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मन पखेरू फ़िर उड़ चला

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26 Jan 2010
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धरती का गीत

धरती पर फ़ैली है,सरसों की धूप-सी धरती बन आई है, नवरंगी रूपसी ॥ फ़ूट पड़े मिट्टी से सपनों के रंग नाच उठी सरसों भी गेहूं के संग। मक्की के आटे में गूंथा विश्वास वासंती रंगत से दमक उठे अंग। धरती के बेटों की आन-बान भूप-सी धरती बन आई है,नवरंगी रूपसी॥ बाजरे की
 
सुनीता शानू
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किस पर किया विश्वास

ऎक कविता के माध्यम से कुछ कहना चाहा है...देखिये सफ़ल भी हुई हूँ कि नही... फ़िर चली आँधी कि उड़ चले पत्ते सभी चरमराया पेड़ ऒ कुछ डालियाँ भी टूटे तभी चीं-चीं, चीं-चीं की चीत्कार जब फ़ैली आकाश में हो गई तत्काल गुम किसी अविश्वास में जैसे गिरा घोंसला उसका टूट
 
सुनीता शानू
Dec 29 2009 11:43 AM
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एक गज़ल

अब ये रस्में-मोह्ब्ब्त भुला दीजिये उनके ख्वाबों को दिल से हटा दीजिये अश्क आँखों में देकर ये कहते हैं वो चाहतों को भी अपनी भुला दीजिये कल ही महफिल में रुसवा किया था हमें अब वो कहते है हमको वफ़ा दीजिये अपने ही जिस्म में अब न लगता है मन उनके दिल को कोई घ
 
सुनीता शानू
Dec 29 2009 11:43 AM
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पलकें बंद हो गई...

आँखों ने आँखों से कह दिया सब कुछ मगर जुबाँ खामोश रही... जब दिल ने दिल की सुनी आवाज़ धड़कन खामोश रही... आँखो के रास्ते दिल में उतरने वाले ऎ मुसाफ़िर अब बाहर जा नही सकते तुम्हारे प्यार की खुशबू से तृप्त उठती गिरती साँसे देख कर अब पलके बंद हो गई... सुनीता
 
सुनीता शानू
Dec 29 2009 11:43 AM
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एक कविता....

दोस्तों कल एक कविता सुनाने का मौका मिला ...आपके सामने प्रस्तुत है... आज़ादी की होली पहन वसन्ती चोला निकली मस्तानो की टोली आजादी की खातिर खेली दिवानों ने होली आज सजा है सर पे उनके बलिदानो का सेहरा चाँद सितारों से मिलता है नादानों का चेहरा आँख में आँसू
 
सुनीता शानू
Dec 29 2009 11:43 AM
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फ़ागुन आया झूम के...

दोस्तों होली का त्यौहार आप सबके जीवन में खुशियाँ लाये यही मनोकामना है... भंग की तरंग ढोलक और मॄदंग होली के रंग नाचे संग-संग ..... फ़ागुन के दोहे डाल-डाल टेसू खिले,आया है मधुमास, मै हूँ बैठी राह में,पिया मिलन की आस। हो रे पिया मिलन की आस फ़ागुन आया झूम
 
सुनीता शानू
Dec 29 2009 11:43 AM
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मै और तुम

एक औरत और नदी में क्या अन्तर है? क्या उसका अपना अस्तित्व बाकी रहता है समुन्दर रूपी पुरूष से मिलकर ? क्या विवाह के बाद भी वह, वह रह पाती है जो पहले थी? क्यों उसे ही बदलना पड़ता है, यहाँ तक की जन्म से जुड़ा नाम तक बदल जाता है... - मै और तुम- -बँध गये हैं
 
सुनीता शानू
Dec 29 2009 11:43 AM
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वेलन्टाईन डे...

वेलन्टाईन डे पर संत वेलनटाईन को मेरी श्रद्धांजली.... रोक सकेगा कौन इन्हे ये आंधी और तूफ़ान है चल रहे है भेड़ चाल ये आजकल के नौजवान है... पहले पहल ये परफ़्यूम देकर अपना प्यार दिखाते है किस डे पर भी किस देकर सबसे प्यार जताते है हग डे पर भी गले मिलकर बन जा
 
सुनीता शानू
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कुछ पुरानी यादें...

कुछ पुरानी यादें...धूमिल न हो जाये...आईये ले चले कुछ हँसने -हँसाने... आज हम भी कोशिश करते है ... तस्वीरे क्या बोलती है... कौन कहता है कि मुझमे लचक नही... मुसाफ़िर भाई ध्यान से कहीं कमर में झटका न आ जाये...:) खलिश भाई यह आपके लिये ही है... देखिये तस्वी
 
सुनीता शानू
Dec 29 2009 11:43 AM
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एक नन्हा सपना

मन के आँगन की माटी को सौंप दिये अरमानों के बीज सौंधी खुशबू से लिपटे आशाओं के पानी से सीँचें स्वर्ण किरणों ने प्यार उड़ेला तब नन्हे-नन्हे अँकुर फ़ूटे मीठा-मीठा कोमल मखमली कोपल के जैसा अहसास हृदय में जागा विश्वास ने जड़े फ़ैलाई सुन्दर मधुर संगीत लिये फ़ैलात
 
सुनीता शानू
Dec 29 2009 11:43 AM
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दीपावली की शुभकामनाएं

शुभ-दीपावली सुबह का सूरज ले आया खुशियों की सौगात पूरे होंगे अरमां सारे जागेगी सारी रात नन्हा सा एक दीप जला सजी दीपों की बारात आओ जलाये दीप एक उन शहीदों के नाम हुए न्यौछावर देश पर जो जिनसे रौशन है कायनात सुनीता शानू
 
सुनीता शानू
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प्यार की पहली बारिश

एक मुद्दत से कुछ लिख नही पाई हूँ,आज एक प्रयास किया है,बस और कुछ नही... वो उतरी है जिस रोज आसमान से रिम-झिम सावन की फ़ुहार बनके झिलमिलाती रही ऎसे आँगन में मेरे असंख्य मोतियों का श्रृंगार बनके। छूती हूँ जब भी मै होठों से उसे महक उठती हूँ सोंधी बयार बनके
 
सुनीता शानू
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जबलपुर की यात्रा...

एक छोटा सा शहर जबलपुर... क्या कहने!!! न न न लगता है हमे अपने शब्द वापिस लेने होंगे वरना छोटा कहे जाने पर जबलपुर वाले हमसे खफ़ा हो ही जायेंगे... :) तो दोस्तों एक खूबसूरत महानगर जबलपुर... गये तो थे हम हकीम साहेब से ससुर जी का इलाज़ करवाने मगर स्टेशन पर ह
 
सुनीता शानू
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मौसी

बरसों से प्यासी धरती पर उगा हो जैसे नन्हा पौधा, बड़े प्यार से उसने मुझको मौसी माँ जैसी जब बोला... हुई सरसराहट कानों में तब जैसे अमृत सा रस घोला, लगा अंक से मैने उसको जब प्यार से बेटा बोला... एक जन्म का नही ये रिश्ता लगता है सदियों पुराना, जन्मा नही है
 
सुनीता शानू
Dec 29 2009 11:43 AM
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आ गई कुछ यादें चुपके से...

यूँ हीं आई जब याद बात कोई तो कागज़ पर कलम फ़िर चल पड़ी.... आधी बात कही थी तुमने और आधी मैने भी जोड़ी तब जाकर बनी तस्वीर सच्ची-झूठी थोड़ी-थोड़ी नटखट सी बातों के पीछे दुनिया भर का प्यार छुपा मुस्काती आँखो ने भी जाने कितने स्वप्न दिखा लूटा था भोला-सा बचपन और
 
सुनीता शानू
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ये दिन जिंदगी में कभी न आये..

आदरणीय आप सभी के आशीर्वाद से मेरे पति बिलकुल स्वस्थ हैं। उन्हें पैरालिसिस का अटैक हुआ था। व साथ ही हर्ट अटैक भी। समझ नही आया यह सब अचानक कैसे हुआ? वह बहुत ही एक्टिव व योग करने वाले इंसान है। कभी सर्दी-जुकाम भी उन्हें नही हुई। फ़िर यह सब होना समझ से बा
 
सुनीता शानू
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मासूमियत के हनन की तस्वीर

उम्मीदों और खुशियों से भरीएक मीठी सी धुन गाता हुआ वहचलाये जा रहा थाहाथो को सटासट...कभी टेबिल तो कभी कुर्सी चमकाते छलकती कुछ मासूम बूँदेंसुखे होंठों को दिलासा देती उसकी जीभखेंच रही थी चेहरे परउत्पीड़न से मासूमियत के हनन की तस्वीरमगर फ़िर भीयन्त्रचालित साहर
 
सुनीता शानू
Aug 19 2009 07:18 PM
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वो सुन न सके

घूँघट की आड़ से, आँसुओं की धार में, पलके छुकाये वो कहती रही मगर.... वो सुन न सके दीवारें सिसकती रहीं कालीन भीगते रहे कातर निगाहों से उन्हे तकते रहे मगर... फ़िर भी वो सुन न सके एक वही थी जो उन्हे कह सकती थी बहुत कुछ मगर... घर में जोर से बोलने का हक सिर्
 
सुनीता शानू
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होली मुबारक हो

ओढ़ चुनर सतरंगी जो बदला रंग धरती का नीला हठीला आसमां भी अचानक हो गया रंगीन कि आज होली है... चाँदी से उजले मतवाले बादल ज्यौं बिनौलों से गुथे हुए चमकीले रूई के फ़ूल कि अभी-अभी निकल भागी है उजली कपास कि आज होली है... दूर कहीं कलरव करती चली परिन्दों की बरा
 
सुनीता शानू
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हॉस्य कविता नव-वर्ष पर...

सबसे पहले आप सभी को नव-वर्ष की हार्दिक शुभ-कामनायें... कुछ हॉस्य हो जाये... हमने कहा, जानेमन हैप्पी न्यू इयर हँसकर बोले वो सेम टू यू माई डियर पहले बस इतना बतलाओ आज नया क्या है समझाओ नये साल पर ही करती हो मीठी-मीठी बातें चलो रहने भी दो हमको चूना मत लग
 
सुनीता शानू
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जिंदगी

तनहा कँटीळी खाली बरतन सी जिंदगी भर गई अचानक जूही के फूलो की महक सी खिल गई शाखों पर अनगिन पुष्प-गुच्छ अमलतास सी भिगो गई शरद पूर्णिमा की उजली चाँदनी सी जिंदगी की राहों में गुलाब सी खूबसूरत महक ही देखी मगर न देख पाई गुलाब की हिफ़ाजत करते उन बेहिसाब काटों
 
सुनीता शानू
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बिल्ली के गले में घण्टी बाँधेगा कौन?

कब मिटेंगे आतंक के साये हर रोज यही सवाल बेचैन करता रहता है? जब कभी घर के किसी सदस्य को चोट लग जाती है हम परेशान हो जाते हैं, देखो सम्भलकर चलना कहीं ठोकर न लग जाये, जल्दी घर लौटना, किसी अजनबी से बात मत करना। न जाने कितनी ही हिदायतें हम बच्चों को दिया
 
सुनीता शानू
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दिल्ली हॉट की गिटर-पिटर

मिला हमें जब नेह निमंत्रण , जा पहुँचे हम दिल्ली हॉट, टिकिट कटा भागे भीतर को, जहाँ सब देख रहे थे बाट। सबने बोला हल्लो हाय हाथ मिले और गले लगाय, बैठा अपने पास हमें फ़िर शुरू किया अगला अध्याय। जान-पहचान हुई सबकी नये पुराने सब फ़रमायें कौन लगा किसको कैसा ब
 
सुनीता शानू
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और मै रूठ पाऊँ...

हर रोज- -दिन निकलने के साथ- -मेरे पास होते हैं कई सवाल- -तुम्हारे लिये- -खोज-खोज कर- -सहेज लेती हूँ उन्हे- -कि तुम्हारे कुछ कहने से पहले ही- -पूछूंगी तुमसे- -उन सवालों के जवाब- -परंतु मेरे कुछ कहने से पहले ही- -तुम समझ जाते हो- -मेरी हर बात- -और बिन
 
सुनीता शानू
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रिश्तों की परिभाषा

रिश्तों की परिभाषा चँचल मृग-नयनों में बसे, इन अश्को की भाषा समझा दो। किस-बिधि नापोगे प्यार मेरा, रिश्तों की परिभाषा समझा दो॥ कभी-कभी अनजानी सी एक डगर, पर लगती है कुछ जानी-पहचानी सी, एक पल में लगता है कोई अपना सा और हो जाती है हर बात पुरानी सी। तुम तन
 
सुनीता शानू