इनर वायॅस's Image

इनर वायॅस

http://sangeetamanral.blogspot.com/
ब्लॉगवाणी पर यह ब्लॉग
नयी प्रविष्टी लिखी
22 Apr 2010
कुल प्रविष्टियां
27
पाठक भेजे
1695
पसंद
19
नापसंद
0
पाठक प्रति पोस्ट
62.78
पसंद करें
3
नापसंद करें

क्या मालूम....

आदमी भागता है दौड़ता है, लेकिन हासिल...कर पता है क्या?? क्या मालूम.... (१)आदमी, रात में ये सोचकर सोया था कल ज्यादा मेहनत करेगा, बहुत दूर गाँव तक जाएगा और कुछ ज्यादा पैसा कम कर लाएगा| आपने आप में अपने भगवान से पूछता है| भगवान कैसा रहेगा कल का दिन, क्या
 
संगीता मनराल
पसंद करें
1
नापसंद करें

लम्बे अन्तराल के बाद

बहुत दिन हुए ब्लॉग में कुछ पोस्ट कये, दिन कहना गलत होता साल ही हो गया है... पति जी ने याद दिलाया श्रीमती जी अगर कुछ दिन और नहीं कुछ पोस्ट करोगी तो ये इनर वायस, unknown वायस ना बन जाए... उन्ही से पूछा बताओ फिर क्या पोस्ट किया जाए... आजकल तो कोई
 
संगीता मनराल
पसंद करें
0
नापसंद करें

"अमन चाहिये, सुकून चहिए, जिन्दगी चाहिये"

सोचा भाग चलूँ, दिल्ली छोङ मुम्बई, फिर मुम्बई से बैंगलौर, आसाम, जयपुर, गुजरात और कहाँ - कहाँ भागूँ... थक गई हूँ जिन्दगी को बचाते। सभी तो थक गये हैं, डरे हुये हैं, आतंकित है, अपनों के लिये, अपनों के अपनों के लिये और फिर भविष्य के लिए भी तो। हमेशा से तो
 
संगीता मनराल
Dec 29 2009 11:47 AM
पसंद करें
0
नापसंद करें

१४ नवम्बर - बाल दिवस

उम्र लगभग १०-१२ साल, पतला-दुबला शरीर, ४ फिट की लम्बाई वाला लङका मैला सा पैंट और उस पर आसमानी रंग की शर्ट पहने जो हलके रंग की होने की वजह से मटमैली हो चुकी थी कालर कुछ घिसे हुये और शर्ट की बाजू पर गाङे काले रंग की परत। पाँव पर अपनी साईज़ से बङी चप्पल ज
 
संगीता मनराल
Dec 29 2009 11:47 AM
पसंद करें
0
नापसंद करें

जीवन एक रेखागणित

दो जीवन समान्तर चलकर भी कभी बिछुङ जाते हैं एक नारियल बेचने वाला अपनी वृत की गोल परिधी में घूमकर भी कभी खो जाता है और वो प्रेमी अपनी पत्नी और प्रेमिका के प्रेम मे पङकर एक त्रिभुज के तीन कोनों में असंतोष और भय से बचता हुआ भटक - भटक कर थक जाता है रिश्ते
 
संगीता मनराल
Dec 29 2009 11:47 AM
पसंद करें
0
नापसंद करें

"तुम यहीं तो हो"

शाम के धुंधलके में ओस की कुछ बूदें पत्तों पर मोती सी चहक कर कह रही हैं तुम यहीं तो हो यहीं कहीं शायद मेरे आसपास नहीं शायद मेरे करीब ओह$ नहीं सिर्फ यादों में दूर कहीं किसी कोने में छुपे जुगनू से जल बुझ, जल बुझ भटका देते हो मेरे ख्यालों को और भवरें सा
 
संगीता मनराल
Dec 29 2009 11:47 AM
पसंद करें
0
नापसंद करें

एकतारे का सुर

हम चले जा रहे थे, आगे घाट की ओर तभी ध्यान गया अपनी दाईं तरफ एकतारे का सुर, पहले भी सुना तो था लेकिन इतना मधुर नहीं, कुछ समझ नहीं आ रहा था क्या शब्द हैं, क्या गीत के बोल हैं क्या गा रहा है? लेकिन एकतारे का सुर और बोल के साथ ताल बहुत मोहक थी राक सुनती
 
संगीता मनराल
Dec 29 2009 11:47 AM
पसंद करें
0
नापसंद करें

कुछ हायकू

धर्म धर्म है बनाता इंसा इसे अधर्म क्यों ---------- जिहाद क्या खुदा की इबादद आंतकवाद ---------- रमज़ान के रोज़े की सहरी से जागी सुबह ---------- कूङा बीनता गरीब बचपन सङकों पर ---------- महानगर दौङ रहा आदमी पैसों खातिर ---------- बच्चे रोते चिङिया लाती दा
 
संगीता मनराल
Dec 29 2009 11:47 AM
पसंद करें
0
नापसंद करें

धर्म के नाम पर

श्रीनगर में कई दिनों से बेकाबू हालात हैं, कल इन सबका असर पूरे भारत पर भी दिखा. "विश्व हिन्दू परिर्षद" ने पूरे भारत मे बंद का आहवान किया. कई मरीज़ों ने सङको पर ही दम तोङ दिया, बहुत लोग परेशान हुये. वैसे प्रदर्शन में शामिल कई लोगो को शायद पता भी ना हो क
 
संगीता मनराल
Dec 29 2009 11:47 AM
पसंद करें
0
नापसंद करें

"मेरी दोस्त मंजू"

पिछले दिनों चोखेर बाली में लडके-लङकी की क्लासिफिकेशन मे कई बातें ऐसी उजागर हुई जो ये आज भी सिद्ध करतीं हैं कि हम चाहे कस्बे में रहे या एक विकसित शहर में, या फिर विकाशील राज्य का हिस्सा हों. कुछ नियम कानून लङकियों के लिये तय से हैं, मॉर्डनाइस सोच के प
 
संगीता मनराल
Dec 29 2009 11:47 AM
पसंद करें
0
नापसंद करें

तुमने सिखाया था प्यार

तुमने सिखाया था प्यार क्या वही है जहाँ तुम लेकर गये मैं बस चलती रही बेखबर मेरी हर तमन्नायें तुम से शुरू होकर तुम पर खत्म थी लेकिन तुम समझाते रहे नहीं ये प्यार नहीं है आज अरसे बाद मन किया है, तुम्हें सोचकर कुछ लिखने का नसों मे कसाव आ जाता है तुम्हारा
 
संगीता मनराल
Dec 29 2009 11:47 AM
पसंद करें
0
नापसंद करें

बीते जमाने की बातें

नीचे अम्मा टीवी से चिपकी बिना पलक झपकाये महाभारत के द्रौपदी, द्रुयोधन संवाद को कुछ ऐसे देख रही हैं जैसे कल परिक्षा देनी हो छत पर चढा पिन्टू बीच बीच मे चिल्लाकर पूछ रहा है अब ठीक है, अब बताओ.. अम्मा बोलो भी क्या अब ठीक हुआ... अम्मा अजीब सा मुँह बनाये
 
संगीता मनराल
Dec 29 2009 11:47 AM
पसंद करें
0
नापसंद करें

प्यार !!

उसने अपनी काली चमकीली आखों को मेरे चहरे पर टिका कर कहा तुम प्यार नहीं कर सकते मैं जानना चाहता था, क्यों? वो बोली तुम शादीशुदा हो तुम्हें कोई हक नहीं गैर प्यार का करना है तो अपनी पत्नी से, बच्चों से करो मैं हैरान था, असमंजस में सिर्फ देख रहा था उसे ये
 
संगीता मनराल
Dec 29 2009 11:47 AM
पसंद करें
0
नापसंद करें

एक सुबह

टिपटिप, टिपटिप, टिपटिप, पेङ सारे नहाये हुये, कुछ ज्यादा ही हरे और चहक रहे हैं माँ ने आज कटहल बनाया है, बेसन में संधा हुआ, महक पूरे घर से शायद पङोस के शर्मा जी के घर तक जा रही है, दीवारे भीगी हुई अपने रंग से थोङी फीकी, सीमेंट और सफेदी कि सोंधी खुशबू,
 
संगीता मनराल
Dec 29 2009 11:47 AM
पसंद करें
0
नापसंद करें

भगवान के नाम

मेरी बहुत पहले लिखी एक कविता सभी कहते हैं, भगवान का नाम अमर है, अजर है ना खत्म होने वाली रोशनी और हवा है भगवान अद्श्य होकर भी एक द्श्य प्राणी सा हम सभी के दिलों में विद्यमान ज्योति सा प्रज्वल्लित है भगवान दिलों के किसी कोने में बैठा उस आदमी सा जो वक्
 
संगीता मनराल
Dec 29 2009 11:47 AM
पसंद करें
0
नापसंद करें

रज्जन की शादी - ०१

मंगल गीतों से सारा घर गूँज रहा था, रज्जन की मौसी ढोलक कि थाप को अपने गीतों में रमाने कि कोशिश करते हुये, बीच बीच में बैठी हुई औरतों को भी उकसा रही थी अरी गाओ ना साथ में, गप्पें मार रहीं हो हाँ, तालियों की भी थाप दो "अम्मा तेरा बिटवा बना है आज बन्ना"
 
संगीता मनराल
Dec 29 2009 11:47 AM
पसंद करें
0
नापसंद करें

दुविधा

माँ से कहती रही कई बार क्या जरुरी है हल्दी रोली के बंधन में बंधकर जिन्दगी बिताना माँ समझाती लाडो ये जरुरी नहीं लेकिन दुनिया कि रीत है, सभी बेटियाँ अपना घर बसाती हैं, और एक ना एक दिन बाबुल का घर पीछे छोङ जाती हैं मैं, माँ को ङूढती रहती सास में और कोसत
 
संगीता मनराल
Dec 29 2009 11:47 AM
पसंद करें
0
नापसंद करें

तुम्हारी याद

आज तुम बहुत याद आ रहे हो ये शायद गलत हो कि तुम्हें अपने ख्यालों तक में लाँऊ पर मजबूर हूँ अपने दिल के हाथों दुनिया भर कि गलत आदतें थीं तुम में तभी तो नकार दिया था तुम्हें और तुम्हारे प्यार को लेकिन आज अहसास होता है कि काश तुम होते मेरे पास प्यार से अप
 
संगीता मनराल
Dec 29 2009 11:47 AM
पसंद करें
0
नापसंद करें

सुख

भाग (2) आ फिस मे कैसे दिन गुजरा अहसास तक ना हुआ...जब अम्मा इला के पास आई थी, तब दिन मे एक बार तो फोन जरूर आ जाया करता था... या तो लंच से ठीक पहले या ठीक उसके बाद, खाना खाया की नही और अगर गलती से भी देर हुई तो अम्मा का वही उसे डाँटना, फिर वो झुंनझलाहट
 
संगीता मनराल
Dec 29 2009 11:47 AM
पसंद करें
0
नापसंद करें

मंजिले तो बहुत हैं लेकिन फासले कम नहीं|

ऐसे तो कई मुद्दे हैं, कभी कभी मन में ये विचार भी आ जाते हैं, जबकि कोई दबाव नहीं, कोई मजबूरी नहीं और ना ही कहीं कोई तानाशाही है लेकिन ये बात कई बार दिल को कचोट जाती है औरत तो औरत है और औरत ही रहेगी कुछ सालों पीछे चली जाँऊ (ज्यादा नहीं सिर्फ ३० साल) तो
 
संगीता मनराल
Dec 29 2009 11:47 AM
पसंद करें
0
नापसंद करें

आज़ादी को सलाम

आजकल सभी जगह आज़ादी को लेकर सरगर्मी है, रेडियो से लेकर, समाचार चैनल और अखबारों तक हो भी क्यों नहीं हमारी आज़ादी को ६० वर्ष जो पूरे हो गये है कभी कभी लगता है, क्या वाकाई हम आज़ाद हुये हैं देखा जाये तो अभी भी कई सारे मसले हैं जिनकी तरफ देखकर यही अहसास होत
 
संगीता मनराल
Dec 29 2009 11:47 AM
पसंद करें
0
नापसंद करें

सुख

भाग (१) आज फिर लेट हो जायेगा, तेज गाङी चलाती हूँ पिछले तीन दिन से रेड मार्क लगवा रही हूँ बस आज और लेट हुई तो बास से झाङ पक्का इला झुनझलाहट में अपने आप से बात किये जा रही थी ये मोटर बाईक वाले भी ना जहाँ से मन किया वहाँ से निकाल लेते है जरा भी नहीं सोच
 
संगीता मनराल
Dec 29 2009 11:47 AM
पसंद करें
0
नापसंद करें

दिल्ली हिन्दी ब्लागर मीट - १४.०७.२००७

हिन्दी ब्लागर मीट, करीब ११ बजे से शुरु होकर सांय ७:३० पर समाप्त हुई कई नामी गिरामी ब्लागरस ने भाग लिया मीट कनाट प्लेस के कैफे काँफी डे शुरू होकर गङी तक चली सुबह सभी कनाट प्लेस के कैफे काँफी डे में इकट्ठे हुये थे लेकिन ज्यादा जगह ना होने और ज्यादा ना
 
संगीता मनराल
Dec 29 2009 11:47 AM
पसंद करें
0
नापसंद करें
पसंद करें
0
नापसंद करें

"यूँ कभी"

सोचो कभी ऐसा हो जाये सब-वे कि सीङियों को चङते तुम से नज़रें अटक जाये (१) क्या तुम देखकर भी अनदेखा कर दोगे या लगा दोगे सवालों कि झङियाँ या सब कुछ भूलकर खो जाओगे इन आँखों के घेरों मे (२) शायद ये मेरा भ्रम होगा कि तुम गुज़रे थे अभी यहीं से कहाँ रहीं तुम इ
 
संगीता मनराल
Dec 29 2009 11:47 AM
पसंद करें
0
नापसंद करें

"सिर्फ तुम्हारे लिये"

१) तुम्हारा आना यूँ बेधङक मेरी जिन्दगी मे कोई इत्तेफाक तो नहीं तुम कैसे आये अहसास तक ना हुआ आज मैं खुद से ज्यादा तुम्हें चाहती हूँ ये कोई जादू या कहीं कोई साजिश तो नहीं मुझे, मुझसे दूर करने की बताओ???? (२) बांये हाथ की रेखाओं को जोङकर दांये हाथ से दे
 
संगीता मनराल
Dec 29 2009 11:47 AM
पसंद करें
0
नापसंद करें

मेरी दिवाली

तुम्हारे संग मनाई हर वो दिवाली कुछ याद सी आ रही है उस रात के अमावसी अधेरें से दूर, सिर्फ मैं और तुम दीपों के बने गोल धारे में बैठे इंतज़ार करते रहे कि काश ये अमावस, प्रकाशवर्ष से भी लम्बी हो जाये हाँ सच, उस रात अहसास हुआ था मुझे, सीता मैय्या कि अतह: प
 
संगीता मनराल
Dec 29 2009 11:47 AM