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नई इबारतें

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08 May 2010
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दौडते समय की, हांफ के बीच, एक बेचैन बयान

एक बेचैन दिमाग, साफ दिल और हक की बात बोलती जुबान इस समय क्या कर रही होगी? ठीक इस समय जब आप इन पंक्तियों को पढ रहे हैं. क्या कर रही होगी वह आंख जो दुश्मन की शक्ल भी पहचानती है और दुकानदारियों से परे जिसके लिए मुनाफे का मुहावरा सिर्फ सिक्कों की खनक नहीं
 
सचिन ..........
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May 08 2010 06:27 PM
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मुझे कविताएं पढकर उबकाई आती है

इधर कुछ दिनों से मेल पर, बज्ज पर और कभी कभार चेट बॉक्स में भी कुछ लिंक आते हैं। कविताओं के लिंक। मन में जो आया सो भेज दिया। मुझे महसूस होता है कि ये तमाम कविताएं कोई एक ही शख्स लिख रहा है। वही भाषा, वही विन्यास, वही भाव। मन, पेड, पहाड, हृदय, अभिव्यक्ति,
 
सचिन ..........
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ऑपरेशन ग्रीन हंट

बंदूक की सरकारी भाषा और आदिवासी''यह नामकरण ही गलत है। इसे हंट नहीं कहा जाना चाहिए। आप किसका शिकार कर रहे हैं? उन इंसानों का जो वहां रह रहे हैं? यह एक दुष्चक्र है। नक्सलवादियों की प्रतिक्रिया हो या सरकार की, दोनों ही बेवकूफी भरी हैं। इस सबमें सिर्फ
 
सचिन ..........
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खयालों की खुशबू को आजादी का इन्तजार

-विनीत तिवारीसन्‌ 1925 में हुए काकोरी बम काण्ड के बाद क्रान्तिकारियों का दल हिन्दुस्तानी प्रजातान्त्रिक संघ बिखरा हुआ था। भगतसिंह ने उस संगठन के बिखरे टुकडों को इकट्ठा कर संगठन का नया नाम रखा - हिन्दुस्तानी समाजवादी प्रजातांत्रिक संघ। एक शब्द का यह जोड
 
सचिन ..........
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लालकृष्ण आडवाणी, एबी बर्धन और प्रकाश करात की गुप्त मंत्रणा

कांग्रेस को भारतीय राजनीति से अलग करने का महाअभियानखबर पक्की है। कोई झोल नहीं। पहली बार में विश्वास नहीं होता लेकिन तथ्यों को फिर परखने पर मामला साफ हो गया। आज सुबह 11 बजे मीटिंग हुई। अजय भवन में। एबी बर्धन की सदारत में। लालकृष्ण आडवाणी अपनी पारंपरिक
 
सचिन ..........
Feb 26 2010 08:58 PM
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पहला नहीं, वनडे क्रिकेट का दूसरा दोहरा शतक है ये

सचिन के 200 रन को वनडे इतिहास का पहला दोहरा शतक घोषित करने वाली मर्द मानसिकता को सलाम। दोस्तो हम क्यों महिला क्रिकेट को भूल जाते हैं। याद कीजिए बैलिंडा क्लार्क की पारी। बात एक दशक पुरानी है, सो शायद भुलक्कड उत्साही क्रिकेट दीवाने उस पर गर्द डाल चुके हैं।
 
सचिन ..........
Feb 25 2010 02:18 PM
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कौन करना चाहता है हेमलाल का अपहरण!!

बीडीओ साहब का अपहरण हो गया। इससे पहले क्रशर मालिक का हुआ था। अखबार में ऐसी खबरें पढ़कर हेमलाल बडा परेशान है। वह अपना रिक्शा छुपाकर रखता है। उसे डर है कि कहीं उसका अपहरण हो गया और बदले में किसी ने रिक्शा मांग लिया तो वह कमाएगा कैसे और खाएगा क्या! बडी भारी
 
सचिन ..........
Feb 25 2010 11:27 AM
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भूख में भी भजन होता है रे!

अभी हाल ही में रांची के एसडीसी सभागृह में मनरेगा वॉच का चौथा सम्मेलन हुआ। भात-भोज से पहले बड़े विद्वान लोगों ने खूब बातें की। कृषि मंत्री मथुरा महतो बोले कि मनरेगा की सही जानकारी नहीं होने की वजह से लोग इसका लाभ नहीं उठा पा रहे हैं। हमें लगा वे कह रहे हैं
 
सचिन ..........
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Feb 23 2010 08:52 PM
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साम्राज्यवाद के लिए आसान शिकार नहीं है ईरान -अंतिम किश्त

पेट्रोल राजनीति की अमेरिकी साजिशों को दो दशक पहले सद्दाम हुसैन ने चुनौती दी थी। आज न सद्दाम हैं न उनकी राजनीति को आगे बढाने वाला कोई कद्दावर ईराकी। हां, ईराक के पडोसी मुल्क ईरान और अमेरिकी नाक के नीचे हुंकार भरते वेनेजुएला इस प्रतिरोध को थामे हुए हैं।
 
सचिन ..........
Feb 23 2010 10:58 AM
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साम्राज्यवाद के लिए आसान शिकार नहीं है ईरान-3

अमेरिकी इजारेदारी की बुनियाद पर नजर रखने वाले जानते ही हैं कि यह चेहरे अपना दामन पाक साफ कभी नहीं रख पाते। उनके बोले-कहे के बीच पेंचोखम को छोड भी दें, तो किये में दोगलेपन की कई मिसालें सामने आती रही हैं। यह जानी पहचानी रणनीति जो करती हुई दिखती है असल में
 
सचिन ..........
Feb 22 2010 12:01 PM
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साम्राज्यवाद के लिए आसान शिकार नहीं है ईरान-2

इस लेख के पहले हिस्से में हमने देखा कि किस तरह अमेरिका परस्त राजनीति सच्चाई पर नकाब चढाकर अपने ढोल को मजबूत करती है। कैसे शैतान की धुरी को खत्म करने की कवायद की गई जो हर मुमकिन प्रतिरोध के बावजूद अमेरिकी अकड को पूरी तरह खत्म नहीं कर सकी। आर्थिक मंदी के
 
सचिन ..........
Feb 21 2010 12:56 PM
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दुश्मन का घेराव : यानी अमेरिकी सेना की चहलकदमी दक्षिण एशिया में

ईरान। इराक, सउदी अरब, कुवैत, पाकिस्तान और अफगानिस्तान से घिरा देश। दूसरे शब्दों में अमेरिकी फौजों की बंदूक का अगला निशाना। तेल की राजनीति को जब आतंकवाद, इस्लामिक कट्टरता और परमाणु संधि के लच्छों में उलझाने की तरकीबें तेज की गई थीं तब विनीत तिवारी ने एक
 
सचिन ..........
Feb 19 2010 04:20 PM
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आठ महीने बाद मिली मौत की खबर का दुख

"I have received your mail. Thanks a lot. As soon as i get time I will get in touch with you."यह उसका आखिरी मेल है। बचपन के पहले दोस्त का आखिरी मेल। दर्ज तारीख इसे आठ माह पुराना बता रही है। इस मेल के लिखे जाने के ठीक 48 दिन बाद उसने आखिरी वाक्य बोला
 
सचिन ..........
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Feb 11 2010 10:59 AM
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मध्यवर्गीय अच्छापन और लूट का एक किस्सा

कुछ लोग बहुत अच्छे होते हैं। सारा जीवन अपनी धुन में गुजार देते हैं। न किसी को परेशान करते हैं, बडे ईमानदार। मजाल है किसी की पाई भी हाथ में रख लें। जहां कोई भिखारी देखेंगे जेब तक हाथ पहुंच जाएगा और सिक्का भिखारी की झोली में डालकर इस संतुष्टि से उनका चेहरा
 
सचिन ..........
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इस बेतरतीब समय की तरह कुछ पंक्तियां

अखबारी उलझनों के बीच कुछ और लिखना तकरीबन असंभव होता है। फिर भी एक बदलाव, एक छुट्टी, एक हल्कापन इंतजार में आंख लगाए रहता है। तब कविता की जमीन पर लौटना होता है। यह अखबारी किचकिच से दूर जाने का सुकून भी है, और फिर मोर्चे पर आने के लिए तलाशी गई ऊर्जा का
 
सचिन ..........
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मैं आज से अविनाश दास को अपना दोस्त मानने से इंकार करता हूं

अविनाश दास, मोहल्ला लाइव वाले कभी मेरे दोस्त होते थे। रांची में उनके साथ कई खूबसूरत शामें गुजारीं। दुनिया की बेहतर शक्ल को ईजाद करने के लिए कसरतें कीं और बराबरी की दुनिया के वे हामी भी लगे। इन दिनों जब वे मुझे अपनी इच्छाओं, सपनों और जरूरी कामों से दूर
 
सचिन ..........
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ये वादा भी तोड देते हैं!

वादा भी अजीब चीज है। करते वक्त लगता है सचमुच जीने का मकसद मिल गया। अब इसे निबाहना ही आदमी होने की शर्त है। लेकिन फिर तोड देते हैं। तोडते वक्त सब कुछ पहले की तरह हो जाने का अहसास चेहरे पर नुमायां हो जाता है। दिल इस डर में घुलने लगता है कि कमीनगी थोडी और
 
सचिन ..........
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क्योंकि वक्त अभी बदला नहीं है

हम कहानी क्यों पढते हैं ? यथार्थ को परखने के लिए ? अपनी नजर साफ करने के लिए ? खाली वक्त काटने के लिए या फिर परिचित कथाकार की मुग्ध शैली से रूबरू होने के लिए ? सवाल और भी हो सकते हैं , जवाब अलग अलग होंगे। मैं अश्विनी पंकज की कहानी इनमें से किसी भी वजह
 
सचिन ..........
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रूढ़िग्रस्त लेखक के लालित्यपूर्ण लेखन पर एक नजर

एक पत्रकार के बारे में अपनी राय कायम करने का एक आसान तरीका तो यह है कि उसके लेखन को तत्कालीन परिस्थितियों, राजनीति और माहौल के सापेक्ष रखा जाए। तात्कालिक मसलों पर जनपक्षीय राजनीतिक समझ के साथ लिखा गया पत्रकार के लिए एक बेहतर कसौटी हो सकता है। अफसोस प
 
सचिन ..........
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सत्ता के निशाने पर नक्सली या नक्सलियों के निशाने पर सत्ता

सरकारी हलकों से लेकर जनसंघर्ष तमाम मोर्चों और कॉरपोरेट हाउसों से लेकर खबरों की तलाश में भटकते अखबारनवीसों तक के बीच माओवाद एक चर्चित शब्द है। इनमें से बडे हिस्से के लिए यह खाली समय में "वक्त काटने के लिए की गई जुगाली" हो सकता है और कई के लिए "भारतीय
 
सचिन ..........
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भोपाल के अखबारों में नहीं थी प्रभाष जी के निधन की खबर!!

वासु पिछले दिनों ही दिल की बीमारी से उबरे हैं। अभी साल भी पूरा नहीं हुआ उनके हार्ट अटैक को. जिस आदमी के दिल का 40 फीसदी हिस्सा ही काम का हो उसके लिए अतिरिक्त तवज्जोह देना लाजिमी है। सो नई इबारतें की नये मंच पर पहली बात उनकी। वासु मित्र पत्रकारिता के
 
सचिन ..........
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आज से आपकी इबारतें ही, मुझसे नहीं लिखा जाता

रूसी क्रांति दिवस की शुभकामनाएं। इधर वक्त की कमी थी (जो जल्द खत्म नहीं होने वाली) सो आपसे बातचीत का मौका नहीं मिला। कई मित्र नाराज हैं, कई तकरीबन हिंसक भावों के साथ खा जाने वाली नजरों से ताक रहे थे। लिखना बंद कर देने की सच्ची दलील भी काम नहीं आई। हाल
 
सचिन ..........
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हबीब दा से आखिरी बातचीत

वालिद की वसीयत पूरी करने का सुकून यकीनन पहाड़ टूटा है। हकीकत इतनी ही ठोस और बेरहम होती है। सोमवार की सुबह सूरज अंधियारा लेकर उगा था। हबीब साहब के इंतकाल के बाद वक्त थम गया। हंसी रुक गई। उम्मीद ठहर गई। अंधेरा छटा तो हौसला मुस्कुराया, कि लोक की आस्था मे
 
सचिन ..........
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इज इट पॉसिबल फॉर एनी वन ..?

मौत कई लोगों के लिए एक सूचना भर होती है . तिल तिल कर मरते , हर रोज जीने की जद्दोजहद में मशगूल लोगों के लिए यह अंत भी है . फिर भी यह दुख से भर जाती है . क्योंकि मौत के साथ सपना देखने वाली आंखें भी बुझ जाती हैं. कुलदीप नारायण मंजरवे जी के न रहने का दुख
 
सचिन ..........
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ये इतिहास हमारा नहीं है

इतिहास क्यों लिखा जाता है. सबक लेने के लिए? गलतियों पर लानत फेरने के लिए? अपनी ताकत को देखने की जिद का नतीजा है इतिहास. या दादाओं के घी पीने के किस्सों में अपना हाथ सूंघने की रवायत. क्यों है ये इतिहास. हमने अपना इतिहास कभी नहीं लिखा. सर्द रातों में ठ
 
सचिन ..........
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झोंके का इंतजार, मेंढक, पसीना और चंद आवाजें

रात हो गई है. पास की नाली के पास रहता मेंढकों का परिवार एक लय में चीख रहा है. नहीं नहीं गा रहा है. शायद उनका कोई दुख उनसे छूट गया है. उस मेंढकी के परिवार में कितने लोग होंगे नहीं कह सकता पर वह अकेली नहीं होगी. प्यास होंठों को सुखाने लगी है और मैं अंध
 
सचिन ..........
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खबर की कीमत पर विज्ञापन कौन छाप रहा है

इस समय की सबसे ज्यादा ऊबाऊ बहसों में से एक अखबार की गुणवत्ता कम होने की बहस है। दो अखबारी मित्र मिलें , कोई जान - पहचान वाला , किसी सरकारी अफसर से मिलो या किसी राजनीतिक से - सभी एक स्वर में मानते हैं कि अखबार से खबरें गायब हुई हैं। खासकर हिन्दी अखबार
 
सचिन ..........
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पहला दलित, जो सत्ता के शीर्ष तक पहुंचा

जाति-जाति रटते, जिन की पूँजी केवल पाखंड मैं क्या जानूँ जाति ? जाति है ये मेरे भुज दंड। ऊपर सिर पर कनकछत्र्, भीतर काले के काले, शरमाते नहीं जगत् में जाति पूछने वाले ? मगर मनुज क्या करे, जन्म लेना तो उसके हाथ नहीं, चुनना जाति और कुल, अपने बस की तो बात
 
सचिन ..........
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मंदी और भारत की दोहरी पहचान

डॉ जया मेहता देश की जानी मानी अर्थशास्त्री हैं. आर्थिक मंदी के हालिया दौर को वे बदलाव की एक नई संभावना के तौ र पर देखती हैं. हाल ही में उन्होंने पत्रिका के लिए विशेष लेख लिखा , जिसमें मंदी के कार णों की पडताल करते हुए मौजूदा और आनी वाली भयावहता का खा
 
सचिन ..........
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मेरे पास माफी नहीं है

आज एक दोस्त ने कहा- माफी मांगता हूं यार. मैं शर्मिंदा हुआ. मेरे पास माफी नहीं थी. जाहिर तौर पर मैंने बुझे स्वर में उससे कहा- मैं नहीं दे सकता. वह बुरा मान गया. असल में सचमुच मेरे पास माफी नहीं है. मैं खर्च कर चुका हूं अपनी सारी माफियां. अपने हिस्से क
 
सचिन ..........
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हिलती हुई दाडी, लचकते हुए जंगल

पिछली पोस्ट से आगे दोनों ने एक दूसरे के इनबॉक्स देखे. सुबह सुबह. कोई नया मैसेज नहीं था। लडके ने अपनी टी शर्ट उतार दी और रात भर की नींद को सिगरेट के सहारे सुलगाकर हवा में बहाना चाहा. ठीक इसी वक्त लडकी ने सिमोन दा बाउआर की किताब उठा ली. हवा तीखी थी. दो
 
सचिन ..........
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आखिरी एसएमएस से पहले

अब उसे एसएमएस नहीं करना था। एक ठंडी बातचीत के बाद गुंजाइश नहीं बची थी कि वे बात करते. बहिरंग की सीढियों पर बैठकर उसने आखिरी एसएमएस किया था. जो दूसरे सेल के इनबॉक्स में पहुंचने तक सारी दुनिया की सैर कर चुका था. उसने एसएमएस पढा, थोडा मुस्कुराई और फिर उ
 
सचिन ..........
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मैं, जो वोट नहीं कर सकता इन्हें

दोपहर में हरिओम राजोरिया से बात हो रही थी. फिर शाम में हुई और फिर अभी देर रात. एक बेचैन कवि से बातचीत करने से अमूमन बचता हूं, लेकिन हरिओम फिर फिर सामने आते हैं. अपनी असहमतियों, बेचैनियों और सवालों के साथ. जो हरिओम को जानते हैं, वे यह भी जानते हैं कि
 
सचिन ..........
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राजकमल, वे तुम्हारी ओट से झांक रहे हैं

सिर्फ अपनी बीवी और सिर्फ अपनी दो सौ चालीस की नौकरी बांधती थी उसे अपने नागरिक व्यूह में राजकमल चौधरी माफी चाहूंगा. लंबा अरसा हुआ आपसे मुखातिब नहीं हुआ. अखबारी जिम्मेदारी और निजी वजुहात कई बार दिली काम पर हावी हो जाती हैं. न चाहते हुए भी हम उस तरफ बहे
 
सचिन ..........
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उसने अंधेरे को अंधेरा कहा

संदर्भ : अभय प्रशाल में रूपांकन की पोस्टर प्रदशनी कला को जीवित रहने के लिए जिस हवा और पानी की जरूरत होती है वह हमारे समय में तकरीबन खात्मे के कगार पर है। अफसोसनाक बात यह भी है कि इसे बचाने की जिद्दी कोशिशें भी कम ही हो रही हैं। ऐसे समय में इंदौर में
 
सचिन ..........
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``ये दलित तो मुसलमानों से भी ज्यादा मारकाट करने वाले होते हैं।``

विनीत मूलत: कवि नहीं है लेकिन वे कविताएं लिखते हैं. तकरीबन चार महीने पहले उन्होंने एक कविता पूरी की थी, जिसे मैंने एक शहर में होते हुए भी मेल पर भेजने के लिए कहा था. ब्लॉग पर साया करने के लिए. कोताही के कारण यह टलता रहा और फिर वह मेल कहीं खो गई. आज क
 
सचिन ..........
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दृश्य का चित्र बनाकर चुपचाप क्यों निकल जाती है कविता

तकरीबन पांच साल पहले की एक गर्म दोपहर में ठंडी चाय के साथ रांची में रामजी भाई ने कहा था- "इधर की कविता अपने समय का भरपूर दृश्य तो बनाती है, लेकिन उसमें मुठभेड के तरीके सिरे से गायब हैं." अनिल अंशुमन और सत्यप्रकाश चौधरी के साथ उस बैठकी में कविता पर लं
 
सचिन ..........
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नए ब्लॉगर, पुराने साथी और संभावित बडे कवि को उकसाइये

अभी अभी अखिलेश जी से बात हुई. मेरठ वाले अखिलेश जी, नहीं भोपाल वाले, नहीं नहीं रांची वाले..... या छपरा. खैर छोडो. फिलहाल वे मेरठ में हैं. मेरे बदतमीज दिनों के सबसे यकीनी आसरे. यहां वहां की आवारगी के बाद जब कभी फुरसत पानी होती है. मेरठ चला जाता हूं. घर
 
सचिन ..........
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कसैली संभावना: मंदिर की सीढियों पर बैठकर

धूपबत्तियों से घिरे भगवान को देखकर मुझे मुर्दे की याद आती है. वैसे श्रद्धा के सांप का जहर उतर चुका है फिर भी गाहे बगाहे मंदिरों की सीढियां चढ जाता हूं. हंसी की तलाश में. हिंसक वक्त में आस्था के केंद्रों का विद्रुप देखना भी खासा मजाकिया होता है. इस तर
 
सचिन ..........
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दो प्रेम कविताएं और एक बेचैनी का बयान

मेरे लिए प्रेम कविताएं लिखना उतना ही मुश्किल रहा है जितना किसी क्राइम रिपोर्टर के लिए धार्मिक बीट देखना. मेरी जान सूख जाती है. होंठ सूख जाते हैं, पेट में बल पडने लगते हैं. शब्द, मुहावरों समेत मुंह फेर लेते हैं और कांपती उंगलियां की-बोर्ड पर यूं बैठती
 
सचिन ..........