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Once upon a time I tried to write ...

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18 May 2010
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सी-थ्रीफाइव पोटाचियो घूघूरियानों (भाग 1)

हेडनोट: शीर्षक एक खुराफात जनित अद्द्भुत फ्यूजन रेसिपी का प्रस्तावित नाम है. कुछ दिनों पहले अपने बॉस के बॉस के साथ एक पाँच सितारा भोज में जब उनके खास अनुरोध पर तैयार किया गया एक विकराल सा नाम धारण किए हुए व्यंजन जब चार बैरे लेकर आए तो हमें लगा कुछ तो बात
 
अभिषेक ओझा
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मुझे वो (भी) चाहिए...

'अबे सुन, जरा अपनी बाइक दे दे आज... ऐसा कर ले के मेरे घर ही आ जा ' 'आके ले जा... वैसे तेरी गाड़ी खराब हो गयी क्या?' 'नहीं आज मौसम थोड़ा अलग सा हो रहा है तो मैडम को ड्राइव पे जाने का मन है... तुझे काम हो तो मेरी गाड़ी ले जा.' 'हाँ ये अच्छा आइडिया है वैसे भी
 
अभिषेक ओझा
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फुरसत ढूँढने में व्यस्त !

व्यस्त होना भी अजीब है... 'व्यस्त/बीजी' मुझे बड़ा ही डांवाडोल अस्पष्ट सा शब्द लगता है.. अपरिभाषित सा. अपनी बात करूँ तो... अक्सर मैं और मुझे जानने वाले बाकी लोग भी मुझे बहुत व्यस्त मानते हैं... कितनी सारी किताबें पढने के लिए बची हैं, खरीदी जाने वाली
 
अभिषेक ओझा
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क्या एक ट्रिगर ही काफी है मौत के लिए ?

मैं बात कर रहा हूँ रिश्तों के एक झटके में मर जाने की. ये थोड़ा कठिन मसला लगता है, यहाँ अगर मौत हो भी गयी तो वापस जिंदगी डाली जा सकती है. क्या कहा आपने गाँठ पड़ जायेगी? नहीं ! मैं रहीम बाबा के 'टूटे से फिर ना जुड़े, जुड़े गाँठ पड़ जाए'  से पूर्णतया
 
अभिषेक ओझा
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Feb 18 2010 03:00 AM
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अंदर जाओ वरना अंदर कर दूंगा !

पिछले दिनो जब कानपुर-लखनऊ गया तो बड़े मजेदार अनुभव हुए. कानपुर सुबह-सुबह पंहुच गया तो ट्रैफिक का मजा नहीं ले पाया. हाँ लखनऊ में जरूर कुछ आशीर्वचन सुनते-सुनाते लोग मिले. मेरे एक दोस्त ने कानपुर में कभी गाड़ी नहीं चलाई. कहते गाड़ी चलाना तो सीख लिया, गाली
 
अभिषेक ओझा
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न वित्तेन तर्पणीयो मनुष्य:

तब मुझे 1.8 लाख का पैकेज मिला था. आस पास के कई गाँवों में खबर फैली थी कि फलाने का बेटा साहब बन गया. एसी टू का किराया मिला था बैंगलोर जाने के लिए. और आज ये बिजनेस क्लास की सीट छोटी लग रही है ' करीब 10 साल पहले की बात याद करते हुए बगल की सीट पर बैठे मे
 
अभिषेक ओझा
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उन गलियों से गुजरना

पिछले दिनों ऑफिस के काम से एक यात्रा पर जाना हुआ. दिल्ली, कानपुर और बीच में लखनऊ. यूँ तो बहुत दिन नहीं हुए पर पता नहीं क्यों लगा कि एक अरसे बाद आना हुआ है इन गलियों में. थोड़ी भाग-दौड़ वाली यात्रा जरूर थी पर बड़ी रोचक और ज्ञानवर्धक रही . अब भाग-दौड़ क
 
अभिषेक ओझा
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कुछ चीजें कभी नहीं बदलती?

दिमाग में चलने वाली रैंडम बाते हैं... अपने रिस्क पर पढें :)] ६.३० घंटे में शाम के चार बजे से सुबह के ५.३० बज जायेंगे. यूँ तो ऐसा पहली बार नहीं हुआ लेकिन पता नहीं क्यों ये बात मुझे पांचवी सदी में ले गयी... अब मन है जहाँ मर्जी ले जाए ! वीजा की जरुरत तो
 
अभिषेक ओझा
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निज भाग्य बड़ाई

जहाँ तक मुझे याद है बिगिनर्स लक (नौसिखिया किस्मत !) का लाभ इससे पहले मुझे एक ही बार मिला था. पहली बार जब पत्ते खेलते हुए बस जीत गया था एक बिन पैसे का खेल. उसके बाद पिछले दिनों जब मुझे स्टीव बालमर द्वारा हस्ताक्षरित विन्डोज़ ७ का लिमिटेड संस्करण मिला.
 
अभिषेक ओझा
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डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ़ महात्मा गाँधी

०२ अक्टूबर २०३०: सरकार ने आज एक विज्ञप्ति जारी की जिसके अनुसार 'इंडिया दैट इज भारत' की जगह 'डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ़ महात्मा गाँधी' कर दिया गया. इसके साथ ही सरकार का दो साल पहले का 'भारत' को देश का राष्ट्रीय नाम घोषित करने वाला फैसला रद्द हो जाएगा. क
 
अभिषेक ओझा
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उनके प्यार का ग्राफ

मैंने बहुत कोशिश की ये जानने की कि आखिर हुआ क्या हमारे रिश्ते में? लेकिन नतीजा कुछ नहीं निकला. इस 'ख़ास रिश्ते' की शुरुआत बाकी कई रिश्तों से बेहतर तरीके से हुई थी लेकिन अंत इस तरह होगा ऐसा कभी नहीं लगा. अंत तो मैं अभी नहीं कहूँगा क्योंकि मैं तो अभी भी
 
अभिषेक ओझा
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फर्माटिंग के चक्कर में बड्डे सेलिब्राट हो गया !

कुछ फर्माटिंग में गड़बड़ हुई और हमारा बड्डे सेलिब्राट हो गया. अब ये वाकया लिखने बैठा तो 'फर्माटिंग' और 'सेलिब्राट' याद आ गए. शब्द चर्चा थोडी देर बाद... १२ सितम्बर को बिस्तर छोड़ने से पहले ही समीरजी का  ईमेल पढ़ा 'जन्म दिन की बधाई और शुभकामनाएं'.
 
अभिषेक ओझा
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कभी-कभी इत्तफाक से...

हर व्यक्ति के जीवन में कुछ लोग होते हैं जिनसे वो जाने अनजाने प्रेरणा लेता रहता है. अपने रिश्ते, आस-पड़ोस के लोगों से लेकर ऐतिहासिक, पौराणिक, काल्पनिक और वास्तविक चरित्रों तक से. और अब इन्टरनेट के जमाने में ये लिस्ट लम्बी हुई है इसमें कोई दो राय नहीं. हम
 
अभिषेक ओझा
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बारिशाना मौसम में शून्य दिमाग !

झम-झम-झम-झम मेघ बरसते हैं सावन के छम-छम-छम गिरती बूँदें तरुओं से छन के चम-चम बिजली चमक रही रे उर में घन के धम-धम दिन के तम में सपने जगते मन के ऐसे पागल बादल बरसें नहीं धरा पर जल फुहार बौछारें धारें गिरती झर-झर उड़ते सोन-बलाक आर्द्र सुख से कर क्रंदन घ
 
अभिषेक ओझा
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हिंदी ही बेहतर है भाई !

यूँ तो ऐसी बातें मैं नहीं करता. क्योंकि (लगभग) सभी के लिए अपना देश और अपनी भाषा ही सबसे अच्छे होते हैं. और वो भाषा जिसमें आप बोलना सीखते हैं उसकी तो बात ही क्या है ! तो किसी एक को बेहतर कहना सही नहीं लगता. पर अपने साथ एक ऐसी घटना घटी कि... जब भी याद
 
अभिषेक ओझा
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स्वाइन फ्लू पर सूअर महासभा की बैठक !

जब से स्वाइन फ्लू ने महामारी का रूप लिया सूअर परेशान ! आनन फानन में सूअर महासभा की इमरजेंसी मीटिंग बुलाई गयी.  तमाम तरह के सुरक्षा साधनों की समीक्षा की गयी. एक सूअर बोल उठा 'ये सब मानव जाति की चाल है हमें बदनाम करने की. ये फ्लू-व्लू तो हमारे अन्
 
अभिषेक ओझा
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जूतम् शरणम् … !

मैं चरण पादुका ! अब ये मत कहना कि स्टाइल मार रहा हूँ नाम तो यही है अब बदल के लोगों ने जूता कर दिया. वैसे अब मुंबई और चेन्नई की तरह मैं भी फिर से चरण पादुका ही कहलाना पसंद करूँगा. वैसे एक एक बात है मेरा इतिहास बड़ा गौरवशाली रहा है. अब आप भी तो अपने बी
 
अभिषेक ओझा
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और भी गिफ्ट है ज़माने में इक डायरी के सिवा !

आज ये डायरी मिली - एज अ गिफ्ट ! मेरे मित्र के मम्मी-पापा की तरफ से. उन्हें पता चला कि 'ब्लागर' हैं और इसके बिस्तर पर कम से कम एक किताब हमेशा पायी जाती है. (भले पढ़े या न पढें !) अब ऐसे आदमी को क्या गिफ्ट दिया जाय? ऐसे आदमी के लिए विकल्प कितने कम होते
 
अभिषेक ओझा
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घूस दे दूँ क्या?

आपका क्या ख्याल है घूस दे दूँ क्या?’ अगर आपसे कोई अधेड़ अजनबी ऐसा सवाल पूछे तो आप क्या कहेंगे? छुट्टी के बाद घर से वापस आ रहा था. रात का समय… बलिया (यूपी) से बक्सर (बिहार) (तकरीबन ३० किलोमीटर) जाने के लिए टैक्सी पकड़नी थी. जल्दी-जल्दी रिक्शे से उतरा
 
अभिषेक ओझा
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छुट्टी कथा: एक दिवसीय किसान

मार्च का महिना कटाई-मड़ाई का सीजन होता है तो हम भी खेती-बाड़ी का हाल देखे आये. वैसे तो ट्रैक्टर से अनाज निकलने का काम कई सालों से हो रहा है पर नजदीक से देखने का मेरा पहला अनुभव था. इससे पहले थ्रेसर ही देखा था. पता चला पहले जो काम रातभर में भी नहीं हो
 
अभिषेक ओझा
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छुट्टी कथा: १३८ पहियों पर लदा अजूबा !

अरे छोटू वो मशीन देखे?' 'कौन मशीन?' 'अरे! जर्मनी से ट्रांफार्मर आया है... इतना बड़ा है कि उसे ले जाने के लिए १३८ पहियों की गाडी आई है, जगह-जगह पेड़ काटे जा रहे हैं. और पुराने पूल कहीं टूट ना जाए इसलिए उनकी जगह नए पूल बनाए जा रहे हैं ! तुम्हारी किस्मत
 
अभिषेक ओझा
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छुट्टी कथा: दिल्ली में... ना भूख ना प्यास

रात को ९ बजे दिल्ली... बाहर निकलते ही भईया मिल गए फिर १.३०-२ घंटे लगे होंगे नॉएडा पहुचने में. फिर जो बातों का सिलसिला चला तो कब सुबह के ४ बजे पता ही नहीं चला. ३ घंटे की नींद और फिर वही... तीन भाई और अनगिनत बातें... ना भूख न प्यास ! [तीन नालायक :-)] न
 
अभिषेक ओझा
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अथ श्री छुट्टी कथा: पुणे से दिल्ली तक

पिछली पोस्ट पर मुझसे छुट्टी का हिसाब माँगा गया.  १७ पोस्ट तो शायद नहीं हो पाए पर लेखा जोखा तो अब देना ही पड़ेगा. आज दिल्ली तक की डायरी. और मिल गयी छुट्टी: हमारे ऑफिस में साल में एक बार लगातार एक सप्ताह (५ कार्य दिवस) की छुट्टी लेना अनिवार्य है. अ
 
अभिषेक ओझा
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क्षीणे पुण्ये ऑफिसम् विशन्ति !

मैंने छुट्टी क्या ले ली जिसे देखो वही परेशान: १७ दिन? कहाँ जा रहे हो? क्यों? कोई 'यूँही' इतने दिनों के लिए घर जाता है क्या? कोई तो काम होगा? और इतने दिनों तक ऑफिस का काम? इतने दिन तो कोई अपनी शादी में भी छुट्टी नहीं लेता ! (चलो ये तो कन्फर्म हुआ की म
 
अभिषेक ओझा
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बुलशिट कार्टेल: 'वो भी वही है': भाग II

पिछले पोस्ट से जारी... पहले कुछ अर्थशास्त्र... एक महान गणितज्ञ हैं जॉन नैश . जिन्हें गेम थियोरी पर किये गए उनके काम के लिए नोबेल पुरस्कार दिया गया. इनकी छोटी चर्चा अन्यत्र हो चुकी है. आज की शुरुआत इनके एक बड़े प्रसिद्द सिद्धांत से. गेम थियोरी परस्परा
 
अभिषेक ओझा
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वो भी वही है !

एक किस्सा: जीवन की कुछ छोटी-छोटी बातें दिमाग में हमेशा के लिए बैठ जाती है. फिर हम ऐसी बातों, घटनाओं और किस्सों को जीवन में होने वाली कई अन्य घटनाओं से जोड़ कर देखते हैं. ऐसी ही मेरे बचपन की एक छोटी सी बात अक्सर बहुत सारे परिपेक्ष्यों में बड़ी सटीक बै
 
अभिषेक ओझा
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चड्ढी-साड़ी आर्बिट्राज ट्रेडिंग स्ट्रेटजी

भयानक मंदी का समय है जहाँ बाजार का कोई भरोसा नहीं है, सालों से फायदा दे रही जमी-जमाई जीतनी भी ट्रेडिंग स्ट्रेटजी (Trading strategy) थी उनका सारा गणित असफल हुआ जा रहा है. आजकल जहाँ बड़े बैंकों के स्टार ट्रेडरों के लिफाफे में बोनस की जगह गुलाबी रशीद (P
 
अभिषेक ओझा
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ऋतूनां कुसुमाकरः

कल सुबह घर से फोन आया तो पता चला की वसंत पंचमी है। ओह ! ऐसी बातें भी अब पता नहीं चलती। खैर हम भी कभी इस दिन पूजा पाठ किया करते थे। और आज करें ना करें ये मन्त्र यूँ ही मन में चलने लगा... और शायद इस जन्म जब भी वसंत पंचमी आए याद आता रहेगा. या कुंदेंदुतु
 
अभिषेक ओझा
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एक तो केरला, डीजे चड्ढा नेम !

थोडी और आपबीती, हिन्दी का भविष्य - १) इधर व्यस्तता के नाटक में कभी-कभार ऑनलाइन आना होता रहा तो कुछ लोगों से बात भी होती रही. इन्हीं दिनों एक अनजान मोहतरमा से बात हुई. गूगल टॉक पर एक मेसेज बॉक्स टिम-टिमाया और सामने एक लड़की का नाम देख हमें तो लगा की अ
 
अभिषेक ओझा
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या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी

इधर कुछ एकाध लोगों ने ईमेल/फ़ोन/टिपण्णी से पूछा कि मैं आजकल पोस्ट क्यों नहीं लिखता? (ओह ये भी बड़ा सुखद अहसास है, किसी को तो हमारी कमी महसूस हुई !) फिर हमने भी सोचा की सवाल तो सही है ऐसा भी क्या कर रहा हूँ मैं? कुछ ख़ास उत्तर नहीं मिला बस अच्छा कारण
 
अभिषेक ओझा
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चिकन अलाफूस: खाया है कभी?

चिकन आलाफूस नहीं है क्या मेनू मे?' 'नहीं सर ' 'क्या? नहीं है? अरे यार फिर क्या खाएं? ! कैसा रेस्टोरेंट है... मैनेजर को बुलाओ' 'सर क्या हुआ?' 'ये चिकन आलाफूस क्यों नहीं है? हर रेस्टोरेंट मे मिलने लगा है आजकल तो' 'सर ये रेसिपी हमें पता नहीं... अगली बार
 
अभिषेक ओझा
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तेरे नाम का पासवर्ड

कल एक करीबी मित्र का फ़ोन आया. हॉस्टल में हुई इस दोस्ती के मतलब ही अलग होते हैं... इसमें एक-दुसरे की हर एक बात पता होती है. उस समय वो यात्रा कर रहा था और अविलम्ब उसे एक ईमेल किसी को फॉरवर्ड करना था... ये सूचित करने के तुरंत बाद उसने अपना पासवर्ड एसेम
 
अभिषेक ओझा
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रोटी, दवा, दारु और चाँद !

दृश्य १: एक ग्रामीण सरकारी प्राथमिक चिकित्सा केन्द्र में एक बच्चा... हड्डी का ढांचा, शायद मांस उनके लिए नहीं होता. पता नहीं सो रहा है या बेहोश है. सरकारी ग्लूकोज की बोतल लगी हुई है... बाप बगल में बैठा है, देखने से तो नहीं लगता कि दो दिन से कुछ खाया ह
 
अभिषेक ओझा