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गीतकार की कलम

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16 Jun 2010
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याद-पुरानी यादों की गठरी से

फूलों की पांखुर से फ़िसक रही शबनम सीसाज की मुंडेरों पर थिरक रही सरगम सीसन्ध्या के आँचल में टाँक रही गुलमोहरनिशिगन्धी महकों में लिपट खड़े मधुवन सीयाद कोई सपना बन, आंखों में तैर गईउस पल पर जीवन की एक सांस ठहर गईगंगा की धारा में मांझी के गीतों सीदादी से सुनी
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मन का इकतारा अब केवल

पता नहीं किसका प्रभाव लज्जा के बन्धन खोले हैमन का इकतारा अब केवल तुमही तुमही बोले है ओढ़ी हुई एक कमली की छायायें हो गईं तिरोहितनातों की डोरी के सारे अवगुंठन खुल कर छितरायेबांधे अपने साथ सांस को द्रुत गति चले समय के पहिये उगी भोर के साथ साथ ही संध्या के
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आज लगा अपवाद हो गये

जो अपने से हो न सका है अब तक वह संवाद हो गयेएक अजनबी सी भाषा का अनचाहा अनुवाद हो गये कथाकार तो राजद्वार पर चाटुकारिता में उलझे थेइसीलिये संदेसे जितने नीतिपरक थे गौण रह गयेललित भैरवी के पदचिह्नों पर चल पाने में अक्षम थाबंसी के स्वर सारंगी की ओढ़ उदासी मौन
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तुमने जो दे दी मंजूरी

यादों की पुस्तक के खुल कर लगे फ़ड़फ़ड़ाने वे पन्नेजिन पर अंकित, मेरे प्रस्तावों को तुमने दी मंजूरीपाणि ग्रहण के पावन पल की वह मॄदु बेला याद आ गईनयनों की फुलवारी में जब रंग बिरंगे फूल खिले थेमंत्रोच्चार जगाता था जब अनचीन्ही हर एक भावनाभावों का अतिरेक उमड़ता और
 
राकेश खंडेलवाल
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टिप्पणी ब्लाग ई मेल और पत्तागोभी के रसगुल्ले

भाई साहब, आप हमारे ब्लाग पोअर पधारें और अपनी अमूल्य टिप्पणी से नवाजेंलगभग रोजाना ही कम से कम ऐसे दस- बारह सन्देश ई मेल के बक्से में मिल जाते हैं. मन में एक प्रश्न उठता है क्यों भाई क्यों पढ़ें हम तुम्हारे ब्लाग को ? हम अपनी पसन्म्द के लेख अपने आप नहीं
 
राकेश खंडेलवाल
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बस वाहे बिकते नहीं हैं

भेजते हैं ज़िन्दगी को पल निराशा के निमंत्रणऔर अस्वीकार करने को, पता लिखते नहीं हैं द्वार पर आते लिपट कर भोर की अँगड़ाईयों मेंमुस्कुराते हर दुपहरी धूप की परछाईयों मेंऔर जब सिन्दूर भरती मांग में संध्या लजाकरउस घड़ी सन्देश भरते गूँजती शहनाईयों में रात के पथ
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जो हैं वाहे तुम्हारे होंगेम

जो दर्पण से बिछुड़ गये हैंवे प्रतिबिम्ब हमारे होंगेसपनों से जुड़ सके नहीं तोद्रवित नयन के तारे होंगें संघर्षों की खिली धूप मेंपांव तले खोती परछाईंतपी आग की छाया पीतीचेहरे पर छाई अरुणाईखुली उंगलियां पकड़ न पातींआशा की चादर के कोनेचाहत रहती बन कर रानीकिसी
Feb 15 2010 06:25 AM
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आपका फिर व्यर्थ है कहना लिखूँ मैं गीत कोई

शब्द से होता नहीं है अब समन्वय भावना कारागिनी फिर गुनगुनाये, है न संभव गीत कोईखो चुकी है मुस्कुराहट, पथ अधर की वीथिका कानैन नभ से सावनी बादल विदा लेते नहीं हैंकंठ से डाले हुए हैं सात फ़ेरे सिसकियों नेपल दिवस के एक क्षण विश्रांति का देते नहीं हैटूट बिखरी
 
राकेश खंडेलवाल
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अब् मुस्कान् कहाँ आ पाये

परिणति, जलते हुए तवे पर गिरी हुई पानी की बूँदेमन की आशा जब यथार्थ की धरती से आकर टकरायेअपने टूटे सपनों की अर्थी अपने कांधे पर ढोतेएकाकीपन के श्मशानों तक रोजाना ले जाते हैंचुनते रहते हैं पंखुरियां मुरझा गिरे हुए फूलों कीजो डाली पर अंगड़ाई लेने से पहले झर
 
राकेश खंडेलवाल
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आज मुझे कुछ शब्द चाहिये

जी हाँ मुझको शब्द चाहियेशब्द कि जिनकी संरचना में छुपे हुए हों कोई मानीकोरे खाकों वाले केवल नहीं चाहता मैं बेमानीशब्द कि जिनसे उड़ न पाये गंध तनिक भी वासीपन कीशब्द उतर जायें सीने में,जो प्रतिध्वनि बन कर धड़कन कीमुझको ऐसे शब्द चाहियेशब्द हाँ मुझे शब्द
 
राकेश खंडेलवाल
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वर्ष प्रस्थान

झर गये पत्र सब पेड़ की शाख से तीन सौ साठ के सँग रहे पाँच वे कुछ हरे,पीत कुछ, कुछ थे सूखे हुए पारदर्शी रहे ज्यों बने काँच के कुछ किरण स्वर्ण से थी नहाई हुई और कुछ ओढ़ कर चाँदनी को मिली कुछ चलीं गांव को छोड़ कर, राह में थी भटकती रहीं मंज़िलें न मिली स्वप्न
 
राकेश खंडेलवाल
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माँ

चाहता था लिखूँ शब्द माँ के लिये लेखनी एक भी किन्तु पा न सकी जितनी ममता उमड़ गोद में है गिरी सिन्धु से व्योम तक वह समा न सकी ज़िन्दगी, ज्ञान, उपलब्धियाँ, प्राप्ति सब एक वह ही रही सबका आधार है सरगमों ने समर्पण उसे कर दिया रागिनी कोई भी गुनगुना न सकी शब्द
 
राकेश खंडेलवाल
Dec 29 2009 11:41 AM
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मिला नहीं संदेश तुम्हारा

मिलती हैं ईमेल सैकड़ों हाटमेल, याहू गूगल पर लेकिन जिसको ढूँढ़ रहा वह मिला नहीं संदेश तुम्हारा भर जाता इनबाक्स रोज ही अनचाहे सन्देश प्राप्त कर इसे खरीदो उसे खरीदो, इस सुविधा का लाभ उठा लो ढेर सूचनायें होती हैं सच्ची झूठी और अफ़वाहें जितना मर्जी आये उतना
 
राकेश खंडेलवाल
Dec 29 2009 11:41 AM
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पंकज सुबीरजी- प्रणय वर्षगाँठ शुभ हो

श्वेत पत्रों पे बैठी हुई शारदा, बीन के राग में गीत गाती रहे रक्त वर्णी किये पांखुरी, विष्णु की प्रियतमा पायलें झनझनाती रहे ज्योत्सना की परी आ धरा पे रँगे चान्दनी की किरन से दिवस आपके और रेखा स्वयं जयश्री बन सदा, आपके भाल टीका लगाती रहे   शुभकामन
 
राकेश खंडेलवाल
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तुझे भेंट मे मैं क्या दूँ

ओ अनुरागी तुझे भेंट मे मैं क्या दूँ, तू ही है दाता तेरे सिवा विश्च में जो भी प्राणी है, वो है इक याचक तेरी अनुकम्पा की बारिश से जब भीगा मेरा आँचल सुधा कलश बन गई हाथ में जो थी मेरे जल की छागल दीपित हुईं दिशायें मेरी जिनपर परत जमी थी काली तेरे आशीषों स
 
राकेश खंडेलवाल
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एक तुम्हारा वॄन्दावन

अभिलाषा का दीप जला कर खड़ा हुआ हूँ द्वारे पर अपनी करुणा के पारस से छू मुझको कर दो कंचन जीवन की आपाधापी में भूल गया अपने को भी लेकिन यह मेरी गति तुमसे आखिर कब है अनजानी कर्म प्रकाशित मेरे जितने हैं बस ज्योति तुम्ही से पा व्यथा हदय की तुमसे, तुमसे ही आं
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पंकज सुबीर जी- जन्मदिन शुभ हो

भाल टीका लगाती रहे जयश्री हो कथा सत्यनारायणी आँगना दीप्त हो आपकी राह, हर मोड़ पर और बाधाओं से हो नहीं सामना हर सितारा चले चाल अनुकूल ही औ’ दिशायें सभी आपकी मित्र हों जो क्षितिज पर बनें भोर में सांझ में आपके ही सभी रंगमय चित्र हों द्वार गूँजे सदा प्रीत
 
राकेश खंडेलवाल
Oct 14 2009 07:37 PM
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मौन सभी प्रतिध्वनियां, तब भी

आंखों में चुभने लग जाये काँटा बन कर उगी रोशनीधागा धागा छितरा जाये, सुधियों की रंगीन ओढ़नीजब विराम का इक पल बढ़ कर पर्वत सा उँचा हो जायेजब अपनी खाई सौगंधें पड़ जायें खुद आप तोड़नीउस पल मन का वीरानापन और अधिक कुछ बढ़ जाता हैकोशिश तो करता है स्वर, पर गीत नहीं
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पॄष्ठ कोरा पड़ा मेज पर

पॄष्ठ कोरा पड़ा मेज पर पूछता रह गया शब्द मैने जड़े ही नहींलेखनी एक करती प्रतीक्षा र्रही, हाथ मेरे उठाने बढ़े ही नहींशब्द ने ये कहा गीत कोई लिखूँ,या नये रंग में एक रँग दूँ गज़लभावना का न उमड़ा मगर ज्वार फिर छंद ने शिल्प कोई गढ़े ही नहीं. -0-0-0-0-0-0- स्याही
Aug 17 2009 06:58 AM
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बासठ वर्षों की आज़ादी

हम स्वतंत्र हैं भूल न जायें, एक बार फिर हुई मुनादीबासठ दिये जला कर अपना, जन्म दिवस करती आज़ादीहम स्वतंत्र हैं जहां धरा पर चाहें वहीं बिछौना कर लेंहम स्वतंत्र हैं जहां चाह हो, अंबर के नीचे सो जायेंहम स्वतंत्र हैं, चाहें पानी पीकर अपना पेट पाल लेऔर अगर
 
राकेश खंडेलवाल
Aug 11 2009 07:08 AM
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एक धागा जोड़ रखता

कॄष्ण बन कर गा रहा है आज मेरा मन सुभद्रेहो रहा प्रमुदित निरंतर मन, लिये नेहा तुम्हाराओ सहोदर, वर्ष का यह दिन पुन: जीवन्त करतास्नेह के अदॄश्य धागे, बाँध जो तुमने रखे हैंदीप बन आलोकमय करते रहे हैं पंथ मेराऔर जो अनुराग के पल हैं, सुधा डूबे पगे हैंएक धागा
Aug 05 2009 07:57 PM
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समीर भाई-जन्मदिन शुभ हो

दिन तो है उन्तीस जुलाई और वार हओ बुधउसका जन्मदिवस आया जो कभी न होता क्रुद्धकभी न होता क्रुद्ध, सदा मुस्कान बिखेरेसबके उसके चिट्ठे पर लगते हैं फ़ेरेकोई रहता नहीं बधाई उसे दिये बिनशुभ समीर हो आज जनम का फिर से ये दिन**********************************
 
राकेश खंडेलवाल
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आज फिर बदली हुई हैं केंचुलें

लड़खड़ाते ज़िन्दगी के कुछ अधूरे प्रश्न लेकरचाहना है उत्तरों की माल अपने हाथ आयेकंठ का स्वर हो गया नीलाम यों तो मंडियों मेंआस लेकिन होंठ नूतन गीत इक नित गुनगुनाये मुट्ठियों की एक रेखा में घिरीं झंझायें कितनीऔर है सामर्थ्य कितनी, कौन अपनी जानता हैचक्रव्यूहों
 
राकेश खंडेलवाल
Jul 27 2009 06:50 AM
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अब हैं नई नई उपमायें

बदल रहा परिवेश, बदलता समय, बदलती परिभाषायेंबदल रही हैं कविता में भी जो प्रयुक्त होती उपमायेंतुम अलार्म की घड़ी दूर जो रखती है वैरन निंदिया सेऔर मुझे दफ़्तर जाने में देर नहीं जो होने देतीऔर तुम्ही तो मोहक वाणी जीपीएस के निर्देशन कीकभी अजनबी राहों पर भी जो
Jul 24 2009 05:41 PM
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बरखा- अतीत के झरोखों से

बरखा किसी देवांगना के स्नात केशों से गिरे मोती विदाई में अषाढ़ी बदलियों ने अश्रु छलकाए किसी की पायलों के घुँघरुओं ने राग है छेड़ा किसी गंधर्व ने आकाशमें पग आज थिरकाए उड़ी है मिटि्टयों से सौंध जो इस प्यास को पीकर किसी के नेह के उपहार का उपहार है शायद
 
राकेश खंडेलवाल
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तुमने कहा न तुमको छेड़ा

तुमने कहा न तुमको छेड़ा कभी किसी ने ओ कुरूपिणे इसीलिये छेड़ा है मैने तुमको सीटी एक बजाकर हमदर्दी के कारण केवल कदम उठाया है ये सुन लो अब ऐसा मत करना मेरे गले कहीं पड़ जाओ आकर नहीं छेड़ती सुतली जैसी ज़ुल्फ़ तुम्हारी कभी हवा भी बेचारी कोशिश करती है, लेकिन जुट
 
राकेश खंडेलवाल
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मैं कौन हूँ

पूछते वे रहे नाम मेरा है क्या सोच मैं भी रहा हूँ कि मैं कौन हूँ मैं अधूरी तमन्नाओं की नज़्म हूँ याकि आधा लिखा रह गया गीत हूँ जोकि इतिहास के पृष्ठ में बन्द है पीढ़ियों की बनाई हुई रीत हूँ प्रश्न करता रहा हर नया दिन यही क्या है परिचय मेरा और क्या नाम है
 
राकेश खंडेलवाल
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नाम तुम्हारा आ जाता है

क्या बतलाऊँ कितना रोका है मैने अपना पागल मन लेकिन होठों पर रह रह कर नाम तुम्हारा आ जाता है उड़ती हुई कल्पनाओं ने देखा नहीं क्षितिज पर कोई चित्र, स्वप्न बन कर वह लेकिन आंखों में आ छा जाता है देहरी पर आकर रुक जाती है जब गोधूली की बेला तब सहसा ही हो जाता
 
राकेश खंडेलवाल
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अटक कर बैठ गई मैं संबोधन पर

ऐसा हुआ कि जब गीतकलश पर गीत आया था " लेकिन सम्बोधन पर " तो उसके आधार पर कई मित्रों ने अपने अपने ढंग से कलम चलाई. तो फिर उसी क्रम में दूसरा गीत लिखा गया. दूसरे गीत के बाद से कई मित्रों के तकाजे हुए कि सिक्के का दूसरा पहलू भी दर्शाया जाये. अतएव यह पंक्
 
राकेश खंडेलवाल
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कह गई आकर हवा

केतकी वन, फूल उपवन, प्रीत मन महके सांझ आई बो गई थी चाँदनी के बीज रात भर तपते सितारे जब गये थे सीज ओस के कण, पाटलों पर आ गये बह के कह गई आकर हवा जब एक मीठी बात भर गया फिर रंग से खिल कर कली का गात प्यार के पल सुर्ख होकर गाल पर दहके कातती है गंध को पुरब
 
राकेश खंडेलवाल
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और तुम्हारा एक तकाजा

बुझे बुझे सरगम के सुर हैं थके थके सारे नूपुर हैं शब्दों का पिट गको आतुर है भावों की लुट हई पोटली अनुभूति के कोष रिक्त हैं और तकाजा एक तुम्हारा मैं इक नया गीत लिख डालूँ अक्षर अक्षर बिखर गई हैं गाथाय्रं कुब याद नहीं हैं शीरीं तो हैं बहुत एक भी लेकिन पर
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आखिर कौन कहो तुम मेरे

सुनो जरा सा समय मिले तो इतना मुझे बता जाना तुम क्या कह कर मैं तुम्हें पुकारूँ , आखिर कौन कहो तुम मेरे तुम हो सखा ? निमिष के परिचित ? या राहों के सहचर कोई क्यो आकर के स्वप्न तुम्हारे डाल रहे नयनों में डेरे मेरे दिवस निशा के गतिक्रम, उलझ गये हैं क्यों
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गांव अपना याद करता है

वो जिसकी गौनियों से तुम डले गुड़ के चुराते थे वो जिसके तास के बूरे में तुम फ़ंकी लगाते थे जो तुमसे बांटता था गोलियां चूरन की रोजाना वो जिसकी सायकिल हर शाम को तुम मांग लाते थे कभी तो लौट कर आओगे तुम ये बात करता है तुम्हें वो गांव का पप्पू पंसारी याद करत
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इकानामी

लगा ये चान्दनी हमको जरा धुंधली लगी होने तो पूछा चन्द्रमा क्या रोशनी अपनी लगा खोने बताया बीस प्रतिशत की कटौती चल रही है अब इकानामी का थोड़ा सा असर उस पर लगा होने -०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-० पहले बोले बचत कीजिये, बिना बचत के पार नहीं है अब कह
 
राकेश खंडेलवाल
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पीर के पन्ने पिचहत्तर

पीर के पन्ने पिचहत्तर सांत्वना के शब्द सत्रह एक यह अनुपात लेकर चल रही है ज़िन्दगानी जागती है भोर की पहली किरण की दस्तकों से और चढ़ती धूप के संग पीर की चढ़ती जवानी सांझ को ढलती हुई यह देख कर, ज्यादा निखरती रात में यों महकती है, जिस तरह से रात रानी एक यह
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देह में बज रही बांसुरी

चांदनी में घुलीं भोर की रश्मियां दूध में टेसुओं की घुली पांखुरी केसरी क्यारियों से उठी गंध की आपकी देह में बज रही बांसुरी यों लगा आज रतिकान्त की चाहना शिल्प में ढल के आई मेरे सामने याकि वरदान बन कर संवर आई है कामनाओं के जल से भरी आंजुरी
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रोशनी गुनगुनाने लगी

रोशनी गुनगुनाने लगी चाँदनी के मचलते हुए साज पर रोशनी गुनगुनाने लगी रात भर जो कमल पत्र पर था लिखा इक सितारे ने गंधों भरी ओस से भोर वह गीत गाने लगी जुगनुओं की चमक से गले मिल गई गंध महकी हुई एक निशिगंध की बादलों ने पकड़ चाँद की उंगलियाँ याद फिर से दिलाई
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जब सपने हरजाई निकले

हमने हर आघात ह्रदय पर सहन किया है हंसते हंसते लेकिन टूटा मन किरचौं में, जब सपने हरजाई निकले नैनों की गलियों में हमने, फूल बिछा भेजा आमंत्रण आश्वासन की पुरवाई को किया द्वार का तोरण वन्दन पलकों के कालीन बना कर तत्पर हुए पगतली करने लेकिन इन राहों पर मुड़
 
राकेश खंडेलवाल
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हाथ सरसों के पीले किये खेत ने

तारकों से टपकती हुई ओस में रात भर थी घुली गुनगुनी चांदनी एक नीहारिका के अधर पर टिकी गुनगुनाती रही मुस्कुरा रागिनी स्वर मिला ओस से, पांखुरी पर ठिठक एक प्रतिमा उभरने लगी रूप की चांद का बिम्ब चेहरा दिखाने लगा ओढ़नी ओढ़ कर थी खड़ी धूप की रत्नमय हो सजी वीथिक
 
राकेश खंडेलवाल
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इसीलिये लिखा नहीं गीत नया कोई भी

पीर नहीं उपजी जो तूलिका डुबोता मैं इसीलिये लिखा नहीं गीत नया कोई भी कलियों के वादे तो सारे ही बिखर गये उठे पांव इधर कभी, और कभी उधर गये भावों ने ओढ़ी न शब्दों की चूनरिया एकाकी साये थे जो, वे बस संवर गये फूलों के पाटल पर टँगी नहीं बून्द कोई रजनी में चन
 
राकेश खंडेलवाल