गीत कलश's Image
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13 Jun 2010
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चांदी के वर्कों सी, आशा

सपनों का विस्तार कल्पना से भी जन आगे हो जाताबिन बोले ही मनभावन सुर में मन का वनपाखी गाताअनायास ही खिंच जाती हैं अधरों पर स्मित की रेखायेंअपने दर्पण में अपना ही रूप सिमटने में न आताविदा हुए जाते बचपन की ओर नहीं उठतीं हैं नजरेंअश्वारूढ़ कुंवर के पथ में ही
 
राकेश खंडेलवाल
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ऐसा एक नहीं है बाकी

रीत गये हैं शब्द कोश के सारे शब्द आज लगता हैकरे रूप से न्याय तुम्हारे, ऐसा एक नहीं है बाकीफूल, पांखुरी,भंवरे तितली, रंग लुटाती केसर क्यारीचम्पा, जूही, रजनीगंधा, गंधों में डूबी फुलवारीनदिया लहरें तट का गुंजन और तरंगित झरता झरनानिंदिया रातें सपने
 
राकेश खंडेलवाल
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गहन व्यथाओं का गंगाजल

थके दिवस की नजरें आ जब खड़कातीं सुधियों की साँकलआंजुरि में तब भर जाता है गहन व्यथाओं का गंगाजलरह रह दंश लगाया करतींनागफ़नी उग उग कर मन मेंनयनसुधा बस साथ निभायाकरती है एकान्त विजन मेंसम्बन्धों में बसी निकटता के बिम्बों की बढ़ती दूरीमें उलझा आभास और तो कुछ भी
 
राकेश खंडेलवाल
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बिछे हुए हैं चौंसठ खाने

होठों पर आने से पहले शब्द हुआ करते संपादित अब उन पर प्रतिबन्ध नये कुछ बंधी अपेक्षा लगी लगानेचुन रख लिए उम्र की बगिया में से एक एक कर कर कर अनुभव के सांचों में ढल कर जितने फूल मिले क्यारी में गुच्छे बना शब्द में ढाले और उन्हें सरगम में बांधाकिन्तु रहे वे
 
राकेश खंडेलवाल
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तूलिका पी गई रंग खुद ही सभी

सूख निर्झर गये भावना के सभी, भाव उमड़े नहीं छंद में जो ढलेंकल्पना की डगर के पथिक थक गये, पांव बोझिल हुए ये न संभव चलबांध कर थे कतारें खड़े अक्षरों का नहीं थाम पाई कलम हाथ भीछन्द के पास भी शेष कुछ न रहा, सिर्फ़ यह हाथ अपने निरतर मलेंचाह तो थी कलम की उकेरे
 
राकेश खंडेलवाल
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कल्पनातीते

वह अधर के कोर पर अटकी हुई सी मुस्कुराहटवह नयन में एक चंचल भाव पलकें खोलता साभाल का वह बिन्दु जिसमे सैकड़ों तारे समाहितकंठ का स्वर शब्द में ला राग मधुरिम घोलता साकल्पनातीते ! मेरी सुधि में तुम्हारी छवि मनोहरलेख बन कर इक शिला का हर घड़ी है साथ मेरेस्वर्णमय
 
राकेश खंडेलवाल
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अभी तलक भी घुली हुई हैं

तुम्हारी नजरें जहाँ गिरी थीं, कपोल पर से मेरे फिसल करहमारी परछाईयां उस जगह में अभी तलक भी घुली हुई हैंहुई थी रंगत बदाम वाली हवा की भीगी टहनियों कीसजा के टेसू के रंग पांखुर पर, हँस पड़ी थी खिली चमेलीमहकने निशिगंध लग गई थी, पकड़ के संध्या की चूनरी कोऔ बीनती
 
राकेश खंडेलवाल
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लौट आये स्वर अधर के

बन्द द्वारे से पलट कर लौट आये स्वर अधर केदॄष्टि के आकाश पर आकर घिरीं काली घटायेंथाम कर बैठे प्रतीक्षा को घने अवरोध आकरलीलने विधु लग गया है आज अपनी ही विभायेंकिन्तु मैं दीपक जला कर आस की परछाईयों मेंअधलिखी कोई रुबाई गुनगुनाता जा रहा हूँधुल गये अक्षर ह्रदय
 
राकेश खंडेलवाल
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माँ के चरणों में

विश्वासों के दीप जला कर भरे प्राण में सघन चेतनाबने सुरक्षा कवच, पंथ में हरने को हर एक वेदनामिट्टी के अनगढ़ लौंदे से प्रतिमा सुन्दर एक संवारेसंस्कृतियों के अमृत जल से बने शिल्प को और निखारेचारों मुख से सृष्टि रचयिता ने किसकी महिमा गाई थीतन पुलकित मन
 
राकेश खंडेलवाल
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जरा सा गुनगुनाया हूँ

लिखे हैं गीत मैने भावना को शब्द में बोकरलिखे हैं अस्मिता को हर सिरजते छन्द में खोकरलिखे हैं कल्पना के पक्षियों के पंख पर मैनेलिखे हैं वेदना की गठरियों को शीश पर ढोकरमगर जो आज लिखता हूँ नहीं है गीत वह मेरातुम्हारी प्रीत को बस शब्द में मैं ढाल लाया हूँरंगा
 
राकेश खंडेलवाल
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लिखने से क्या होगा हासिल

 सम्भव तो था लिख देता मैं गीत नये नित दस या बारहप्रश्न उठा लेकिन यह मन में, लिखने से क्या होगा हासिलअक्षर चार वाहवाही के, और शब्द कुछ " खूब लिखा है ""अद्भुत है","उपमायें अनूठीं""शिल्प रचा है तुमने सुन्दर"भावों की कड़ियां गूंथी हैं सुघड़ तरीके से माला
 
राकेश खंडेलवाल
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उत्तीर्ण होता ही रहूँगा

लो परीक्षा चाहे जितनी तुम मेरे विश्वास की प्रिय है अडिग विश्वास मैं उत्तीर्ण होता ही रहूँगा अर्चना के दीप की लौ चाहे जितनी थरथराये पंथ हर पग पर स्वयं ही सैंकड़ो झंझा उगाये द्रष्टि के आकाश पर केवल उमड़ते हों बगूले और चारों और केवल चक्र वायु सनासनाये डगमगा
 
राकेश खंडेलवाल
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चांद किरन से की मनुहारें

कलासाधिके तेरे नयनों से फिसली इक दॄष्टि किरन नमेरे मन के अवसादों में भर दी है उमंग फ़ागुन कीअंबर ने भर कलश तिमिर के जितने ढुलकाये संध्या मेंउनका तम रिस रिस कर रंगता था मेरे मन की दीवारेआशा के जुगनू करवट ले लेकर उनमें रह जाते थेतोड़ा करती थी दम पल पल चांद
 
राकेश खंडेलवाल
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बदलते मौसम में

उड़ी हवा में गन्ध, टूटने लगे लगे प्रतिबन्ध, मचलने लगे होंठ पर छन्द बदलते मौसम मेंजगी ह्रदय में प्रीत, सपन में आया मन का मीत, सुनाता हुआ नये कुछ गीत बदलते मौसम मेंचेहरे पर से हटा एक चादर को जागा कई दिनों से परछाईं के घर में जा था दिन सोयाहुई ओस की मद्दम
 
राकेश खंडेलवाल
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दीप बन जलता रहा हूँ

दृष्टि को अपनी उठा कर तुम मुझे देखो न देखोोमैं तुम्हारे द्वार पर बन दीप इक जलता रहा हूँनींद की चढ़ पालकी तुम चल दिये थे जब निशा मेंमैं खड़ा था उस घड़ी बिसरे सपन की वीथियों मेंऔर तुम आलेख लिखते थे नये दिनमान का जबमैं रहा संशोधनों का चिह्न बन कर रीतियों मेंएक
 
राकेश खंडेलवाल
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गीत में जो ढल रहा है, मैं स्वयं ही हूँ अनावॄत

घिस गई  जो पिट गई जो बात वह गाता नहीं हूँगा चुके जिसको हजारों लोग, दोहराता नहीं हूँभाव हूँ मैं वह अनूठा, शब्द की उंगली पकड़ करचल दिया जो पंथ में तो लौट कर आता नहीं हूँ गीत में जो ढल रहा है, मैं स्वयं ही हूँ अनावॄतकोई कॄत्रिम भाव मैने
 
राकेश खंडेलवाल
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हिना की रंगत हथेलियों पे

तुम्हारे अधरों की सिहरनों ने लकीर हाथों की जब से छू लतभी से रंगत हिना की गहरी हुई है मेरी हथेलियों पेनयन के दर्पण में आ के संवरीं हजार झीलें उषा की झिलमिकपोल पर आ लगीं थिरकने सिन्दूर घोले हुए विभायेंअधर कीथिरकन में थरथरा कर अटकती वाणी लगी है खोनेलगीं
 
राकेश खंडेलवाल
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बादल का टुकड़ा निचोड़ कर.

दॄष्टि तुम्हारी चूम गई थी आकर जहाँ नयन को मेरेयह पागल मन अब भी अटका हुआ उम्र के उसी मोड़ परताजमहल की परछाईं में बतियाता था मैं लहरों सेअधलेटा, सर टिका हथेली पे अपनी मैं अलसाया सागंध भरे बादल का टुकड़ा आया एक पास था मेरेजैसे गीत हवा का गाया मौसम ने हो
 
राकेश खंडेलवाल
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मैं नया इक गीत लिख दूँ आज मुझ से कह रहा है

जाये रच परछाईयों के पांव में भी जब महावरधूप की अंगनाई में पायल हवा की झनझनायेदोपहर की थाम उंगली सांझ करती नॄत्य हो जबवीथिका में गंध की सारंगियों पर फूल गायेउस घड़ी लगता तुम्हारा चित्र मेरे सामने आमैं नया इक गीत लिख दूँ आज मुझ से कह रहा हैकह रहा परवाज़ दूँ
 
राकेश खंडेलवाल
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गीत कलश से छलकी तीन सौ पचासवीं बूँड--आपके सामने

जिसे देख कर के अजन्ता बनी थीमचलती हुई इस हवा के इरादमेरे हमनशीं जो अगर नेक होतेनहीं छेड़ती फिर ये ज़ुल्फ़ें तुम्हारीन अठखेलियाँ चूनरी से ही करतीये सोई हुई थी कहीं झाड़ियों मेंकिसी फूल की पंखुरी ्में सिमट कजगा कर गया एक खुशबू का झोंकातुम्हारे पगों से चला
 
राकेश खंडेलवाल
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चाँदनी की धुली हर किरन पी गये

धूप की डोरियों से बन्धे थे प्रहरथीं घड़ी की सुई डगमगाती रहींबन बिखरती रही आज की झोंपड़ीआस तिनके पे तिनका सजाती रहीकल जो आया ढला आज में, खो गयाफिर प्रतीक्षा संवरने लगी इक नईदांये से बांये को, बांये से दांये कोमथ रही ज़िन्दगी, इक समय की रईजो बिखर कर गिरा भोर
 
राकेश खंडेलवाल
Feb 24 2010 06:09 AM
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जो कहानी लिखी थी गई रात भर

थी धुंधलके मे रजनी नहाये हुएचांदनी चांद से गिर के मुरझाई सीआंख मलती हुई तारकों की किरणले रही टूटती एक अँगड़ाई सीकक्ष का बुझ रहा दीप लिखता रहासांझ से जो शुरू थी कहानी हुईलड़खड़ाते कदम से चले जा रहीलटकी दीवार पर की घड़ी की सुईफ़र्श पर थी बिछी फूल की
 
राकेश खंडेलवाल
Feb 22 2010 06:34 AM
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मैं हूँ उलझा हुआ अभी तक

तुमने जो सम्बोधन देकर मुझे पुकारा खंजननयननेबस उस के ही सन्दर्भों में, मैं हूँ उलझा हुआ अभी तकफ़िसला हुआ अधर की कोरों से, चढ़ कर स्वर की लहरी परथाम हवाओं के झोंके की उंगलियाँ जो मुझ तक आयामन में उमड़ रहे भावों की ओढ़े रंग भरी दोशालाजिसे सांझ की परछाईं ने काजल
 
राकेश खंडेलवाल
Feb 15 2010 06:28 AM
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कभी कभी गुनगुना लिया है

जो भी आधा और अधूरा शब्द मिला मुझको राहों मेंमैने उसको पिरो छन्द में कभी कभी गुनगुना लिया हैजितनी देर टिके पाटल पटपके हुए भोर के आंसूउतनी देर टिकी बस आकरहै मुस्कान अधर पर मेरेजितनी देर रात पूनम की करती लहरों से अठखेलीउतनी देर रहा करते हैंआकर पथ में घिरे
 
राकेश खंडेलवाल
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गीत कोई कलम से झरा ही नहीं

प्रार्थना कर थकी छन्द की भूमिकामुक्तकों ने कई बार आवाज़ दीदोहे दस्तक लगाते रहे द्वार परसोरठे बन गये शब्द के सारथीचन्द चौपाईयाँ चहचहाती रहींगुनगुनाती रही एक गम की गज़लथे सवैये प्रतीक्षा सजाये खड़ेबँध गया लय में अतुकान्त भी एक पलभावना सिन्धु सूखा भरा ही
 
राकेश खंडेलवाल
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केवल एक तुम्हीं हो कारण

सरगम की सीमा ने अपनी सीमा  तुम्हें देख कर ,मानीकहा आठवें सुर की संरचना का एक तुम्ही हो कारण रूप न कर पाई वाणी जब सातों सुर लेकर के वर्णितशब्दों के अनथके प्रयासों ने केवल असफ़लता पाईलहरों ने रह रह कर छेड़ी जलतरंग की मधुर रागिनीजो कि तुम्हारे
 
राकेश खंडेलवाल
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माँ शारदा के चरणों में सादर नमन

श्वेत पत्रों से पंकज के फिसली हुई ओस की बूँद ढल स्याहियों में गई बीन के तार के कम्पनों से छिटक एक सरगम आ सहसा कलम बन गई फिर वरद हस्त आशीष बन उठ गया बारिशें अक्षरों की निरंतर हुईं शब्द की छंद की माल पिरती हुई आप ही आप आ गीत तब बन गई.माँ  शारदा के
 
राकेश खंडेलवाल
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आँगन हो गया पराया

जकड़े हुए हमें अपनी कुंडलियों में यादों के विषधररजनी गंधा जहां महकती थी आँगन हो गया परायाजीवन की सीमाओं पर अपौधे उगे नागफ़नियों केसिंचित किये दूध से हमनेउपजे होकर फ़ेनिल सपनेलहरें उमड़ी निगल गईं हैंनावें सब कोमल भावों कीऔर तीर हैं फ़न फ़ैलायेतत्पौर हुए साध को
 
राकेश खंडेलवाल
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हर पल साथ रहे तुम मेरे

ओस में डूब कर फूल की पंखुड़ी भोर की इक किरण को लगी चूमनेगंध फिर तितलियों सी हवा में उड़ी, द्वार कलियों के आकर लगी घूमनेबात इतनी हुई एक पत्ता कहीं आपके नाम का स्पर्श कर आ गयायों लगा आप चलने लगे हैं इधर, सारा उपवन खुशी से लगा झूमने  
 
राकेश खंडेलवाल
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भाषा नयन की लिख रहा हूँ

 चाहता हूँ मैं लिखूँ कुछ प्रीत के नूतन तरानेभाव में डूबे हुए कुछ बिम्ब ले लेकर सुहानेकिन्तु वर्णन न्यायसंगत हो नहीं पाता तनिक भीशब्द जितने पास मेरे, हो चुके हैं सब पुरानेइसलिये अब शब्द बिन भाषा नयन की लिख रहा हूँआईना हूँ आपको अपने सरीखा दिख
 
राकेश खंडेलवाल
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सात पग साथ मिल तुम मेरे जो चले

धूप के चन्द छींटे मिलें साध येएक लिपटी हुई थी सदा ही गलेमिल गई दोपहर हमको बैसाख कीसात पग साथ मिल तुम मेरे जो चलेचाँदनी का पता पूछते पूछतेरात आती रही रात ढलते रहएक भोली किरण पंथ को भूल कर, आ इधर जायेगी आस पलती रहीबन के जुगनू सितारे उतरते हुए राह को दीप्त
 
राकेश खंडेलवाल
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इस नये वर्ष में

चाँदनी से बना अल्पना द्वार परइस नये वर्ष का आओ स्वागत करेंआस सपने नये आस के रच रहीकोई क्रम फिर न दुहराये गत वर्ष कावो अनिश्चय, वो संशय की काली घटाहर निमिष यों लगा युद्ध का पर्व थाअर्थ की नीतियों की जड़ें खोखली फिर न रह पायें बीते दिनों की तरहदीप विश्वास
 
राकेश खंडेलवाल
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क्या भूलूं क्या याद रहा है

दोछत्ती पर रखी हुई थी एक टोकरी यादों वाली आज सफ़ाई करते करत झाडन उसको जरा छू गया बीते हुए दिवस तितली ब सजे कक्ष की दीवारों पर कल का खर्च हुआ हर इक पल फिर से संचित आज हो गया और लगे नयनों में तिरने बरगद,पीपल, वे चौपालें वे बिसायती वे परचूनी औ; लकड़ी कोयल
 
राकेश खंडेलवाल
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उठ आये हैं प्रश्न हज़ारों

तुमने मुझसे कहा लिखूं मैं गीत तोड़ कर सब सीमायें मैं लिखने बैठा तो मन में उठ आये हैं प्रश्न हज़ारों क्या मैं लिखूं न समझा जाये जिसे एक परिपाटी केव आंसू क्रन्दन मुस्कानें या उपज रही पीड़ा की बातें प्रीतम के भुजपाशों के पल, दृष्टि साधना के मोहक क्षण या फि
 
राकेश खंडेलवाल
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सम्भव नहीं कल्पना को अब

संभव नहीं रहा लिख पाऊँ गीत नया कोई शतरूपे क्योंकि कल्पना के पाखी के पंख किसी ने नोच लिये हैं ये बहेलिया वक्त न जाने क्या मंतव्य लिये आया है कैद कर रहा अरमानों के पल पल पंछी कई, जाल में एक साध ज्यों करवट लेकर आतुर होकर पंख तौलती उसे बांध कर रख लेता है
 
राकेश खंडेलवाल
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गीत रागिनी आ गाती है

स्वप्न तुम्हारे हो जाते हैं जब आकर पलकों में बन्दी तब संभव है कहाँ दूसरा चित्र नयन में बनने पाये नाम तुम्हारा ढल जाता है जब हर अक्षर के सांचे में तब फिर गीत दूसरा कैसे फिर मेरा पागल मन गाये ओ परिभाषित तुमसे ही तो सब सन्दर्भ जुड़े हैं मेरे मेरे चे
 
राकेश खंडेलवाल
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किसी ने कहा ओ पिया

रोशनी के चिबुक पे डिठौना लगा रात जा छुप गई चाँदनी की गली ओस की बून्द से बात करते हुए मुस्कुराने लगी इक महकती कली रश्मियां जाग जर नॄत्य करने लगीं गीत गाने लगी गुनगुनाकर हवा पूछने लग गईं क्यारियाँ बाग में क्या हुआ क्या हुआ क्या हुआ क्या हुआ नीम की शाख
 
राकेश खंडेलवाल
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लिखता हूँ प्रिय गीत तुम्हारे

परिभाषित जो हुआ नहीं है, शब्दों में ढल भाव ह्रदय का मैं उसमे ही डूबा डूबा लिखता हूँ प्रिय गीत तुम्हारे ढलती हुई निशा ने बन कर कुन्तल की इक अल्हड़ सी लट जो कुछ् कहा अधर पर आकर छिटकी ऊषा की लाली से अँगड़ाई ले उठीं हुई गंधें कपोल की पंखुड़ियों से जो अनुबन्
 
राकेश खंडेलवाल
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रच गई है स्वप्न मेंहदी से

जब तुम्हारे चित्र आकर छू गये हैं दॄष्टि का नभ रच गई है स्वप्न मेंहदी से नयन की तब हथेली चेतना की वीथियों में पांव रखती छवि तुम्हारी देहरी को लांघती है जिस तरह दुल्हन नवेली और रँग जाती कई रांगोलियाँ सहसा ह्रदय में ड्यौढ़ियों पर दीप जलने लग गये दीवालियो
 
राकेश खंडेलवाल
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गीत कैसे लिखूं

तीलियां घिसते घिसते थकीं उंगलियां वर्त्तिका नींद से जाग पाई नही शब्द दस्तक लगाते रहे द्वार पर सुर ने कोई गज़ल गुनगुनाई नहीं आपका है तकाजा रचूँ गीत मैं चांदनी की धुली रश्मियों से लिखे गीत कैसे लिखूं आप ही अब कहें जब कि पायल कोई झनझनाई नहीं ************
 
राकेश खंडेलवाल