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13 Jun 2010
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उस मोड़ से शुरु करें ये ज़िंदगी- जगजीत सिंह

तुम्हें भूल जाऊँ? तुमसे इजाज़त लेकर भूलने की कोशिश करती हूँ, रोज़ और फिर सच भूल जाती हूँ, यह सोच कर कि तुम्हें भूल गई। देखो! भूल ही तो गई हूँ तुम्हें। बस मेरे साथ आना छोड़ दो, जहाँ कहीं भी जाती हूँ।  ये मेरी उँगली पकड़े कहाँ-कहाँ घूमते हो तुम? फिर एक
 
मानसी
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दो रवीन्द्र संगीत- प्रेम एशे छीलो/आमारो परानो जाहा चाये...

रवीन्द्र संगीत की शृंखला में आज, दो और गीत।  भावानुवाद करने की कोशिश की है। किसी त्रुटि के लिये अग्रिम क्षमा याचना के साथ।प्रेम एशे छीलो नि:शब्दो चौरोने...प्रेम आया था, नि:शब्द पांव सेतब स्वप्न लगा वोनहीं दिया आसनप्रेम आया था...बिदाई ली जब उसनेआहट
 
मानसी
Jun 03 2010 06:07 AM
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याद पिया की आये

याद पिया की आये, ये दुख सहा न जाये...सबसे पहले the authentic - बड़े गुलाम अली खां की आवाज़ में ...ये दर्द और कहाँ...और एक नया तरीक़ा, रीमिक्स? मगर असरदार है- वडाली बंधु की आवाज़- निरालाफिर सुनिये उभरती हुईं- कौशिकी चक्रवर्ती की आवाज़- अब इतना बस चुके हैं बड़े
 
मानसी
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विरह गीत- दीप बना कर याद तुम्हारी

दीप बना कर याद तुम्हारी, प्रिय, मैं लौ बन कर जलती हूँप्रेम-थाल में प्राण सजा कर लो तुमको अर्पण करती हूँ।अकस्मात ही जीवन मरुथल में पानी की धार बने तुम,पतझड़ की ऋतु में जैसे फिर जीवन का आधार बने तुम,दो दिन की इस अमृत वर्षा में भीगे क्षण हृदय बाँध कर,आँसू से
 
मानसी
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एक सपना जी रही हूँ

 एक सपना जी रही हूँपारदर्शी काँच पर सेटूटते बिखर रहे कण हँसता खिलखिला रहा हैआँख चुँधियाता हर इक क्षणथोड़े दिन का जानकर सुखमधु कलश सा पी रही हूँएक सपना जी रही हूँवह तुम्हारा स्पर्श अजाना जिसने छू लिया था मन को अनकही बातों ने फिर धीरेसे खोली थी गिरह
 
मानसी
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ग़ज़ल- दिल में ऐसे उतर गया कोई

दोस्त बन कर मुकर गया कोई  अपने दिल से यूँ डर गया कोईआँख में अब तलक है परछाईंदिल में ऐसे उतर गया कोईसबकी ख़्वाहिश को रख के ज़िंदा फिरख़ामुशी से लो मर गया कोईजो भी लौटा तबाह ही लौटाफिर से लेकिन उधर गया कोई"दोस्त" कैसे बदल गया देखोमोजज़ा ये भी कर गया कोई
 
मानसी
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मिताली (मुखर्जी) सिंह- दो गज़लें

उन दिनों ख़ूब ग़ज़लें सुनती थी, ख़ाली वक़्त में। जगजीत सिंह की ग़ज़लें सबसे प्रिय थीं। मेरी उम्र रही होगी सोलह-सत्रह साल की।  इसी तरह मिताली मुखर्जी (मिताली सिंह) की गायी एक दो गज़लों ने दिल में ऐसी जगह बनाई थी, कि अब भी उन ग़ज़लों को सुन कर वे दिन याद आ
 
मानसी
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ग़ज़ल- तेरा क्या और मेरा क्या है

तेरा मेरा रिश्ता क्या हैफिर इस दर्द का मुद्दा क्या हैहर इक बात में ज़िक्रे-यार अबतर्के-तआल्लुक़ है, या क्या है(तर्के-तआल्लुक़- टूटा रिश्ता) उमर लगी तारुफ़ होने मेंखु़द से मिल कर रोता क्या है(तआरुफ़- पहचान होना) एक नशेमन तिनका तिनका तेरा क्या और मेरा क्या
 
मानसी
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Mar 07 2010 01:38 AM
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छू आई बादल के गाँव

छू आई बादल के गाँव बहुत दिनों के बाद सखी रीउमड़ घुमड़ करगरजी बरसीबीते मौसम में हो आईधो आई स्मृतियों के ठाँवछू आई बादल के गाँवकुनमुन सी ये धूप सुनहरीबस इक क्षण कीबनी सहचरी फिर पायल बन रुनझुन में ढलसज गई दो सखियन के पांवछू आई बादल के गाँवमछली कंटकफँसी
 
मानसी
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बाट तेरी जोहती हूँ

 आज भी मैं बाट तेरी जोहती हूँरात जब तू खो गया था आँख से चुपचाप बह करझर गया था एक अश्रुमन का आर्तनाद बन करपथ अभी भीगा हुआ हैनहीं बुहारा मैंने आँगनराह अब भी देखती हूँबाट तेरी जोहती हूँमाना ये जीवन है सुंदरहर इक क्षण है बहुत प्याराछोटी-छोटी खुशियों से
 
मानसी
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ओ रे बचपन!

ओ रे बचपन जीवन के संगक्यों कट्टी मिट्ठी करता हैबूढ़ी कबड्डीचक्कर घिन्नीअक्कड़ बक्कड़बम्बई दिल्लीपुलिस पकड़तीअंडा चोरीमां से लड़करडंडा गिल्लीओ रे बचपन छूट गया मन तेरी कुटिया कहीं पड़ा हैछ: बारातीदो की शादीचांद की नगरीकी शहज़ादीबाँहों की डोलीमें चढ़ करमैके से मैके
 
मानसी
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मां-बाबा- आज तुम्हारे लिये- रवीन्द्र संगीत

एक पूरी ज़िंदगी के कुछ लम्हों को जी लेना ही कितना मुश्किल होता है, वहीं आज एक बहुत प्यारे जोड़े ने ऐसे कई सुनहरे लम्हों को साथ गुज़ारते हुये अपने ५०वें साल में प्रवेश किया है- मेरे मां-बाबा।  आज २६ जनवरी को उनकी शादी की सालगिरह है। बचपन से ही मां को
 
मानसी
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ट्रैफ़िक टिकट

मेरे ड्राइविंग के कि़स्सों का ज़िक्र कर चुकी हूँ पहले।  तो अब तो मैं एक्सपर्ट हो चुकी हूँ (ये और बात है कि हाइवे से अभी भी डर लगता है और पति हों साथ तो कभी भूल से भी ड्राइविंग व्हील को हाथ नहीं लगाती)।कल स्कूल के पार्किंग लॉट में मुड़ ही रही थी कि
 
मानसी
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दो बातें

दो अश्रुएक अश्रु मेराएक तुम्हाराठहर कर कोरों परकर रहे प्रतीक्षाबहने कीएक साथरातपिघलती जाती हैक़तरा क़तरासोना बन कर निखरने को,कसमसाती हैज़र्रा ज़र्राफूल बन कर खिलने को,हर रोज़रातदो बातेंदो बातें,एक चुपएक मौनकर रहे इंतज़ारएक कहानी बनने कीअजनबीचलो फिर बन जायें
 
मानसी
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लौट चल मन!

लौट चल मनदुविधा छोड़ सबलौट चल अबसीमायें तज भटक-भटकथक कर चूरघर से दूरश्रांत मन हो शांत लौट चल अबमधुर अमृत की लालसा मेंचाह कर विष किया पानप्रीत भँवर में उलझ करमिथ्यानंद से किया स्नानग्लानिसिक्त रुदन छोडअब झूठे सब बंधन तोड़अश्रु संचयकर अंजुरि में लौट चल
 
मानसी
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लौटा रहा हूँ

जाने कितना कुछ अधूरा पड़ा होता है। कई शेर, कई बिंब, कई कहानियाँ....ऐसे ही अपनी फ़ाइल टटोलते हुये, अधूरी कहानी की कुछ पंक्तियाँ दिखीं। कभी कहानी बढ़ी नहीं...कुछ लिखने बैठो तो कई बार वह प्रवाह नहीं रह जाता और वह सेव हो कर पुरानी फ़ाइलों की भीड़ में चली जाती है।
 
मानसी
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प्रिय क्या हो जो हम बिछड़ें तो

प्रिय क्या हो जो हम बिछड़ें तो   बरसों बाद आकर तुमसे मैं कोरों में चुपचाप मिलूँगीबिन चाहे अथाह सागर सेपानी बन झरना झर लूँगीलाली बन के शाम रँगूंगीरात को सपना बन बिखरूँगीप्रिय क्या हो जो हम बिछड़ें तोसदियों बाद अपनी उंगली सेलिपटा जो इक क्षण
 
मानसी
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एक बार कह लेते प्रियतम

एक बार कह लेते प्रियतमघना कुहासा धुँआ-धुँआ साछँट जाता घुप्प आसमां बँधा-बँधा सा कट जाताकोरों पे ठहरी दो बूँदेबह जाती चुपके से अंतिमएक बार कह लेते प्रियतमकही नहीं पर कहीं जो बातेंमूक आभासदो प्राणों के गुँथे हवा मेंकुछ निश्वासअधरों पर कुछ काँपते से स्वर भी
 
मानसी
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शंकर दा

शंकर दा नहीं रहे मुनिया।" "ओह" शंकरदा की उम्र हो चुकी थी। अभी-अभी मिल के आ रही हूँ उनसे चन्दननगर के इस बार के विज़िट के दौरान। शंकर दा मेरे पिताजी से दो-तीन साल बड़े थे। मेरे परदादा जी डाक्टर थे और प्रथम विश्वयुद्ध में भाग लिया था उन्होंने। उनकी बाद मे
 
मानसी
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Dec 29 2009 11:40 AM
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उम्र की वो सौग़ात न होगी

अब पहले सी बात न होगी उम्र की वो सौग़ात न होगी खिलना खिल-खिल हँसना झिलमिल तारों के संग आँख-मिचौली दौड़म भागी, खींचातानी लड़ना रोना, हँसी-ठिठोली सच्चे-झूठे किस्सों के संग दादी की वो रात न होगी उम्र की वो सौग़ात न होगी खुले आसमां के नीचे होती थी सरगो़शी
 
मानसी
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मैं छोटे, बड़े सभी को सही सम्मान दूँगा

वो स्कूल के आफ़िस के सामने, अन्य बच्चों के साथ, फ़र्श पर बैठा अपनी मां के आ कर उसे ले जाने का इंतज़ार कर रहा था। मुझे उसकी आँखों से दो बूँद आँसू ढुलकते दिखाई दिये। मैं उसे उसकी कक्षा में नहीं पढ़ाती पर, उसे स्कूल में देखती हूँ। सो , मैं उसके पास जाती हूँ
 
मानसी
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आज सारा दिन जिंजर-ब्रेड आदमी को ढूँढते हुये

छुट्टियों के आने की तैयारी हो रही है स्कूलों में। किसी कक्षा में जिंजर-ब्रेड मेन बन रहे हैं तो किसी कक्षा में हनुका के लिये लैटके बन रहे हैं। स्कूल के शीत- उत्सव (विन्टर कन्सर्ट) में प्यारे- प्यारे, छोटे-छोटे बच्चों को अपने छोटे-छोटे हाथों को नचा-नचा
 
मानसी
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श्रीकांत आचार्य- आमार शाराटा दीन

बँगला गानों की शृंखला में, ये एक अत्यंत मधुर गीत आज, श्रीकांत आचार्य की आवाज़ में। मैंने इस गीत को पहली बार कुछ दिनों पहले ही, बंगाल से एक दोस्त के भेंट करने पर सुना।  इतना मधुर संगीत और मख़मली आवाज़ में इस गीत को सुन कर भाषा को जानने न जानने की ज़
 
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नन्हें फूल- रोज़ ही एक नया मज़ेदार कि़स्सा

अब के इस मौसम में नन्हें फूलों से महकी गलियाँ हैं" इस शेर को जब लिखा था तो वो प्यारे-प्यारे, छोटे-छोटे बच्चे थे दिमाग़ में, जिन्हें पढ़ाने का मौक़ा मिला है इस साल। कक्षा किंडर्गार्टन से कक्षा दूसरी तक के बच्चे, ४ - ७ साल तक के। शुरुआत में बड़ी परेशानी हो
 
मानसी
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भालोबाशो शुधु भालोबाशो- हेमंत कुमार

बचपन में इस गाने को सुनती थी, एल.पी. रेकार्ड पर। आज ये आनलाइन मिल गई। हेमंत कुमार द्वारा गाया ये बंग्ला गीत- भालोबाशो शुधु भालोबाशो। इसके रचनाकार कौन हैं नहीं जानती, पर शायद संगीत हेमंत कुमार का अपना हो, पक्का पता नहीं। इस गाने के मिठास के क्या कहने।
 
मानसी
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मेरे घर में उस बुढ़ापे के लिये कमरा नहीं

जनसता के वार्षिकी विशेषांक में मेरी एक ग़ज़ल प्रकाशित हुई है। ग़ज़ल तो पुरानी है पर ये ख़बर अच्छी लग रही है। ग़ज़ल एक बार फिर - कहने को तो वो मुझे अपनी निशानी दे गया मुझ से लेकर मुझको ही मेरी कहानी दे गया जिसको अपना मान कर रोएँ कोई पहलू नहीं कहने को सारा
 
मानसी
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क्या आप सत्तर के दशक में पैदा हुये हैं?

क्या आप ७० के दशक में पैदा हुये हैं? या ऐसा कहें कि ८०-९० के दशक में बड़े हो रहे थे...स्कूल जा रहे थे, कालेज जा (नहीं जा, बदले में फ़िल्म देखने) रहे थे? तब तो - - फ़ैंटम, मैंड्रेक, बहादुर (वो घोड़े पर...) आपके ड्रीम हीरो थे। आप अगर लड़की हैं, तो "प्रेत का
 
मानसी
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ग़ज़ल- छोटी-छोटी सी ख़ुशियाँ हैं

बाबुल की कच्ची कलियाँ हैं खुशियाँ रंगती फुलझड़ियाँ हैं नई मिट्टी है मन सोंधा है कटती-जुड़ती सी कड़ियाँ हैं तेरा प्यार से गाल चिकुटना छोटी-छोटी सी खुशियाँ हैं बचपन के सपनों से अब तक अम्मा की जगती अँखियाँ हैं झकमक धूप जो आंगन खेले थोड़े दिन की रंगरलियाँ है
 
मानसी
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इज़ दैट यू?

हर साल एक नया असाइन्मेंट होता है। इस साल भी, किंडर्गार्टन से कक्षा चौथी तक को म्यूज़िक, ड्रामा, आर्ट, आदि पढ़ाने की ज़िम्मेदारी। कभी इतने छोटे बच्चों को सम्हाला नहीं है, तो स्कूल के शुरु होते ही पहला सप्ताह रोज़ स्टाफ़रूम में रोना-धोना मचा रहता था मेरा। मेरे
 
मानसी
Oct 23 2009 05:50 PM
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मिलत्ते ही मैं गले नहीं लगता

लोग मुझको कहें ख़राब तो क्या और मैं अच्छा हुआ जनाब तो क्या है ही क्या मुश्तेख़ाक से बढ़ कर आदमी का है ये रुआब तो क्या उम्र बीती उन आँखों को पढ़ते इक पहेली सी है किताब तो क्या मैं जो जुगनु हूँ गर तो क्या कम हूँ कोई है गर जो आफ़ताब तो क्या ज़िंदगी ही लुटा द
 
मानसी
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जब दीप जले आना

दीपावली की सुंदर शाम, कई सुंदर पल, घर में लक्ष्मी के आगमन की तैयारी, मन में खुशियों के मेले, कई आने वाले सुंदर पलों की कल्पना और भगवान से प्रार्थना कि सब ऐसा ही सुंदर चलता रहे, सबके लिये। इन्हीं भावनाओं के साथ स्वागत है दीवाली तुम्हारा- २००९। अभी यहा
 
मानसी
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आज कुछ माँगती हूँ प्रिय...

आज कुछ माँगती हूँ मैं प्रिय क्या दे सकोगे तुम ? मौन का मौन में प्रत्युत्तर अनछुये छुअन का अहसास देर तक चुप्पी को बाँधे खेलो अपने आसपास क्या ऐसी सीमा में खुद को प्रिय बांध सकोगे तुम? आज कुछ माँगती हूँ प्रिय... तुम्हारे इक छोटे से दुख से जो मेरा मन भर
 
मानसी
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लौ को अपने दीप पर कुछ प्राण का विश्वास तो हो

शमन के अंतिम चरण में आस थरथराती क्यों हो लौ को अपने दीप पर कुछ प्राण का विश्वास तो हो शांत हो जलती कभी तो संग स्पंदन के थिरकती रात की स्याही से अपने रूप को रंग कर निखरती देह जल कर भस्म हो उस ताप में, पर मन नहाये अश्रु-जल की बूँद से वह पूर्ण सागर तक स
 
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बड़ी हैं सीमायें मगर...

ज़िंदगी गुम हो रही है आधुनिकता ढो रही हैं खिंच रहा है बेलगाम मन चमचमाती खनक सुन कर छिछले होते जा रहे अनूभूति के गहरे समंदर बन गया है आदमी अब एक मन रहित सा पुर्ज़ा भावनायें प्रेम विरह सब अट्ठहास सी कर रही हैं हृदय स्वार्थी हो गया है एकनिष्ठता मूर्खता है
 
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डूब जायें बस...मुल्तानी काफ़ी- उस्ताद सलामत खां

मुल्तानी-काफ़ी राग सिन्धी भैरवी में उस्ताद सलामत खां की आवाज़ में - डूब जायें बस...मुल्तानी काफ़ी एक तरह की गायकी है जिसमें सूफ़ी प्रभाव देखा जा सकता है। इसे सिन्ध और पंजाब में बहुत गाया जाता है। ये बहुधा पंजाबी या सिंधी भाषा में होती है। ये मुल्तानी काफ़ी
 
मानसी
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Sep 27 2009 10:39 AM
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ग़ज़ल- है फ़ासले तो बहुत पर मिली हैं राहें कहीं तो

गुज़र गया वो ज़माना, पड़ी हैं यादें कहीं तोदबी हुई है कहानी, हैं दफ़्न लाशें कहीं तोमैं जो ज़मीं पे हूँ ज़र्रा, है आसमां उसकी मंज़िलहैं फ़ासले तो बहुत पर, मिली हैं राहें कहीं तोकिया करूँ मैं दिनो-रात उसकी बातें सभी सेमेरी भी यादों से महके किसी की रातें कहीं
 
मानसी
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Sep 03 2009 06:55 AM
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ई-स्वामी - बधाई

कुछ दोस्त, कुछ रिश्ते यूँ ही राह में चलते-चलते बन जाते हैं। ई-स्वामी से कुछ ऐसे ही मुलाक़ात हुई थी आनलाइन। और राह में चलते-चलते कब हम दोनों इतने अच्छे मित्र बन गये, पता नहीं चला। कुछ एक जैसा ही बैक-ग्राउंड (मध्य प्रदेश से), कुछ एक जैसी सोच तो कुछ उल्टी
 
मानसी
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Sep 01 2009 07:16 AM
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यादें- क्या बात थी कि जो भी सुना अनसुना हुआ

पुरानी कई यादों को संजो कर ले आई हूँ इस बार भारत से। १८-१९ साल की उम्र में आकाशवाणी रायपुर से प्रसारित मेरी गाई ग़ज़लें पापा के पुराने टेप-रिकार्डर में मिली। साथ ही मिला एक पुराना पीला अख़बार। पापा ने कितने जतन से ये सब संभाल के रखा है।उन ग़ज़लों में से एक
 
मानसी
Aug 27 2009 08:45 PM
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आई मां मैं सच, हाँ सच

कुढ़ मत सपने अब मत जल आई मां मैं सच, हाँ सच बादल की सफ़ेद गाड़ी में पंख फैलाये हवा से बातें गप-शप नींद पुराने क़िस्से आती हूँ मां सच, हाँ सच आम के पेड़ों से कहना, दो आम रख लें बचा के अपने बारिश से कहना कि मुनिया आती हैं अब के हाँ सच साजन पीछे तुम रो लेना
 
मानसी
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पगली कूक-कूक चिल्लाये

भारत में जहाँ मानसून के लिये तरसा जा रहा है, बरसात कभी भी आ सकती है, वहीं यहाँ अभी-अभी गर्मी शुरु हुई है। ऐसे में भी, मगर कविता लिखते समय भारत की गर्मी की ही छवि सामने होती है। गर्मी के दिन फिर से आये सुबह सलोनी, दिन चढ़ते ही बन चंडी आंखें दिखलाती पीप
 
मानसी