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कुछ मेरी कलम से -kuch meri kalam se **

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09 Jun 2010
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संदेशे तब और अब

यूँ ही बैठे बैठेयाद आए कुछ बीते पलऔर कुछ ....भूले बिसरे किस्से सुहानेक्या दिन थे वो भी जब ....छोटी छोटी बातों के पलदे जाते थे सुख कई अनजानेदरवाज़े पर बैठ करवो घंटो गपियानाडाकिये की साईकल की ट्रिन ट्रिन सुनबैचेन दिल का बेताब हो जानाइन्तजार करते कितने
 
रंजना [रंजू भाटिया]
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यादों के पल

जीवन की रेल पेल मेंहर संघर्ष को झेलतेहर सुख दुःख को सहतेकभी मैंने चाही नही इनसे मुक्तिपर कभी बैठे बैठे यूं ही अचानकजब भी याद आई तुम्हारीतब यह मन आज भीभीगने सा लगता हैचटकने लगते हैं तन मन मेंजैसे मोंगारे के फूलऔर जैसेसर्दी से कांपते बदन मेंतेरी याद का
 
रंजना [रंजू भाटिया]
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खाली किताब

पढ़ रही हूँज़िन्दगी की किताबआहिस्ता -आहिस्तावर्क दर वर्कपन्ना दर पन्नालफ्ज़ बा लफ्ज़फिर इस केएक -एकहर्फ को उतारूँअपने जलते हुए सीने मेंऔर इस तरह बीता दूँअपनी लम्बी ज़िन्दगी कीतन्हा रात ..वर्ना यह अँधेरेमुझे अपने में समेट करखाली किताब सा कर देंगे !!!रंजना
 
रंजना [रंजू भाटिया]
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अपने अपने प्यार की परिभाषा

ना जाने किसकी तलाश मेंजन्मों से भटकती रही हूँ मैंअपनी रूह से तेरे दिल की धड़कन तकअपना नाम पढ़ती रही हूँ मैं....लिखा जब भी कोई गीत या ग़ज़लतू ही लफ़्ज़ों का लिबास पहने मेरी कलम से उतरा हैयूँ चुपके से ख़ामोशी से तेरे क़दमो की आहटहर गुजरते लम्हे में सुनती
 
रंजना [रंजू भाटिया]
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लफ्ज़ बिखरे हुए ...

१)सपने देखनाबंद पलकों मेंक्यों कि उन में उड़ने केकुछ पर होंगेदुनिया देखनातो आँख खोल केयहाँ उनसपनो के टूटे पर होंगे२)रात के घने अंधेरेकैसे सब फ़र्कमिटा जाते हैंअलग अलग वजूदअलग राह केमुसाफिर की परछाई कोएक कर जाते हैंरोशन होते हीहर उजाले मेंयह छिटक करअलग हो
 
रंजना [रंजू भाटिया]
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प्यार -एक एहसास

कैसे लिखूं मैं तेरे लिए,जबकि मैं जानती हूँकि तुझ तक पहुँचने के बादविचार शून्य हो जाते हैंऔर कल्पनाएँ ........वो तो न जानेकिस ताखे परबैठ जाती हैऔर देखो ...मैं यूँ ही अलसाई हुई सीउसी ताखे पर बैठी हुईदेखती रहती हूँबस देखती रहती हूँकैसे लिखूं मैं तेरे
 
रंजना [रंजू भाटिया]
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अपनी मंज़िल कहीं और तलाशिये

बन रही है यह ज़िंदगी एक रास्ता भूलभुलैया सीवो कहते हैं अब अपनी मंज़िल कहीं और तलाशियेखत्म होने को है अब सब बातें प्यार कीअब कोई नया दर्द और नया शग़ल तलाशियेनाकाम है सब हसरतें इस पत्थर दिल संसार मेंजाइए अब नया शहर ,कोई नया युग तलाशियेदिखता नही नज़रों में
 
रंजना [रंजू भाटिया]
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दो रंग ...(कुछ यूँ ही )

अस्तित्व अपना ही अस्तित्व अजनबी सा नजर आता है मुझे ...जब गैरों को तू मुझे अपना कह कर मिलाता है.......आईनाअपना ही चेहराबिना आवाज़ केसामने तो दिख जाता हैपर ....आईने के पीछे की दुनियाक्या है.........यह कौन देख पाता है ?दिखते अक्स मेंधडकता दिल हैपीछे आईने की
 
रंजना [रंजू भाटिया]
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ज़िंदगी का सच

क्यों खिले गुल ,इस चमन मेंदे के सुगंध ..फिर क्यों मुरझाए?शमा जली तो रोशनी के लिएपर परवाना क्योंसंग जल के मर जाए?गुनगुन करते भंवरे,क्यों सब पराग पी जाए?क्यों फूल भी हँस के अपनासब कुछ उस पर लुटाए ?झूमती गाती हवाक्यों एक दम शांत हो जाएधीमे धीमे बहते दिन
 
रंजना [रंजू भाटिया]
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"संगिनी"

यूं जब अपनी पलके उठा केतुम देखती हो मेरी तरफ़मैं जानता हूँ....कि तुम्हारी आँखेपढ़ रही होती हैमेरे उस अंतर्मन कोजो मेरा ही अनदेखामेरा ही अनकहा है..अपनी मुस्कराहट सेजो देती हो मेरे सन्नाटे कोहर पल नया अर्थऔर मन की गहरी वादियों मेंचुपके से खिला देती होआशा से
 
रंजना [रंजू भाटिया]
Mar 06 2010 01:27 PM
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तेरे छूने से

तेरे छुने से बरसो बाद मेरा मौन टूटा है एक पर्दा सा था तन मन पर मेरे तेरे छुने से वो भ्रम जाल टूटा हैआज बरसो बाद दिल में प्यार फूटा है !!हिमनदी सी जमी हुई थी मैं तेरे छुने से एक गर्माहट हुई सोई हुई तितलियों के पंख में फिर से कोई अकूलाहट हुई दिल में फिर से
 
रंजना [रंजू भाटिया]
Feb 25 2010 10:44 AM
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लेडिज कूपे (पुस्तक समीक्षा )

पिछले बीते दिन कुछ स्वस्थ ठीक नहीं था ,पर दिल शुक्रिया करता है इस तरह बीमार पड़ने का भी ..इसका भी एक अलग ही सुख है जब डाक्टर बेड रेस्ट के लिए कह दे और आपके आस पास दवाई के रेपर के साथ बिस्तर पर कुछ किताबे बिखरी हुई हो और कोई आपको अधिक डिस्टरब नहीं करता :)
 
रंजना [रंजू भाटिया]
Feb 20 2010 01:03 PM
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काश ....(प्रेम दिवस पर )

प्रेम के सागर को ,प्रेम की गहराई को ,प्रेम के लम्हों को ,कब कोई बाँध पाया है ..पर इक मीठा सा एहसास ,दिल के कोने में ..दस्तक देने लगता हैजब मैं तुम्हारे करीब होती हूँकि काश ..प्यार की हर मुद्रा मेंहम खुजराहो की मूरत जैसेबस वही थम जाएलम्हे साल ,युग बसयूँ
 
रंजना [रंजू भाटिया]
Feb 13 2010 04:47 PM
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आज का सच

आज का जन्मपैदा होते हीमाँ के सीने से लिपटापर उसके दूध से दूरबोतल और बाल आहार पर पलताखोल के नन्ही आंखेंबिटर-बिटर दुनिया को तकताबनूँगा इस आहार पर हीताकतवरहगीज़ पहन कर भीख़ूब है हँसताआज का बचपनडगमगाते कदमो सेसूरज के संग खोल के आंखेंहाथ थाम के चलने की
 
रंजना [रंजू भाटिया]
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अनचाहा सा सवाल

(इसको बड़ा कर के पढ़े )बहुत सोचता है मेरा दिल तुम्हारे लिए बहुत सी बातें कह कर भीकुछ अनकहा सा रह जाता है मेरे दिल में तुम्हारे लिएएक प्यार का सागर लहरता हैफिर भी ना जाने यह दिलअनचाहा सा सवाल क्यों कर जाता हैपूछता है दिल मेरा अक्सर ......क्या मेरे प्यार का
 
रंजना [रंजू भाटिया]
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तलाश

बसंती ब्यार सा,खिले पुष्प सा,उस अनदेखे साए ने..भरा दिल को..प्रीत की गहराई से,खाली सा मेरा मन,गुम हुआ हर पल उस मेंऔर झूठे भ्रम कोसच समझता रहा ..मृगतृष्णा बना यह जीवनभटकता रहा न जाने किन राहों परह्रदय में लिए झरना अपार स्नेह का यूं ही निर्झर बहता रहा,प्यास
 
रंजना [रंजू भाटिया]
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धोखा

एक साँस .....जाने किस आस पर दिन गुजरती है..निरीह सी आंखो सेअपने ही दिए जीवन को, पल -पल निहारती हैपुचकारती है, दुलारती हैअपने अंतिम लम्हे तकउसी को ...जीने का सहारा मानती हैसच है ...जीने की वजह कोई बनाने के लिएइस तरह ..एक धोखा होना जरुरी हैऔर दिल के किसी
 
रंजना [रंजू भाटिया]
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एहसास (कुछ यूँ ही )

सर्दी का ...घना कोहरा..उसमें..डूबा हुआ मन..एक अनदेखी सीचादर में लिपटा हुआऔर तेरी याद उस मेंआहिस्ता से ,धीरे सेउस कोहरे को चीरतीयूँ मन पर छा रही हैजैसे कोई कंवलखिलने लगा है धीरे धीरेऔर आँखों में एक चाँद...मुस्कराने लगा है ...रंजना (रंजू )भाटिया"सन्डे
 
रंजना [रंजू भाटिया]
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झूमता हुआ नया साल फ़िर आया....

नया सालएक नई आशानई उम्मीद जगाता हुआकलेंडर के पन्नों परउतर आता हैऔर कुछ दिन तोअपने नयेपन के एहसास सेकुछ तो अलग रंग दिखाता है....फिर ढलने लगते हैं लम्हेवक़्त यूँ ही गुजरता जाता है ....कुछ नया होने की आस मेंयह जीवन यूँ ही बीतता जाता हैनए साल की सबको बहुत
 
रंजना [रंजू भाटिया]
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कुछ बिखरे लफ्ज़ (क्षणिकाएँ...)

वक़्त. क्यों तुम्हारे साथ बिताई हर शाम मुझे आखिरी-सी लगती है जैसे वक़्त काँच के घर को पत्थर दिखाता है !! हरसिंगार लरजते अमलतास ने खिलते हरसिंगार से ना जाने क्या कह दिया बिखर गया है ज़मीन पर उसका एक-एक फूल जैसे किसी गोरी का मुखड़ा सफ़ेद हो के गुलाबी-सा
 
रंजना [रंजू भाटिया]
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लफ्ज़ ,कुछ कहे -कुछ अनकहे ("क्षणिकाएँ..")

तेरे मेरे बीच तेरे मेरे बीच एक दुआ एक सदा मेरी बेखुदी तेरी बेरूख़ी चटका हुआ आईना काँपता पीले पत्ते सा फिर भी यह रिश्ता जन्म तक यूँ ही चलता रहेगा !! साथ जब मैं उसके साथ नही होती तो वह मुझे हर श्ये में तलाश करता है पहरों सोचता है मेरे बारे में और मिलने
 
रंजना [रंजू भाटिया]
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क्षणिकाएँ...

१)उलझन बनो तुम चाहे मेरी कविता चाहे बनो अर्थ चाहे बनो संवाद , पर मत बनो ऐसी उलझन जिसे में कभी सुलझा न सकूं ! २)तन्हा चाँद भी तन्हा तारे भी हैं अकेले और हम भी उदास से उनकी राह तकते हैं तीनो हैं तन्हा एक साथ फ़िर भी क्यों इस कदर अकेले से दिखते हैं ? ३)च
 
रंजना [रंजू भाटिया]
Dec 15 2009 10:38 AM
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तरक्की की कीमत..

बचपन के दिन कैसे फुदक के उड़ जाते हैं ,स्कूल की शिक्षा खत्म हुई और आँखो में बड़े बड़े सपने खिलने लगते हैं जैसे ही उमंगें जवान होती है कुछ करने का जोश और आगे ऊँचे बढ़ने का सपना आंखो में सजने लगता है !ठीक ऐसा ही शिवानी की आँखो में था एक सपना कुछ बनने क
 
रंजना [रंजू भाटिया]
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तूने आज जब वो मेरे लिखे ख़त जलाए होंगे..

आज मुझे भूलने के बाद, जब वो मेरे ख़त तूने जलाए होंगे फ़िज़ाओ में आज भी वो बीते पलो के साए महक आए होंगे बिताए थे ना जाने कितने बेहिसाब लम्हे साथ साथ उनके तस्वुर ने तेरे होश एक बार फिर से तो उड़ाए होंगे याद आया होगा तुझे भी मेरा ,तेरी बाहों में सिमाटना
 
रंजना [रंजू भाटिया]
Nov 30 2009 12:23 PM
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बंधे हुए लफ्ज़ ....

आतंक के हाथ क़ानून से ज्यादा लंबे हैं जो ख़ास सुरक्षा मिलने पर भी मौका मिलते ही धमाका कर जाते हैं और लिखने वाले के हाथ अभी भी बंधे हैं जो आजाद होते हुए भी इंसानो से ड़र जाते हैं !! 2:) सुनो , आज कुछ लफ्ज़ दे दो मुझे ना जाने मेरी कविता के सब मायने ...
 
रंजना [रंजू भाटिया]
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जाने लोग यहाँ क्या-क्या तलाश करते हैं...

जाने लोग यहाँ क्या-क्या तलाश करते हैं पतझड़ों में हम सावन की राह तक़ते हैं अनसुनी चीखों का शोर हैं यहाँ हर तरफ़ गूंगे स्वरों से नगमे सुनने की बात करते हैं जाने लोग यहाँ क्या-क्या तलाश करते हैं ..... बाँट गयी है यह ज़िंदगी यहाँ कई टुकड़ों में टूटते सप
 
रंजना [रंजू भाटिया]
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क्या फ़िर से ??

जाने अन्जाने, कब न जाने प्रीत -प्यार के बहाने.. मेरे दिल पर तुम ने लिख दी प्यार की एक अमिट दास्तान.. उस नज़्म के लिखे शब्द अक्सर तन्हाई में मेरी.. मुझे तेरे प्रेम का राग सुनाते हैं देखती हूँ जब भी मैं आईना तेरे नयनो के.. वो प्यार भरे अक़्स अक्सर मेरी
 
रंजना [रंजू भाटिया]
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सुनो ...

आसमान की तरह ""खाली आँखे "" धरती की तरह "चुप लगते "सब बोल हैं पर तुम्हारे कहे गए एक लफ्ज़ " सुनो "में जैसे वक्त का साया ठहर सा जाता है बिना अर्थ ,बिना संवाद के भी यह लफ्ज़ न जाने कितनी बातें कह जाता है कभी लगता है यह भोर का तारा कभी सांझ का गुलाबी आँ
 
रंजना [रंजू भाटिया]
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बदली हुई फ़िज़ा

बदली हुई रुत .. बदली हुई फिजा .. जाग रही है ... दो रूहों की एक ही हलचल मद्धम मद्धम .. रात की गहरी चुनरी ओढे चाँद भी मुस्कराया .. और ............. लबों पर तैरता चाँदनी के मुख पर वो हल्का सा तब्बसुम या फ़िर रुकी हुई है कोई शबनम की बूंद .. परियों के अफ़स
 
रंजना [रंजू भाटिया]
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दुनिया अजब गजब

क्या आप जानते हैं कि कहने को तो सब जीव जंतु के खून का रंग लाल होता है पर टिड्डी एक ऐसा कीट है जिसका रक्त का रंग सफ़ेद होता है .. तितली की स्वाद ग्रंथि उसके पिछले पैरों में होती है हाथी के दांत दो या तीन बार नहीं पूरे जीवन काल में यह छः बार निकलते हैं
 
रंजना [रंजू भाटिया]
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कोई तो होता .....

कोई तो होता ...... दिल की बात समझने वाला सुबह के आगोश से उभरा सूरज सा दहकता रात भर चाँद सा चमकने वाला पनीली आखों में है खवाब कई ... कोई संजो लेता .. इन में संवरने वाला थरथराते लबों पर ठहरा है लफ्जों का सावन कोई तो होता .. इनमें भीगने वाला दिल की धडकन
 
रंजना [रंजू भाटिया]
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चाँद रात --रूमानी चाँद (भाग _२)

रूमानी चाँद (भाग _१) आपने पढ़ा और पसंद किया ,शुक्रिया चाँद रात .. मेरी नजरों .... की चमक .... तेरी नजरों ... में बंद ... कोई चाँद सी रात है .. उलझे हुए से धागे में कोई जीने की सौगात है .. और जब यह तेरी नजरें ... ठहरतीं हैं ..... मेरे चेहरे पर ठिठक कर
 
रंजना [रंजू भाटिया]
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रूमानी चाँद (भाग _१)

यह हफ्ता चाँद के नाम है ...अब तक न जाने कितनी पंक्तियाँ लिखी गई है मुझसे भी चाँद पर ...क्यों हर लिखने वाले दिल के लिए चाँद हमेशा ख़ास रहा है ..दूर गगन में चमकता चाँद दिल के बहुत करीब महसूस होता है ,रूमानी चाँद .उदास चाँद .बोलता चाँद .अंधा चाँद .आधा च
 
रंजना [रंजू भाटिया]
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झूठे ख्वाब

मैं ख्वाब देखती हूँऔर तुम्हे भी संग उनकेजहान में ले जाती हूँजानती हूँ यह ख्वाब हैसिर्फ़ .....चंद लम्हों के ...जो बालू की तरह हाथ से फिसल जायेंगेपर जब यह बंद होते हैंपलकों में .. तो अपने लगते हैंबंद मुट्ठी में भी यह सपनेकुछ पल तो सच्चे लगते हैं ..इस लिए
 
रंजना [रंजू भाटिया]
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जाने अपने बच्चे के अंतर्मन और स्वभाव को ..

बच्चो का मनोविज्ञान समझना कोई आसान बात नहीं है | उनका स्वभाव .उनकी रुचियाँ और उनके शौक यदि हर माता पिता समझ ले तो बच्चों के दिल तक आसानी से पहुंचा जा सकता है | बहुत सी ऐसी बातें होती है जिनको समझने के लिए कई तरकीब ,कई तरह के मनोविज्ञानिक तरीके हैं जिस से
 
रंजना [रंजू भाटिया]
Sep 16 2009 01:41 PM
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प्यार का प्रतिदान

धरा का रूप धरेउजाला तुझ सूरज से पातीतेरे बिना सजना मैंश्याम वर्ण ही कहलातीपाती जो तेरे प्यार की तपिशतो हिमखण्ड ना बन पातीधूमती धुरी पर जैसे धरतीयुगों युगों तक साथ तेरा निभाती मन की अटल गहराई सिंधु सीहर पीड़ा को हर जातीसृष्टि के नव सृजन सीख़ुद पर ही
 
रंजना [रंजू भाटिया]
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तेरा होना ..

तेरी हर छुअन के बाद ..दिल हो जाता है ..यूँ हरा भरा ..सुनहरा ...तेरी ही सुंगंध ..में डूबा ..जैसे ....बरसात के बाद ..हरी पत्तियां ....सोनल धूप की छुअन से ,दिप -दिप सी खिल उठती हैंऔर फ़िर सब तरफ़हरा भरा सा ....मन हो झूमने लगता है............
 
रंजना [रंजू भाटिया]
Sep 03 2009 04:56 PM
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एक बारिश की शाम

औरत का दिल ईश्वर ने ऐसा बनाया है कि हर वक़्त प्यार के खुमार में डूबा रहता है कुछ नया खोजता सा ,कुछ नया रचता सा। रजनीश ज़ी के लफ़्ज़ो में .. सारी तहज़ीब स्त्री के आधार पर बनी,घर ना होता तो, नगर ना होते ... नगर ना होते ,तो तहज़ीब ना बनती ...मर्द और औरत
 
रंजना [रंजू भाटिया]
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