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निर्मल-आनन्द

http://nirmal-anand.blogspot.com/
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11 Jun 2010
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चिड़ीनिहार

शहरों में आज भी बहुत सी चिड़िया रहती हैं, आती-जाती हैं, गाती-चिल्लाती हैं। मगर हमारे पास उन्हे देखने-सुनने के लिए आँख-कान नहीं बचे हैं। ट्रैफ़िक और टीवी के शोर में किस के पास चिड़िया को देखने का धीरज और स्थिरता है। बिना स्थिरता के आप चिड़िया नहीं देख सकते!जब
 
अभय तिवारी
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शब्द चर्चा समूह

हिन्दी शब्दों के समान्तर अर्थ; हिन्दी से उर्दू व उर्दू से हिन्दी में अर्थ; अंग्रेज़ी से हिन्दी व हिन्दी से अंग्रेज़ी में अर्थ; हिन्दी से अन्य भारतीय भाषाओं व अन्य भारतीय भाषाओं से हिन्दी में अर्थ; हिन्दी से अरबी-फ़ारसी व अरबी-फ़ारसी से हिन्दी में अर्थ पर
 
अभय तिवारी
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छविभंजक एडवर्ड सईद

एडवर्ड सईद की किताब ओरयण्टलिज़्म, प्राच्यविद्या (ओरयण्टलिज़्म) की आधुनिक व जनतांत्रिक आलोचना समझी जाती है। ऐसा बताते हैं कि इस किताब के प्रकाशन ने जमे हुए विद्वानों की पोल में से असली रंगत उजागर करने की पद्धति और साहस, नए विद्यार्थियों को दिया।; उस दृष्टि
 
अभय तिवारी
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राष्ट्र क्या है?

राष्ट्र एक आत्मा है, एक आध्यात्मिक सिद्धान्त है। दो चीज़ें, जो वास्तव में एक ही हैं, इस आध्यात्मिक सिद्धान्त की रचना करती हैं। एक भूत काल में है और दूसरे वर्तमान में। एक है स्मृतियों की एक समृद्ध धरोहर पर साझा अधिकार; और दूसरी है आज की तारीख़ में साथ रहने
 
अभय तिवारी
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फ़िलिस्तीन-इज़राईल विवाद एनीमेशन में

इज़राईली नज़रिया फ़िलिस्तीनी नज़रिया और हमास का पक्ष जून २००७ में गज़ा पट्टी में छिड़े एक अन्दरूनी संघर्ष में ११२ मौतें हुईं और उसके बाद दिवंगत नेता यासिर अराफ़ात के दल 'फ़तेह' को पूरी तरह से उखाड़ कर 'हमास' गज़ा पट्टी का एकछत्र शासक हो गया। इस संघर्ष के पहले फ़तेह
 
अभय तिवारी
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बस आने वाली है...

कलामे रूमीजो नतीजा है इस मेहनत का..
 
अभय तिवारी
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टाई लगा कर हिन्दी?

भाषा मुँह से निकली ध्वनियों से अलग भी कुछ होती है? क्या होती है? हमारी सोच का विस्तार और सीमा? हमारे चिन्तन का शिल्प? ज्ञानकोष का खाता? सामाजिक और नैतिक मूल्यों की परम्परा? मेरी परिवार की एक बारह साल की बच्ची को ठीक से 'क ख ग घ' नहीं आता। तीस के आगे
 
अभय तिवारी
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जाति जन गण ना?

मैं इस बारे में उत्सुक हूँ कि भारतीय जनो में विभिन्न जातियों का क्या अनुपात है। लेकिन इस उत्सुकता के आधार पर ही क्या मैं जातिवादी हो जाता हूँ। मेरी उत्सुकता के बीज दूसरे हैं और मुलायमादि यादवों के कारण दूसरे। पर देखा ये जा रहा है कि आम प्रगतिशील व्यक्ति
 
अभय तिवारी
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ऋषि मोनियर-विलियम्स

१९४८ में पुणे के डेक्कन कालेज के पोस्ट ग्रैजुएट रिसर्च सेन्टर ने एक महत्वाकांक्षी योजना अपने हाथ ली - एक वृहत संस्कृत से अंग्रेज़ी शब्दकोष तैयार करने की। मगर साठ साल बीत जाने के बाद भी वो पहले क़दम से आगे नहीं बढ़ सकी है और अभी तक 'अ' पर अटकी है; 'अ' में भी
 
अभय तिवारी
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जुझारू जेसिका

सात मास समुद्र में अकेले! चालीस फ़ुट ऊँची लहरों के मुक़ाबिल एक ‘अबला’ शोडषी? जिसके लिए एक आम राय ये बन रही थी कि उसके माँ-बाप ने उसे एक आत्मघाती अभियान पर जाने की अनुमति दी है, वो लड़की लौट आई, न सिर्फ़ सही सलामत बल्कि एक ऐसे अनुभव की विजेता होकर जो जीवन भर
 
अभय तिवारी
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पूँजीवाद-माओवाद: कुछ नोट्स-५

माओवादियों के पक्ष की एक बात यह है कि जिनकी लड़ाई लड़ रहे हैं, जिनके हितों की रक्षा की बात करते हैं उस जनता के साथ बिलकुल घुले-मिले हुए हैं। जनता और उनके प्रतिनिधियों में कोई बाधा नहीं है। दूसरी तरफ़ पूँजीवाद तंत्र के राज्य और जनता के बीच इतने-इतने संस्थान
 
अभय तिवारी
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पूँजीवाद-माओवाद: कुछ नोट्स-४

अरुंधति मानती हैं कि भारत एक सवर्ण हिन्दू राज्य है क्योंकि यहाँ मुसलमानों, दलितों, ईसाईयों, सिखों, आदिवासियों, कम्यूनिस्टो और प्रतिरोध करने वालों ग़रीबों पर अत्याचार होता है। ठीक है। लेकिन ये कैसा सवर्ण हिन्दू राज्य है, जिसमें सवर्णों की सत्ता की रक्षा के
 
अभय तिवारी
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पूँजीवाद-माओवाद: कुछ नोट्स-३

सुनीति कुमार चटर्जी के अनुसार भारत में आज जो चार प्रकार के जन पाए जाते हैं – निषाद (औस्ट्रिक; कोल, भील, शबर), किरात (मंगोलोइड, पर्वतीय क्षेत्रों में रहने वाले चीनी तिब्बती भाषा मूल के), द्रविड़ (दास, द्रविड़, नाग) और आर्य (भारोपीय)- उन में आदिवासी निषाद सब
 
अभय तिवारी
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पूँजीवाद-माओवाद: कुछ नोट्स - २

हमारे समाज में पूँजीवाद के सकारात्मक पहलू की समझ ग़ैर-मौजूद है। हम हमेशा पूँजीवाद को पिछले समाज के या वर्तमान समाज के नज़रिये से देखते हैं और हो रही उथल-पुथल के लिए उसे ज़िम्मेदार मानते हैं, और गरियाते हैं। जैसे हम हमेशा ये दुहाई देते हैं कि पूँजीवाद यहाँ
 
अभय तिवारी
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पूँजीवाद-माओवाद: कुछ नोट्स-१

आज कल मेरे दोस्तों को मुझ पर शर्म आने लगी है। मेरी राजनीति पर सवाल खड़े हो रहे हैं। पूछा जा रहा है: तुम्हारी पौलिटिक्स क्या है पार्टनर। मैं उनकी शर्म का समाधान नहीं कर सकता। मैं यह ब्लौग इसलिए नहीं लिखता कि मेरे दोस्तों को मुझ पर शर्म न आए। इसलिए भी नहीं
 
अभय तिवारी
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सड़कों पर नाचते पाकिस्तानी

यह कोई तंज़ या कटाक्ष नहीं है। यह हो रहा है। पाकिस्तान की सड़कों और बाज़ारों में नौजवान लड़के नाच रहे हैं और लड़कियां भी। जी, लड़कियां भी। आज कल एक पाकिस्तानी को लेकर बहस भी गर्म है और लोग डरे हुए हैं कि वो शौएब मलिक हमारी अकेली टेनिस स्टारलेट प्यारी सानिया
 
अभय तिवारी
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एक पागल का प्रलाप

मेरे दोस्त फ़रीद ख़ान ने दो नई कविताएं लिखी हैं, उर्दू में लिखते तो कहा जाता कि कही हैं, लेकिन हिन्दी में हैं इसलिए लिेखी ही हैं।हिन्दी में कविता मुख्य विधा है फिर भी ऐसी कविताएं विरल हैं।मुलाहिज़ा फ़र्माएं:एक पागल का प्रलापकम्बल ओढ़ कर वह और भी पगला गया,कहने
 
अभय तिवारी
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अरुंधति का रूमान

अरुंधति अपने दांतेवाड़ा यात्रा वृत्तान्त का अंत एक ऐसे शाएर की एक मशहूर नज़्म के एक टुकड़े से करती है, जो अपनी रुमानी क्रांतिकारिता के लिए प्रसिद्ध है- फ़ैज़।वहाँ पाया गया अंश यह है :हम अहले-सफा मर्दूदे-हरममसनद पे बिठाए जाएंगेसब ताज उछाले जाएंगेसब तख्त गिराए
 
अभय तिवारी
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हिन्दी पर आलोक

उर्दू-हिन्दी का विवाद बड़ा जटिल मामला है। हिन्दी भाषा और हिन्दी समाज गहरे तौर पर इस विवाद से प्रभावित रहा है। पिछले दिनों इलाहाबाद में लोकभारती में किताबें देखते हुए अचानक शम्सुर्रहमान फ़ारुक़ी की किताब ‘उर्दू का आरम्भिक युग’ दिखाई दी। फ़ारुक़ी साब आज की
 
अभय तिवारी
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जै सिया राम!

पहले बोलते थे- जै सिया राम! बोलते थे राम-राम! नाम भी होते थे राम सजीवन, राम पदारथ, राम खिलावन, राम कृपाल, राम गोपाल। जन-जन राम से ओत-प्रोत था, सराबोर था। लोग चुहुल में माँ को माताराम भी कहते। अल्पसंज्ञा और संज्ञाशून्य हस्तियों को भी नाम प्रत्यय से
 
अभय तिवारी
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जन्न्त हमीं अस्त?

जम्मू और कश्मीर में ‘वूमन्स परमानेन्ट रेज़ीडेन्ट (डिसक्वालिफ़िकेशन) बिल’ पर घमासान छिड़ा हुआ है। इस बिल के पास हो जाने के बाद राज्य की कोई भी औरत अगर किसी ग़ैर-प्रान्तीय से शादी करती है तो वो राज्य की स्थायी निवासी होने का अधिकार खो देगी। क्या है वो अधिकार?
 
अभय तिवारी
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एल एस डी नहीं सच की गोली

फ़िल्म का नाम सचमुच वहमाना है। एल एस डी जो सच्चाई से दूर एक सपनीली दुनिया में तैराने की एक गोली हुआ करती थी, यह फ़िल्म आज के इण्डिया की वो सच्ची तस्वीर है जिसमें बुरक़े पहन कर जवान मुस्लिम लड़कियां ‘लव सेक्स और धोख़ा’ देखने चली आतीं है। सिनेमा हॉल में नौजवान
 
अभय तिवारी
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लैण्डमार्क में हिन्दी वाले

परसों के रोज़ लैंडमार्क बुक स्टोर जाना हुआ। मेरी हमसर तनु पामुक की नई किताब 'म्यूज़ियम ऑफ़ इन्नोसेन्स' पढ़ना चाह रही थीं। पहले उसे हाथ में ले लिया और फिर इधर-उधर किताबों में नज़र फेंकता रहा। एक अरसे से अलबर्तो मोराविया की किताबें खोज रहा हूँ, मिलती नहीं।
 
अभय तिवारी
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आदमी की औरत और अन्य कहानियां

शनिवार की शाम को अमित दत्ता की फ़िल्म ‘आदमी की औरत और अन्य कहानियां’ देखने का अवसर हुआ। अमित दत्ता की पिछली छोटी फ़िल्में ‘क्षत्रज्ञ’ और क्रमशः’ मैं ने देख रखीं है। इसके अलावा अमित ने एक और छोटी फ़िल्म ‘का’ भी बनाई है, वह भी मैंने देखी है। अमित के शिल्प की
 
अभय तिवारी
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रोड मूवी

हिन्दी फ़िल्मों की मसालेदार दुनिया से एकदम अलग स्वाद की बनी एक हिन्दी फ़िल्म है रोड मूवी। हिन्दी समाज के किसी भी स्वाद से फ़ीकी, एकदम बेस्वाद। इस क़दर नक़ली और बनावटी कि हैरत होती है कि ऐसी फ़िल्म बनाने के पीछे क्या सोच काम कर रही है आख़िर? नक़ली चरित्रों द्वारा
 
अभय तिवारी
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रंगीला रसूल भेज दूँ, छापोगे क्या?

क़रीब तीन साल पहले जब ब्लौग जगत के कुछ उत्साही सेकुलरपंथियों ने हिन्दू धर्म के देवी-देवताओं की मर्यादा का अतिक्रमण करती कुछ पोस्टें चढ़ाई थीं तो धुरविरोधी* ने पूछा था : “रंगीला रसूल भेज दूँ, छापोगे क्या?”एम एफ़ हुसैन साहिब को लेकर जो बहस छिड़ी हुई है,
 
अभय तिवारी
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संस्कृति की अश्लील परम्परा उर्फ़ बहुत हुआ सम्मान

इलाहाबाद में अपने छात्र जीवन की शुरुआत के साथ ही अश्लील परम्पराओं से मेरा परिचय हो गया था। हमें हौस्टल के सीनियर्स ने फ़र्शी सलामी सिखलाई और जिस हौस्टल गीत को याद कर के उचित अवसरों पर सुनाने की हमें ताक़ीद की गई उसमें पुरुष के अंग विशेष के गुणगान किए गए
 
अभय तिवारी
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Mar 05 2010 10:04 AM
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दिल्ली में देखें सरपत

अक्सर दोस्तों की शिकायत रहती है किस तरह से मेरी लघु फ़िल्म 'सरपत' देखना मुमकिन हो.. सत्ताइस फ़रवरी को नई दिल्ली के इन्डिया इन्टरनेशनल सेन्टर में दिन के डेढ़ बजे कोई भी टहलते हुए जा कर सरपत देख सकता है। यह प्रदर्शन मैजिक लैन्टर्न फ़ाउन्डेशन के द्वारा आयोजित
 
अभय तिवारी
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हिन्दी में कौन स्टार है?

पिछले दिनो कुछ रोज़ दिल्ली के अन्तराष्ट्रीय पुस्तक मेले में बीते। कई दोस्तो से मिलना हुआ। कुछ किताबें ख़रीदी और बहुत सारी देखीं। मेले मे ही लाल्टू के कविता संग्रह 'लोग ही चुनेंगे रंग’ और गीत चतुर्वेदी के संग्रह 'आलाप में गिरह' के लोकार्पण में भी शिरकत हो
 
अभय तिवारी
Feb 17 2010 08:00 AM
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क्या बेच रहे हैं शाहरुख़ ख़ान?

कल माई नेम इज़ ख़ान रिलीज़ होने वाली है। शाहरुख़ उम्मीद कर रहे होंगे कि यह फ़िल्म थ्री ईडियट्स से भी बड़ी ओपेनिंग लेगी और उस से भी बड़ी हिट साबित होगी। मुम्बई के कुछ सिनेमाघरों में शिवसेना के कार्यकर्ता इसका विरोध कर रहे हैं लेकिन वह विरोध असल में नुक़सान
 
अभय तिवारी
Feb 11 2010 08:05 AM
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खिचड़ी पोस्ट

पिछले दिनों कई बातें ऐसी रहीं जिन्हे ब्लाग पर डालना चाहता था लेकिन मसरूफ़ियत के चलते टलती रहीं। आज काम पूरा हो गया और दिल्ली रवाना हो रहा हूँ तो सनद के तौर पर यहाँ चिपका रहा हूँ।* सण्डे के टाइम्स (३१ जनवरी) में स्वप्न दास गुप्ता ने भाषा पर बात की है,
 
अभय तिवारी
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दायें या बायें

यह उस फ़िल्म का नाम है जो मेरी समझ में हिन्दी फ़िल्म की एकाश्मी परम्परा से बहुत आगे, और बहुत ऊपर की संरचना में बुनी हुई है। जीवन का इतना गाढ़ा स्वाद और इतने महीन विवरण उपन्यासों में भी तो फिर भी मिलते हैं, मगर फ़िल्मों में विरलता से दिखते हैं। हिन्दी उपन्यास
 
अभय तिवारी
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घर बैठे किताबें

कवि कवितायें पढ़ते हैं। पत्रकार अख़बार पढ़ते हैं। ब्लॉग वाले ब्लॉग पढ़ते हैं। कुछ लोग कथा-कहानी भी पढ़ते हैं। कहानी- कविता–अख़बार से बा़की दुनिया में इल्म की जो किताबें हैं वो कौन पढ़ता है? अगर कोई है तो उन से गुज़ारिश है कि किताब की दुकान में जाने की ज़हमत न
 
अभय तिवारी
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बँटा हुआ सत्य

बहुत-बहुत पहले सोचा हुआ होता था सत्य फिर बोला हुआ हो जाता था सत्यअभी हाल तक लिखा हुआ तो निश्चित होता था सत्यअब समय ये है कि सोचा हुआ सत्य नहींकहा हुआ सत्य नहींलिखा हुआ भी सत्य नहींतो क्या है सत्य?मेधा के नए प्रवीण कहते हैं कि सत्य बँटा हुआ हैसब में सब
 
अभय तिवारी
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आल इज नाट वेल: वी आर पैथेटिक

आज थ्री इडियट्स देख ली। अच्छा हुआ कि सुबह के शो में नब्बे रुपये दे के ही देख ली। शाम के शो में देखता तो १३५ रुपये और मेरी जेब से निकलकर विनोद चोपड़ा की जेब में पहुँच जाते। पहले ही कामयाबी के सारे रिकाड तोड़ती फ़िल्म १३५ रुपये और कामयाबतर हो जाती। वैसे तो
 
अभय तिवारी
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चेतन भगत शुड बी थैंकफ़ुल

पिछले दिनों ख़बर थी कि सरकार कॉपीराइट क़ानून में बदलाव का मन बना रही है ताकि कलाकारों के अधिकारों की रक्षा हो सके, दुनिया भर में सिनेमा और संगीत आदि के तैयार हो जाने के बाद भी कॉपीराइट के मूल अधिकार लेखक/ कलाकार के पास सुरक्षित रहते हैं मगर भारत में
 
अभय तिवारी
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वसुधैव कुटुम्बकम?

दुनिया भर में फैले हुए प्रवासी भारतीयों को यदि उन देशों के बहुसंख्यक लोग गोमांस खाने पर मजबूर करने लगे तो उन्हे कैसा लगेगा। यदि वो अपनी मरजी से ऐसा करते हैं तो किसी को कोई आपत्ति क्यों होगी लेकिन यदि उन पर यह बाध्य कर दिया जाय कि यदि उस देश में रहना
 
अभय तिवारी
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फ़ूको बनाम चॉम्सकी

फ़ूको : बजाय सामाजिक संघर्षों को ‘न्याय’ की दृष्टि से समझने के, हमें न्याय को सामाजिक संघर्ष के नज़रिये से देखना चाहिये .. .. सर्वहारा शासक वर्ग के खिलाफ़ इसलिए युद्ध नहीं छेड़ता क्योंकि ये एक इंसाफ़ की लड़ाई है। सवर्हारा शासक वर्ग के विरुद्ध युद्ध करता है
 
अभय तिवारी
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खरगोश : नारेबाज़ी नहीं कला

एक खुशखबरी यह है कि मेरे मित्र परेश कामदार की फ़िल्म खरगोश को ओसियान फ़िल्म फ़ेस्टिवल में पुरस्कार मिल गया है। और एक नहीं चार पुरस्कार मिल गए हैं: ज्यूरी पुरस्कार, अन्तर्राष्ट्रीय ज्यूरी पुरस्कार, ऑडियेन्स पुरस्कार, और नेटपैक पुरस्कार। किसी भी फ़िल्म के
 
अभय तिवारी
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राज्य की नैतिकता और तमाम उलझे सवाल

माओवादियों की नीति और हिंसा के खिलाफ़ लिखे मेरे पिछले लेख को कुछ पाठकों ने उसे आदिवासियों के अधिकारों के खिलाफ़ भी समझ लिया। और यह भी समझ लिया कि मैं राज्य की हर उलटी-सीधी हिंसा और अन्याय का समर्थक हूँ। शायद लेख के शीर्षक से ऐसा बोध हुआ है। ऐसा नहीं है
 
अभय तिवारी