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घुघूती बासूती

http://ghughutibasuti.blogspot.com/
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15 Jun 2010
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बन्दिनी वर्षा, बन्दिनी मैं................... घुघूती बासूती

वर्षा तू भी तो मजबूर हैइस शहर में,मुझ सी तू भी कैदी है!जैसे मैं इतनी खिड़कियोंबाल्कनियों के होने पर भी,हूँ सलाखों के पीछेतू भी तो चाहे बरसती है अपने मन सेफिर भी गति न है तेरी तेरे मन की।प्रकृति में क्या है उद्देश्य वर्षा का?बादलों से तकना प्यासी धरती
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टिप्पणियाँ सीमा मुक्त हुईं! सिरिल आपका बहुत बहुत आभार!.......................घुघूती बासूती

अवैधानिक चेतावनी: ज्ञान पिपासु फिर कभी आएँ जब ज्ञान वार्ता हो रही हो। खेद है कि आज ज्ञान की दुकान बन्द है। आज अगम्भीर चिन्तन दिवस है।कुछ देर पहले नेट पर आई तो ब्लॉगवाणी वाले सिरिल की टिप्पणी दिखी। 'टिप्पणियां सीमा मुक्त हुईं.' पढ़कर मुझे उतनी ही खुशी हुई
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वर्षा तुम जल्दी आना!

वर्षा केवल पानी नहीं लाती, वह अपने साथ लगभग सभी इन्द्रियों की तृप्ति का साधन भी लाती है। कई महीनों से झुलसे हुए शरीर को वह फिर से हर इन्द्रीय सुख ग्रहण करने के लिए तैयार कर देती है। पहली फुहार पड़ते से ही मानव मन मोर की तरह नाच उठता है। उसका शरीर भीगता
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कैसी विडम्बना है, अपना ब्लॉग लिख सकती हूँ किन्तु पढ़ नहीं सकती!............घुघूती बासूती

आजकल नेट पर आना, ब्लॉग पढ़ना बहुत कम हो गया है, लिखना तो लगभग छूट ही गया है। कमी थी तो कल से मैं कोई भी ब्लॉगस्पॉट वाला ब्लॉग नहीं खोल पा रही हूँ। ब्लॉगवाणी खुल जाती है किन्तु वहाँ से लोगों के ब्लॉग नहीं खुलते, केवल वर्डप्रेस वाले या .com वाले खुलते हैं।
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मुझपर भी चढ़ रहा जाति का बुखार !...........................घुघूती बासूती

हमारे कुछ नेता चाहते हैं कि जनगणना में जाति भी पूछी जाए। सोचती हूँ कि यदि जनगणना में कोई मुझसे मेरी व मेरे परिवार की जाति पूछेगा तो क्या कहूँगी? जिस जाति में मेरा जन्म हुआ, जिससे विवाह किया या कोई जाति नहीं? तीन दशक से कुछ कम वर्ष पहले जब हमसे बिटिया के
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माँ के साथ मदर्स डे। हमारे जमाने में तो एक ही डे होता था!.................................. घुघूती बासूती

आज शाम को मैं माँ के साथ उनके कमरे में बैठ समाचार देख रही थी, या यूँ कहिए देखने की अभिलाषा लिए थी। बहुत सारे विज्ञापनों के बाद जब समाचारों की जगह कुछ फिल्मी हस्तियाँ अपनी माँओं की बात कर रही थीं/ रहे थे तो मैं परेशान थी कि समाचार क्यों नहीं आ रहे कि
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क्या किसी के कहने से मैं अपनी कलम का रुख बदल दूँ?.......................घुघूती बासूती

परसों की मेरी पोस्ट पर एक युवा मित्र ने मुझे सुझाव दिया है कि मैं अपनी कलम का रुख बदल दूँ। उनका कहना है कि स्त्रियों को लेकर मेरी कलम एक तरफ ही चलती है। उनका सुझाव है कि मुझे स्त्रियों के शरीर को अधिक ढकने के लिए कुछ करना चाहिए। गर्मी की भरी दुपहरी उनके
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क्या आपने कभी सुना है.........घुघूती बासूती

क्या आपने कभी सुना है कि किसी माता पिता ने अपनी प्रतिष्ठा/सम्मान के लिए अपने......१. गंजेड़ी, नशेड़ी पुत्र की हत्या कर दी?२.बलात्कारी पुत्र की हत्या कर दी?३.देशद्रोही पुत्र की हत्या कर दी?४.आतंकवादी पुत्र की हत्या कर दी?५.हत्यारे पुत्र की हत्या कर
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टिमटिम तारा का जाना, अवकाश, शोक और बच्चों को लगा शौक

अभी अभी 'अनवरत' पर दिनेशराय द्विवेदी जी का राजकीय शोक पर लिखा लेख पढ़कर आ रही हूँ। इससे पहले 'मुसाफिर हूँ यारों' में नीरज जाट के चन्डीगढ़ पर तीन लेख पढ़े थे। मन यूँ ही चन्डीगढ़मय हो रहा था। सो मुझे अपने स्कूली दिनों के एक उस दिन की याद आ गई जब शोक मनाने के
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जब सूजी नाक भी खबर बन गई!.........................घुघूती बासूती

मैं पत्रकारिता के विषय में कुछ नहीं जानती़। मैं संसार के अधिकतर विषयों के बारे में बहुत कम या कुछ नहीं जानती। किन्तु फिर भी मनुष्य को सहज ही किसी बात को देखकर यह लगता है कि कुछ गड़बड़ है, या किसी के साथ अन्याय हो रहा है, या यह कुछ अच्छा होता लग रहा है।
Apr 17 2010 12:04 AM
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ब्लॉग लेखक की गिरफ्तारी। .........................................घुघूती बासूती

किसी भी सुविधा का उपयोग मनुष्य अपने मूलभूत स्वभाव के अनुसार करता है। जब भी कोई नई खोज या आविष्कार होता है तो लोग अपनी प्रकृति के अनुसार उसके उपयोग ढूँढ लेते हैं। जेबकतरा शेविंग ब्लैड जेब काटने के लिए, आत्महत्या का प्रयास करने वाला कलाई कि नसें काटने,
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सहज पके सो मीठा होय ?

समय के साथ बहुत सारी लोकोक्तियाँ व मुहावरे अपनी सार्थकता खो बैठे हैं या उन्हें पलट ही दिया गया है। बचपन से सुनते आए थे कि धीरे धीरे पका हुआ फल ही स्वाद होता है। पेड़ पर पका हुआ तो सबसे स्वाद होता है। किन्तु आज फलों को पेड़ पर पकाना तो दूर की बात है उन्हें
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अलीबाग का समुद्रतट ..............................घुघूती बासूती

होली के समय चार दिन को बड़ी बिटिया व उसका पति यहाँ आए। बच्चे जब घर आते हैं तो जीवन भी घर आता है। हम लोग होली से अगले दिन अलीबाग घूमने गए। सारा रास्ता प्राकृतिक सौन्दर्य से भरा हुआ था। मुम्बई के पेड़ों व जंगली उगे पेड़ों को देखकर यही लगता है कि यहाँ का
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सानिया प्रसंगः सानिया और उनके प्रशंसकों को उनका निर्णय मुबारक!...........घुघूती बासूती

सानिया वाले प्रसंग में जो कुछ बिन्दु महत्वपूर्ण हो सकते हैं उनमें से कुछ ये हैं.....१.सानिया हम सबकी तरह स्वतन्त्र हैं किसी से भी विवाह करने या न करने के लिए।२.यह बात सभी मानते नहीं तो जानते हैं किन्तु जब बात पाकिस्तान की आती है तो हम मस्तिष्क से नहीं मन
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जरा माचिस तो देना!.............................घुघूती बासूती

एक नया गैस सिलिन्डर जब लगाया तो ठीक से बैठ नहीं रहा था। पति व ड्राइवर दोनों ने कोशिश कर ली। फिर गैस एजेन्सी से उनके वर्दीधारी मैकेनिक को बुलाया, उसने जबरदस्ती लगा तो दिया परन्तु मेरे यह पूछने पर कि इतनी लड़ाई लड़कर कोई स्त्री यह कैसे लगाएगी, उसने कहा कि अब
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आइ पी एल यदि तमाशा है तो तमाशे पर टैक्स क्यों नहीं लगता ?

हाँ, मुझे भी क्रिकेट पसन्द था और काफी सीमा तक अभी भी है। मैंने भी आम भारतीय बच्चे की तरह खूब बल्ला घुमा रखा है और न जाने कितने घंटे, जो कुल मिलाकर शायद महीने नहीं तो कुछ सप्ताह तो अवश्य हो जाएँगे, टैनिस गेंद या क्रिकेट गेंद से कुछ कम सख्त कॉर्क की गेंद
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एक टिप्पणी, एक लेख .....................घुघूती बासूती

इस लेख में बहुत कुछ जोड़ भी सकती हूँ किन्तु वह फिर कभी। यह बस यूँ ही नारी पर टिपियाते हुए (स्त्री के मन से अनायास निकला हुआ) कह दिया। जोड़ने को माँ के साथ हुए अनगिनित वाद विवाद व वार्ताएँ हैं, हजारों वे बातें हैं जो आज तक अनकही रह गईं। कहने पर उलाहने मिलने
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वरमाला कोई भी पहना दे, किन्तु मायामय हो वह वरमाला!...............घुघूती बासूती

एक नवयुवक है। इसी साल पढ़ाई खत्म होगी। कैम्पस साक्षात्कार में उसे बढ़िया नौकरी भी मिल गई है। कई जगह से रिश्ते आने शुरू हो गए हैं। अभी कुछ ही दिन पहले तक केवल एक विशेष कार, एक बड़ा टी वी, फ्रिज़, (बड़ा कठिन है इस सूची को बनाना! कुछ छूट गया तो? एक बेसिक सूची
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भारत में स्त्री की औकात

लीजिए बहनो और भाइयो, यदि आप किसी भ्रम में जी रहे थे तो तुरन्त उससे बाहर निकल आइए। यदि आप भारतीय नारी को महान मानने वालों का लिखा पढ़ते यह सोच रहे थे कि शायद आपका ही घर परिवार एक अपवाद है अन्यथा शेष भारत में तो जो वह कहे वही होता है, उसकी आज्ञा सबको
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मीठा मीठा गप्प, कड़वा कड़वा थू।................घुघूती बासूती

वाह, आरक्षण के पक्षधर अचानक उसके विरोधी हो गए! जब आरक्षण खुद को नौकरी में मिलना था तब तक उसके लिए युद्ध में डटे हुए थे। तब उसके विरोधी सामाजिक न्याय के विरोधी दिख रहे थे, अकेले मलाई खाना चाहने वाले लगते थे। तब आरक्षण समर्थक चाहते थे कि अगड़ी जाति वाले
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मर्द हो तो मदाम की बात तो मत ही मानो!..........................घुघूती बासूती

बात तब की है जब हम साऊदी अरब में थे। हम खरीददारी के लिए पास के शहर जाते थे। वहाँ काफी भारतीय, पाकिस्तानी, बंगलादेशी व श्रीलंकाई लोग दुकानों पर काम करते थे, सो भाषा या संस्कृति की समस्या अधिक नहीं होती थी। वे सभी जानते थे कि रसोई का सामान तो कम से कम
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वह गोबर होली वर्ष था !..............................................घुघूती बासूती

कहाँ कहाँ खेली, कैसी कैसी तो होलीजैसी हमने खेली वैसी ही हो ली होलीजहाँ जहाँ गए हम संग हो ली होलीतेरी, मेरी, उसकी हम सबकी होली।होली का दिन आता है तो उसके कुछ पहले से व उसके कुछ बाद तक मुझे अलग अलग जगहों पर खेली होली की याद आती है। हम लोग हैं बंजारे, हर दो
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Feb 26 2010 06:42 PM
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आज भी है वैलेन्टाइन दिवस...................................घुघूती बासूती

सोचती हूँ कि १० साल पहले आज के दिन कितने खतरे मोल लेकर हम दोनों मिले थे। तब कुछ ही महीने पुराना प्यार था। जानते थे कि मिलने में खतरा है, कि संस्कृति के रक्षक कभी भी पकड़ सकते हैं और फिर जलूस भी निकाल सकते हैं किन्तु लगता था कि उनसे डरना गलत होगा और हम
Feb 14 2010 10:42 PM
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कुछ बातें सही गलत की सब मर्यादाओं से बाहर की होती हैं !................घुघूती बासूती

जीवन में हम अधिकतर बातों को सही या गलत, काले या सफेद, अच्छे या बुरे के साँचे में डालने के यत्न में लगे रहते हैं। यह हमारे लिए सुविधाजनक होता है। इससे मस्तिष्क को कम से कम कष्ट होता है। सबसे बड़ा लाभ तो यह होता है कि हमें अधिक चिन्तन भी नहीं करना पड़ता ।
Feb 11 2010 05:33 PM
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बइयाँ ना मरोड़ो बलमा..............घुघूती बासूती

अवैधानिक चेतावनी: ज्ञान पिपासु फिर कभी आएँ जब ज्ञान वार्ता हो रही हो। खेद है कि आज ज्ञान की दुकान बन्द है। आज अगम्भीर चिन्तन दिवस है।प्लास्टर उतर गया, जमकर रगड़ा लग गयाऔर हम खड़े खड़े, हॉस्पिटल में पड़े पड़ेहाथ खूब मुड़वाते औ तुड़वाते रहे।हाय रे मानव! तू सदा
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क्यों बाँध रखी है ब्लॉगवाणी ने टिप्पणियों पर सीमा ?..........घुघूती बासूती

हमारी माँगें हैं कि बढ़ती ही जा रही हैं, क्यों न बढ़ें जब ब्लॉगवाणी उन्हें पूरा करती हो !माँग उससे की जाती है जो माँग पूरी करे या जिस पर कोई अधिकार या स्नेह का रिश्ता हो। अब यह स्नेह चाहे इकतरफा हो या दुतरफा परन्तु हम लगे हाथ एक और माँग कर ही डालते हैं।
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केवल एक'वेरी गुड' का सवाल है बाबा! ..... घुघूती बासूती

आप एक पोस्ट लिखते हैं यह बताते हुए कि आपकी भैंस मर गई।टिप्पणी आती है गुड।आप एक पोस्ट लिखते हैं यह बताते हुए कि आपके पिताजी मर गए।टिप्पणी आती है गुड।आप एक पोस्ट लिखते हैं यह बताते हुए कि आपके ऊपर मुकदमा किया गया है।टिप्पणी आती है गुड।आप एक पोस्ट लिखते हैं
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आज है इकतालिसवाँ दिन!.....................घुघूती बासूती

कबसे मन गा रहा था....वो सुबह कभी तो आएगीजब प्लास्टर उतारा जाएगाजब बाँह को धोया जाएगा।चालीस दिन से हर रात दिनों की गिनती करते बीती है। कितने बीत गए, कितने बचे हैं। एक बाँह को ऊपर से आठ अंगुल और नीचे से केवल उँगलियाँ छोड़कर यदि प्लास्टर में जकड़ दिया गया हो
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देखिए तो, मित्रों के सुझावों से कैसे समस्या सुलझ गई!...................घुघूती बासूती

पिछली पोस्ट में मैंने अपनी एक ब्लॉग सम्बन्धी समस्या, ब्लॉग का इन्टरनेट एक्सप्लोरर ठीक से न खुल पाना, आप सबके सामने रखी थी। बहुत से मित्रों ने मुझे समस्या के कारण बताए, समाधान के लिए सुझाव दिए। मैंने अपने ब्लॉग में उनके बताए अनुसार थोड़ा बहुत बदलाव किया।
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मित्रों को मुझसे शिकायत है!.................घुघूती बासूती

मेरे बहुत से मित्रों व पाठकों को एक शिकायत है और शिकायत बिल्कुल उचित भी है। समस्या यह है कि मैं शिकायत से सहमत हूँ, किन्तु उसके कारणों को समझने व दूर करने में असमर्थ हूँ। चाहती हूँ कि सुधी मित्र समस्या के समाधान में मेरी सहायता करें।समस्या यह है कि बहुत
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ये ही क्या वसंत है?...........घुघूती बासूती

प्रकृति से रिक्तरंगों से अछूतीधूल के गुबार हैं।न कोई आम्रमंजरीन कोई मंजरी महकडीजली,पैट्रौली बास है।कोयल नहीं कूकती चिड़िया नहीं चहकतीवाहनों की बस गूँज है।सरसों नहीं फूलतीन गेहूँ की बालियाँबोनसाई बरगद ही वृक्ष है।ठंड तो पड़ी नहींअंगीठी सेकी नहींए सी ने
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हम फिर चूक गए..............घुघूती बासूती

ज्योति बसु ने अपना शरीर ४ अप्रैल २००४ को चिकित्सीय अनुसंधान के लिए दान कर दिया था। मरणोपरांत उनकी यह इच्छा पूरी की जा रही है। उनकी आँखों की कॉर्निया तो पहले ही निकाल ली गई हैं व नेत्रहीनों के काम आएँगी। आज उनका पार्थिव शरीर भी चिकित्सीय अनुसंधान के लिए
Jan 19 2010 03:38 PM
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चलती चक्की देख कर .........घुघूती बासूती

गेहूँ की पिसाई तीन रुपया!सरकार गरीबी की रेखा से नीचे की आबादी को राशन में शायद २ रुपए किलो गेहूँ उपलब्ध करवाती है। सबसे पहले तो समस्या यह है कि बहुत से लोगों के पास राशन कार्ड ही नहीं होता। राशन कार्ड होने पर भी शहरों में जब गरीब मकान बदलते हैं तो यह
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गुड़ होता गुड़झोली करती..............घुघूती बासूती

गुड़ होता गुड़झोली करतीआटा लेती उधारपर क्या करूँ घी नहीं है।अहा, गुड़झोली! माँ उपरोक्त कहावत तो सुनाती थी किन्तु उन्हें यह पता नहीं था कि उनकी बेटी जीवन भर कहती रहेगी...ठंड होती गुड़झोली करती,ठंड होती रजाई ओढ़ती,ठंड होती आग सेकती,ठंड होती गाजर का हलवा
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सेल फोन कान से चिपकाने के कितने लाभ! आम के आम गुठलियों के दाम!.........घुघूती बासूती

हममें से बहुत से लोग सेल फोन कान से चिपकाए पति, पत्नी, बच्चों, मित्रों से प्रायः परेशान हो जाते हैं। सेल फोन कान पर लगाकर वे जैसे समाधिस्थ हो जाते हैं। फिर आप कुछ बोलने के लिए इर्द गिर्द मंडराते रहिए। बच्चे को स्कूल की फीस माँगनी होती है, बस चाहे छूट
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पुरुष जितना समय स्त्री के वस्त्रों, साज श्रृंगार व पहनावे पर सोचकर व्यर्थ करते हैं यदि अपने पहनावे व रखरखाव पर लगाएँ तो................घुघूती बासूती

तो.. स्वाभाविक है अधिक चुस्त,सुन्दर व स्वस्थ दिखेंगे व महसूस करेंगे। और सबसे बड़ी बात स्त्रियों को भी अधिक भाएँगे। भाएँगे केवल उपर्युक्त कारणों से ही नहीं अपितु अपने अखड़ूस व्यवहार के कारण भी। पुरुषों का एक बड़ा प्रतिशत स्त्रियों की चिन्ता में
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और आप सोचते थे कि मनुष्य और पक्षी ही गृह निर्माण करते हैं!.......घुघूती बासूती

हमारे सोचने से क्या होता है? इन्डोनेशिया की एक औक्टॉपस की प्रजाति तो ऐसा बिल्कुल नहीं सोचती। वे नारियल के कटोरीनुमा खोल इकट्ठा करते हैं। अब अष्टभुज हैं तो अपनी भुजाओं का प्रयोग भी खूब करते हैं। वे समुद्र के तल से मनुष्यों द्वारा फेंके गए नारियल के खो
Dec 24 2009 05:17 PM
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काश, बिना दुर्घटना के सीट बेल्ट पहनना सीख लिया होता !

कार में आगे बैठने पर सीट बेल्ट पहनना आवश्यक होता है। कितना अच्छा होता कि पीछे की सीट पर भी यह आवश्यक होता।मैं लगभग सदा पीछे की सीट पर बैठती हूँ और इसी कारण पेटी नहीं बाँधती थी। सच तो यह है कि पेटी बाँधने का खयाल भी नहीं आता था। शनिवार को मैं पुणे जा
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तलवार से भी तेज धार, सरपत........घुघूती बासूती

मुम्बई आए हुए महीने बीत गए थे। बस केवल अनीता जी से मिलना हुआ था। मुम्बई आने से पहले ही अभय तिवारी व प्रमोद सिंह से बात हुई थी। सोचा था कि यहाँ आने पर मिलना भी हो जाएगा। किन्तु कभी वे लोग व्यस्त तो कभी मैं व्यस्त रही। आखिर उनके आने का कार्यक्रम ५ दिसम
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एलबर्ट पिंटो को गुस्सा क्यों आता है?..........घुघूती बासूती

क्या पता क्यों आता था? मैंने तो यह फिल्म देखी नहीं । परन्तु जब जब किसी के गुस्से के बारे में देखती, सुनती, पढ़ती हूँ तो इस फिल्म का नाम याद अवश्य आ जाता है। गुस्सा आना भी समझा जा सकता है किन्तु गुस्से में पगलाना और किसी को जान से मार देना मेरी समझ से
Dec 17 2009 08:36 PM