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हाशिया

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11 Jun 2010
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भूमकालः साथियों के साथ एक सफर

हाशिया पर हमने आउटलुक में प्रकाशित अरुंधति राय की चर्चित रिपोर्ट का अभिषेक श्रीवास्तव द्वारा हिंदी में संक्षिप्त अनुवाद पोस्ट किया था. इस रिपोर्ट ने देश और दुनिया में माओवाद और सामाजिक रूपांतरण में हिंसा के उपयोग पर एक नई बहस को जन्म दिया था. इस विवाद
 
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कॉरपोरेट नेतृत्व में लोकतंत्र : विकास या विकास का आतंकवाद?

14 मई 2010 को पोस्को प्रतिरोध संग्राम समिति के संघर्षरत साथियों पर धिनकिया ग्राम में गोलीचालन, की घटना हुई। 12 मई 2010 को कलिंग नगर में गोलीचालन, नियमगिरि एवं पोटका, झारखण्ड में दमनकारी कार्रवाई हुई। इसके खिलाफ जननेत्री दयामनी बरला के नेतृत्व में झारखण्ड
 
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बरबादी की वही पुरानी दास्तान: नहर का पानी खा गया खेती

रायबरेली से लौट कर रेयाज उल हक अपनी फूस की झोंपड़ी में गरमी से परेशान छोटेलाल बात की शुरुआत आसान हो गई खेती के जिक्र से करते हैं. वे कहते हैं, ‘पानी की अब कोई कमी नहीं रही. नहर से पानी मिल जाता है तो धान के लिए पानी की दिक्कत नहीं रहती.’पास बैठे रामसरूप
 
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गिरीश मिश्र के लेखन में अज्ञान और उद्दंडता का मिश्रण दिखाई पड़ता है

सदानंद शाही के संपादन में निकलने वाली पत्रिका साखी के 20वें अंक में छपे अपने (मूलतः अंगरेजी में लिखे) पत्र में, अर्थशास्त्र के प्राध्यापक और आर्थिक इतिहासकार गिरीश मिश्र ने रामविलास शर्मा और मैनेजर पांडेय के कार्यों पर गंभीर टिप्पणियां की थीं. इस पर
 
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माओवाद पर जारी बहसः ईपीडब्ल्यू से साभार

कुछ माह पहले मंछली रिव्यू की वेबसाइट पर बर्नार्ड डिमेलो का एक लंबा आलेख छपा था, जिसे बाद में इकोनॉमिक एंड पोलिटिकल वीकली ने संपादित करके छापा, जिसके डिमेलो उप संपादक भी है. ईपीडब्ल्यू में प्रकाशित होने के बाद इस आलेख पर मॉन्ट्रियाल स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ
 
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Jun 01 2010 07:53 PM
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हमरी अटरिया पे आओ संवरिया

कभी कभी कुछ गीत कितनी पुरानी यादों को छेड़ देते हैं. उस रात जब उमा (अचानक, जिसकी मैं अपेक्षा भी नहीं कर रहा था) ने यह गीत सुनाया तो हमें पटना के वे दिन याद आ गए, जब प्रभात खबर के दफ्तर के सामने अजय जी (जो तब प्रभात खबर के संपादक हुआ करते थे) के साथ
 
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प्रेम एक राजनीतिक मसला है...

देवाशीष प्रसूनसमगोत्रीय शादियों के ख़िलाफ़ खाप पंचायतों ने ख़ूब हो-हल्ला मचा रखा है। डंके के चोट पर उन दंपत्तियों की हत्या कर दी जा रही है, जो एक ही गोत्र होने के बावज़ूद अपने प्रेम को तवज्जो देते हुए परिवार बसाने का निर्णय लेते हुए शादी करते हैं। अंतर्जातीय
 
Reyaz-ul-haque
टैग: अपराध
May 28 2010 03:28 PM
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परमाणु जवाबदेही विधेयक में छिपे सवाल

प्रफुल्ल बिदवई क्या हमने भोपाल गैस त्रासदी से कोई सबक लिया है? क्या चौथाई सदी लंबी चोट, बदनामी और अपमान की उस स्थायी पीड़ा से हमने कुछ सीखा है जो दुनिया की सबसे भयावह रासायनिक दुर्घटना के पीड़ितों को भुगतनी पड़ी है? परमाणु दुर्घटना होने पर मुआवजा देने
 
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कृषि संकटः आपदा के घुमड़ते बादल

बढ़ती हुई महंगाई उस आपदा का सिर्फ एक संकेत है, जिससे खेती जूझ रही है. दरअसल भारतीय कृषि क्षेत्र बुरी तरह से चरमरा रहा है. संकट से पार पाने के लिए नजरिए में बड़े बदलावों की जरूरत है. लेकिन कृषि मंत्री शरद पवार आपदा की इस आहट को सुनने के लिए तैयार नहीं.
 
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May 24 2010 09:07 AM
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हर किसी को चाहिए अपने-अपने नायक

दिलीप मंडलदिल्ली की सबसे ऊंची इमारत का नाम जनसंघ के संस्थापक श्यामाप्रसाद मुखर्जी के नाम पर रखा गया है। ये इमारत दिल्ली नगर निगम की है और इस समय दिल्ली नगर निगम में भारतीय जनता पार्टी का बहुमत है। इसलिए माना जा सकता है कि बीजेपी जिन लोगों से प्रेरणा लेती
 
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May 24 2010 08:46 AM
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'जो इनसान हैं वे हमारा समर्थन करेंगे, राक्षस नहीं': टिकैत

बालियान खाप के चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत, रेयाज उल हक को बता रहे हैं कि सगोत्र में शादी की इजाजत देना उनकी नस्ल पर हमला है. इस बातचीत के कुछ अंश तहलका में प्रकाशित हुए हैं.अब तो केंद्र सरकार ने साफ कर दिया है कि वह हिंदू विवाह अधिनियम में संशोधन करने की
 
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महिला आरक्षण और राजनीति के क्षेत्र में व्यभिचार

दिलीप मंडलराजनीति के क्षेत्र में महिला आरक्षण का उप-उत्पाद (बाइ प्रोडक्ट) नेताओं के यौन भ्रष्टाचार में बढ़ोतरी की शक्ल में नजर आ सकता है। भारतीय राजनीति में यौन भ्रष्टाचार का पक्ष अक्सर दबा दिया जाता है, जबकि राजनीति का यह एक अभिन्न अंग रहा है। इसकी
 
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May 23 2010 08:32 AM
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संसद की बातें और युद्ध का सच

अनिल चमड़ियालाल कृष्ण आडवाणी ने नवंबर 1999 में जब ये कहा कि आंतरिक सुरक्षा की चुनौतियों का सामना करने के लिए सैनिक बलों की संख्या पर्याप्त नहीं है तो राज्यसभा में इस बाबत एक सवाल किया गया।तब सरकार ने जवाब दिया था कि इस समय जम्मू कश्मीर में मिलिटेंसी से
 
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विकास की छड़ी नहीं है जनगणना

साल दर साल ये आंकड़े आ रहे हैं कि दलित, आदिवासी और मुस्लिम समुदाय रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में बाकी समुदायों से पीछे रह जा रहे हैं। लेकिन इस सूचना का तब तक कोई महत्व नहीं है, जब तक कि सरकार सचेत रूप से इन समुदायों के हित में काम न करे और
 
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May 21 2010 06:36 PM
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यह जश्न, यह गीत किसी को बहुत हैं…

जो कल तक हमारे लहू की खामोश नदी में तैरने का अभ्यास करते थे.आपने पोस्कोविरोधी आंदोलन पर क्रूरतम पुलिसिया कार्रवाई की निंदा करती हुई एक अपील हाशिया पर पढ़ी. नीचे हम इस कार्रवाई की एक और भर्त्सना पेश कर रहे हैं.यह टिप्पणी फेलिक्स पाडेल की है. फेलिक्स
 
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उड़ीसा में शांतिपूर्ण तरीके से आंदोलन कर रहे लोगों पर पुलिस हमला बंद करो

15 मई को उड़ीसा में प्रस्तावित पोस्को स्टील परियोजना का विरोध कर रहे किसानों के शांतिपूर्ण धरना पर पुलिस की 40 डिवीजनों ने हमला किया, ताकि किसानों को जमीन से हटा कर उसे पोस्को को सौंपा जा सके. पुलिस फायरिंग से सौ से अधिक लोग घायल हुए और कम से कम एक
 
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शहरों में अपराध का बदलता समाजशास्त्र

कभी मार्क्स का अपराधों पर लिखा वह दिलचस्प अंश भी हाशिया पर पेश किया जाएगा, जिसमें वे अपराध के राजनीतिक अर्थशास्त्र की खबर लेते (देते) हैं. दिलीप मंडल का यह लेख पढ़ते हुए महसूस होता है कि समाज के सभ्य होते जाने के जितने और जैसे दावे किए जा रहे हैं, अहिंसा
 
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मजदूरों का बंधुआ बनना जारी है...

देवाशीष प्रसून का यह लेख कल के जनसत्ता में प्रकाशित हुआ था. विकास और सामाजिक उन्नति के बेशर्म और झूठे दावों के बीच जमीन पर वास्तविक हालत क्या है, इसे प्रसून ने दिखाने की कोशिश की है.अगर भारत सरकार या देश के किसी भी राज्य सरकार से पूछा जाये कि क्या अब भी
 
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May 03 2010 05:21 PM
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एक विस्थापित का अविश्वास प्रस्ताव

देश का शासक वर्ग अपनी सीमाओं के भीतर एक और युद्ध लड़ रहा है. कारपोरेट कंपनियों, औपनिवेशिक स्वामियों और उनके दलाल देशी पूंजीवादी घरानों के हित में लड़ी जा रही यह लड़ाई पिछले छह महीनों से अधिक समय से लड़ी जा रही है. ऑपरेशन ग्रीन हंट के नाम से चल रहा यह
 
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विद्रोहों के केंद्र में कुछ रातें और कुछ दिनः जन मिर्डल व गौतम नवलखा

बस्तर और माओवादी प्रभाव वाले इलाकों के सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक जीवन के बारे में एक और रिपोर्ट आई है. स्वीडेन के लेखक जन मिर्डल और मानवाधिकार कार्यकर्ता तथा ईपीडब्ल्यू के सलाहकार संपादक गौतम नवलखा हाल ही में उन इलाकों से लौटे हैं. उन्होंने
 
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दुनिया का सबसे बड़ा घोटाला है भारत का लोकतंत्र

अरुंधति राय के इस साक्षात्कार के बारे में हम पहले भी एक पोस्ट में लिख चुके हैं. पेश है यह पूरा साक्षात्कार. आप इसे यहां सुन सकते हैं और चाहें तो डाउनलोड भी कर सकते हैं.
 
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आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरा बनते हुए

उपन्यासकार, कार्यकर्ता, पत्रकार और आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरा?  अरुंधति राय ने इस बातचीत में भारत के केंद्र में स्थित जंगलों में माओवादी क्रांतिकारियों से मिलने और बात करने के लिए किए गए की गई यात्रा के बारे में बताया है. राय यहां लारा को प्रतिरोध
 
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पढ़िए अरुंधति कोः बंदूक की नली से निकलता ग्राम स्वराज

अरुंधति राय, दंडकारण्य से लौटकरअनुवादः अभिषेक श्रीवास्तवदंतेवाड़ा को समझाने के कई तरीके हो सकते हैं। यह एक विरोधाभास है। भारत के हृदय में बसा हुआ राज्यों की सीमा पर एक शहर। यही युद्ध का केन्द्र है। आज यह सिर के बल खड़ा है। भीतर से यह पूरी तरह उघड़ा पड़ा है।
 
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शोकगीत नहीं, उल्लास का उत्सवः पढ़िए अरुंधति को

आनेवाले दशकों में शायद इसे एक क्लासिक की तरह पढ़ा जाएगा. इन बेहद खतरनाक- और उतने ही शानदार- दिनों के बारे में एक विस्तृत लेखाजोखा. पिछले एक दशक से अरुंधति के लेखन में शोकगीतात्मक स्वर बना हुआ था, पहली बार वे इससे बाहर आई हैं और पहली बार उनकी किसी रचना
 
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महज एक बच्चे की ताली पर: एक बहस जिसका जवाब प्रभाष जी ने नहीं दिया

यह लेख प्रभाष जोशी के लेख 'काले धंधे के रक्षक' के छपने के तुरंत बाद लिखा गया था, लेकिन प्रभाष जी की जिद थी कि वे इंटरनेट पर आयी बातों का जबाव नहीं देंगे। प्रिंट में आये तभी बोलेंगे।  इसलिए इसे उस समय इंटरनेट के लिए नहीं दिया गया. जब जनसत्ता ने इसे
 
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आदिवासियों की संघर्ष कथा

उनकी कहानियां हों, या कविताएँ या उपन्यास- रणेंद्र अपने लेखन में जनता के सरोकारों से अभिन्न रूप से जुड़े दिखते हैं. खास कर आदिवासी समुदाय की पीड़ा, उसका विस्थापन और उसका संघर्ष उनके लेखन में अधिक मुखर होता है.उनका ताजा उपन्यास ग्लोबल गांव के देवता पढ़िए.
 
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सेहत की आड़ में सेहत से खिलवाड़

कैंसर से बचाने के लिए हजारों गरीब बच्चियों को एक विवादित टीका लगाया जा रहा है और ऐसा करने के लिए सरकार, कंपनियां और गैरसरकारी संगठन नियम-कायदों की धज्जियां उड़ा रहे हैं. शांतनु गुहा रे और कुणाल मजूमदार की रिपोर्ट नागेश्वर और वेंकटम्मा से जब कोई सरिता के
 
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छत्तीसगढ़ कहत हे, जियन दे हमनला

यह छत्तीसगढ़ की आवाज है, जो सारे देश की जनता का प्रतिनिधित्व करती है. साम्राज्यवाद के चमकदार स्टूडियो में बैठ कर भनभनानेवाली मक्खियों, आक्रामक, बदतमीज और उज्जड टीवी पत्रकारों और उनके मालिकों का देश नहीं, भूखे और वंचित लोगों का देश. यह आवाज सुनिए. इसे
 
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विदेशी कंपनियां, दलाल व्यवस्था और गिरवी संप्रभुताः दो आख्यान

अभी संवाद प्रकाशन से आई मिशेल चोस्दुव्स्की की गरीबी का वैश्वीकरण पढ़ रहा था. पूरी दुनिया में साम्राज्यवाद के कसते शिकंजे की एक पड़ताल करने की कोशिश की है मिशेल ने. हालांकि उनके लेखे-जोखे में कुछ खामियां और गलतियां भी हैं, लेकिन कुल मिला कर एक शानदार और
 
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भारतीय अर्थव्यवस्था का भविष्य

गिरीश मिश्रपहले की तरह ही इस बार चालू वित्तीय वर्ष के दौरान भारतीय अर्थव्यवस्था की प्रगति की रूपरेखा संसद के समक्ष आगामी वर्ष का बजट पेश करने के पूर्व रखी गई जिससे बजट प्रस्तावों पर सार्थक बहस हो सके. 'आर्थिक समीक्षा 2009-10' में संवृध्दि की संभावनाओं और
 
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चिंताएं, संविधान और सामाजिक विकास का यथार्थ

अनिल चमड़ियासंविधान में जो व्यवस्थाएं हैं उनकी व्याख्या विभिन्न विचारों वाली राजनीति अपने तरीके से कर सकती है. लेकिन संविधान से अलग कोई व्यवस्था करने का आश्वासन या भरोसा कोई राजनीतिक दल प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से देता है तो उसके दो ही मकसद हो सकते हैं. एक
 
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नवउदारवादी दलदल में भारत

गिरीश मिश्रगरीबी, गांवों से शहरों और पिछड़े राज्यों से अपेक्षाकृत विकसित राज्यों की ओर पलायन, भ्रष्टाचार, अपराध, आतंकवाद, सामाजिक विषमता, क्षेत्रीय असंतुलन, मलिन बस्तियां आदि हमारे देश में अनेक दशकों से विद्यमान हैं मगर इनमें परिणामत्मक एंव गुणात्मक
 
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आदिवासी और माओवादी एक तरफ हैं और राजसत्ता दूसरी तरफ

‘पुलिस दुश्मन के साथ है’क्रांतिकारी कवि और विचारक वरवर राव बता रहे हैं कि पश्चिम बंगाल में पुलिस कैंप पर हमला ऑपरेशन ग्रीन हंट के बदले में किया गया था. तहलका में प्रकाशित शोभिता नैथानी से बातचीत से अंश, साभार.पश्चिम बंगाल में जवानों की निर्मम हत्या पर
 
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ज़ोर-जुलम है, जेल-सेल है। वाह खूब आज़ादी है!

सीमा आजाद और विनायक सेन जैसी नजीरों के इस दौर में बाबा नागार्जुन की यह कविता उनके नाम जो चुप्पियों और चाटुकारिता को सीने से लगाए घूम रहे हैं.सच न बोलना नागार्जुनमलाबार के खेतिहरों को अन्न चाहिए खाने को,डंडपाणि को लठ्ठ चाहिए बिगड़ी बात बनाने को!जंगल में
 
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Mar 03 2010 06:19 PM
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भारत की क्षेत्रीय नीति में सुधार की जरूरत

प्रफुल्ल बिदवईपाकिस्तान और अफगानिस्तान के बारे में, जो ऐसे देश हैं जहां अशांति फैली हुई है और जो भारत की सुरक्षा पर काफी बडा असर डाल सकते हैं. क्या भारत की कोई निश्चित और संगत नीति है? हाल में जो घटनाएं घटी हैं, उन्हें देखते हुए इस सवाल का ईमानदार जवाब
 
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Feb 25 2010 06:47 PM
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एक दमनकारी होते राज्य में जनता का प्रतिरोध और साहित्य की जिम्मेदारियां

तद्भव का यह संपादकीय अपने आप में एक पूरी टिप्पणी है. हाशिया पर साभार.इन दिनों राज्य के दमनकारी चरित्र को लेकर विचार मंथन की प्रक्रिया तीव्र हुई है। नक्सलवाद के सफाये के नाम पर बेकसूर और मुफलिस लोगों पर राज्य का कहर इसका ताजा और ज्वलंत उदाहरण है। यह एक
 
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Feb 24 2010 11:13 AM
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आर्थिक संवृध्दि का मायाजाल

गिरीश मिश्रपिछले कई हफ्तो से यह धुआंधार प्रचार चल रहा है कि भारतीय अर्थव्यवस्था विश्वव्यापी अति मंदी के भंवर से लगभग बाहर आ गई है। उसकी संवृध्दि रफ्तार पकड़ने लगी है और वह दिन दूर नहीं जब वह दो अंकों में हो जाएगी तथा भारत विश्व की एक महाशक्ति बन जाएगा।
 
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Feb 20 2010 11:05 AM
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मुझे निष्कासित नहीं करने का कारण बताए प्रशासन

दिलीपयह हिंदी विश्वविद्यालय के छात्र-छात्राओं का दुर्भाग्य है कि उनके पास अपनी बात रखने का ज़्यादा विस्तृत आयाम विश्वविद्यालीय मंच के बजाए मीडिया मुहैया कराती है.  मैं इसे दुर्भाग्य इसलिए मान रहा हूँ क्योंकि मीडिया के जरिए यहाँ की सहमति-असहमति
 
Reyaz-ul-haque
Feb 18 2010 12:21 PM
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आदिवासियों का शिकार बंद करे सरकार

भारत के किसी अखबार का शायद यह पहला संपादकीय है, जिसमें साफ-साफ शब्दों में सरकार से ऑपरेशन ग्रीन हंट को रोके जाने की मांग की गई है और माओवादियों से एक ईमानदार बातचीत शुरू करने का आह्वान किया गया है. डेक्कन हेराल्ड के इस संपादकीय को पढ़वाने के लिए भाई
 
Reyaz-ul-haque
Feb 17 2010 12:43 PM
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प्रोपेगेंडा, बिकी हुई खबरें, मीडियाः एक अदृश्य सत्ता

हमारे समय में चेतना की धार को कुंद करने वाले शब्दों को उसके सही और वास्तविक मायनों में व्याख्यायित करने वाले प्रख्यात पत्रकार जॉन पिल्गर ने यह व्याख्यान (यहां एक वीडियो भी है) शिकागो में पिछली जुलाई में दिया था। इस व्याख्यान में वे विस्तार से बताते हैं
 
Reyaz-ul-haque
Feb 16 2010 02:20 PM