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ये कैसी ज़िंदगी जी रहे हैं हम
पिछले दो दिनों से मन काफी विचलित है। चाहकर भी कुछ लिख न सका। सच पूछिए तो कुछ सोच ही नहीं सका। हर ओर आंसुओं का सैलाब। टेलीविजन पर रोते हुए चेहरे। अखबारों में खून से लथपथ चेहरे, चीखते बिलखते चेहरे। भला ऐसे असामान्य माहौल में कोई भी संवेदनशील व्यक्ति सा
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Dec 29 2009 11:40 AM


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