते हैं | पहले मैं यही समझता था, मैं जादूगर हूँ शब्दों का | पर उलझाकर ये मुझ
 
Tapashwani Anand
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भेज़ा फ्राइ

पंसारी के दूकान मे,पनवारी के पान मे, मोची के जूते मे, गाय के खूटे मे, महीने के राशन मे, नेता के भाषण मे, पंडित के झोली मे, बोली ठिठोली मे, फिल्म की कहानी मे, रात मच्छरदानी मे, झूठे अस्वासन मे,अपनो के शासन मे, परीक्षा के प्रश्नो मे, साधू के वचनो मे, द
 
Tapashwani Anand
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किसकी सत्ता......साधू कौन

अभी शुरुआत है, ना जाने कितने तीर छुपा रखे है | हमने इस चेहरे पर,ना जाने कितने चेहरे लगा रखे है | वो जो दौरे भगदड़ थी, उसकी बिसात कुछ भी नही, तुम्हारे वास्ते हर घर मे नया जाल बिछा रखा है | मुझे तू जनता है, ये भूल है और कुछ भी नही, हमने कितनो को, इसी भ
 
Tapashwani Anand
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कोई सरफिरा

कभी मेरे हाथो मे भी हाथ होगा , कोई सरफिरा तब मेरे साथ होगा | अकेला हूँ मैं, राह भी कुछ बड़ी है, कभी मेरे पीछे भी संसार होगा | भले राह मे आज काँटे बिछे हो, कभी तो ये राहें आ मुझसे मिलेंगी | भले सारी नदियाँ हो उफान पर अब, कभी तो ये सागर से ही जा मिलेंग
 
Tapashwani Anand
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समंदर से कर दुश्मनी........

समंदर से कर दुश्मनी, मैं किनारों पर सपने सुखाता रहा | हर लहर यूँ तो दुश्मन घरौंदो की थी, वो मिटाती रही मैं बनाता रहा | खिचता था लकीरे किनारों पर मैं, पर साहिल पर मुझको भरोशा ना था | ख्वाब अपने भिंगो करके अश्को से मैं, कल के गाल मे ही चुपाता रहा | जब
 
Tapashwani Anand
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कुछ बंदीसे

दिल के हर अहसास को, हम काश कह पाते | उमड़े हुए हर भाव को, कागज पर लिख पाते || बहुत कुछ दिल मे है मेरे, जो ऐसे कह नही सकता | बड़ी मुस्किल है बिन बोले भी, मैं अब रह नही सकता || मगर कुछ बंदीसे ऐसी है, जो मुझे भी रोकती है | अगर अपनी पर आजाए, तो सरहद चीज़
 
Tapashwani Anand
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प्रण ये भी उठाकर चलिए...

जो भी मिल जाए उसे दोस्त बनाते चलिए, फ़िज़ा मे अमन का एक फूल खिलाते चलिए | खिलखिला के हो रुख्सत जो मिले अब हमसे, अपने कंधो को आँसुओ से भिगोते रहिए | यहाँ बिखरी हो किल्कारियाँ मोती की तरह, पड़े जो राह मे उसे भी गोद उठाते चलिए | हर घर मे उजाला हो फिर मक
 
Tapashwani Anand