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रजनीगन्धा

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नयी प्रविष्टी लिखी
13 Apr 2010
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राही

मुझको सूरज की किरण दे दो,आकाश का नीला विस्तार दे दो,मैं हूँ एक पाखी,जीने के लिए ऊँची उड़ान दे दो.मैं अपने कोमल पँखों को फ़ैलाऊँगीबादलों के साथ बहुत दूर तक जाऊँगीकोई साथी नहीं होगा,इस सफ़र के अनंत बिंदु तक जाऊँगी.पेड़ के नीचे ठंडी हवा जब बहेगीपलकें बोझिल हो
 
रजनी भार्गव
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अनकहे बोल

मेरे मानस में अनमने बोल हैंमन के क्षितिज पर अनकहे बोल हैंकहती हैं कहानियाँयह मेरे मन के चोर हैंअनबुझी सांस की पोर हैंजीवन के प्रवाह के छोर हैंफिरसासें क्यों नही आतीजब गुजरती है मेरी छायातुम्हारे कदमों से लिपट केढलती है मेरी कायातुम्हारे नयनों मे सिमट
 
रजनी भार्गव
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ख्याल

एक ख्याल था जिसे बुना थाआँखों में असमंजस में पड़ा हैसोच रहा है धनक के पार उतरूँया ज़मीन पर आशियाना बनाऊँमैंने भी पूछा नहीं मंज़िल कहाँ,क्या खोज रहा था वह राह जिसमेंमीठे सपनों का झरना होसेतु क्षितिज से मिलता हो,कगार पर बालू में धंसी वो नाव होऔर पानी की लम्बी
 
रजनी भार्गव
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नीम

कागज़ पर कुछ टेढ़ी मढ़ी लकीरेंनक्शे पर नीली, हरी लकीरेंबच्चों के मन में गढ़ गई थीं,आज लकीरें सुलग रही थींबनती बिगड़ती बटोही सीभटक रही थीं।खबर थी,सीमा को कल मोड़ दिया थाआज पहाड़ के उस पार पहुँचा दिया थागुड़्हल के फूल,नीम के पेड़़,कल छज्जू मियाँ की खपरैल औरअहाते
 
रजनी भार्गव
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बात

बातें, बातों और बातों के पीछेखूबसूरत मंज़र भटकते हैंखामोश से,बंद किवाड़ के पीछेठाकुर जी से रहते हैं,हर दिन नए जंगल बनते हैं,दरदरे जंगल में चीड़ के पेड़धूप छाँव का खेल खेलते हैंरेशम के तार जब सिरा ढूँढते हैंमेरे से उलझ जाते हैंशाख पर तब बहुत सेज्योति पुंज नज़र
 
रजनी भार्गव
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पलाश के फूल

कोयल कुहकीअमुआ महकीपोखर पीलासूरज निकलाले फूलों के कलश कईड्योढ़ी फैलेअंगना खेलेनव पल्लवपक्षी का कलरवउल्ल्सित बसंत से खेल कईगुब्बारे फूटेगुलाल, रंग छूटेअब गली ढूँढॆनुक्कड़ ढूँढेवह दिवस जब बिखरे थे रंग कईचौबारे के रंगघर में हैं बंदसूखी होलीजाए अबोलीबुलाए दर
 
रजनी भार्गव
Mar 02 2010 09:26 AM
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रोशनी की लकीरें

कुछ दूर रख करकुछ फ़ासले से देखाकागज़ पर उतरते नक्श कोधरती पर उतरती सूरज की छायाजैसे बदलती हर पहर के रूपगाढ़े रंग, हल्के रंगआढ़ी, तिरछी रोशनी की लकीरेंसब उतर गए थे छवि के संगउन के बीच में थीवोउदास आँखें जोबीन रहीं थीबसंत में खिलेरोशनी से भरेसफ़ेद चेरी के
 
रजनी भार्गव
Feb 17 2010 05:18 PM
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चिरैया

फुनगी पर बैठी थी चिड़िया,लपकी थी नभ की ओरचुराई थी सांझ की लाल डिबियाउड़ाई थी, फुटकायी थीबनी थी गुलाबी गुलाल चिरैया।ले के सांझ के संदेसेलौटी थी अपने नीड़पातियों को किया कंठबद्धस्वर दिया, संगीत दिया बनी थी काली कोयल गौरयाभोर के पास पहुँचाने थे संदेसेतड़के उठ
 
रजनी भार्गव
Feb 10 2010 10:30 PM
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गुल्लक

लम्हे, गुल्लक मेंरेज़गारी से खनकते हैंहर दिन रुई से भरी दोहड़के लिए ललकते हैं।एक लम्हा,जब आँखें उस पर टिक जाती हैं,लाल, पीले फूलों वाली,किस, किस पगडंडी से गुज़रती है,ठिठुरन में जलते अलावों सीधूप की सगी बहन लगती है,मुलायम सी रेशमी तारों कीदेवों के दुशाले सी
 
रजनी भार्गव
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नज़रिया

फ़ुटपाथ के बैंच परज़िंदगी के निचोड़ कोछूटे हुए अखबार की तरहछोड़ आए थे,कुछ मेरे विचार थेकुछ तुम्हारी सोचतुम्हारी धारणा थीसमाज को बदलना है,मैं अपनीपरिधि के दायरे कोविकसित करना चाह्ती थी,कल अखबार बारिश में भीगा,आज धूप में सूखा,अब अलावों के बीच सुलग रहा
 
रजनी भार्गव
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कुछ हायकु

टूटते तारे लान में लेटे हुए अगस्त माह गाँव में चाँद बावड़ी में भीगा है अमा आ गई धुला सूरज जंगले आती धूप चाय की चुस्की गरजे मेघ कानाफ़ूसी करते ऊँचे शीशम नन्ही मछली पोखर है हाथ में जमी है काई मेपल पत्ती डायरी के पन्ने झड़ रहे हैं __________
 
रजनी भार्गव
Dec 29 2009 11:45 AM
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आरिगामी

धूप और पत्तों की आरिगामी मेरी खिड़की पर बन रही थी, सुबह के बदलते पहर मुड़ते, खुलते खिड़की के एक कोने पर सीमित रह गए थे। उस आरिगामी में रह गई थी अब, एक मैना, एक पत्ती, एक टुकड़ा धूप। धूप सरकी, पत्ती टूटी, मैना उड़ गई, और, अब रह गया है सिर्फ़ कोरा कागज़ दूसरे
 
रजनी भार्गव
Dec 29 2009 11:45 AM
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नानाजी की टोपी

मैं नानाजी की टोपी, चाँद की किरण से सीती थी। अंदर से टोपी उधड़ गई थी। उम्र में बड़ी हो गई थी। थकी-हारी कुछ बेजान सी लगती थी। जब तागे निकल जाते थे तो झूमर से लहराते थी। बड़े छोटे बेतरतीब से माथे पर नज़र आते थे। टोपी अब भी पुख्ता थी। ऐसे लगता था जैसे कोई म
 
रजनी भार्गव
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आकांक्षा

आकाश को कितनी ही बार अपने हाथों में ले कर दूधिया बादल से नहाई हूँ मैं, आकांक्षाओं को कई बार अपनी आँखों में संजो कर रंग भरी पिचकारी सी छूटी हूँ मैं, और फिर, गुलमोहर की तरह गर्व से तुम पर बिखर गई हूँ मैं, क्षितिज का प्रथम पहरेदार आकाश में वो जो ध्रुव त
 
रजनी भार्गव
Dec 29 2009 11:45 AM
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सभ्यता

ज़िन्दगी के पलों को गुणा, भाग कर , घटा, जोड़ कर , बहा दिया था नदी में एक दिन मैने । नदी - जो ज़मीन के नीचे, पुरखों के पांव तले और मेरे पाँव के नीचे भी बहती रही है सदियों से । मैं देखती हूँ कि उभर आये हैं भित्तिचित्र नदी के मुहाने पर । और... ये भी देख रह
 
रजनी भार्गव
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मेरे अपने सपने

मेरे सपने मेरे अपने हैं, कोई भी इस हाशिए पर लिखे ये फ़िर भी मेरे अपने हैं. मौजों पर सवार ये तख्ती, बहुत थपेड़े सहती है. क्षितिज तक पहुँचने की चाह में खुद ही मीलों तक बहती है. _________________
 
रजनी भार्गव
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होली- कुछ चित्र

खुलते जाते सब गठबँधन आसमान से हटते पहरे जब से फागुन ले कर आया पीत पराग रँग कुछ गहरे। --- पीली हल्दी, सजी किनारी खिली धूप की चादर ओढ़ी आँगन पूरा हरसिंगार सा और वसंत खड़ी है ड्योढ़ी। --- पच पच पच करती पिचकारी रँगों की बहती फुलवारी मल गुलाल सिहरी दोपहरी मे
 
रजनी भार्गव
Dec 29 2009 11:45 AM
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सवाल

वो पल वहीं ठहर गया था, जिस पल खिड़की से छनती धूप ने, तुम्हे हताश और निढाल पाया था, मेरी आँखों से कुछ सवाल करते पाया था। वो सवाल अभी भी उघड़े पड़े हैं, उस पोस्टकार्ड की तरह जो आया था पहाड़ियों की बर्फ से भीग कर, दराज़ में अब भी पड़ा है कुछ सिकुड़ा हुआ। चलो,
 
रजनी भार्गव
Dec 29 2009 11:45 AM
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प्रार्थना

धूप में लिपटी एक प्रार्थना, कुछ चुप, कुछ कहती हुई, दूब के साथ उग रही थी। मेरी कोट की जेब में भूली हुई मेवा की तरह अंगुलियों में कुलमुला रही थी। मुट्ठी में भर कर, मन में कुछ बुदबुदा कर, फूँक मारी थी। तुम्हारी आँखों के अथाह सागर में गुम हुई खामोशी बता
 
रजनी भार्गव
Dec 29 2009 11:45 AM
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चेतना के फूल

कमरे में थी एक मेज़, दो कुर्सियाँ, सीलिंग से लटके लैम्प की रोशनी गोल सीमित दायरे में. उससे परे थे कुछ साए, खिड़की में रखे गमले के, कांउटर पर कप और प्लेट के, खूँटी पर टँगे कपड़ों के. समय के सन्नाटे में, झाँक रहा था सूरज का एक टुकड़ा, आधा मेज़ पर और आधा फ़र्
 
रजनी भार्गव
Dec 29 2009 11:45 AM
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नया साल

आया नया साल ढलते दिन के साथ, साँसे बह चली, लिये नूतन दिवस के पराग। आया नया साल बदलती तिथि के साथ, अहसासों की गिलौरी में बस गई है मीठी आस आया नया साल पुराने दिनों के साथ आस्था की मौली बाँधी, नए सूर्योदय के साथ। आया नया साल गुज़रते सपनों के साथ, खुरदरे
 
रजनी भार्गव
Dec 29 2009 11:45 AM
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बिखरे खत

कुछ खत पहुँचे, कुछ पहुँचे ही नहीं, कुछ उत्तरी दिशा में देवदारों पर अटक गए, कुछ दक्षिण दिशा में संदल बन में भटक गए. दरवाज़े की ओट में किसी की नज़र में रह गए, किसी राह में साँझ के साथ डूबते चले गए, तुम्हारे साथ चलते हुए कुछ लिखे गए पर टूटे माणिक से हर जग
 
रजनी भार्गव
Dec 29 2009 11:45 AM
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अम्मा की रसोई

अम्मा की रसोई में सुबह शाम जलता चूल्हा, बच्चों का उपर नीचे कूदना, किसी का झिड़की खाना तो किसी का आंचल में छुप जाना, दिन गुज़रता था ऐसे हर पल सँवरता हो जैसे। कितने प्रश्न अम्मा के सामने जा बैठते थे, अम्मा उन्हें हर कोने से उठा कर तरतीब से लगाती थी, जैसे
 
रजनी भार्गव
Dec 29 2009 11:45 AM
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मत्स्य

रात का आखिरी पहर जब और गाढ़ा हो, जब हाथ को हाथ न सूझे, अंधेरे में मुट्ठी भर शब्द मोगरे की तरह महक उठे, अंधेरे की रेशमी तह चूम कर बलैयां लेती रहें, तुम सिरहाने बैठ कर शांत, निर्लिप्त, विरक्त समुद्र में नौका खेते रहो और, मैं फेनल से भीगी मत्स्य अर्जित क
 
रजनी भार्गव
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गुलाबी पतझड़

कुनमुनी रातें अलाव सिकी यादें, कुलमुलाती हैं सखी की बातें ठौर-ठौर पिये चाँदनी का दोना लिये, मढ़ती रात तारों के धागे लिये पोरों पर कसती रानी कहानी रचती, सूखी पीली पत्ती अम्बर पर लिखती मन गुंथी सांझ झर गए पात-पात, गुलाबी पतझड़ जाए सखी घर याद आए।
 
रजनी भार्गव
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गाँठ

मेरे सर्वस्व की गाँठ पानी, आग, धरा, पंचतंत्रो से गुँथी है, अक्षत, रोली, मौली, धूप, दीप से बनी है, देवी, देवताओं, खड़िया से दीवार पर सजी है, पेड़ों की फ़ुनगी पर नभ से बंधी रहती है खुलती है तो छाँव सी धूप में घुल जाती है, दिन जब चढ़ता है तो बड़ या पीपल पर म
 
रजनी भार्गव
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फ़ुर्सत के पल

पलाश के दहकते फूल जब मेरी हथेली पर गिरते हैं, फिसलते हुए ये जलते सूरज मेरे मन में परिक्रमा करते हैं । ------------- परिधि के घेरे में आ बैठे हैं, कुछ चिन्ह नियुक्त कर बैठे हैं, चिन्हों से जूझते हुए परिधि में खुद को खो बैठे हैं। __________________ शब्
 
रजनी भार्गव
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मूक अभिवादन

घर की परिधि के दायरे मेरे मानचित्र पर बिंदु से उस पगडंडी पर रहते हैं जहाँ सूर्योदय रोज़ तुम्हारे द्वार पर लौटती सूर्य किरण की प्रतीक्षा करता है पहाड़ी के उस ओर से बादलों की टोली को हवा धकेल ले आती है और गुलदावदी के फूल हवा को छुपा कर यूँ ही लहकते फ़िरते
 
रजनी भार्गव
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क्वार गीत

रास्ते में जब रुकी तो दीवारों के कान उग आए थे पत्तों की सरसराह्ट थी आँगन में बुदबुदाहट थी और दीवारों की आँखों में रंग भर गए थे कपाट पर कूची से बूटे खिले थे सफ़ेद पुती दीवार पर जलाशय बने थे बाहर अहाते में तिमिर का कोलाहल बोल रहा था झींगुर की आवाज़े थीं
 
रजनी भार्गव
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आसमानी फूल

सेतू के किनारे खिले थेकुछ आसमानी फूल,पानी में बिम्बित थासुनहरी आकाश अपार,मैंने आकाश की असीमताउठा के दी थी तुम्हे,तुम्हारी असीमता में मुझे मिलेकुछ फूल उपहार में,आँगन में मेघदूत मिलेकाले और बौराए से,औरसंदेसों की झारी मेंगुलाब की कुछ पाँखुरी पड़ीकाली स्याह
 
रजनी भार्गव
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तमन्ना

एक तमन्ना छोटी सी,बड़ी आँखों वाली लड़की कीखामोशी में रहती थी,लड़की के गालों के गुच्चों में मुस्कराहट में छिपी रहती थी,लड़की के काले बालों कीचोटी में फूल सी गुँथी रहती थीएक तमन्ना बड़ी सी,रसॊई के आले में आचार के मर्तबान में रहती हैफ़टी रसीद सी पंसारी की
 
रजनी भार्गव
Aug 02 2009 09:16 AM
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जेठ बुलाए

उड़ती फ़ूस कटी-कटी धूप गुड़-गुड़ करती बाबा के हुक्के की मूँज जेठ दुपहरी छाँव तले गिलहरी किट-किट करती अम्मा की सुपारी दिन सून लम्बे दिन लम्बी तारीखें औंधे मुँह ऊँघती जीजी की किताबें, परचून गुम हवा झुलसी धरा मेढ़ पर सोचती उसकी आँखें लगी, सब सून ____________
 
रजनी भार्गव
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दुआ

बचपन से दुआएँ साथ चलती हैं आँगन को बुहारती टीन के डिब्बे में आम की पौध सी पलती हैं मेरे हाथ की लकीरों में गली में स्टापू सी खेलती हैं रात में सपनों सी दिन में पूजा के आचमन सी मिलती हैं बाँस के झुरमुट में मेरे तलवे के नीचे धूप सी खिलती है नन्हे पैरों
 
रजनी भार्गव
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सैलाब

दर्द का सैलाब रुक गया था कागज़ के कोने पर अहसास हो रहा था कोने से टपक कर गिरी जो एक भी बूँद अन्तराल की गहराईयों तक जाएगी जहाँ अँधेरा काली चिकनी चट्टान सा शून्य सा जड़ आहिल्या की तरह पाषाण सा होगा और दर्द की बूँद जब टपक कर गिरेगी अन्तर्नाद करती हुई एक उ
 
रजनी भार्गव
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सुरमई शाम

चुपके से सुरमई हो गयी थी शाम रात ने सर रख दिया था काँधे पर तारे ने बो दिये थे चन्द्रकिरण से मनके वीराने में धवल, चमकीली चाँद की निबोली अटकी रही थी नीम की टहनी पर नीचे गिरी तॊ बाजुबंध सी खुल गई सुरमई शाम रात के काँधे पर सर रख कर सो गई । ______________
 
रजनी भार्गव