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हिन्द-युग्म

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18 Jun 2010
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एक चिड़िया मरी पड़ी थी

एम वर्मा हिन्द-युग्म के अत्यधिक सक्रिय पाठक-कवियों में से हैं। एकबार हिन्द-युग्म के यूनिकवि भी रह चुके हैं। मई 2010 की यूनिकवि प्रतियोगिता में भी इनकी एक कविता ने दसवाँ स्थान बनाया।पुरस्कृत कविता: एक चिड़िया मरी पड़ी थीबलखाती थीवह हर सुबह धूप से बतियाती
 
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अपनी आँखों में सपने हैं उनकी में सुख सारे

हिन्द-युग्म के पाठक अवनीश सिंह चौहान की कविताओं से परिचित हो चुके हैं। मई 2010 की यूनिकवि प्रतियोगिता में प्रस्तुत कविता ने नवाँ स्थान बनाया है। पुरस्कृत कविता: किसको कौन उबारेबिना नाव के माझी मिलतेमुझको नदी किनारेकितनी राह कटेगी चलकरउनके संग
 
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समय केले का छिलका है....

चाँद का पानी पीकर,लोग कर रहे होंगे गरारे...और झूम रही होगी जब सारी दुनिया...मशीन होते शहर में,कुछ रोबोट-से लोगढूँढते होंगे,ज़िंदा होने की गुंजाइश।किसी बंद कमरे में,बिना खाद-पानी केलहलहा रहा होगा दुःख...माँ के प्यार जितनी अथाह दुनिया केबित्ते भर हिस्से
 
निखिल आनन्द गिरि
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वो सच नहीं है जो कथा में लिखा जाता है गाँव

मई माह की यूनिकवि प्रतियोगिता की 8वीं कविता सुरेन्द्र अग्निहोत्री की है। सुरेन्द्र की एक कविता जनवरी महीने की यूनिकवि प्रतियोगिता के शीर्ष 11 में चुनी गई थी। शीर्ष 10 में आने का इनका पहला मौका है।पुरस्कृत कवितावो सच नहीं है जो कथा में लिखा जाता है
 
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हमें खिलाकर ताज़ा खाना माँ बासी रोटी खाती थी

देवेश पाण्डेय जनवरी 2010 से हिन्द-युग्म पर सक्रिय हैं। यह इनकी तीसरी रचना है जिसने मई 2010 की यूनिकवि प्रतियोगिता में सातवाँ स्थान बनाया है।पुरस्कृत कविताः माँ1-माँ क्या है?एक शब्द एक भाव एक खुश्बूएक ध्वनि एक दृश्य !क्या है माँ .....?जब पैदा हुआ तो
 
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देवेश पाण्डेय जनवरी 2010 से हिन्द-युग्म पर सक्रिय हैं। यह इनकी तीसरी रचना है जिसने मई 2010 की यूनिकवि प्रतियोगिता में सातवाँ स्थान बनाया है।पुरस्कृत कविताः माँ1-माँ क्या है?एक शब्द एक भाव एक खुश्बूएक ध्वनि एक दृश्य !क्या है माँ .....? जब पैदा हुआ तो
 
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Jun 14 2010 06:58 PM
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तुम्हारे प्यार की खुशबू

हम हर माह के तीन सोमवारों को उस माह के यूनिकवि की रचनाएँ प्रकाशित करते रहे हैं। उसी परम्परा मे प्रस्तुत है हमारे मई माह के यूनिकवि मृत्युंजय ’साधक’ का यह मधुर गीत, जो प्रेम-गीतों की वासंती-बगिया के एक मनोहर पुष्प सी मोहकता लिये है।तुम्हारे प्यार की
 
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पुरानी दीवारें और नया कवि

हर माह यूनिप्रतियोगिता के माध्यम से हिंद-युग्म से कई नये कवि भी जुड़ते हैं। प्रतियोगिता की पाँचवी कविता भी एक नये कवि की है। रचनाकार प्रदीप शुक्ला की यह हिंद-युग्म पर प्रथम कविता ही है। 10 अगस्त 1978 को जन्मे प्रदीप जी मध्य प्रदेश के रहने वाले हैं। गणित
 
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खाप सरपंच

यूनिप्रतियोगिता की चौथे स्थान की कविता के द्वारा एक नये कवि हिंद-युग्म के मंच से जुड़ रहे हैं। कविता के रचनाकार वसीम अकरम की हिंद-युग्म पर यह पहली कविता है। उत्तर प्रदेश के मऊ जनपद से तअल्लुक रखने वाले वसीम वर्तमान मे दिल्ली मे स्वतंत्र पत्रकार के तौर पर
 
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बनमानुस...

एक दुनिया है समझदार लोगों की,होशियार लोगों की,खूब होशियार.....वो एक दिन शिकार पर आएऔर हमें जानवर समझ लिया...पहले उन्होंने हमें मारा, खूब मारा,फिर ज़बान पर कोयला रख दिया,खूब गरम...एक बीवी थी जिसके पास शरीर था,उन्होंने शरीर को नोंचा,खूब नोचा...जब तक हांफकर
 
निखिल आनन्द गिरि
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सपने टूटे: राजेंद्र स्वर्णकार की कविता

यूनिप्रतियोगिता की पाँचवीं कविता के रचनाकार राजेंद्र स्वर्णकार हैं। हिंद-युग्म से उनका जुड़ाव पिछले माह की प्रतियोगिता से ही हुआ है, जबकि उनकी कविता नवें पायदान पर रही थी। मूलत: छंदबद्ध कविताएं रचने वाले राजेंद्र जी अपने गीतों व ग़ज़लों को सुरबद्ध कर
 
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आंच चिढाती है आतिश

मई माह की यूनिप्रतियोगिता मे दूसरा स्थान स्वप्निल कुमार ’आतिश’ की ग़ज़ल ने पाया है। आतिश पिछले कुछ समय से ही हिंद-युग्म से जुड़े हैं, मगर कवि और पाठक के तौर पर उनकी सक्रियता उदाहरण के योग्य रही है। इनकी पिछली गज़लें भी यूनिप्रतियोगिता मे ऊपर के पायदानों
 
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मई माह की यूनिप्रतियोगिता के परिणाम

कविता अपने समय से संवाद करने की महत्वपूर्ण कड़ी है, तो उसे आइना दिखाने और उसकी विद्रूपताओं को उजागर करने का माध्यम भी। हिंद-युग्म यूनिप्रतियोगिता के द्वारा समकालीन कविता मे हमारे समय के पदचाप खोजने का प्रयास करता है। इस बार हिंद-युग्म मई माह की
 
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कितना कुछ छिपाती रहती हैं लड़कियाँ आत्महत्या के एक दिन पहले तक

विजयशंकर चतुर्वेदी यथार्थ के कवि हैं। वे समय के आर और पार देखने वाली कविताएँ लिखते हैं। 'पृथ्वी के लिए तो रुको' कविता-संग्रह की बहुत सी कविताओं में विजय वास्तविकता के शब्दनाव खेते हैं। देखिए कुछ और नज़ीर-बड़े बली रहे वेवे जब तक रहेवायु, पृथ्वी, जल,
 
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जून 2010 की यूनिप्रतियोगिता मे भाग लीजिये

हिंद-युग्म पर जनवरी 2007 से आरंभ हुआ यूनिप्रतियोगिता का सफ़र अबाध गति से 41 सोपानों को पार करता हुआ अपने 42वें माह मे प्रवेश कर रहा है। इस प्रतियोगिता का मूल उद्देश्य दुनिया भर से काव्य प्रतिभाओं की तलाश करना तो है ही, साथ ही यूनिकोड-हिन्दी के प्रयोग को
 
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अन्याय का गणित

हमअपने समय के सबसे बेईमान और बेरहम वक्त के जबड़ों में फँसे हैं जहाँ हैवानी नस्ल इंसानी पैदावार की शगल में मुक्ति के शब्द भुलाकर ऐय्यास क्रियाएँ खेल रही हैं इंसान होने की परिभाषा साहित्य से स्थगित होकर खद्दरों के मुँह में घुस गयी है सपनीले नग्मों के
 
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मैं स्वतंत्र हूँ

ऋषभ कुमार मिश्र 'निशीथ' पिछले महीने से हिन्द-युग्म पर सक्रिय हैं। इनकी एक कविता पिछले महीने प्रकाशित हुई थी। अप्रैल माह की यूनिकवि प्रतियोगिता में भी इनकी एक कविता ने 12वाँ स्थान बनाया है।कविताः तुम्हें क्यातुम्हें क्या!कुटिल मुस्कान और कुछ नशीली
 
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May 30 2010 11:59 AM
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ग्रहण का सच

अप्रैल 2010 की यूनिकवि प्रतियोगिता की शीर्ष 10 कविताओं से आगे बढ़ते हैं। 11वीं सुमीता प्रवीण केशवा की है। सुमीता इससे पहले भी हिन्द-युग्म पर प्रकाशित हो चुकी हैं।कविताः यह ग्रहण नहीं, है पाणिग्रहणहाँ, चाँद हूँ मैं...जैसे चन्द्रमुखी थी एकऔर हे सूर्यदेव,
 
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विजयशंकर चतुर्वेदी की कविताओं में माइथोलॉजी और टेक्नॉलॉजी, दोनों का अंगीकार दिखता है

विजयशंकर चतुर्वेदी हिन्द-युग्म के यूनिकवि रह चुके हैं। कवि की कई कविताएँ हिन्द-युग्म पर प्रकाशित हैं। हाल ही में राधाकृष्ण प्रकाशन से कवि का एक कविता-संग्रह 'पृथ्वी के लिए तो रुको' प्रकाशित हुआ है, उसमें कुछ ऐसी कविताएँ भी संकलित हैं जो हिन्द-युग्म पर
 
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May 28 2010 10:25 AM
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दीप देहरी पे मन बस जलाता रहा !!

मैं तुम्हारी प्रतीक्षा में दहलीज पर,सांतिये नेह के बस बनाता रहानैना तकते रहे सूनी पगडंडियाँ,दीप देहरी पे मन बस जलाता रहा !!तुम मिले तो लगा मन के हर कोन में,फिर बसंती पवन का बसेरा हुआतुम मिले तो लगा की ग्रहण छट गया,मन में फिर आस का इक सवेरा हुआ !इस सवेरे
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कौन खोंट लेता है मन पर उगी हरी दूब (मनोज झा की 4 कविताएँ)

मनोज कुमार झा एक बेहद अलग वाक्य-विन्यास की कविताएँ लिखते हैं। इनकी कुछ कविताओं से हमने आपके पिछले सप्ताह परिचय करवाया था। आज हम इनकी कुछ और कविताओं को प्रकाशित कर रहे हैं-इस तरफ से जीनायहाँ तो मात्र प्‍यास-प्‍यास पानी, भूख-भूख अन्‍नऔर साँस-साँस भविष्‍यवह
 
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हर रस्ते की एक कहानी लगती है

स्वप्निल तिवारी 'आतिश' हिन्द-युग्म पर अत्यंत सक्रिय हैं। ग़ज़लें लिखते हैं। अब तक इनकी 3 कविताएँ प्रकाशित है। आज हम जो कविता प्रकाशित करने जा रहे हैं, उसने अप्रैल 2010 की यूनिकवि प्रतियोगिता में 10वाँ स्थान बनाया है।पुरस्कृत कविताः सीधी सादी एक कहानी
 
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खचाखच भर चुकी होगी पृथ्वी

अप्रैल माह की यूनिकवि प्रतियोगिता की नौवीं कविता के रचनाकार बीकानेर (राज॰) निवासी राजेन्द्र स्वर्णकार काव्य की सभी विधाओं, रंगों-रसों में राजस्थानी, हिंदी और उर्दू में ( ब्रज, भोजपुरी और अंग्रेजी में भी ) मुख्यतः छंदबद्ध के सृजनकर्म में समलग्न हैं। लगभग
 
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चिड़िया भूखी थी भूखी है पौ-बारह सरपंचों की

अवनीश सिंह चौहान हिन्द-युग्म की प्रतियोगिता में पहली बार भाग ले रहे है और इनकी कविता ने आठवाँ स्थान बनाया है। 4 जून 1979 को जन्मे अवनीश की कविताएँ, कहानियाँ, आलेख, समीक्षाएँ इत्यादि अमर-उजाला, हिंदुस्तान, देश-धर्म, डी एल ए, उत्तर-केसरी, प्रेस-मेन,
 
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बादल खोल के मेरी आरजुएँ देखना तुम

अप्रैल माह की यूनिकवि प्रतियोगिता की सातवीं कविता ऋतु सरोहा द्वारा रचित है। ऋतु की कविताएँ इससे पहले दो और बार इस प्रतियोगिता के शीर्ष 10 में स्थान बना चुकी हैं। पुरस्कृत कविताः अजनबीतुम्हें याद है ना मेरी आरज़ुओं को आदत थीतुम्हारे फलक के रंगीन सितारे
 
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माँ ने बना लिया है ब्लॉग, पैदा कर लिए हैं ईमेल-पते

संगीता सेठी के कविता के पात्र सामान्तयाः स्त्रियाँ ही होती हैं। इनकी कविताएँ हमारे निर्णायकों को भी पसंद आती हैं। इन सभी बातों का ताज़ा उदाहरण अप्रैल माह में छठवाँ स्थान बना चुकी इनकी यह कविता है-पुरस्कृत कविताः नहीं बाँच सकती कोई माँवो ज़माना चिट्ठी
 
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मै टूटे बर्तन के जैसी लगातार रिसती जाती हूँ

प्रतियोगिता की पाँचवीं कविता की रचयित्री रंजना डीन दूसरी बार यूनिकवि प्रतियोगिता में हिस्सा ले रही हैं, लेकिन पहली बार प्रकाशित हो रही हैं। रंजना डीन पिछले तीन वर्षों से लखनऊ (उ॰प्र॰) के एक प्रतिष्ठित निजी विश्वविद्यालय में प्राध्यापक के रूप में कार्यरत
 
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इश्क सचमुच इक बला है-gazal

हो गई फ़िर से खता हैदिल तुझे जो दे दिया हैइश्क सचमुच इक बला हैखुद मजा है,खुद सजा हैहो गई फ़िर से खता हैदिल तुझे जो दे दिया हैइश्क सचमुच इक बला हैरोग भी खुद,खुद दवा हैगम से बचकर है निकलनाप्यार ही बस रास्ता है आ रही शायद वही हैदिल मेरा जो झूमता हैहै हसीं
 
श्याम सखा 'श्याम'
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बुधवा मुंडा नींद में बोलता है- उलगुलान उलगुलान उलगुलान

अच्युतानंद मिश्र ने 'नक्सलबारी आन्दोलन और हिंदी कविता' पर उल्लेखनीय कार्य किया है। चूँकि अच्युतानंद मूलतः बोकारो के हैं, इसलिए बिरसा मुंडा के सपनों की फसल में जब आग लगती है तो उसकी गर्मी महसूस करते हैं। जबकि सरकार पूरे देश को लगभग यह मनवा चुकी है कि अपने
 
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आज एक बार फिर अचंभित है वो बच्चा

तेजेन्द्र शर्मा हिन्दी के ख्यातिलब्ध कथाकार हैं। यद्यपि इनकी कविताओं और ग़ज़लों का एक संग्रह भी प्रकाशित हो चुका है, फिर भी ये लोगों से अपना परिचय एक कहानीकार के रूप में ही देते हैं। इनका पूरा-परिचय पढ़ना हो या फिर एक दमदार कहानी पढ़नी हो तो यहाँ जायें।
 
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माना तुम्हें शहर ने जगमग जगमग रातें दी होंगी

भरा-भरा सा दिन लगता है लेकिन खाली-खाली शामकहाँ गयी चौपालों वाली बतियाती मतवाली शाम घर जाने का मन होता था मन में घर आ जाता था शाम ढले ही इंतजार में खुलती खिड़की वाली शाम सारे दिन की थकन मिटाती गय्या जैसी लगती थी आँगन के पीपल के नीचे करती हुई जुगाली शाम
 
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आज तुम लटके मिले हो फाँसी पर

युवा कवि दीपक मशाल अपनी लेखनी को लगातार परिपक्व करते जा रहे हैं। सितम्बर 2009 का यूनिकवि सम्मान प्राप्त कर चुके दीपक की एक कविता ने अप्रैल 2010 की यूनिकवि प्रतियोगिता में चौथा स्थान बनाया है।पुरस्कृत कविताः बीजऔर आज तुम लटके मिले हो फाँसी परमगर फिर भी
 
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जमूरे की दुनिया और औरत का संतुलन

विद्वान कहते हैं कि मानव सभ्यता का लगभग समस्त इतिहास और साहित्य पुरूषों ने लिखे, पुरुषों ने रचे, इसलिए औरत का अतीत पुरुष की समझने की हद तक हम तक पहुँच पाया। और इतना ही नहीं पुरुष द्वारा महसूसा स्त्री का सच अपनी सारी विकरालता के साथ नहीं संग्रहित हो पाया,
 
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गायब हो जाता है

हिन्द-युग्म के अप्रैल 2010 की यूनिकवि प्रतियोगिता के तीसरे स्थान की कविता की कवयित्री नीरा त्यागी ने पहली बार इस प्रतियोगिता में भाग लिया है। नई दिल्ली में जन्मीं नीरा मिरांडा हाऊस, दिल्ली यूनिवर्सिटी से विज्ञान में स्नातक हैं। ब्रिटेन के सरकारी
 
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May 15 2010 07:03 PM
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सारे अरमान धरे के धरे रह गए...

मेरी लाडो , मेरी लाडली चल बसी ,सारे अरमान धरे के धरे रह गए !जिनकी खातिर गई जान से लाडलीसब वो सामान धरे के धरे रह गए !!कितनी मिन्नत से पाया था ये लक्ष्मी धन,इक तपस्या सी करके था पला उसे !जितना चाहा उसे ,उतना चाहा किसे ,खुद से पहले खिलाया निवाला उसे !उसकी
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कोखजने का दम तोड़ना

एम वर्मा कई बार हिन्द-युग्म की प्रतियोगिता में भाग ले चुके हैं और लगभग हर बार ही इनकी कविताओं ने शीर्ष 10 में स्थान बनाया है। जनवरी 2010 के यूनिकवि सम्मान से सम्मानित हैं। अप्रैल 2010 की यूनिकवि प्रतियोगिता में इनकी कविता ने दूसरा स्थान बनाया है।पुरस्कृत
 
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इधर की कथा में मृत्‍यु कभी भी आ सकती है

इन दिनों जी गईं और महसूस की गईं कविताओं से हम सम्पादकों का बहुत कम ही वास्ता पड़ता है। लेकिन मनोज कुमार झा की कविताओं में उनके आस-पास का सच उसी विद्रूपता के साथ दिखाई पड़ता है, जैसा वो होता है। अपनी ख़ास शैली में अपनी बात कहने वाले मनोज खाँटी देशज़
 
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मुंगेर मेल से हिन्द-युग्म पहुँचा अप्रैल 2010 का यूनिकवि

हमें बहुत खेद है कि हम अप्रैल 2010 की यूनिकवि एवं यूनिपाठक प्रतियोगिता के परिणाम अभी तक नहीं प्रकाशित कर पाये। असल में निर्णायकों ने जिस कविता को यूनिकवि चुना, उस कवि ने अपनी कविता को मुंगेर (बिहार) से स्कैन करके भेजा था और कविता के साथ अपना कोई फोन/मो॰
 
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माँ के लिए एक ख़त

माँ! कहने को इस शहर से रिश्तासाल भर का हो गया हैअब तक तो इसे चलना सीख लेना थापर जाने क्यूँ माँइसे बीमारी लग गई है, अकेलेपन कीऔर ये रिश्ता, अपाहिज हो गया हैसोचा था इस शहर के रिश्ते से नए रिश्ते मिलेंगे, मगरयहाँ रिश्ते मोबाइल में बंद रहते हैंएसएसएस पर पलते
 
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मेरे फेल होने का नतीजा मुझसे बेहतर जानती है माँ

हिन्द-युग्म के सभी पाठकों को मातृ दिवस की शुभकामनाएँ। आज हमने इस अवसर पर 40 से अधिक प्रविष्टियों का प्रकाशन किया है। यहाँ देखिए हमारा विशेष अंक। नये प्रकाशन के तौर आज हम युवा कवि विजय शंकर चतुर्वेदी की एक कविता 'माँ की नींद' प्रकाशित कर रहे हैं। विजय
 
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