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नवागंतुक

http://shankaralok.blogspot.com/
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21 Apr 2010
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ये खराश-ए-दिल है क्यों

ये खराश-ए-दिल है क्यों , हैं निगाहें लहूलुहानकल शब् तो गुल खिले थे इधर , ईदगाह थेमेरा ही तो दिल नहीं है कि जिसपर सितम हुएतब उनकी निगाहों से जमाने तबाह थेसब वक्त लुट गया मेरा , एक पल भी ना रहाएक दौर था कि हम भी बड़े बादशाह थे
 
Alok Shankar
Apr 21 2010 12:10 PM
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मेरी मौत के दिन

मेरी मौत के दिनतुम्हें हिचकियाँ नहीं आयेंगीं ,औरतुम्हारी आँखों से लावे की नदियाँ सूख गयी होंग़ीं -उस दिन मैं मुर्गियों की तरहदूकानों में बिक रहा होऊँगा ,मांस के टुकड़ों में , तोल तोल कर ,ग्लानि से भरा हुआ , धूप में कपड़ों के साथसूखता मिलूँगा -और मेरी घोर
 
Alok Shankar
Feb 26 2010 03:08 PM
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गज़ल

महफ़िलों की नीयतें बदल गयीं हैं आजकल महमिलों से आजकल शराब निकलती नहीं क़ातिलों के कायदे खुदा भी जानता नहीं जान गई पर मुई हिज़ाब निकलती नहीं जिन्दगी जवाब चाहती हरेक ख्वाब का ख्वाब बह गये मगर अज़ाब निकलती नहीं ख़्वाहिशों के अश्क हैं हज़ार मौत मर रहे कब्रगाह
 
Alok Shankar
Dec 29 2009 11:47 AM
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मै / तुम

हम दोनों ही बड़ा बनना चाहते थे- तुम्हें उनकी नजरों में बड़ा दिखना था, मुझे मेरी नजरों में । 2> दोनों को ईश्वर नहीं मिला , तुम्हें वो नहीं मिला, मुझे तुम । 3> जीवन भर , मैनें अपनी पहचान ढूँढी, फ़िर - मुझे तुम मिले ।
 
Alok Shankar
Dec 29 2009 11:47 AM
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नवागंतुक

देश पर निज प्राण के जो पुष्प न्यौछावर करे जो कफ़न का ओढ़ चोला देश पर ही मिट मरे उस तनय के जनक द्वय को नमन बारंबार है जो गँवाकर प्राण करता देश का शृंगार है ।"
 
Alok Shankar
Dec 29 2009 11:47 AM
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धरती और आसमान

जब भी कुछ फ़ुरसत मिलती है, कुछ आसमान चढ़ लेते हो ; अम्बर की गर्वित ऊँचाई , को थोड़ा कम कर देते हो । सपनों के उड़ते बादल को डोरी से खींच धरातल पर, साँचे में उसको ढाल- ढाल कर मूर्त्त,बना देते प्रस्तर । विस्मित है यह ब्रह्मांड सकल लखकर तेरा पुरुषार्थ प्रबल
 
Alok Shankar
Dec 29 2009 11:47 AM
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हाथ होते गर हजारों

आदमी यह सोचता है, काश अपने पंख होते, तो गगन में उड़ रहे हम खग-सदृश निःशंक होते । आज जीवन में हमारे उलझनें जो आ पड़ीं हैं, और यदि सामर्थ्य से लगने लगी विपदा बड़ी है । दीप यदि उम्मीद का , होकर विवश बुझने लगा है, और मन का दीप्त कोना ज्योति से चुकने लगा है
 
Alok Shankar
Dec 29 2009 11:47 AM
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याद

कोई हँसी न खुशबू देगी कहीं, दीवारें कुछ गढ़ जायेंगीं , पत्थर , चंदन , शबनम, धागों की आवाज़ें रह जायेंगीं । आड़ी तिरछी तसवीरों की, रंगीं बातें बह जायेंगीं ; जब धुँध कहीं पर कम होगा, तेरी बातें रह जायेंगीं । जिंदगी , आवाज़ तेरी , बुझ गयी तो क्या करुँगा ? य
 
Alok Shankar
Dec 29 2009 11:47 AM
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किसी दिन, किसी उड़ान में

कल्पना , मुझे ले चलो वहाँ , उस जग में जहाँ सरसता है । संघर्ष - सरित की धारा से, अमृत रस जहाँ छलकता है । हमेशा मन के इशारों पर नाचने वाला आज चाहता है कि थोड़ा आज़ाद हो लूँ , बहुत हो गयी ता- ता थैया ।कभी किसी ने बेवजह कुछ सोचा और कहानी बनती चली जाए- हवा
 
Alok Shankar
Dec 29 2009 11:47 AM
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कवि रे, कर अब निर्मम गान

बीत गई वह निशा सुखद- सी, टूटा अम्बर का अभिमान; सारे उसके हँसते माणिक , बिखरे भू पर हो निष्प्राण । उदयाचल की ओर जरा लख, क्षीण हुई सारी श्री , मान ; रजतरश्मियाँ क्षीण हो उठीं, लुप्त हुए विभु के यश गान । मधुरम कंठस्वर को तज रे, कवि तू कर अब निर्मम गान ।
 
Alok Shankar
Dec 29 2009 11:47 AM
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तुम होते तो …

तुम होते तो इतना कुरूप अंतर का यह शृंगार न होता नयनों में यह बद्ध नीर , उर का पीड़ित संसार न होता । मानस -पटल घने कोहरे में जब भी दुःखाकुल होता; शोक - मलिन उर के पट पर नयनों की उजियाली मलता । विपदा के वीरानों में जब भी आहट तेरी दिखती; निज - प्राणों के
 
Alok Shankar
Dec 29 2009 11:47 AM
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कर्मवीर

सोने दो उन्हें , जिन्हें सोने की आदत है; कर्मवीर हैं, ज़रा सा इस गुण का दंभ- सो, सो रहे हैं; इंसान- आदमी जो बन रहा है ।
 
Alok Shankar
Dec 29 2009 11:47 AM
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उस दिन

और उस दिन हम दोनों के दिल नदी में बहती हुई दो बड़ी बड़ी बूँदें थीं इतनी पारदर्शी कि कुछ भी न दिखाई पड़ता था उनके भीतर
 
Alok Shankar
Dec 29 2009 11:47 AM
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नवागंतुक

कहीं पर दिन नहीं ढलता , कहीं बस रात होती है , न जाने प्यार के मौसम में कैसी बात होती है . दिवानो की दुआओं को खुदा भी खूब सुनता है यहाँ पर दिल धड़कता है वहां बरसात होती है
 
Alok Shankar
Dec 29 2009 11:47 AM
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नवागंतुक

मेरे निर्विकार को लिखने वक्त नही आएगा ; अपने शोणित की गरिमा से वह लिखा जायेगा
 
Alok Shankar
Dec 29 2009 11:47 AM
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नवागंतुक

मेरे चिंतन , मेरे प्रमाद यह सुखद मौन, हा: यह विषाद अंतस की तुमुल विविधता रे ! यह आलिंगन , या आर्त्तनाद ?
 
Alok Shankar
Dec 29 2009 11:47 AM
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नवागंतुक

राम नही बसते धरती के मंदिर और शिवालो में या चन्दन टीका करके बस भोग लगाने वालो में वे मर्यादा की प्रधानता का प्रतीक हैं , संबल है उन हृदयों में राम बसें ,जो प्रेम भाव से विह्वल हैं -आलोक
 
Alok Shankar
Dec 29 2009 11:47 AM
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उजालों की जानिब कहाँ जिन्दगी है दहकती सुबह ,खौलता आसमाँ है चलो ढूँढ़ते हैं गमों का बहाना बहुत देर से रोशनी का समाँ है । बहुत चाँदनी जी चुकी हैं निगाहें कि आँखों में सीलन है,कोहरा घना है न अब ख्वाब डालो हमारी नसों में उनींदे समय को जरा जागना है । कहीं
 
Alok Shankar
Dec 29 2009 11:47 AM
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टीस

कमरे के बियाँबान में काँटों को छूती हुई अष्टावक्र सी दिखती हुई एक आकृति लेटी है, या बचना चाहती काँटों से बदन पर लिख रहे अँधेरों से-- शरीर के गँदले पर चीरे की कालिख़ दुखती है आह! यह पिंजर!! पिंजर !! फड़फड़ाते हुए विखंडित पंख , मिरगी-से काँपते -उछलते फड़
 
Alok Shankar
Dec 29 2009 11:47 AM
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थी बड़ी ही देर चुप्पी

लोग कहते हैं, कि हमने चाहतों में मात खाई इस कदर लहरों ने अपने प्यार की कश्ती डुबाई बस जरा सी बात थी ,अपनी समझ में जो न आई मैं जिसे समझा सफ़र है, तुम उसे समझे लड़ाई ——— 2———- पीर मेरी रागिनी है, दर्द मेरा साज़ है खो गये अल्फ़ाज़ मेरे ,गुम बड़ी आवाज़ है अब न
 
Alok Shankar
Dec 29 2009 11:47 AM
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इतने बुतों के ढेर पर बैठा है आदमी

इतने बुतों के ढेर पर बैठा है आदमी कि आज अपने आप में तनहा है आदमी| अपने खुदा के नाम पर मरना तो है कबूल इंसां से किस कदर यहाँ खफा है आदमी | किस किस की आह पर भला अब जिंदगी रुके, कब जिंदगी की आह पर ठहरा है आदमी| कल डूबते रहे कोई तिनका नहीं मिला , क्यों इ
 
Alok Shankar
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स्वप्न यूँ मरते नहीं हैं

हो गया इतिहास लोहित यदि हमारे ही लहू से है खड़ा विकराल अरि द्रुत छीनता विश्रान्ति भू से बादलों की हूक से पर्वत-हृदय डरते नहीं हैं स्वप्न यूँ मरते नहीं हैं तीन रंगों से बनी जो है वही तस्वीर प्यासी भारती के चक्षु कोरों पर उगी कोई उदासी किंतु ये मोती पि
 
Alok Shankar
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शहीद

कल बड़े उजाड़ होते हैं और होती है उनमे जर्जर और वीरान खामोशी कब्रिस्तान की तरह जिनमें दबे होते हैं कई प्रश्न जिनकी कब्रों पर उगे होते हैं हजारों उत्तर चीखते और गुर्राते हुए लाल लाल खून भरी आँखों से बताते हुए खामोश प्रश्नों का हश्र - और हैरान परेशान आ
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एक आदमी था

एक कवि था या शायद कवि नहीं था- लाख कोशिश करता पर नहीं लिख पाता प्रेम कवितायें, नहीं मान पाता था घर के पास रहने वाली लड़की को चाँद या फ़िर परी | न उसे लड़कियों के परी होने पर यकीन होता , न ही चांद के लड़की होने का | लड़की उसके लिये व्रत रखती, पर वो नह
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एक और कविता

देखना , तुम्हारे शब्द हिलें नहीं गाड़ देना जमीन में उन्हें गहरा - और रख देना उनके ऊपर पत्थर ताकि हिला न पाएं अपनी पलकें और निकल न पाएं कोंपल बनकर - इस तरह रखना उन्हें कि कोमलता छू भी न सके , और वे उगें तो सीधा ठूंठ की तरह कठोर , नमीरहित हो कर ताकि बन
 
आलोक शंकर
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सलीम बुढ्ढे पर मत रो

नहीं जी , अब डर नहीं लगता , दर्द नहीं होता और आंसू भी दीखते नहीं पलको पर , अब कुछ टूटता भी है तो बे-आवाज टूटता है करना क्या है ? बस पड़े पड़े समय को पकड़ कर रुई बना लेता हूँ , और कातता हूँ रोज धागे , सूत और रेशम के - कल भेजी थी उसके लिए बना कर रेशमी
 
आलोक शंकर