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इयत्ता

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04 Jun 2010
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ओकरे किरुआ परी

-- हरि शंकर राढ़ीउस समय लगभग साढ़े बारह बज रहे थे। धूप अपने पूरे यौवन पर थी। गर्मी से बुरा हाल था लेकिन इस सांस्कृतिक नगरी में बिजली गुल थी । भूख लगी हुई थी और हम खाना खाने एक होटल में गए। उसका इनवर्टर फेल हो चुका था और जेनेरेटर था नहीं । गर्मी से बैठा
 
Hari Shanker Rarhi
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Jun 04 2010 03:34 PM
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काशी में एक दिन

---हरिशंकर राढ़ीगेस्ट हाउस में नहा - धोकर लगभग ११ बजे हम काशी विश्वनाथ जी के दर्शन के लिए चल पड़े। काशी में रिक्शे अभी बहुत चलते हैं, भले ही स्वचालित वाहनों की संखया असीमित होती जा रही हो। रिक्शे की सवारी का अपना अलग आनन्द और महत्त्व है। इधर रिक्शा चला और
 
Hari Shanker Rarhi
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यात्रा क्षेपक

--हरिशंकर राढ़ीमैं अपनी यात्रा जारी रखता किन्तु न जाने इस बार मेरा सोचा ठीक से चल नहीं रहा है। व्यवधान हैं कि चिपक कर बैठ गए हैं। खैर, मैं कोडाईकैनाल से मदुराई पहुँचूँ और आगे की यात्रा का अनुभव आपसे बांटूं , इस बीच में एक क्षेपक और जुड़ जाता है। इस क्षेपक
 
Hari Shanker Rarhi
May 29 2010 01:09 AM
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कार्टूनिस्ट त्रयम्बक शर्मा : एक मुलाक़ात

वर्ष २००८ में नेशनल लेवल पर पांडिचेरी में 'टेन आउटस्टेंडिंग यंग इंडियन अवार्ड' से अम्मानित प्रसिद्द कार्टूनिस्ट त्रयम्बक शर्मा विगत दिनों जबलपुर आये । वे शहर में भारतीय सुरक्षा संस्थान कि उत्पादन इकाई द्वारा आयोजित कार्टून प्रदर्शनी में हिस्सा लेने आये
 
राकेश 'सोहम'
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कोडाईकैनाल में

--हरिशंकर राढ़ीहमारी बस अपनी तीव्र गति से प्रकृति का स्पर्श करती हुई कोडाईकैनाल की तरफ बढ़ी जा रही थी।पर्वतमाला हमारे साथ-साथ चल रही थी और हम उत्सुक थे कि हम इनके अन्दर प्रवेश करें। इसी पर्वतपाद प्रदेश में बस चालक ने एक रेस्तरां पर बस रोकी और उस खुले से
 
Hari Shanker Rarhi
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हैप्पी मदर्स दे के अवसर पर !

आज के आधुनिक परिवेश में माँ की स्थिति को उकेरती मेरी पसंद की स्वरचित कवितामैं और वो ?मुझे एसी मेंनींद आती है ,उसके पास टेबल फेन हैजो आवाज़ करता है ।मैं ऊंचे दाम केजूते पहनता हूँ ,उसके पासबरसाती चप्पल है ।मैं हँसता हूँवो रो देती है,मैं रोता हूँवो फूट पड़ती
 
राकेश 'सोहम'
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May 09 2010 12:40 PM
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क्यों जाने दिया उसे?

रतन1कोलाहल का तांडवखंडित है नीरवभीड़ चहुंओरभागा-भागी का दौरसब हैं अपने काम में मगनफुरसत नहीं किसी कोपल भर कीसुबह हुई शाम हुईजिंदगी रोज तमाम हुई2जहां थी कोलाहल की आंधीसब कुछ पड़ा है आज मंदखामोश दरो-दीवारेंबे-आवाज जंजीरेंन घुंघरू की छम छमन तबले की थापन
 
इष्ट देव सांकृत्यायन
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क्यों मुस्काते हो..?

रतन जब मैं सदमे में जीता हूंतब तुम क्यों मुस्काते हो?मंजर है नहीं आज सुहानाक्यों तुम गीत सुनाते हो?पाया नसीबा हमने ऐसाअक्सर तुम कहते मुझसेमैं तो हूं पछताने वालाअब तुम क्यों पछताते हो?जब तक था मन साथ तुम्हारेतुमने दूरी रखी कायमअब हारा हूं थका हुआ
 
इष्ट देव सांकृत्यायन
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Apr 16 2010 01:49 PM
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तुम कहां गए

रतनबतलाओ तुम कहां गएबरसों बाद भी तेरी यादेंआती हैं नित शाम-सवेरेजब आती है सुबह सुहानीजब देते दस्तक अंधेरेकोना कोना देखा करतानजर नहीं तुम आते होमन में बसते हो लेकिन क्योंअंखियों से छिप जाते होबतलाओ तुम कहां गए हम जाते हैं खेत गली हरहम जाते हैं नदी
 
रतन
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मौजूं दुनिया इतनी डरावनी क्यूं हैं?

मौजूं दुनिया इतनी डरावनी क्यूं हैं? सनसनाते हुये हवाई जहाज गगनचुंभी बिल्डिंगो को चीर डालते हैं, और फिर इनसानी गोश्त लपलपाती हुई लपटों में भूनते जाते हैं। फिर असलहों से लैस कई मुल्कों की फौज धरती के एक कोने पर आसमान से उतरती हैं और मौत का तांडव का शुरु कर
 
Alok Nandan
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वास्तव में यह माओवादियों की युद्ध रणनीति को न समझने का मामला

तथाकथित सभ्य समाज में माओवादियों द्वारा 75 जवानों को मौत के घाट उतारना उतना ही निंदनीय है, जितना स्टेट पावर द्वारा नक्सलियों के दमन के लिए चलाया जा रहा आपरेशन ग्रीन हंट। भावुकता से इतर हटकर यदि हम निरपेक्ष रूप से नक्सलियों और केंद्र सरकार के बीच जारी
 
Alok Nandan
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बिहार में रिफोर्मिस्ट की कमी है

कल रात अचानक बिहार आर्ट थियेटर की दुनिया के एक मजे हुये सख्सियत से मुलाकात हो गई। बातों ही बातों में मैंने पूछा, भारंगम में बिहार आर्ट थियेटर की क्या उपस्थिति है। उन्होंने कहा, कुछ भी नहीं। एक बार हमने भारंगम में बिहार आर्ट थियेटर से एक नाटक भेजा था।
 
Alok Nandan
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जिंदगी पा गया

रतनतुझे पाके मैं हर खुशी पा गयाज्यों सौ साल की जिंदगी पा गया बहारों के सपने भी आने लगेखिजां दूर पलकों से जाने लगेतू है साथ हर सादगी पा गयाज्यों सौ साल की जिंदगी पा गया हुए साथ भंवरे भी गाने लगेथे वीराने जो मुस्कुराने लगेथा सूना जो दिल आशिकी पा गयाज्यों
 
रतन
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अहसास

रतन क्या यही अहसास है?आप थे जब तक साथ मेरेएक संबल था और बल थाऔर था मां का भी आंचल आपसेहमने पाई तमाम खुशियांसाथ इस अहसास केकि पापा हैं साथ हमारेएक इस अहसास सेदमदार हो जाते थे हमसारी मुश्किल पल में आसानहोती थीं यह जानकरकि हैं पापा साथ मेरेक्या यही अहसास
 
रतन
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चाहिए एक ख्वाब

रतनचाहिए एक ख्वाबहसीन हो जोसकून दे वोझरनों सी झर-झरबारिश सी झम-झमकलियों की चटकनपायल की छम-छमझांझर की झन-झनकंगन की खन-खनहवाओं की सर-सरफिजाओं की रौनकहो जिसमेंचाहिए एक ख्वाबबसे गुंजन मेंरहे तन-मन मेंनाचे आंगन मेंमहके उपवन मेंसुरमई शाम मेंहर एक काम मेंपीपल
 
रतन
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विश्व महिला दिवस का अवशेष !

कल थामहिला दिवस परअखबारों मेंविशेष,दिवस गयाआज फिरमहिलारह गयीशेष ! आज सेउस कल तकअखबारों मेंबिखरेगी -महिला, महिलाऔर महिला । महिला का शोषण,महिला का कुपोषण । महिला पर अत्याचार,महिला का बलात्कार । महिला का आकर्षण,महिला का चीरहरण । महिला का दमन,महिला का दहन ।
 
राकेश 'सोहम'
Mar 09 2010 10:22 AM
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मीनाक्षी के बाद

मीनाक्षी के बादमंदिर से निकलते-निकलते अंधेरा हो चुका था । विद्युत प्रकाश में नहाया हुआ मीनाक्षी सुन्दरेश्वर मंदिर प्रांगण के बाहर से और भी मनमोहक लग रहा था। फिर भी हम अब बाहर की दुनिया में वापस आ चुके थे। अर्थ-व्यवहार एवं दुकानदारी के चिर परिचित
 
Hari Shanker Rarhi
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Mar 08 2010 07:51 AM
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होली के बहाने न्यू मीडिया की अपार शक्ति का बखान कर गये आलोक मेहता

“न्यू मीडिया” से बौखालाये और होलियाये आलोक मेहता ने होली के बहाने इस मीडिया की जोरदार तरीके से ऐसी की तैसी करने की कोशिश की। इसके लिये तमाम तरह के तर्क और कुर्तक गढ़े, और इस न्यू मीडिया की लानत-मलानत में कोई कोर कसर नहीं छोड़ा, जो उनके लिए स्वाभाविक था।
 
Alok Nandan
Mar 01 2010 01:48 AM
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फागुन आया रे!

मेरे एक कवि मित्र ने घोषणा की है – फागुन आया रे! कब आया, कहां से आया, किस रास्ते आया, किसके मार्फ़त आया और कब तक ठहरेगा... इन सवालों का उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया है. सीधे काम की बात पर आ गए. सबसे पहले सीधे यही बता दिया कि किसलिए आया है. एकदम दिल्ली
 
इष्ट देव सांकृत्यायन
Feb 28 2010 06:09 AM
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चाहिए कुछ भी नहीं

चाहिए कुछ भी नहीं तुमसे मुझेन सांसों की सरगमन आने की आहटन धुंध खयालों कान अहसास रहगुजर साशहनाई भी नहींरानाई भी नहींपरछाई भी नहींतनहाई भी नहींरुसवाई भी नहींतुम सोचते होगे यहक्या चाहिए है मुझकोबस साथ इस तरह सेमिलता रहे तुम्हाराजब जी में आए देखूंजब जी करे
 
रतन
टैग: कविता
Feb 27 2010 04:33 PM
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फाल्गुन आया रे !

गोरी को बहकाने फाल्गुन आया रे । रंगों के गुब्बारे फूट रहे तन आँगन, हाथ रचे मेंहदी के याद आते साजन ॥ प्रेम-रस बरसाने फाल्गुन आया रे । यौवन की पिचकारी चंचल सा मन, नयनों से रंग कलश छलकाता तन ॥ तन-मन को भरमाने फाल्गुन आया रे । [] राकेश 'सोहम' dhanyavad
 
राकेश 'सोहम'
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मीनाक्षी सुन्दरेश्वर मंदिर

-हरिशंकर राढ़ी(लेखमाला की पिछली कड़ी में मदुराई और मीनाक्षी मंदिर का जो वर्णन मैंने किया था , उसे राष्ट्रीय सहारा दैनिक ने अपने 23 जनवरी के अंक में ज्यों का त्यों सम्पादकीय पृष्ठ पर अपने कॉलम ‘ब्लॉग बोला ' में 'देवदर्शन और विशेष शुल्क‘ शीर्षक से छापा
 
Hari Shanker Rarhi
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देवदर्शन टैक्स इन इंडिया

-हरिशंकर राढ़ीआज की ताजा खबर यह है कि शिरडी स्थित श्री साईं भगवान के दर्शन के लिए अब शुल्क लगेगा। प्रातःकालीन आरती के लिए 500रु, मध्याह्न की आरती के लिए 300रु और सामान्य दर्शन के लिए 100रु। इसमें कुछ शर्तें भी शामिल हो सकती हैं, टर्म्स एण्ड कंडीशन्स
 
Hari Shanker Rarhi
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खुद को खोना ही पड़ेगा

लंबे समय से ब्लाग पर न आ पाने के लिए माफी चाहता हूं। दरअसल, हमारे चाहने भर से कुछ नहीं होता। इसके पहले जब मैंने अपनी गजल पोस्ट की थी, उस पर आपने बहुत सी उत्साहजनक टिप्पणियां देकर मुझे अच्छा लिखने को प्रेरित किया था। आज जो गजल पेश कर रहा हूं, यह किस
 
विवेक भटनागर
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खुद को खोना ही पड़ेगा

लंबे समय से ब्लाग पर न आ पाने के लिए माफी चाहता हूं। दरअसल, हमारे चाहने भर से कुछ नहीं होता। इसके पहले जब मैंने अपनी गजल पोस्ट की थी, उस पर आपने बहुत सी उत्साहजनक टिप्पणियां देकर मुझे अच्छा लिखने को प्रेरित किया था। आज जो गजल पेश कर रहा हूं, यह किस
 
विवेक भटनागर
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एक मगही गीत

गीतकार -पंडित युदनंदन शर्मासब कोई गंगा नेहा के निकल गेल,आ तू बइठल के बइठले ह।ढिबरी भी सितारा हो गेल,आ ढोलकी भी नगाड़ा हो गेल,आ तू फुटल चमरढोल के ढोले ह।झोपड़ी भी अटारी हो गेल,कसैली भी सुपारी हो गेल।कुर्ता भी सफारी हो गेल,छूरी भी कटारी हो गेल,आ तू ढकलोल
 
Alok Nandan
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महंगाई को लेकर भूतियाये लालू

आलोक नंदनलालू यादव महंगाई को लेकर भूतियाये हुये हैं। 28 जनवरी को चक्का जाम आंदोलन का आह्वान करते फिर रहे हैं। (यदि बिहार में इसी तरह से ठंड रही तो उनका यह चक्का जाम आंदोलन वैसे ही सफल हो जाएगा)। बिहार में जहां-तहां जनसभा करके लालू यादव लोगों को ज्ञान दे
 
Alok Nandan
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पोंगापंथ अपटु कन्याकुमारी -5

( मेरी यात्रा मदुराई तक पहंची थी, उसका वर्णन मैंने किया था। उसके बाद वास्तविक यात्रा तो नहीं रुकी किन्तु उसका वर्णन रुक गया।इस बीच में कुछ तो इधर - उधर आना जाना रहा और कुछ कम्प्यूटर महोदय का साथ न देना। पहले विण्डोज उड़ीं और फिर लम्बे समय तक इण्टरनेट नहीं
 
Hari Shanker Rarhi
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नई शाम

नव वर्ष की शाम में डूबेकितने युवा जाम में डूबे । जो गुंडे हैं गरियाये,मोटर-साइकिल की शान में डूबे । प्रेमियों ने तलाशे कोने,यौवन की उड़ान में डूबे । ढलती शाम का दर्द ढो रहे,प्रार्थना और अज़ान में डूबे । जो बहक गये क़दम उनके,जवानी के उफ़ान में डूबे । पार्टी
 
राकेश 'सोहम'
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एक सार्थक पहल के लिए

कथाकार - ०००0 सुनीति 0००० ' अगली गोष्ठी में काव्या जी अपनी कहानी का वाचन करेंगी । ' सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया और गोष्ठी समाप्त हो गयी . ' काव्या जी, ' डॉ . ललित ने विदा लेते हुए कहा, ' अगली गोष्ठी में आपकी सार्थक कहानी सुनने का अवसर मिलेगा .' काव
 
राकेश 'सोहम'
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व्यंग्य को आलोचना की बैसाखी की जरूरत नहीं

हिन्दी व्यंग्य एवं आलोचना पर लखनऊ में यह राष्ट्रीय संगोष्ठी हुई तो थी 30 नवंबर को ही थी और इसकी सूचना भी भाई अनूप श्रीवास्तव ने समयानुसार भेज दी थी, लेकिन मैं ही अति व्यस्तता के कारण इसे देख नहीं सका और इसीलिए पोस्ट नहीं कर सका. अब थोड़ी फ़ुर्सत मिलने
 
इष्ट देव सांकृत्यायन
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भांति-भांति के जन्तुओं के बीच मुंबई बैठक

आलोक नंदन मुंबई के संजय गांधी राष्ट्रीय नेशनल पार्क में भांति-भांति के जन्तुओं के बीच रविवार को भांति-भांति के ब्लौगर जुटे। लेकिन एन.डी.एडम अपनी ड्राइंग की खास कला से वाकई में कमाल के थे। पेंसिल और अपनी पैड से वह लगातार खेलते रहे, किसी बच्चे की तरह।
 
Alok Nandan
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ललन और लोलिता को सांस्कृतिक ठेकेदारों से बचाते हैं जज पंत

मैं एक जज की गरिमा को पूरी मजबूती से स्थापित करना चाह रहा था...इसलिये जज पंत के रुटीन को लेकर चल रहा था ताकि दर्शकों के बीच जज पंत की पहचान एक गंभीर जज के रूप में हो। सीन 6 और 7 में कहानी को आगे बढ़ाते हुये एक जज के मैनेरिज्म को ही स्थापित किया गया ह
 
Alok Nandan
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कहां है चैनलों को मिले 268 नोटिसों का जवाब ??

आलोक नंदन सूचना एंव प्रसारण मंत्रालय ने कलर्स टीवी पर चलने वाला धारावाहिक “ना आना इस देश लाडो” और तथाकथित रियलिटी शो “बिग बास 3” के लिए कलर्स चैनल को कारण बताओं नोटिस जारी किया है। सूचना एंव प्रसारण मंत्रालय का कहना है कि “ना आना इस देश लाडो” में एक
 
Alok Nandan
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टीवी क्राइम शो और उसके इफेक्ट को रिफ्लेक्ट करता फिल्म राब्स का सीन 5

मित्रों आलोक जी ने यह एपिसोड समय से लिखकर सहेज दिया था, मैं ही अपनी निजी व्यस्तता के कारण इसे पोस्ट नहीं कर सका.  बहरहाल, आशा है सुधी पाठक देर के लिए मुझे क्षमा करेंगे. फिल्म की पटकथा में जितनी महत्वपूर्ण चीज़ कहानी होती है, उतना ही महत्वपूर्ण हो
 
Alok Nandan
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बदल रहा है सामाजिक यथार्थ : कुँवर नारायण

नई धारा' के आयोजन में कुंवर नारायण, बालेन्दु एवं राधेश्याम तिवारी सम्मानित भारत का सामाजिक यथार्थ अत्यंत जटिल, विविध, बहुस्तरीय और रूढ़िबद्ध है. वह बदल रहा है, लेकिन इतनी तेजी से नहीं कि यहाँ की सामाजिक चेतना को बदल दे. इससे पहले और तेजी से बाजारवाद औ
 
इष्ट देव सांकृत्यायन
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जज रमेश पंत और शराब चोर गोल्डी के सीन

अख़बार की दुनिया से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और फिर सिनेमा तक तक़दीर की आजमाइश करते चले जाने वाले आलोक नंदन को सिनेमा के व्याकरण की अच्छी समझ है. हिंदी में सही पूछिए तो किसी भी क्षेत्र में स्क्रिप्टिंग पर औपचारिक रूप से बहुत ढंग का काम नहीं हुआ है. साहित्य
 
Alok Nandan
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सीन बाई सीन देखिये फिल्म राब्स ..बिना पर्दे का

आलोक नंदन) एक फिल्म स्क्रीप्ट डिस्पले कर रहा हूं…फिल्म का नाम है राब्स, इसके साथ नीचे में इनवर्टेड कौमा में लिखा हुआ है, अपराध जगत में एक प्रयोगवादी जज...अब खुद देख लिजीये यह जज कितना प्रयोगवादी है....यह जैसा है वैसे ही रखने जा रहा हूं....एक एक सीन र
 
Alok Nandan