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चांदी के वर्कों सी, आशा
सपनों का विस्तार कल्पना से भी जन आगे हो जाताबिन बोले ही मनभावन सुर में मन का वनपाखी गाताअनायास ही खिंच जाती हैं अधरों पर स्मित की रेखायेंअपने दर्पण में अपना ही रूप सिमटने में न आताविदा हुए जाते बचपन की ओर नहीं उठतीं हैं नजरेंअश्वारूढ़ कुंवर के पथ में ही
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Jun 14 2010 07:30 AM


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