0
मैं कवि बन गया ......
तुम ग़ज़ल बन के जो,आ गयी सामने |बस तुम्हे पढके ही,मैं कवि बन गया |तेरी हर इन्द्रियाँ,यूँ थी अनुपात में |देखते देखते ही,नज़म गढ़ दिया |तेरे यौवन कि मदिरा,बही इस तरह |घूरते-घूरते मैं,कहीं बह गया |होंठ से दाँत कि,जंग को देख कर,क्या बताऊँ तुम्हे,मैं कहाँ खो
- 11 00 टिप्पणियां [1]
May 20 2010 10:55 PM


Shuffle








