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08 Mar 2010
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सभी बुड्ढे हुए जवान, इस होली में

क्यों सोता चद्दर तान ,इस होली में?सभी बुड्ढे हुए जवान, इस होली मेंबाहर निकल कर देख जरा तूक्यों बॆठा हॆ,अपनी ही खोली में ?किसने किसको कब,क्या बोला ?मत रख अब तू ध्यान, इस होली मेंखट्टा-कडवा ,अब कब तक बोलेगा?मिश्री-सी दे तू घोल, अपनी बोली मेंमाना की जीवन
 
विनोद पाराशर
Mar 01 2010 02:38 PM
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मंहगाई ऒर नया साल

मंहगाई ऒर नया-साल-विनोद पाराशर-हमने कहा-नेताजी! मंहगाई का हॆ बुरा हालबीस रुपये किलो आटाअस्सी रुपये दालमुबारक हो नया साल.देसी घी का दिया-सिर्फ प्रभु के सामने जला रहे हॆंऒर-हम खुद!सूखे टिक्कड चबा रहे हॆं.बच्चों को-दूध नहीं/चाय पिला रहे हॆंरो-धोकर-गृहस्थी
 
विनोद पाराशर
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Vinod Parashar

नया घर
 
विनोद पाराशर
Dec 29 2009 11:44 AM
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ताजा-अखबार

लूट-पाट भ्रष्टाचार बलात्कार बासी खबरे ताजा अखबार ********* नया घर
 
विनोद पाराशर
Dec 29 2009 11:44 AM
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्सुख ऒर दु:ख

हम- यह जानकर बहुत सुखी हॆं कि-दुनिया के ज्यादातर लोग हमसे भी ज्यादा दु:खी हॆं. पिता- इसलिए दु:खी हॆ- कि बेटा कहना ही नहीं मानता बेटे का दु:ख- कॆसा बाप हॆ? बेटे के जज्बात ही नहीं जानता. मां- इसलिए दु:खी हॆ- कि जवान बेटी रात को देर से घर आती हॆ बेटी का
 
विनोद पाराशर
Dec 29 2009 11:44 AM
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कहां से चले थे,कहां जा रहे हो ?

कहां से चले थे, कहां जा रहे हो? -विनोद पाराशर- ------------------------------ क्यों? बहुत खुश नजर आ रहे हो स्वतंत्रता की वर्ष-गांठ मना रहे हो लेकिन- जरा ये भी तो सोचो कहां से चले थे, कहां जा रहे हो? झोंपडी की जगह- आलीशान बंगला बना लिया दाल-रोटी छोड द
 
विनोद पाराशर
Dec 29 2009 11:44 AM
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आज हिन्दी में ब्लागिंग का एक साल पूरा

मित्रों! आज आप सभी के मार्ग-दर्शन ऒर सहयोग से हिन्दी-ब्लागिंग की दुनिया में मुझे एक साल पूरा हो गया हॆ.आज के दिन एक वर्ष पूर्व जब मॆंने ब्लागिंग की दुनिया में कदम रखा था, तो उस समय न तो मुझे कम्प्यूटर के संबंध में कोई तकनिकी जानकारी थी ऒर न ही अंग्रे
 
विनोद पाराशर
Dec 29 2009 11:44 AM
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कवि सप्लाई केन्द्र

कवि सप्लाई केन्द्र =========== जब इस बार भी- बिजनिस में हुआ घाटा तो हमारे ’मनि-माइन्डिड बाप’ ने हमें डाटा. बोला-"दो साल में दस ट्रेड बदल चुके हो जितनी जमा पूंजी थी,सब निगल चुके हो क्या इसी तरह नाम रोशन करोगे? यही हाल रहा तो बेटा भूखे मरोगे." हमें भी
 
विनोद पाराशर
Dec 29 2009 11:44 AM
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उठते हुए सवालों को अब न दाबिये

उठते हुए सवालों को अब न दाबिये कितने गहरे हुए ज़ख्म उनको मापिये? हर चेहरे ने ओढ़ा हॆ नकाब कॊन किसका क़ातिल हॆ कॆसे जानिये? ख़ुद नहीं बदला, ये मॊसम का मिज़ाज सय किसी की हॆ ज़रुर मानिए न मानिए लबालब भर चुका हॆ, सब्र का तालाब अब रेत की दीवार हॆ कव तक थामिए ?
 
विनोद पाराशर
Dec 29 2009 11:44 AM
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सेठजी,नेताजी,मजदूर ऒर नया साल

खाने को रोटी नहीं,पीने को विस्की,रम ऒर बीयर आप कहो ,हम भी कहें ’हॆप्पी न्यू ईयर" (मित्रों!नया साल आज से शुरु होने जा रहा हॆ.हर साल की तरह,इस साल भी आप ऒर हम नये साल की मुबारकबाद देने की ऒपचारिकता निभायेंगे.क्या सभी के जीवन में,नया साल नयी-नयी खुशियां
 
विनोद पाराशर
Dec 29 2009 11:44 AM
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मॆं ऒर तुम

मॆं-नहीं चाहता कि तुम ऒपचारिकता का लिबास पहनकर मेरे नजदीक आओ. अपने होठों पर झूठ की लिपिस्टिक लगाकर सच को झुठलाओ या देह-यष्टि चमकाने के लिए कोई सुगंधित साबुन या इत्र लगाओ. मॆं-चाहता हूं कि तुम अपनी असली झिलमिलाहट के साथ मुझसे लिपट जाओ. मेरे सुसुप्त भा
 
विनोद पाराशर
Dec 29 2009 11:44 AM
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सुनाओ अपना हाल जी,मुबारक नया साल जी.

सुनाओ अपना हाल जी, मुबारक नया साल जी तुम्हारी बढती तोंद क्यों? हमारे पिचके गाल जी. तुम तो खाऒ हलवा-पूरी मजा न आये बिन अंगूरी इच्छा हो जाये सारी पूरी हमको रोटी-दाल जी सुनाओ अपना हाल जी मुबारक नया साल जी. कॆसे मोटे हो गये लाला? देश का क्यों निकला दिवाल
 
विनोद पाराशर
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आज बहुत सर्दी हॆ

आज बहुत सर्दी हॆ पक्षियों का चहचहाना, फूलों का मुस्कराना, ऒर-कोयल की कूक से, मंत्र-मुग्ध हो जाना, खत्म हो गया हॆ. आज बहुत सर्दी हॆ रामलाल- सेठ के यहां, मजदूरी कम मिलने पर, नहीं चिल्लायेगा, चुपचाप आ जायेगा. आज बहुत सर्दी हॆ शरीर का हर अंग शून्य हो गया
 
विनोद पाराशर
Dec 29 2009 11:44 AM
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ओ मेरे अंकल! ओ मेरे नाना!! गया वो जमाना

ओ मेरे अंकल! ओ मेरे नाना!! गया वो जमाना,गया वो जमाना मोटा पहनना ऒर सादा खाना गया वो जमाना,गया वो जमाना. भजन-कीर्तन छोडो.’ईलू-ईलू’ गाओ घर से कालेज कहकर ,पिक्चर में घुस जाओ काहे का गाना,काहे का बजाना ओ मेरे अंकल!ओ मेरे नाना......... अरे! ’हलवा-पूरी’ छो
 
विनोद पाराशर
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खूबसूरत कविता

मॆं/जब भी लिखना चाहता हूं कोई खूबसूरत कविता अभावों की कॆंची कतर देती हॆ मेरे आदर्शों के पंख. कानों में- गूंजती हॆं- आतंकित आवाजें न अजान,न शंख. मॆं/जब भी लिखना चाहता हूं कोई खूबसूरत कविता भ्रष्टाचारी रावण चुरा ले जाता हे ईमानदारी की सीता. मॆं/जब भी ल
 
विनोद पाराशर
Dec 29 2009 11:44 AM
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दीपावली की शुभकामनाय़ें

सभी- नामी-ग्रामी परिचित-अपरिचित जाने-अनजाने साथियों को दीपावली की शुभकामनाय़ें. स्नेह की बाती से प्रेम का दीपक जलायें. ****** नया घर
 
विनोद पाराशर
Dec 29 2009 11:44 AM
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पुलिस,बच्चे ऒर लुच्चे-लफंगे

पहले- पुलिस को देखकर बच्चे घरों में दुबक जाते थे. लुच्चे,लफंगे ऒर बदमाश सामने आने से घबराते थे. अब- पुलिसवाला बच्चों से घबराता हॆ, लुच्चे,लफंगे,बदमाशों को देखकर चुपचाप निकल जाता हॆ. अरे ! मॆनें तो यहां तक सुना हॆ कि आजकल- हर बदमाश पुलिसवाले को ’बडा भ
 
विनोद पाराशर
Dec 29 2009 11:44 AM
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ना लायक हॆ.

हमने उनसे पूछा- आपका बेटा-बेकूफ हॆ? वो बोले- ’ना लायक’ हॆ. आत्मनिर्भरता ========== वो- पहले-पडे थे अब- खडे हॆं चलो- आत्मनिर्भरता की ओर कुछ तो बढे हॆं. ********** नया घर
 
विनोद पाराशर
Dec 29 2009 11:44 AM
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सूरज निकल रहा हॆ

सूरज निकल रहा हॆ ऒर तुम सो रहे हो. स्वपनों की दुनिया में कहां खो रहे हो. स्वपन सिर्फ स्वपन होते हे. सुनहरे स्वपन रुपहले स्वपन मीठे-मीठे जहरीले स्वपन. ओ भईया! कपडा बनाने वाले ओ भईया! अनाज उपजाने वाले अरे ओ बाबू! दफ्तर को जाने वाले जरा आंखें खोलो तो ये
 
विनोद पाराशर
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नया घर

नया घर
 
विनोद पाराशर
Dec 29 2009 11:44 AM
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दॊडो ! दॊडो !! दॊडॊ !!!

दॊडो ! दॊडो !! दॊडो !!! ऎ नालायक घोडी-घोडो देश के लिए दॊडो दॊडॊ ! दॊडो !! दोडो !!! कभी गांधी के लिए दॊडो कभी नेहरू के लिए दॊडो अपनी टांगे तोडो दॊडो ! दॊडो !! दॊडो !!! चोरों के लिए दॊडो रिश्वतखोरों के लिए दॊडो आपस में सिर फोडों दॊडो ! दॊडो !! दॊडो !!!
 
विनोद पाराशर
Dec 29 2009 11:44 AM
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नया घर

नया घर
 
विनोद पाराशर
Dec 29 2009 11:44 AM
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अंग्रेज चले गये ?

अंग्रेज चले गये’ ’अब हम आजाद हॆं’ -दादाजी ने कहा -पिता ने भी कहा - मां ने समझाया - भाई ने फटकारा लेकिन वह- चुप रहा। दादाजी ने- घर पर/ दिन-भर अंग्रेजी का अखबार पढा। पिता ने- दफ्तर में/चपरासी को अंग्रेजी में फटकारा। मां ने- स्कूल में/भारत का इतिहास अंग
 
विनोद पाराशर
Dec 29 2009 11:44 AM
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हिन्दी पखवाडा

साहब ने- चपरासी को हिन्दी में फटकारा ’हिन्दी-स्टॆनों’ को पुचकारा ऒर-कलर्क को अंग्रेजी टिप्पणी के लिए लताडा. क्या करें ? मजबूरी हॆ- वो आजकल मना रहे हॆं ’हिन्दी-पखवाडा’. ********* नया घर
 
विनोद पाराशर
Dec 29 2009 11:44 AM
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आ गई दिवाली !

चेहरे पर मुस्कराहट चिपकी,मन अंदर से खाली-खाली चारों ओर घुप्प-अंधेरा ,वो कहते आ गयी दिवाली कहां गये वो खील-बतासे,कहां गये वो खेल-तमाशे? कमर-तोड मंहगाई ने,कर दी सबकी हालत माली कहने को साथ-साथ हॆं,हो जाती हर रात बात हॆ फिर भी क्यों लगता हॆ? सब कुछ हॆ जा
 
विनोद पाराशर
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गुलाब

कई बारचाहा हॆतेरे नर्म होंठों पररख दूं,अपने गर्म होंठ.तेरी खुशबू को बसा लूंअपने दिल में.ऒर पी जाऊंतेरी सुन्दरता कोइन नयनों सेहाला समझकर.लेकिन-तेरे जिस्म के चारों ओरखडे पहरेदारों को देखकरसहम जाता हूंऎ! गुलाब.नया घर
 
विनोद पाराशर
टैग: कविता
Aug 26 2009 08:28 AM
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लुटते हुए देश को बचाओ साथियो !

लुटते हुए देश को बचाओ साथियों!कदम से कदम मिलाओ साथियों,लुटते हुए देश को बचाओ साथियों.कोना-कोना देश का जल रहा हॆ,शासन-तंत्र जनता को छल रहा हॆ,कॆसी-कॆसी चालें यह चल रहा हॆ,अंधेरे में रहे क्यों?बताओ साथियो,लुटते हुए देश को बचाओ साथियो.इधर देखो कुत्ता
 
विनोद पाराशर
टैग: गीत
Aug 16 2009 06:37 PM