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कुमार आशीष

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21 May 2010
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तेरे हाथो से

लिखी है मौत मेरी गर्चे तेरे हाथो सेकहाँ था तू जिसे मैं ढूँढता रहा अब तकअगर नहीं तो कहीं और वक्‍त ज़ाया करझुका सका ही नहीं कोई भी ये सर अब तक
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समरसता

हो जहाँ जनतामगर जन-ता न होतन्‍त्र के एकक मेंनिर्भयता न होहो, न हो, कुछ तोविलक्षण है जरूरराज हो अपनों कासमरसता न हो...
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हम गोद में जिनके हैं

ये लोग उम्‍मीदों को चुटकी में मसल देंगे.. गुलशन में क़तल करके चुपके से निकल लेंगे.. हम कुछ न कहें लेकिन हर हाल में ये तय है हम गोद में जिनके हैं वे हमको निगल लेंगे..
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पर्दाफाश

दहक रहा है देश स्‍वार्थपरताओं के चलते ठगी खड़ी है मानवता बस हाथों को मलते हिंसा नंगी नाच रही है हौव्‍वा बन करके अपनी परछाईं से सहमे कटते रहो..मरो.. ... या बढ़कर आतंकवाद का पर्दाफाश करो।
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अंगरेज

ये रोज़मर्रा की परछाइयों का जंगल है यहां हवायें अगर तेज हैं तो अच्‍छा है हम ऐसे लोग यहां बर्फबारी करते हैं हमें समझते सब अंगरेज हैं तो अच्‍छा है...
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दीप

हुआ कभी जो उसको हमको फिर दुहराना है.. तिरा शिलायें जल पर सागर पार कराना है.. दीवाली पर हमने जो ये दीप सजाये हैं, बाती से लौ का रिश्‍ता वो बहुत पुराना है...
Dec 29 2009 11:40 AM
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प्रकाशपर्व

हमने मनाया झूम के कुछ यूं प्रकाशपर्व जीवन ही सारा आरती की तरह सज गया बाहों में हमने कर लिया तारों भरा आकाश बरबस सा चांद झील में गहरे उतर गया
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माखनचोर

माखनचोर बनाये प्रभु को प्रभु की चोर आप खुद दुनिया देखो क्‍या-क्‍या रंग दिखाये खोकर अपनी सुधबुध दुनिया
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निशांदेही

तेरी आंखें शिकारियों सी सधी मेरे मन के पटल पे तैर गयीं नींद चिंहुकी तो, पाया जैसे इन्‍हें मुद्दतों से तलाश मेरी थी कितने जन्‍मों की प्‍यास थी कि जिसे सातवें आसमान की थी खबर रूह के साथ जिसकी जद्दोजहद रूह के आरपार तैरी थी और फिर सिर्फ जिसके ही खातिर बू
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मां की वह कोख

जो आजाद होकर के होना था ऐसा तो उससे हमारी गुलामी भली थी नजर तो चुराना न था एक दूजे से नफरत तो दिल में न ऐसी पली थी कभी भाई हमने ये सोचा नहीं था कि कि अब अस्‍पतालों में होंगे धमाके जो जांबाजी का सिर्फ यह नमूना तो फिर मां की वह कोख खाली भली थी जो आजाद
Dec 29 2009 11:40 AM
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सब्र

एक दिन सब्र का तोहफा मिला हमें कश्‍मीर दोस्‍तों, सब्र में सेहत भी है, मिठास भी है।
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बीता है जो

जो बोले है मुझमें से 'मैं' वह मुझमें या कहीं और है जीवन का आखिर सच क्या है 'होना' खुद में किस बतौर है खुली हुई पलकों का सच ही सच-नगरी का महापौर है जीवन लुभा रहा है खुद को लिए हाथ में एक कौर है यह तो हर्जाना है दिल का बीता है जो, तुम्हें गौर है?
Dec 29 2009 11:40 AM
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निगहबां

मैं चाहता हूं ये हो साथ साथ वो भी हो पर जिसमें रजामंदी हो मर्जी भी तेरी हो हमको बताइये कि हम हों गुनहगार क्‍यूं अच्‍छा हो या बुरा हो निगहबां तो तुम ही हो।
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करम के लेख

एक आंख कुछ और देखती है दूजी कुछ देखे एक करम के लेख बांचती दूजी पल-पल जोखे पल-पल धोखे खेल तमाशे भीड़भाड़ दुनिया की बढ़ते जाओ भी बस आगे खुद को रोके-रोके
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इक नन्‍हा यकीं

वो हर जर्रे में है मौजूद ये होली बताती है.. बताती है कि इक नन्‍हा यकीं क्‍या गुल खिलाता है.. ..बगावत है जरूरी आड़े वालिद ही न खुद क्‍यूं हो है वाजिब जंग जब हैवान कोई जुल्‍म ढ़ाता है ..अजब फितरत है मगरूरी कि इसकी जज्‍ब में आकर अकड़कर खाक का पुतला खुदी
Dec 29 2009 11:40 AM
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मुसाफिर

हमीं नहीं हैं मुसाफिर... हैं चांद सूरज भी दरअसल, पार हमें जुस्‍तजू को करना है... हमारे जेहन में पलती है जुगनुओं की तरह उसी की कौंध में अब हमको वजू करना है
Dec 29 2009 11:40 AM
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तनिक ठहर कर

अपनापन जैसा जो हममें है उसको आंखों से देखें आओ देखें हम जो नहीं हों तो आखिर फिर बचता क्‍या है हम जिसको कहते हैं जीवन मौत कि जिससे घबराते हैं अन्‍तर्मन की ज्‍योति जलाकर देखें आखिर पर्दा क्‍या है नचा रहा है हमें मदारी जो बंदर जैसा दुनिया में आओ तनिक ठह
Dec 29 2009 11:40 AM
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कुतूहल

द्रुत गति से बहती सरिता की कलकल है या विस्‍मय के होठों पर ठहरा पल है काश, कभी आगे भी इसके जान सकूं अभी तो नारी मेरे लिए कुतूहल है
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हक

वक्त जिससे कि सभी डरते हैं खुद वो हक को सलाम करता है। उस पर हर रहमतें बरसती हैं इश्क जिस पर मुकाम करता है।
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ओ जयन्‍त

धमाकों में सिकुड़ जाता है मन थोड़ा सा ...ज्‍यादा फैलता है ओ जयन्‍त, याद है कुछ... चक्षु-विक्षत चरण सीता के तुम्‍हारे दृगों को फिर संतुलित होने न देंगे.. कहां भागोगे किधर जाओगे आखिर भागकर तुम सींक जब बन जायेगी शर राम का, तब कौन देगा आश्रय फिर ओ जयन्‍त
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उसे छू ना सकोगे

वो जगह हलचल जहां कोई नहीं है है दिलों के बीच दिल के तार जुड़ते हैं जहां आपस में उसका अक्‍स उसके नक्‍श हर दिल में निहां हैं.. ..उसे छू ना सकोगे इस तरह विस्‍फोट करके तुम ..जो कुछ तुम सोचते हो.. क्‍या उसे झकझोर पाओगे.. कंटीली झाडि़यों की तरह बस झर जाओगे
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धमाकों में सहमी

जहां लोगों के दिल मुहब्‍बत से खाली जहां दुनिया रहमोकरम की सवाली जहां पैसे वाले गरीबों को देते भर कर पटाखों में कस करके गाली दिवाली ये वो पहले वाली नहीं है धमाकों में सहमी हुई है दिवाली ये झूठी दिवाली ये झूठी दिवाली
Dec 29 2009 11:40 AM
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कातिल

रोशनी झरती हुई हो जिसके कदमों के तले ...प्‍यास, इक उतरी हुई दरिया कि जैसे बह चले प्‍यास जो छेड़ो तो धुन सरगम के बिखरेंगे हुजूर प्‍यास जो कौंधे तो फिर कातिल से मिलती है गले
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गो कि

दिल के हलकों में छुपी गहराइयाँ और हर सूँ ढेर सी रुसवाइयाँ लौ सरीखी रात भर हिलती रहीं आँसुओं की भाप में सच्‍चाइयाँ दिल ने नज़रों में उतर करके कहा आइनों में सिर्फ हैं परछाइयाँ मुझको आखिर ले चलोगे किस तरफ छूट जायेंगी मेरी तनहाइयाँ जज्ब की मुझमें ही है श
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अन्‍धी

रूप के परे मैं हूं आग क्‍या बिगाड़ेगी रोशनी तो मेरी है वरना आग अन्‍‍धी है...
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इम्‍तेहान

वफ़ा के पैरों में अब तक थकान बाकी है न जाने कौन सा फिर इम्‍तेहान बाकी है हमारे डैनों ने चीरे हैं बादलों के बदन हमारे पैरों तले आसमान बाकी है...
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इंतिखाब

दिल की उजली सी धूप में तुमको कितना खामोश खुद में देखा है एक लम्‍हे की प्‍यास थी जिसको एक सैलाब इंतिखाब मिला