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31 Dec 2009
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ये कैसी ज़िंदगी जी रहे हैं हम

पिछले दो दिनों से मन काफी विचलित है। चाहकर भी कुछ लिख न सका। सच पूछिए तो कुछ सोच ही नहीं सका। हर ओर आंसुओं का सैलाब। टेलीविजन पर रोते हुए चेहरे। अखबारों में खून से लथपथ चेहरे, चीखते बिलखते चेहरे। भला ऐसे असामान्य माहौल में कोई भी संवेदनशील व्यक्ति सा
 
Satyendra Prasad Srivastava
Dec 29 2009 11:40 AM
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कसूर

शैलेंद्र की एक कविता उनका कोई कसूर नहीं था उन्हें कुछ भी नहीं हथियाना था कब्जियाना था फिर भी फिर भी जंगल में आग लगी और जल गए आशियाने उनके भी अपनी दुनिया में ही खोए रहने की आदती थी उनकी और उनकी हर जगह खलल डालने की। अपने ही देश में से साभार
 
Satyendra Prasad Srivastava
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डीएमके की राजनीति

सुरेश जायसवाल मनमोहन सिंह की अगुवाई में कांग्रेस की नयी सरकार जब सत्ता संभालने की तैयारी कर रही थी तभी डीएमके ने कर दिया रंग में भंग । एक तरफ जहां सोनिया गांधी मनमोहन सिंह के साथ राष्ट्रपति भवन में शपथ लेने वाले मंत्रियों की सूची तैयार कर रही थीं वही
 
Satyendra Prasad Srivastava
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मेरा सुंदर सपना टूट गया

सुरेश जायसवाल लोकसभा चुनावों के नतीजोंने कांग्रेस की तो बल्ले बल्ले कर दी लेकिन कितनों के तो सपने ही तोड़ दिए। चुनाव नतीजों से पहले बहुत से लोगों ने तरह तरह के सपने संजोकर रखे थे लेकिन इन कमबख्त नतीजों ने सारे सपनों पर पानी फेर दिया । नतीजों ने कितनो
 
Satyendra Prasad Srivastava
Dec 29 2009 11:40 AM
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साथ रहा न जाय, दूरी सही न जाय

लोकतंत्र का ऐसा ड्रामा शायद ही भारत ने कभी इससे पहले देखा हो। दुनिया के सबसे बड़े धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र ने इससे ज्यादा शर्मनिरपेक्ष चुनाव इससे पहले नहीं देखा होगा। त्रिशंकु संसद का ऐसा अंदेशा और ऊपर से कुर्सी का ऐसा मोह की आखिरी चरण का चुनाव नजदीक आ
 
Satyendra Prasad Srivastava
Dec 29 2009 11:40 AM
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वो जाने वाले हो सके तो...

सवा तीन महीने। काफी लंबा वक्त होता है सवा तीन महीने। इतने वक्त में बहुत कुछ बदल जाता है। इतने वक्त में सिर्फ किसी व्यक्ति ही नहीं बल्कि पूरे के पूरे देश की तकदीर बदल सकती है। इस दौरान देश में चुनावी बिगुल बज गया। पहले चरण का वोट भी कल पड़ना है। जुबान
 
Satyendra Prasad Srivastava
Dec 29 2009 11:40 AM
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मत करो जज्बे को सलाम!

टेलीविजन पर बारूद की गंध नहीं आती लेकिन जेहन पर इसका जबर्दस्त असर है। टेलीविजन के पर्दे पर सिर्फ दिखता है धुआं, गुबार, आग। टेलीविजन के सामने बैठते दम घुटता है। बारूद का धुएं की गंध नाक से होते हुए सीधे दिमाग में उतर जाता है। आसपास कहीं धुआं नही, सिर्
 
Satyendra Prasad Srivastava
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बापू को बख्श दो, प्लीज

आगामी चुनावों में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी का मुकाबला करने के लिए कांग्रेस महात्मा गांधी को मैदान में उतारने की सोच रही है। इसके लिए दो अक्टूबर से जनता के सिपाही नाम से कांग्रेस एक अभियान शुरू करने जा रही है। इस ख़बर को पढ़कर मैं हैरान रह ग
 
Satyendra Prasad Srivastava
Dec 29 2009 11:40 AM
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जब जेब कट जाती है

धोखा शैलेंद्र की एक कविता यह जो चमक-दमक है जिससे आंखें जुड़ाती हैं हकीकत से कहीं दूर ले जाती हैं भटकाती हैं अफसोस! समझ में ये बात तब आती है जब जेब कट जाती है। क्या आपने कथा संसार में समीर लाल की कहानी 'आखिर बेटा हूं तेरा' पढ़ी? अगर नहीं तो क्लिक आखिर
 
Satyendra Prasad Srivastava
Dec 29 2009 11:40 AM
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मां आज भी करती है जिऊतिया

आस्था सुरेंद्र दीप की एक कविता मां, मनाती आ रही है वर्षों से जिऊतिया का पर्व इस विश्वास के साथ कि होंगे भगवान खुश उसके अन्न जल ग्रहण न करने से और देंगे उसकी संतानों को एक लंबी उम्र बचाएंगे आने वाली मुसीबतों से वह शास्त्रों के पचड़े में नहीं पड़ती उसक
 
Satyendra Prasad Srivastava
Dec 29 2009 11:40 AM
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स्वप्नदर्शी आंखों को फोड़ दिया

अनजाना दर्द डॉ सूर्यदेव शास्त्री की एक कविता डॉ सूर्यदेव शास्त्री एक अच्छे गुरु, अच्छे कवि, अच्छे भाषा विज्ञानी और अच्छे इंसान थे। नालन्दा के तुलसीगढ़ में जन्मे डॉ शास्त्री कोलकाता के संस्कृत कॉलेज में भाषा विज्ञान विभाग के प्रमुख थे। वातायन, नया पथ,
 
Satyendra Prasad Srivastava
Dec 29 2009 11:40 AM
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मैं जीभ बना रहा हूं

गोपाल प्रसाद की कविता आत्मा की आवाज़ मैं सब काम छोड़ कर जीभ बना रहा हूं ताकि करोड़ों लोग जो बे-जुबान हैं बोल सकें। अगर मेरा यह काम अपराध है तो यह अपराध मैं बार-बार करूंगा तुम जो भी सज़ा दोगे अंगीकार कर लूंगा किंतु मेरी अन्तर-आत्मा कहती है मेरा यह काम
 
Satyendra Prasad Srivastava
Dec 29 2009 11:40 AM
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हम ही छीन रहे हैं बच्चों की मासूमियत

मेरी बेटी ने पूछा--पापा, दादा कहां गए? मैंने बताया--भगवान के पास उसने फिर पूछा--नाना कहां गए? मैंने बताया--भगवान के पास। उसने पूछा-भगवान के पास क्यों चले गए? मैंने कहा-दोनों बहुत अच्छे थे, इसलिए भगवान ने बुला लिया शायद हम बच्चों के ऐसे सवालों का ऐसा
 
Satyendra Prasad Srivastava
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मेरी तरह उदास जला सा लगा है चांद

नूर मुहम्मद नूर की एक ग़ज़ल मेरी तरह उदास, जला सा लगा है चांद फिर आज कितना ख़ूब भला सा लगा है चांद। दिखता है दाग़दार, जले के निशान हैं दलितों की झोपड़ी सा, जला सा लगा है चांद हम तो तमाम उम्र किसी के न हो सके जूड़े में आसमां के खिला सा लगा है चांद इक
 
Satyendra Prasad Srivastava
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अपना सवाल जवाब

गोपाल प्रसाद की एक कविताजब यही अपराध है किचोर को चोर न कहूंतो मैं सहर्ष यह अपराध करूंगाधरूंगा हर उस जगह कदमजहां धरना जरूरी हैआम को आमऔर वाम को वामउस समय तक कहूंगाजब तक मेरी जीभ मेरे पास हैकैसा समय आ गया है किप्रतिवाद बर्फ बन गया हैसुना नहीं आपनेपैसेंजर
 
Satyendra Prasad Srivastava
Aug 07 2009 08:59 PM
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चौधरी हो तो दिखाओ चौधराहट

वात्सल्य रायगिल साहब माफ कीजिएगा। भले ही आपका गिला जायज हो। भले ही तमाम खिलाड़ी आपके सुर में सुर मिला रहे हों लेकिन हमें तो बीसीसीआई की ठसक ही रास आ रही है। कोई माने या न माने हम तो अपने क्रिकेटर्स को ईमानदार ही मानते हैं। सचिन से सच्चा खिलाड़ी कौन हो
 
Satyendra Prasad Srivastava
Aug 05 2009 09:15 AM
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ये आपने क्या किया मनमोहन जी

सुरेश जायसवालमिस्र के शर्म अल शेख में भारत और पाकिस्तान के प्रधानमंत्रियों के बीच मुलाकात के बाद जारी साझा घोषणा पत्र से एक बात तो साफ हो गयी है कि भारतीय कूटनीति अमेरिका के दबाव में है । इसी दबाव का ही नतीजा है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कूटनीति में
 
Satyendra Prasad Srivastava
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हम झूठे ही भले

वात्सल्य राय सच... बहुत मुश्किल है... सुनना भी और बोलना भी... सच। यूं तो हम सब सच्चे हैं। दिल से... जज्बात से... जुबान से और इरादों से भी। सच्चे हिंदुस्तानी। सच्चाई हमारी रगों में खून की तरह दौड़ती है। फिर भी सत्यवादियों की गिनती उंगलियों पर ही हो जा
 
Satyendra Prasad Srivastava
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सवा लाख बनाम पनेसर

वात्सल्य राय अचानक गुरू महाराज याद हो आए। ' सवा लाख से एक लड़ाऊं '। पापा भी साथ मैच देख रहे थे और कॉलिंगवुड के आउट होते ही, उन्होंने कंगारुओं की जीत तय मान ली थी। उनका कहना था, ' पनेसर के बस का कुछ नहीं है '। क्रिकेट को लेकर अगर बहस हो तो पापा के मुक
 
Satyendra Prasad Srivastava
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देखो मैंने देखा है इक सपना...

सुरेश जायसवाल पंद्रहवीं लोकसभा के चुनाव का आखिरी समर पूरा होते ही 7 रेसकोर्स रोड पर कब्जे की जंग तेज हो गयी है । हर छोटा बड़ा राजनीतिक दल और मोर्चा सत्ता की रेस में शामिल हो गया है । इस रेस में शामिल दलों और मोर्चों की न तो कई विचारधारा है और न ही को
 
Satyendra Prasad Srivastava
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मां, चिंता की कोई बात नहीं

मदर्स डे पर ख़ास सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव मां! तुम्हारा ख़त मिला मैं जानता था तुम चिंतित होगी मेरे लिए लेकिन चिंता की कोई बात नहीं यहां सब ठीक है। मेरी नौकरी छूट गई है कारखाने की चिमनी अब धुआं नहीं नारे उगल रही है लेकिन चिंता की कोई बात नहीं मैं मज़
 
Satyendra Prasad Srivastava
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जब इतने दिन ढोया है तो ढो ले और अंधेरा थोड़ा

नूर मुहम्मद नूर की ग़ज़ल रोग भयंकर हो जाती है, धीरे-धीरे खांसी माई यही भाग का लेखा अपना, काहें होत रुआंसी माई। दाना एक नहीं है घर में, पेट जल रहे चूल्हे ठंडे तू ही नहीं अकेली दुखिया, चारों ओर उदासी माई। तन पथरीला दिन पथरीले सपने भी पथरीले निकले दिन भ
 
Satyendra Prasad Srivastava
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गाली बनते शब्द

सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव बड़े प्यार से मैंने उसे बुलाया था-अरे पप्पू, कैसे हो? और वो भड़क गया. सुबह-सुबह खरी-खोटी सुना दी। ऐसी लताड़ लगाई कि शायद अब इस जन्म में तो मैं पप्पू शब्द अपने मुंह से निकालूंगा ही नहीं। जहां तक मैं जानता था और बरसों से जान
 
Satyendra Prasad Srivastava
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संन्यास राग

वात्सल्य राय साल नया है... तो जोश भी नया होना चाहिए... जिनका जोश ठंडा पड़ चुका है, उन्हें भी नई रवानी हासिल करने का मौका मिलना चाहिए... लेकिन ऐसी रियायत होती कहां है... जिन्हें संन्यास राग गाने की आदत है, उन्हें तारीख बीतने, कलैंडर बदलने या किसी बरस
 
Satyendra Prasad Srivastava