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प्रत्यक्षा

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05 Jun 2010
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ऐसा जिसे प्यार कहा नहीं जा सकता

नदी बनती है , पहाड़ बनता है तुम बनते हो प्यार बनता है ***तुम्हें चूमना खुद को चूमना होता है तुम्हें छूना खुद को , आईने में तुम देखते हो जिधर मैं भी वहीं देखती हूँ ***रात में तकिये के नीचे तुम्हारी आवाज़ सिरहाने *** कँधे से कँधे सटाये साथ बैठना सिर्फ और कुछ
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हम दोनों

दिन में बड़ी मेज़ पर पोस्टर्स और कागज़ फैलाये मैं धूप पीती हूँ । बारीक महीन इलस्ट्रेशंज़ । मेरे पास दो महीने का समय है । उसके मन्यूस्क्रिप्ट के शब्दों को मैं जीभ पर घुलते महसूस करती हूँ । हर शब्द के अर्थ तीन चार । तलाशती हूँ गुप्त संकेत । शब्दों और वाक्यों
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अमेज़िंग ग्रेस

आज उदास होने का दिन नहीं जबकि आँख की नमी कुछ और कहती है । छाती पर जमी कोई टीस है , कई स्मृतियाँ हैं । जो सबसे नज़दीक की हैं , उन्हें भूल जाना चाहती हूँ , जो पुरानी हैं आज सिर्फ उन्हें याद करना चाहती हूँ , आज खुश रहना चाहती हूँ , आपके लिये आपकी सब तकलीफें
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खुद से

मुर्गाबियों का झुँड पानी की सतह पर उतरता है । जैसे साँझ उतरती है । पानी पर पहले उतरती है , पेड़ की पत्तियों से छनकर । आसमान में जबकि अब भी दिन का आभास बाकी है । ये दिन का वो समय है जब खुद से बात की जा सके,रफ्ता रफ्ता ,सोचकर रुककर समझकर टटोलकर,अपनी आत्मा
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कि ज़मीं से भी कभी आसमाँ मिल गया

बम्बई की खाली सड़कें , मरीन ड्राईव का कर्व , बारिश के झपाटे , नवीन निश्चल और प्रिया राजवंश , हँसते ज़ख्म रोते दर्शक , रात में शहर , ऑरकेस्ट्रा के बीच गाड़ी तेज़ी से गीले सड़क पर भागती घूमती , रौशनी , अँधेरा , बारिश प्यार , तेज़ तेज़ मीठा मीठा फिर हँसी और धुँआ
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बिना ज़मीन जंगल पानी के ..हम कहाँ जायें ?

ऐसा समय है किसी का किसी पर विश्‍वास नहीं । आप पर मेरा और आपको मेरा विश्‍वास नहीं । उस दूसरे पर तो हम दोनों को ही भरोसा नहीं जो अपनी पहचानी भूमिका, बहत हद तक हमारे ओर से आरोपित, से अलग किसी नयी शक्‍ल में हमारे सामने आ रहा है। उसकी शक्‍ल क्‍या बनती है से
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सिर्फ एक प्रेम कथा

***   ***   ***गीली मिट्टी ,गेहूँ की बाली, तुम और मैं.... तुम्हें याद है गर्मी की दोपहरी खेलते रहे ताश, पीते रहे नींबू पानी, सिगरेट के उठते धूँए के पार उडाते रहे दिन खर्चते रहे पल और फिर किया हिसाब गिना उँगलियों पर और हँस पडे बेफिक्री
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इतनी परछाईयाँ किस बात की ? beyond the still silhoutte

I can feel the blisters in my soul.He laughs at me, his eyes crinkling at the edges. I feel hurt, I feel abandoned. You betrayed me, I complain. My voice is a little girl’s voice. I tell him, wear always white.He says, little girl, comb your hair. I wake
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छत मिलेगी ? और सपना ?

बाहर सन्न हवायें डोलती हैं , उँगलियों पर दिन निकलते हैं , रात ? रात भर बात चलती है ,सपनों की दुनिया दिन के उजाले की खैरात पर नहीं चलती , सफेद पँखों वाले घोड़े की पीठ पर बेखट सरपट बहती हवा के संग किसी और छोर निकल जाती हैं अँधेरी रात में बाँसुरी की धुन चाँद
Feb 28 2010 06:31 AM
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रात के बाद

निर्मल कुहनी पर सर टिकाये दीवार का कोना देखती है । गर्मी है उमस है अँधेरा है। साड़ी का पल्ला फर्श पर फैला है जैसे नदी बहती हो , अँधेरी रात में नीली नदी , शरीर बहता है मन बहता है । कमर पर पसीने की झुलस झाँस है । फिर भी दिल में कैसी हुमस है , ऐसे इस तरह लेट
Feb 25 2010 12:59 PM
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बारिश और बिच्छू

बहुत पुरानी स्मृतियों में , मेरी नहीं , माँ की स्मृति में , जो जाने कितनी बार दोहराई गई हैं , बरसाती दोपहरों में और कुहासे घिरी ठंडी रातों में , चाय की प्यालियों की भाप के बीच और खाने के बाद सौंफ की खुशबूदार जुगालियों के गिर्द , सोचते और फिर याद करते ,
Feb 19 2010 09:55 PM
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कुसुम कुमारी कुँज बेहारी

सपने के भीतर एक और सपना था , पानी पर तैरती मरी मछली के पेट जैसा , पीला फीका और निस्तेज़ । ऐसा नहीं था कि जागी दुनिया कुछ शोख चटक थी लेकिन सपनों से एक दूसरे उड़ान की कल्पना और उम्मीद तो रखी ही जा सकती थी । शहरज़ाद की हज़ार कहानियों वाली अरेबियन टेल्स की तरह
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अँधेरे में अकेले

एक बगीचा था । धूप से भरा । एक कमरा भी था जिसकी दीवारें नहीं थीं । बगीचे की नीली छत थी । कमरे में हरियाली थी । औरत सोचती थी यही जन्नत है , भीतर बाहर । ऐसा सोच कर उसे बेतरह खुशी मिलती थी । और इतना कहते ही एक अकेली चिड़िया आसमान में एक तीखे उड़ान में निकल
Feb 14 2010 07:25 PM
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15 माईल्स ... अंतिम भाग

‘‘ओ... यू...?’’ जैसे उसकी रूह उसके तन-मन के हाथ पकड़ कर नाच उठी। उठने लगी तो उसने उसके कंधे पर हौले से हाथ रख कर रोक लिया और खुद भी बैठ गया।वह उसे कंधों पर से भारी-भरकम सैक उतारते देखती रही।‘‘कैसी हैं आप?’’ वह आवाज उसकी नसों में उतरती चली गई। ‘‘व्हेयर हैव
Feb 14 2010 11:42 AM
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द माईलस्टोन ... भाग 2

( अब आगे ... )अगर किसी फिल्म की शूटिंग चल रही होती तो भीड़ होती और वह लौट जाती चुपचाप...लेकिन उसकी नजरें अभी जंगल और नदी तट को छान रही थीं... कहीं ‘कोई’ तो हो...नहीं... कोई नहीं है। तो कोई नहीं आएगा अब?उसने अपनी आंखें भीतर को मोड़ीं और जैसे जन्मों से जमी
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15 माइल्स...द माइलस्टोन

अपने ब्लॉग पर कभी दूसरों की चीज़ नहीं डाली पर ये कोई हीरामन की तीसरी कसम नहीं थी । खैर , दो शैतानों से बातचीत होती रही थी और अचानक बातों बातों में एक नये खेल का अस्वाद .. चलो व्हाई नॉट । मुझे आनंद आयेगा , उनको आयेगा और मेरे सब ब्लॉग साथियों , उम्मीद है आप
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तुमी बाजना बाजो ना कैनो ?

अनुराज रामदूथ पुराने मंदिर के चबूतरे पर सूखे पत्ते हटाता जीर्ण खंभे से पीठ टिकाता बैठ जाता है । धूप चेहरे पर बरसती है । कपड़े के जूते धूल से अटे हैं । इस बियाबान सुनसान में छूटा लूटा भक्ति स्थल , साँप की बाँबी और फर्श फोड़ते तने का बवंडर । कोई राहगीर द
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शेक्सपियर ऐंड कम्पनी

इस जगह को देख कर सबसे पहले इच्छा होती है कुछ दिन यहाँ रहा जाय । सचमुच रहा जा सकता है अगर आप लेखक हैं और दुकान की मालकिन सिल्विया को आपकी शकल और आपकी लिखाई पसंद आ जाये । सैंतीस रू दला बूशेरी पर स्थित ये शेक्सपियर ऐंड कम्पनी है । लैटिन क्वार्टर्स में स
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परती परिकथा

उनके बीच उल्लास खत्म हो गया है । बावज़ूद, वो अब भी किसी मोह में डूबे बात करते हैं । चौंक चौंक कर हड़बड़ा कर किसी आवेग में एक दूसरे को तलाशते हैं । लेकिन बात शुरु करते ही , पहला शब्द बोलते ही लगता है , ओह क्या बात कहनी थी ? जेब में रेज़गारी टटोलने जैसी जु
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शहर पार अजनबी .. एक मोंताज़ , चीन की दीवार

पत्थर के चौकोर टुकड़ों पर हाथ फिराते बार बार खुद को याद दिलाया , ये इतिहास का एक हिस्सा है और इसे छूते ही मैं उस समय से इस समय तक खिंचा तार हूँ । नीचे पेड़ों के झुरमुट से चमकते शीशे जैसा लाल रंग कौंधता है । लड़की अपनी आँखें मींचे हँसती है और बूढ़ी औरत बा
Oct 14 2009 07:35 PM
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हाय गज़ब ! कहीं तारा टूटा

पलथी मार कर बैठीं मुन्नी दीदी के चेहरे पर हँसी दौड़ रही थी । जैसे कोई छोटा बच्चा चभक कर उनके चेहरे पर आ बैठा हो । कोई किस्सा सुना रही थीं और उस किस्से के होने की याद में , बोलने के पहले ही उनका शरीर उस हँसी में बार बार डोल जाता । मैं ज़रा मुस्कुराती , उस
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बरसात की एक रात ..द स्टेज इज़ सेट फॉर द क्राइम

कुहासा झम झम गिर रहा था । जाड़े के सर्द दिनों में बारिश का तीसरा अवसाद भरा दिन था । दिन के बाद रात अचक्के नकाबपोश सी आई थी। सड़क वीरान थी। घरों की खिड़कियाँ बन्द थीं , पर्दे गिरे थे । अँधेरे में लैम्पपोस्ट से लटका एक पीला फीका गोला धीरे धीरे हिल रहा था ।
Aug 25 2009 01:31 PM
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गली के पीछे

कौन सा पुराना बाजा बजता है , पता नहीं पर रात बीतते नस पर चढ़ता है दर्द , और कोई धीमे से पूछता है , डर तो नहीं लग रहा ? तिरती खामोशी में खुद की साँस का शोर बेशर्म बेढपपने में छूटता गिरता है । एक सुबुक सिसकी दम तोड़ती है , हँसी फुसफुसाती है दबी शैतानी में और
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मोहब्बत

उसकी आवाज़ कूँये में गिरते छोटे पत्थरों जैसी थी । हर शब्द के बाद एक चुप्पी का छोटा तालाब जिसमें शब्द की अनुगूँज सुनाई दे । दबी कसक में लिपटी जाने कहां से अचानक उस बचपन की याद हो आई जब हम घर के पीछे पोखरे पर कितनी शामें कमीज़ और निकर में , घुटने छिलाये ,
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क्‍या बात करें ?

किससे बात करें ? क्‍या बात करें ? गालों पर पेंसिल टिकाये सोचते हुए चेहरे दीखते हैं , सोच की घरघराती मशीन का वाजिब प्रॉडक्‍ट क्‍या है, हाथ नहीं आता । हाथ आता है, स्‍वाति ? स्‍वाति मेरी तरफ देख रही है, दीखता है, वाकई सुन पा रही है ऐसा नहीं लगता । लंच के
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सबसे बड़ा ग्लोब

हमारे घर एक बैरोमीटर , एक लक्टोमीटर और एक ग्लोब था । एक थर्मामीटर भी था जो टूट गया था और जिसका पारा हमने एक छोटे पारदर्शी डब्बे में इकट्ठा कर रखा था । लैक्टोमीटर से हम दूध की शुद्धता नापते थे । उन दिनों हमारे घर में फ्रिज़ नहीं था और माँ दिन में चार ब
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समय सपना

मैं सपने देखने के सपने देखता हूँ । हवा तेज़ चलती है , सीटी बजाती और गौरैया फुदकती है खिड़की के सिल पर ,रेडियो सिलोन पर पुराने गाने बजते हैं, प्रीतम आन मिलो ....और बाहर सड़क पर सिलबट्टे कूटने वाला फेरी लगाता है सुनसान सड़क पर , अकेला सब दरवाज़े बन्द हैं ,
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सफीना ए गमे दिल

कभी आप इश्क़ में पड़ जाते हैं , कुछ पढ़ते हैं और मोहब्बत हो जाती है । क़ुर्तुल एन हैदर को पढ़ा था जब दस बारह साल की रही हूँगी । अपरम्परा एक पत्रिका थी जिसके सिर्फ तीन अंक निकले । बड़े लोग जुटे थे इस पत्रिका से और इसके छपने से घरैया संबंध भी था जो खैर महत्त
Mar 30 2009 05:29 PM
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तैमूर तुम्हारा घोड़ा किधर है ?

बूढ़ा गरम कपड़ों में लिपटा , पनियायी आँखों से देखता है , जीवन जो बीत चुका । अब और कुछ नहीं है इंतज़ार के सिवा । चाय की प्याली से हाथ सेंकता सोचता है अब भी वही तीस साल का फुर्तीला जोशीला लड़का कुँडली मार कर बैठा है भीतर । क्या होगा उसका मृत्यु के बाद । ये
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चीख

खुशी एक याद है । बचपन जैसे । फिर कैसे भूलती हूँ । वो रास्ता गुम हो जाता है समय में । पीछे पीछे पाँव रखते पहुँच नहीं पाती वहाँ जहाँ से सब शुरु हुआ था । उन दिनों को याद रखना इतना ज़रूरी क्यों था ? अब सिर्फ एक चीख की गूँज जैसा कुछ सिर्फ क्यों बाकी है । ब
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स्वप्न गीत

किसी छोटी सी बात का सिरा कहाँ तक जाता है । उसने सिर्फ ये कहा था , लगता नहीं है जी मेरा उजड़े दयार में । उसकी आवाज़ में उदासी का बेहोश आलम था । जैसे अफीम के पिनक में कोई नशेड़ी । मैंने पूछना चाहा था , कौन सा दयार था जो उजड़ गया ? लेकिन पूछा नहीं था । सिर्
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बैठे बिठाये

उदास संगतों के बीच कोई सुर तलाशते हैं , खोजते हैं मायने सपनों के । झरते फूलों और गिरते पत्तों के सारंगी सुरबहार तान में , कोई विकल बेचैनी नये पत्ते की तरह फूटती है । काली बिल्ली एक बार घूम जाती है पूँछ उठाये । मैं अँधविश्वासी नहीं फिर भी रुकती हूँ ,
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लमोरे के

कैसी आवाज़ थी ? जैसे किसी तूफान में समन्दर हरहराता हो , जैसे रेत का बवंडर गले से उठता था । उसमें पत्थरों की खराश थी , नमी थी एक खुरदुरापन था । रात में खुले में चित्त लेटे तारों को देखना था और किसी ऐसे ज़मीन के टुकड़े पर पाँव रखना था जो इस दुनिया का नहीं
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डांस मी टू द एन्ड ऑफ लव

कोई ताला था जिसकी चाभी बस मेरे पास थी । नीम अँधेरी रातों में अपने भीतर की गर्माहट में उतर कर देखा था मैंने ..ठंड से सिहरते किसी ऐसी अनजान लड़की को बाँहों में भरकर ताप दिया था और फिर पाया था , अरे इसकी शकल तो हू बहू मेरी है । उसके चेहरे को हथेलियों में
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ओ लाल मेरी पत रखियो ...

दिन गुज़रता है , दीवार पर हिलते काँपते सिमटती छाया , साया गुज़र जाता है आसपास , रात बीतती नहीं , आँखों में सपना बीत जाता है । आग के फूल रेगिस्तान में उगते हैं , पैर के तलवे फटते हैं , सफर होता नहीं खत्म , दिन बीतता है , बीतती है साँस और छाती पर हर रोज़
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मैं तुम्हारे लिये गुमनाम सडकों पर बसों से उतरता अकॉर्डियन बजाता रहता हूँ ..

तुमने कहा था – मैं तुम्हारे लिये गुमनाम सडकों पर बसों से उतरता अकॉर्डियन बजाता रहता हूँ .. ढेर सारी सूखी पत्तियाँ फिर भी झरती रहतीं हैं । बचपन में देखे पोस्टकार्ड्स में पीले और सुर्ख पत्तों से भरे बाग के नीचे एक अकेला बेंच। कुछ कुछ उस फेल्ट लगाये दढ़ि
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एक ऐसा प्यार भी ..

कुछ बेहद उदासी वाला गाना क्रून करना चाहती हूँ , नशे में डूब जाना चाहती हूँ । माई ब्लूबेरी नाईट्स । अँधेरे रौशन कमरों की गीली हँसी में फुसफुसाते शब्दों को छू लेना चाहती हूँ , उस धड़कते नब्ज़ को छू कर दुलरा लेना चाहती हूँ । गले तक कुछ भर आता है उसे छेड़ना
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मेरी यात्रा शुरु होती है अब ..

मेरा मन ऐसा क्यों हुआ ? जैसे दरवाज़े पर लटका भारी ताला ? और तुम्हारी संगत के दिन ? ऐसे थे क्या कि धूप अब खत्म हुई सदा के लिये । मेरे दिन क्या ऐसे ही लाचार बेचारे थे ? अपाहिज़ ,जो तुम्हारी संगत के बिना एक पल धूप और रौशनी की तरफ चल न पायें ? उन दिनों का
Jan 28 2009 10:17 AM
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चुंगकिंग एक्सप्रेस ?

सब चीज़ें एक्स्पायरी डेट के साथ आती हैं । प्यार , स्नेह , भरोसा , अंतरंगता , भोला सहज विश्वास ..सब । उम्र तक ! मैं कहती हूँ । तुम कहते हो ,चुंगकिंग एक्स्प्रेस का डायलॉग बोल रही हो ? मैं लेकिन पाईनऐप्पल खाते नहीं मर सकती , मैं हँसती हूँ । मैं दुख में क
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एक दोपहर ..तुम यकीन नहीं करोगे

हम जब बात करते हैं हमारे बीच की हवा तैरती है , तरल । तुम यकीन नहीं करोगे लेकिन कई बार मैंने देखी है मछलियाँ , छोटी नन्ही मुन्नी नारंगी मछलियाँ , तैरते हुये , लफ्ज़ों के बीच , डुबकी मारती , फट से ऊपर जाती, दायें बायें कैसी चपल बिजली सी । तुम कहते हो ,