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07 Jun 2010
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कुछ लघु कविताएं- क्षणिकाएं

अबला जब तक तुम अपने आप को दूसरों के दर्पण मे देखना चाहोगी। तुम अबला ही कहलाओगी। ******************* प्रेम या कर्ज तुम को सँवारनें मे मैने अपना जीवन होम कर दिया। अपनी खुशीयां देकर तुम्हारा गम लिआ। वह प्रेम था तो..... इस बात को भूल जाओ। कर्ज था तो.... अपनी
 
परमजीत सिँह बाली
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बहुत सताया गर्मी ने......

(चित्र गुगुल से साभार) रिम-झिम रिम-झिम बरसा बादल, बहुत सताया सूरज ने... सब के तन मन आग लगी है, बहुत सताया गर्मी ने.... ऊपर वाले अब तो सुन ले, तू अब तक क्यों सोया है। महँगाई की मारे खा के, निर्धन अक्सर रोया है। तू भी क्यों उस को है रूलाता, पेश आ उस से
 
परमजीत सिँह बाली
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गर्मीयां......

पेड़ की ओट में अपने बच्चों को समेटती इन गर्म हवाओं और लू की मार सहती वह गरीब औरत जो राजधानी मे पेट भरने को आई थी परिवार के साथ... सोच रही होगी- इस पूरी गर्मी को.... मेरे कितने बच्चे देख पाएगें? कितने वापिस गाँव जाएगें? ...
 
परमजीत सिँह बाली
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मेरी डायरी का पन्ना - २

डायरी का पन्ना - १ पिछ्ला भाग पढ़े। हम सभी जी रहे हैं लेकिन हम मे से कितने होगें जो किसी लक्ष्य को लेकर जी रहे हैं।शायद यह प्रतिशत बहुत कम होगा।समय के साथ साथ परिस्थिति वश हमारी दिशा प्रभावित होती रहती है।हम ना चाहते हुए भी लाख कोशिश करें लेकिन
 
परमजीत सिँह बाली
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उदासी का राज.....

उदास मन,उदास मेरा, दिन और रात है। वजह नजर आती नही, ये कैसी बात है। या रब खफा है तू ,या खुद से खफा हूँ मै, समझ नही आता मिली, कैसी, सौगात हैं। पूछूँ किसे जाकर बताएगा यहाँ अब कौन, हर दिल का लगे ऐसा ही, मुझको हाल है। मन की आँख जैसे, मुझे दुनिया दिखे वैसे,
 
परमजीत सिँह बाली
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मुर्दो की बस्तीयों में.....

मुर्दो को बस्तीयों में घर हमने बसाया है। जो रूठ कर बैठा है, अपना ही साया है। बहारों की तमन्ना, करते सभी हैं लेकिन- सौंगात को यहाँ पर,कब किसने पाया है। आग सब तरफ है बाहर भी और दिल में, आतिशे मौसम, क्या लौट फिर आया है। मज़हब के नाम पर, होते यहाँ धमाके - या
 
परमजीत बाली
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दिल कहीं पर जल रहा............

(by shiknet) दिल कहीं पर जल रहा और कहीं दीप है, तेरी मेरी कोई ना जानें ये कैसी प्रीत है। तू हमेशा प्रश्न मुझ पर दागता रहता सदा, मै हमेशा बहता हूँ जिस ओर चलती है हवा। बस मे मेरे अब नही, चलता नही कोई जोर है, मै गुलामी कर रहा चारों तरफ यह शोर है। वक्त के
 
परमजीत बाली
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मेरी डायरी का पन्ना - १

जीवन में कई बार ऐसे मौके आते हैं कि हम जो होते हैं उस से एकदम विपरीत सोचनें लगते हैं।जब कि हम खुद भी नही जानते कि ऐसा क्युं कर होता है।हमारा मन ,हमारा दिल, दिमाग अचानक हमारे लिए अनायास अंनजान सा क्युं हो जाता है। जब कि हम सदा ऐसा मानकर चलते हैं कि हम
 
परमजीत बाली
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बेमतब की बातें...

बेमतलब बोलता बच्चा कभी गाता है... कभी नाचता है.. कभी अध्यापक बनकर उन बालको को पढ़ाता है... जो वहाँ हैं ही नही... कई बार उस से खींज कर उसके इस बेमतल के शोर और नाच के कारण उस पर चिल्लाता हूँ..... वह तो दोड़ जाता है... लेकिन उसकी जगह हर बार अपने को पाता हूँ।
 
परमजीत बाली
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मन हमारा पंछी....

(गुगुल से साभार) मन हमारा पंछी बन कर उड़ रहा आकाश में... ठौर यहाँ मिल ना सके, मिल जाएगी इतिहास में। सोचता है कौन, जीवन को समर, कोई यहाँ... चल रहे हैं हम सभी,भीड के ही साथ में। जी रहे हैं, या की जीना, आज हम को पड़ रहा... आज जीवन भी ये अपना, रहा नही है हाथ
 
परमजीत बाली
Mar 26 2010 01:15 PM
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मन की तरंगे......

कब तक कोई बाहर ही देखता रहे...समझ मे नही आता कि बाहर ऐसा क्या है ?..... जिस का मोह हम से छूटता ही नही। कितना तो भाग चुके इन सब के पीछे.....कितनी सफलताएं असफलताएं हाथ आई हैं, ऐसा लगता है हमें ।......लेकिन जब पीछे मुड़ कर देखते हैं तो सिवा खालीपन के कुछ नजर
 
परमजीत बाली
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ना हिन्दू बुरा है ना मुसलमान बुरा है......

ना हिन्दू बुरा है ना मुसलमान बुरा है जिसने ये देश बाँटा वो इंसान बुरा है। गाँधी गोली खा मरे बहुत बुरा हुआ सुभाष लापता हुए बहुत बुरा हुआ फायदा किसे हुआ जानता है रब.. देश ना समझा ये बहुत बुरा हुआ। चुप रहके सब देखना, मान बुरा है। ना हिन्दू बुरा है ना
 
परमजीत बाली
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चंद मुक्तक

ना पूछो, वक्त ने क्या क्या सितम ढहाए हैं। अपनो ने जो रास्ते हमको अब तक दिखाए हैं समझ आता नही जाए कहां कोई बता दो यार, यहां हर मोड़ पर हमने देखे बस चौराहे हैं। ************************************ हरिक चौराहे पर अब भीड़ दिखती है। वह ऐसा मुझे हर खत मे लिखती
 
परमजीत बाली
Mar 01 2010 05:35 AM
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दो क्षणिकाएं

पता नही- किस की नजर लग गई है... अब मेरा बटुआ पहले जैसा नजर नही आता। जेब मे होते हुए भी जेब में है... लेकिन... मै जान नही पाता। ***************************** इस मंदी से मार.... हम और तुमको खानी है। नेता तो इस मंदी से भी फायदा उठाएंगे। वे जानते हैं ...
 
परमजीत बाली
Feb 22 2010 04:40 AM
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दुआ कीजिए.........

शिकायत किसी से क्या कीजिए। खुद अपना दामन बचा लिजिए। बहुत धोखा खाया है चेहरों से हमने, मुखौटा ये अपना हटा लीजिए। पहचानते हैं हम भी अपना पराया ऐसे ख्याल ना भीतर पालीए। कदम अब संभल कर हम रख रहे हैं, मंजिल तक पहुँचे दुआ कीजिए।
 
परमजीत बाली
Feb 15 2010 04:59 AM
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बुझी चिंगारीयों को फिर से हवा मिल रही है..

बिना कारण कुछ भी तो नही होता.....समस्याए पैदा ही तभी होती हैं जब कोई कारण हो।..यदि समय रहते उस कारण को दूर कर दिया जाए तो यह अंसभव है कि वह समस्या ज्यादा देर टिक पायेगी।क्यों कि कोई बाहरी दुश्मन तभी किसी देश मे हस्तक्षेप कर सकता है जब उसको वहाँ कोई छिद्र
 
परमजीत बाली
Feb 11 2010 05:22 AM
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जिज्ञासा

अपने अधूरेपन की तलाश मुझे यात्रा पर ले जाती है। जहाँ वह मुझे अन्जान रास्तो पर अंन्जान लोगो के बीच बहुत खेल खिलाती है। मेरा तमाशा बनाती है। लेकिन मेरी हताशा देख कर कोई आवाज मुझे बुलाती है मुझे समझाती है- इस जिज्ञासा को जलाए रखे अपने भीतर। देर सबेर रास्ता
 
परमजीत बाली
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किसी से भी नही गिला.....

संभल कर जब भी चला सिवा ठोकर के मुझे क्या मिला ? लेकिन मुझे इस बात का किसी से भी नही गिला। क्योंकि मेरा संभलना, उन मेरे अपनों के लिए दुखदाई हो जाता है। जिन्हें मेरी लापरवाही से चलना बहुत भाता है। इसी लिए मेरा इस तरह चलना उन्हे रास्तों मे पत्थर रखने को
 
परमजीत बाली
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गज़ल

(नेट से साभार) आज फुर्सत मे बैठ कर कुछ गजलें सुन रहा था.."तुम इतना क्यूं मुस्करा रहे हो.." इसी को सुनने के बाद गजल लिखने बैठा और ये गजल बना ली....। इस मे उस गजल की झलक भी नजर आएगी....लेकिन फिर भी लिख दी....। जब गजल कि अंतिम पंक्तियां लिखनें लगा....तो
 
परमजीत बाली
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ये कैसी जिन्दगी है........

अपनी आवाज भी मुझ को, सुनाई नही देती। ये कैसी जिन्दगी है जिन्दगी, दिखाई नही देती। नशा है जाम का जिस मे बहक चल रहे है सब, होश मे मुझको यहाँ जिन्दगी दिखाई नही देती। हरिक पल मर रहा है जिन्दगी का सामने मेरे, पकड़ना दूर,मुझको संग भी, चलने नही देती। खुदा ने दी,
 
परमजीत बाली
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कुछ क्षणिकाएं

ठंड बहुत है.... इसी लिए सरकार ने गरीबों के लिए ठंड से बचाने के लिए यह जुगत लगाई है - महँगाई की आग जलाई है। ******************* जब कोई गलत आदमी सही बात बोलता है.... आदमी को नहीं उस की बात को मान देना चाहिए। यदि यह तुम्हें स्वीकार नही... अपने को - पहचान
 
परमजीत बाली
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दिल की बातें.........

दिल की बातों का असर अब नही होता। दुसरो के लिए कोई यहा अब नही रोता। जिन्हें सदा देख कर , मुस्कराते थे हम, उनकी तस्वीर है ये, यकी अब नही होता। खेल है किस्मत का या कहर है उनका, खुदा भी मेहरबा हम पर, अब नही होता। अब दिल की बातों को सुनना छोड़ दिया, परमजीत दिल
 
परमजीत बाली
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अब यह चुप्पी तोड़ दो

तुम से किसने कहा- तुम चुप रहो.... अपने को संभालो मत ऐसे बहो। तुम्हारा चुप रहना ही कमजोर बनाता है। दूसरो की हिम्मत बढ़ाता है। जरा अपनी तरफ देखो- तुम भी ठीक वैसे ही हो जैसा वह है.. फिर किस बात का भय है ? बस! गलत का साथ इस लिए मत दो.. क्योकि वह वही है जो तुम
 
परमजीत बाली
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नये साल की आप सब को बधाई...

अच्छा बहाना है, नया साल आया है। मिलने का एक नया बहाना लाया है। जो कहते थे हमसे कभी,वक्त नही है, नये साल ने हमको उनसे मिलाया है। मुँह फुला बैठा था जो हमसे बहुत दूर, अपने अंह ने कर रखा था, मजबूर । नये साल की मुबारक पर मुस्कराया है। अच्छा बहाना है, नया
 
परमजीत बाली
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अपने अपने सच....

चित्र गुगुल से साभार) सच तो मैं भी बोल रहा हुँ। सच तो तुम भी बोल रहे हो। अपने अपने सच दोनों के, दोनों को क्यों तौल रहे हो ? जो मैने भुगता, उस को गाया। जो तूने भुगता, उसे सुनाया। दोनो अपनी अपनी कह कर, अपना सिर क्यों नोंच रहे हो। सुन्दर फूलो के संग अक्
 
परमजीत बाली
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कोई घर ना फिर से उजड़ जाए.....

फिर कहीं राख को कोई कुरेद रहा। चिंगारी कहीं कोई ना भड़क जाए। नफरत की इस आँधी में कहीं यारो, कोई घर ना फिर से उजड़ जाए। बहुत सोच समझ कर उठाना ये कदम अपना। कदम कदम पे बारूद मुझ को दिखता है। आज पैसो की खातिर मेरे वतन मे यारों जीना मरना भी यहाँ अब बिकता है
 
परमजीत बाली
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मुस्कराहट.....

एक पैकेट में ७ बन(ब्रेड) हैं. मेरी पत्नी रोज आधा खाती है और मैं एक पूरा. पहेली है कि ५ वें दिन कौन कितना खायेगा? (समीर जी की पोस्ट से साभार) यदि पत्नी मेरी हुई तो.... पहले दिन ही पैकेट खत्म हो जाएगा। स्त्री/ पुरूष विमर्श धरा रह जाएगा। ***************
 
परमजीत बाली
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मौहब्बत और फैंशन.

मौहब्बत से कहो, बातें तेरी सब मान लेते हैं। मगर हर बात पर क्यूँ , हमारी जान लेते हैं। बहुत उम्मीद थी, राहों में, चिरागे रोशनी होगी, मगर हर बार अंधेरों का दामन थाम लेते हैं। बहुत मजबूर हैं दिल से, यहाँ चलना जरूरी है, ठहर जाए अगर कोई, मुर्दा मान लेते ह
 
परमजीत बाली
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आज कैसे कर रहे हैं देखो हम करम....

बस उम्मीदों के साये मे जी रहे हम। आज अपना ही लहू पी रहे हैं हम। कौन हमको हमसे बचाएगा यहाँ आज, होठ सच के मिल यहाँ, सी रहे हैं हम। घुट घुट के निकल रहा आज अपना दम। आज कैसे कर रहे हैं देखो हम करम। प्यार पैसा बन गया हर नजर में आज। रिश्ते पैसों से बनें , क
 
परमजीत बाली
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ऐसा क्यो होता है........

फोटो अनाम स्त्रोत) जो बात हमारे अपने देश मे हजारो सालों से मान्य है ,उसी बात को जब विदेशी मोहर लग जाती है तो वह अध्ययन का विषय बन जाती है।.....वर्ना हमारे देश मे ऐसे बातों को मानने वालो को अंधविश्वासी कहा जाता है। आध्यात्म और विज्ञान-...... पोस्ट लिख
 
परमजीत बाली
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आध्यात्म और विज्ञान- बुनियादी फर्क

जिस बात का ज्ञान हमे नही होता उस बात को पूरी तरह से नकार देना मूडता है। यदि ऐसा होता तो आज विज्ञान इतना उन्नत ना होता।लेकिन फिर भी कुछ बातों को नकारने से पहले हम कभी विचार करना ही नही चाहते। सामने वाले का सीधा प्रश्न होता है साबित करके दिखाओ। जबकि वह
 
परमजीत बाली
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हम अंधविस्वासी नही हैं... पर आई टिप्पणीयों पर आधारित...

पिछली पोस्ट हम अंधविस्वासी नही हैं... पर आई टिप्पणीयों पर आधारित... आध्यात्म और विज्ञान मे एक बुनियादी अंतर है। आध्यात्म से प्राप्त अनुभव या उपलब्धी व्यक्तिगत होती है औरविज्ञान की उपलब्धी सार्जनिक। इसी लिए आध्यात्म मे प्राप्त अनुभव या उपलब्धी को दूसर
 
परमजीत बाली
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यह अंधविश्वास नही है.....

गुगुल से साभार) भूत होते हैं.... कोई भी विश्वास बिना कारण नही बनता।यदि ऐसा होता है तो संभव है वह विश्वास कभी ना कभी कमजोर साबित हो ही जाएगा। जब आप बीमार होते हैं तो किसी चिकित्सक को खोजते हैं ... आप को जो ठीक कर देता है वही योग्य चिकित्सक हो जाता है।
 
परमजीत बाली
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भूत होते हैं....

आज एक पोस्ट पढ़ी "भूत प्रेत होते हैं या नही" इसी लिए इस विषय पर लिखने का विचार बन गया। भूत या आत्मा कुछ भी कहे लेकिन यह होते हैं ऐसा सभी धार्मिक ग्रंथ कहते हैं।गीता में आत्मा के बारे में कहा गया है। ईसाई आत्मा या कहे शैतान और फरिश्तों को मानते हैं।मुस
 
परमजीत बाली
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फिर जल जाएगें दीपक..........

फिर जल जाएगें दीपक रात जरा गहरी होने दो। पहले आँखों के आँसु को पूरा तो मुझको पीने दो। बहुत लगन से देख रहा था सपनो का आकाश मैं गहरे सागर में भटक रहा था मोती की तलाश में मोती की चाहत में मुझसे कुछ ऐसा था छूट गया मेरे जीवन के सब रंगों को जैसे कोई लूट गय
 
परमजीत बाली
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एक मुर्गे की मौत

ज्यादा पुरानी बात नही है। उन दिनों एक कच्ची कालोनी में रहता था। हमारे पड़ोस मे रहनें वाले एक परिवार ने बहुत मुर्गी यां पाल रखी थी।उन मे कुछ मुर्गे तो बहुत तगड़े थे कि हर कोई उन से बच कर निकलने मे ही अपनी भलाई समझता था।एक बार पता नही कैसे एक बड़े मुर्गे
 
परमजीत बाली
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तेरा खुदा जो कह रहा...

तेरा खुदा जो कह रहा, मेरा खुदा नही मानता।आदमी को आदमी, कोई नही, यहाँ मानता।रूतबों औ’ धन से यहाँ, आदमी का मोल है,आदमी का दिल यहाँ कोई नही पहचानता।अपनी ही धुन में यहाँ ,चल रहे सब बेखबर,कितनें गुल पैरों तले, कुचलें, नहीं कोई जानता।देख सुन खामोंश है दुनिया
 
परमजीत बाली
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वक्त से आगे वक्त से पीछे

बहुत भागा ......वक्त के साथ हो लूँ।लेकिनहमेशा पीछे छूट जाता हूँ।वक्त से हारने पर,अपने को सताता हूँ।लेकिनअब मैने वक्त के पीछे दोड़नाछोड़ दिया है।उस से मुँह मोड़ लिया है।अब वक्त परबिछोना बिछा करउस पर लेट गया हूँ।वक्त जहां चाहता है ,मुझे ले जाता है।अब मुझे
 
परमजीत बाली
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सपनो की छाया तले.....

सपनो की छाया तले हम जी रहे हैं ।आज अपना ही लहू हम पी रहे हैं ।नेह मर चुका, अर्थ की सत्ता बढी है,सत्य के होठों को हम सब सी रहे हैं।सपनों की छाया तले हम जी रहे हैं।था कभी वह वक्त, सत्य पूजा जाता।झूठ उस के सामने था, तड़्फड़ाता।आज घुटकर मर रहा रोता अकेला,चल
 
परमजीत बाली
Aug 13 2009 07:41 AM
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तुम क्यूँ जिन्दा हो......

दूसरों का दुख देख करआँख तब तक नही रोतीजब तक कोई पीड़ातुम्हारे भीतरपहले से नही सोती।इस समुंद्र के किनारेरेत में क्या खोज रहे होउसे नही पाओगे।समय की लहरेंहमेशा की तरह उसे बहा करअपने साथ ले गई होगींकहीं दूर, बहुत गहरे में,किसी पत्थर के नीचे पड़ी या दबीवह
 
परमजीत बाली