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सफर - राजीव रंजन प्रसाद

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08 Mar 2010
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माओवादियों का “सीजफायर” और दिनकर की “शक्ति और क्षमा”

रात जब संचार माध्यमों नें चीखना आरंभ किया कि माओवादियों नें बहत्तर दिनों के सीजफायर का एलान किया है तो जिज्ञासा इस बात की थी कि उनकी शर्ते क्या हैं? हम महान देश के वासी हैं, हमसे आतंकवादी भी अपनी शर्तों पर बात करते हैं। शर्त स्पष्ट है – ऑपरेशन ग्रीन हंट
 
राजीव रंजन प्रसाद
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नक्सलवादी, आतंकवादी और भगत सिंह

कुहु बिटिया अब हाथी-घोडे की कहानियों से आगे आ गयी है, क्यों न हो वह अब कक्षा दूसरी में जो जाने वाली है। आज मैंने भगत सिंह से उसका परिचय कराया। “बेटा भगत सिंह नें संसद के भीतर बम और आजादी के पर्चे फेंके” मैं कहानी सुना रहा था। ”लेकिन पापा बम क्यों फेंका
 
राजीव रंजन प्रसाद
Feb 19 2010 03:02 PM
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बंगाल में हुए नक्सली हमले पर खामोश मीडिया, मानवादिकारवादी और लेखक [श्रद्धांजलि आलेख]

कोई आश्चर्य नहीं कि चौबीस घंटे भी नहीं बीते और पश्चिम बंगाल में नक्सली हमले की खबर मीडिया के सर से सींग की तरह गायब हो गयी। देश और दुनियाँ में बहुत सी खबरे हैं जिसके लिये हमारे देसी जेम्स बॉंड जुटे हुए है और बहुत सक्रिय हैं। कोई महानायक को महानालायक
 
राजीव रंजन प्रसाद
टैग: नक्सल
Feb 16 2010 01:48 PM
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भूमिपुत्र [मुम्बई को जागीर समझने वालों पर मेरा विरोध]

बहुत से जानवरइलाका बनाते हैं अपनाजिसके भीतर हीभौंकते-किचकिचाते हैं,थूकते-चाटते हैं,और कोने किनारे पाये जाते हैंटाँग टेढी किये।मजाल है घुस जाये कोई?वो मानते हैं कि हमअपनी गली के शेरबखिया उधेड सकते हैंकभी भी-किसी की भीइलाका अपना है....एक आदमी, एक रोजजा रहा
 
राजीव रंजन प्रसाद
टैग: कविता
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मैं गा लूँ जग की पीड़ा माँ [वसंत पंचमी पर - वंदना]

वीणा के तार से गीत बजेंमैं गा लूँ जग की पीड़ा माँमेरे आँसू, मेरी आहें,मेरे अपने हैं रहने दोपलकों के गुल पर ठहरकभी बहते हैं, बहने दोसुख की थाती का क्या करनाकरने दो दुख को क्रीड़ा माँवीणा के तार से गीत बजेमैं गा लूं जग की पीडा माँदेखो बिखरी है भूख
 
राजीव रंजन प्रसाद
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मुट्ठी में एक तमंचा है अंकल...

नन्हे-मुन्ने बच्चे तेरी मुट्ठी में क्या है? मुट्ठी में एक तमंचा है अंकल मैंने इससे ही कत्ल किया है!! सुनता हूँ, गाना नये दौर का है सागर से दरिया पहाड़ों की ओर बहता चला है, कहता चला है पश्चिम से सूरज निकलना तय है बिल्ली ने अपने गले ही में घंटी बाँधी है
 
राजीव रंजन प्रसाद
Dec 29 2009 11:42 AM
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मौत जब सनसनीखेज हो जाये

मेरे क्षेत्र में भूख से कोई मर नहीं सकता मीडिया के आरोपों से सांसद महोदय तैश में थे मानो घर के आगे उन्होंने लंगर खोल रखा हो। आंकडे "नेताईयत " की आत्मा हैं मगर कम्बखत परमात्मा तो वही नंगा है जो मर कर जी का जंजाल हो गया है... नेता जी गुरगुराये, माईकों
 
राजीव रंजन प्रसाद
Dec 29 2009 11:42 AM
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पेट दुखता है मैं कुछ कहूँ, कुछ कहूँ...

मुझको बरसात में सुर मिले री सखी पेट दुखता है मैं कुछ कहूँ , कुछ कहूँ .. एक कूँवे में दुनियाँ थी, दुनियाँ में मैं गोल है, कितना गहरा पता था मुझे हाय री बाल्टी, मैने डुबकी जो ली फिर धरातल में उझला गया था मुझे मेरी दुनिया लुटी, ये कहाँ आ गया छुपता फिरता
 
राजीव रंजन प्रसाद
Dec 29 2009 11:42 AM
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इतना सख्त भी नहीं पहाड

पहाडों के आगे बैठा हुआ मैं सोचता हूँ अगर तुम्हारा गम न रहा होता तो आज कितना बौना पाता मैं अपनें आप को और अब देखता हूँ इतना सख्त भी नहीं पहाड जितना मेरा दिल हो गया है.. *** राजीव रंजन प्रसाद
 
राजीव रंजन प्रसाद
Dec 29 2009 11:42 AM
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युगों तक खमोश दो बुत..

नारज़गी हद से बढी और हो गयी पर्बत आँखों से पिघल गया ग्लेशियर जैसे मोम नदी हो जाता है पत्थर की तरह पिघल पिघल कर.. पीठ से पीठ किये युगों तक खमोश दो बुत इस तरह बैठै रहे तोड तोड कर चबाते हुए घास के तिनके जैसे गरमी की दोपहर ढलती नहीं.. और जब नदी न रही पिघल
 
राजीव रंजन प्रसाद
Dec 29 2009 11:42 AM
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जैसे कोई मर्तबान में, जल-चीनी का घोल बना दे..

जैसे इकलौता गुल खिल कर, काँटों को बेमोल बना दे सीपी क्या है एक खोल है, मोती हो अनमोल बना दे.. तुम होते हो खो जाता हूं, फिर अपनी पहचान साथ है जैसे कोई मर्तबान में, जल-चीनी का घोल बना दे.. मन के भीतर की आवाज़ें, आँखों से सुन लेता हूँ, साथ हमारा एसा जो,
 
राजीव रंजन प्रसाद
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सठिया गया है देश चलो जश्न मनायें।

गाँधी की नये फ्रेम में तस्वीर सजायें , सठिया गया है देश चलो जश्न मनायें।। हमने भी गिरेबाँ के बटन खोल दिये हैं थी शर्म, कबाड़ी ने रद्दी में खरीदी है बीड़ी जला रहे हैं अपने जिगर से यारों ये पूँछ खुदा ने जो सीधी ही नहीं दी है हम अपनी जवानी में वो आग लगा
 
राजीव रंजन प्रसाद
Dec 29 2009 11:42 AM
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मेरे साये..

जैसे ही आईना देखा , चौंक गया , मेरा चेहरा कहीं नहीं था , कहीं नहीं.. सिर धुनता दीवारों पर मैं चीख उठा खंडहर पर बैठे चमगादड़ उड़ कर भागे डर कर मकड़ी धागे पर कुछ और चढ़ी आँखें मिच-मिच करते उल्लू अलसाये खिल-खिल कर के हँसी गहनतम खामोशी कितने फैल गये देखो
 
राजीव रंजन प्रसाद
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सचमुच तरक्की भी क्या चीज है..

सभ्यता व्यंग्य से मुस्कुराती है जंगल के आदिम जब "मांदर" की थाप पर लय में थिरकते हैं जूड़े में जंगल की बेला महकती है हँसते हैं, गुच्छे में चिडिया चहकती है देवी है, देवा है पंडा है, ओझा है रोग है, शोक है, मौत है.. भूख है, अकाल है, मौत है.. फिर भी यह उप
 
राजीव रंजन प्रसाद
Dec 29 2009 11:42 AM
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बडा स्कूल.

स्कूल बहुत बडा है डिजाईनर दीवारें हैं हर कमरे में ए.सी है एयरकंडीश्नर बसें आपके बच्चों को घर से उठायेंगी यंग मिस्ट्रेस नयी टेकनीक से उन्हे पढायेंगी सूरज की तेज गर्मी से दूर नश्तर सी ठंडी हवाओं से दूर मिट्टी की सोंधी खुश्बू से दूर जमीन से उपर उठ चुके
 
राजीव रंजन प्रसाद
Dec 29 2009 11:42 AM
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टुकडॆ अस्तित्व के..

मन का अपक्षय आहिस्ता आहिस्ता मुझको अनगिनत करता जाता है नदी मेरे अस्तित्व से नाखुश है और मुझे महज इतना ही अचरज है इतना तप्त मैं टूटता हूं पुनः पुनः मोम नहीं होता लेकिन.. निर्निमेष आत्मविष्लेषण एकाकी पन एकाकी मन और तम गहन..गहनतम अपने ही आत्म में हाथ पा
 
राजीव रंजन प्रसाद
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ज़ुल्फें..

बांध कर न रखा करो ज़ुल्फें अपनी नदी पर का बाँध ढहता है तबाही मचा देता है एसा ही होता है जब तुम एकाएक झटकती हो खोल कर ज़ुल्फें.. *** राजीव रंजन प्रसाद
 
राजीव रंजन प्रसाद
Dec 29 2009 11:42 AM
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आ कर कहीं से तुम तभी...

आप तो जाते रहे फिर नींद भी जाती रही आसमां की चांदनी हमको जलाती भी रही वो एक ख्वाब जो आँखें खुले देखा किये हम रात भर जलती रही अपनी चिता जैसे जला करते अभी जब बुझ गये बस राख थे आ कर कहीं से तुम तभी ले चुटकियों में राख माथे पर सजा ली फिर जी गये हम पलक झप
 
राजीव रंजन प्रसाद
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अंधियारा चप्पल उतार कर मन के आँगन में आता है।

अंधियारा चप्पल उतार कर मन के आँगन में आता है। तुमने मेरी गुडिया तोडी, मैनें बालू का घर तोडा तुमने मेरा दामन छोडा, मैंने अपना दामन छोडा तुम मुझसे क्यों रूठे जानम, मैं ही टूटा, मैनें तोडा मुझको मुझसे ही शिकवा है, तुमसे मेरा क्या नाता है अंधियारा चप्पल
 
राजीव रंजन प्रसाद
Dec 29 2009 11:42 AM
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कितनी कठोरता जानम..

पहाड से टकरा कर लौट आता है तुम्हारा नाम तुम से टकरा कर लौट लौट आती है मेरी धडकन कितनी कठोरता जानम कि पर्बत हो गयी हो.. *** राजीव रंजन प्रसाद
 
राजीव रंजन प्रसाद
Dec 29 2009 11:42 AM
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कैसे मेरा दिल धडकने लगा है...

मेरे बगीचे के गुलाब मुस्कुराते नहीं थे हवा मुझे छू कर गुनगुनाती नहीं थी परिंदों नें मुझको चिढाया नहीं था मेरे साथ मेरा ही साया नहीं था तुम्हे पा लिया, ज़िन्दगी मिल गयी है चरागों को भी रोशनी मिल गयी है नदी मुझसे मिलती है इठला के एसे कि जैसे शरारत का उस
 
राजीव रंजन प्रसाद
Dec 29 2009 11:42 AM
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नक्सलवाद और महाराज प्रबीर चंद भंजदेव की हत्या: थोडा आज, कुछ इतिहास (“बस्तर का हूँ इस लिये चुप रहूँ” आलेख श्रंखला)

आई प्रबीर-द आदिवासी गॉड ” देर रात तक इस पुस्तक पर आँखें गडाये रहा, कब नींद आ गयी पता ही नहीं लगा। सीने पर पडी किताब से एक सपना आँखों के भीतर चू गया। मेरे सम्मुख देवताओं की तरह दिखने वाला व्यक्तित्व खडा था - चौडा ललाट, बोलती हुई आँखें और कंधे तक बिखरे
 
राजीव रंजन प्रसाद
Dec 29 2009 11:42 AM
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मै, नींद, रात और चांद

रात और चांद का एक रिश्ता है नींद और चांद का एक रिश्ता है मेरा और चांद का एक रिश्ता है मै , नींद , रात और चांद जब इकट्ठे होते हैं महफिलें सजती हैं और ज़िन्दगी जाग जाती है.. *** राजीव रंजन प्रसाद
 
राजीव रंजन प्रसाद
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तुम भी सोचो..

एक बार देस में पंछी के दो चार चिरैये लड बैठे फिर आसमान में सीमायें बन गयीं अनेकों कैसे सूरज बटता लेकिन किसके हिस्से चांद सिमटता और हवाओं का क्या होता बैठ चिरैये सोच रहे थे तुम भी सोचो सीमा में क्या बंध जायेगा सब कुछ... *** राजीव रंजन प्रसाद
 
राजीव रंजन प्रसाद
Dec 29 2009 11:42 AM
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ब्रह्मदर्शन..

ज़िन्दगी को समझना है? सागर को तैरो तो उस पार पहुचो.. अरे डूब जाओ न आँखों में उसकी वही सत्य है फिर वही ब्रह्मदर्शन.. *** राजीव रंजन प्रसाद १५.०१.१९९६
 
राजीव रंजन प्रसाद
Dec 29 2009 11:42 AM
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हजार पच्यासीवें का बाप [बस्तर में जारी नक्सलवाद के समर्थकों के खिलाफ] - राजीव रंजन प्रसाद

दिल्ली में बैठा हूँ और सुबह सुबह एक प्रतिष्ठित अखबार भौंक गया है, बस्तर के जंगलों में क्रांति हो रही है। लेखिका पोथी पढ पढ कर पंडित हैं, कलकत्ता से बस्तर देखती हैं। दिख भी सकता है, गिद्ध की दृष्टि प्रसिद्ध है, कुछ भी देख लेते हैं। वैसे लाशों और गिद्ध
 
राजीव रंजन प्रसाद
Feb 04 2009 11:12 AM
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कुछ तो बोलो...

अधकाच्ची अधपक्की भाषा कैसी भी हो कुछ तो बोलो.. खामोशी की भाषा में कुछ बातें ठहरी रह जाती हैं आँखों के भीतर गुमसुम हो गहरी गहरी रह जाती हैं मैं कब कहता हूँ मेरे जीवन में उपवन बन जाओ मैं कब कहता हूँ तुम मेरे सपनों का सच बन ही जाओ? लेकिन अपने मन के भीतर
 
राजीव रंजन प्रसाद
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सादापन तुम्हारा है तो मेरी भी कहानी है..

सिर्फ सादगी और तुम.. महज इस लिये रंगीन है दुनिया कि बादल हर रंगों को आँखों में पिरोते हैं कि बादल तेरे दामन से मेरी आँखों में खोते हैं कि सादापन तुम्हारा है तो मौसम में रवानी है कि सादापन तुम्हारा है तो मेरी भी कहानी है कि सादापन लहर बन कर मुझको डुबो
 
राजीव रंजन प्रसाद
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गुनगुनाते हुए कुछ ही पल..

धूप भरी ज़िन्दगी में निर्झर में पैर डाले गुनगुनाते हुए कुछ ही पल एसे नहीं हैं क्या जैसे भूले हुए लम्हों में बीती हुई बातों की चीरफाड और छोटी छोटी बातों पर घंटों की उलझन जैसे आपस में गुथे हुए हम... फिर फिर याद आओगे आप हमें स्मृतियों में महकेंगे ये पल औ
 
राजीव रंजन प्रसाद
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सफर - राजीव रंजन प्रसाद

अशांत थे भीष्म मन के हिमखंडों से पिघल-पिघल पड़े, गंगा से विचार.. कि कृष्ण! यदि आज तुम प्रहार कर देते तो क्या इतिहास फिर भी तुम्हें ईश्वर कहता? रथ का वह पहिया उठा कर, बेबस मानव से तुम धर्म-अधर्म की व्याख्याओं से परे यह क्या करने को आतुर थे? स्तंभ नोच
 
राजीव रंजन प्रसाद
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बस्तर भारत का हिस्सा नहीं है?

क्रांति की एक चौराहे पर पुंगी बज रही थी “बोल मजूरे हल्ला बोल-हल्ला बोल, हल्ला बोल”। सूत्रधार चीख रहा था – दिल्ली बिजली से चमचमाती है और इधर बस्तर में जानवरों की तरह जीने के लिये विवश हैं लोग। सडक नहीं है, पीने का पानी हर गाँव नहीं पहुँचा, स्कूल नहीं
 
राजीव रंजन प्रसाद
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नक्सलवादी या उनके समर्थक - सुकारू के हत्यारे कौन? (बस्तर का हूँ इस लिए चुप रहूँ - संस्मरण, कडी-2)

तब एसी मनहूसियत हवाओं में नहीं थी। उससे मैं पहली बार पुरानी बचेली के बाजार में मिला था जहाँ मुर्गे लडाये जाते थे। बडा जबरदस्त माहौल हुआ करता था। उसने लाल अकडदार मुर्गे पर दाँव लगाया हुआ था, कम्बख्त मुर्गा केवल देखने का ही मोटा था। सामने वाला मुर्गा
 
राजीव रंजन प्रसाद
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तालाब नहीं भाते हैं..

मुझे तालाब नहीं भाते हैंठहर जाते हैंऔर तुम इसीलिये उदास करती हो मुझे..तुममें अपनी परछाई देखता हुआखीज कर फेंकता हूँ पत्थरभँवरें मुझतक आती हैंफिर ठहर जाती हैं..शाम कूट कूट कर लाल मिर्चझोंक देता है मेरी आँखों मेंमैं पिघल पिघल कर बहा जाता हूँठहर जाता हूँ
 
राजीव रंजन प्रसाद
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बस्तर का हूँ इस लिये चुप रहूँ - साभार मोहल्ला।

संस्मरण (कडी-1) जगदलपुर का सीरासार चौक, शाम के करीब सात बजे होंगे। अचानक एक जनसैलाब उमडा और चौंक से उस बेहद संकरी सडक में जैसे उमडता हुआ पुलिस थाने की ओर बढने लगा। मैं कुछ समझ पाता इससे पहले बचने की कोशिश जरूरी थी। मैं अपने मित्र अफज़ल के घर की ओर भाग
 
राजीव रंजन प्रसाद