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RHYTHM OF LIFE...listen it from heart.

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21 May 2010
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और उस पे ज़िद.. ज़िंदा रहने की...

अकेलापन... उदासी... बेबसी....और उस पे ज़िद... ज़िदा रहने की....थका हुआ तन... थका हुआ सा मन...हर संवेदना.. है शून्य सी...और उस पे ज़िद... ज़िंदा रहने की....ना दुख का एहसास.. ना सुख की चाह...सारी इच्छायें... बैरागन - जोगन सी...और उस पे ज़िद.. ज़िंदा रहने
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’अमर्यादित’...

बस देह से देह के घर्षण से...कोई अपवित्र नहीं हो जाता...यूं लुट नहीं जाती ’इज्जत’ किसी की..यूं नहीं हो जाता कोई ’अमर्यादित’...तुमने किसी ’मर्यादा’ का उल्लंघन किया नहीं...तुमने नहीं किया किसी सीमा का अतिक्रमण...सीमा लांघी हैं... किसी और ने अपनी मर्यादाओं
Feb 10 2010 11:28 PM
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जुनून..

तन्हाई दिल में घर किये बैठी है....अंघेरे मकां का खौफ़ नहीं मुझको....आहिस्ता - आहिस्ता दर्द बरसता है....टूटी छत से ज्यों पानी रिसता है....मेरी नसों में लावा बहता है...पैरों तले अंगारों का खौफ़ नहीं मुझको.....रोम - रोम मेरा दिये सा जलता है...अस्थियों का
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आफ़ताबी आगोश...

रात की खुमारी को....जब सुबह.. आफ़ताब ने आगोश में भर लिया....नम के होठों के फूल...गर्म सीने पे हमने खिला दिये....आफ़ताबी आगोश... मुझे कसता रहा...मैं बर्फ़ानी नदी सी पिघलती रही....पैरों तले.. ज़मी बहने लगी...ज़िस्म धूप सा जलता रहा...ख्वाब का कंबल ओढे... दो
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मेघा तुम अभी मत बरसना....

अभी गीला है मेरे घर का आंगन... अभी नम है वो लीपी हुई मिट्टी... बह जायेगी... मेघा तुम अभी मत बरसना..... रात जो छत पर डाली थी... वो खटिया..वो चटाई.. अभी तक वहीं पड़ी है... भींग जायेगी.... मेघा तुम अभी मत बरसना.... आंगन में सूखते वो कपड़े... अभी सूखे नहीं
Dec 29 2009 11:49 AM
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एक उत्तर : मौलिकता

कुछ दिनों पहले मैंने एक कविता अपने ब्लोग पर पोस्ट की थी "वो हंसी सिर्फ़ लिख सकता है" .. और वो पसंद भी की आप लोगों ने.. वो कविता मैंने जिनकी प्रेरणा से या यूं कहूं जिन पर लिखी थी.. उन्होंने.. उस कविता को थोड़ा रूपांतरित कर बड़ा सुंदर जवाब दिया है. मैं उस
Dec 29 2009 11:49 AM
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रात भर सोई नहीं मैं....

रात भर सोई नही मैं... सोचती तुमको रही... चांदनी खिड़की पे खड़ी थी... मैं खिड़की पे बैठी रही... चांद से बातें हुई... रोशन सितारों को तका... नींद पास में थी... पलकें मगर झपकी नहीं... मुझसे नाराज हैं.... चादर, बिस्तर, तकिये मेरे... उनको सोना है...मगर.. मैं
Dec 29 2009 11:49 AM
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वो हंसी सिर्फ़ लिख सकता है....

मैंने उसे कई बार लिखते देखा है... हाथ में कलम लिये.. सर झुकाये.. शब्दों को शक्ल देते हुये... और ये भी की वो सिर्फ़ खुशी लिखता है.. एक दिन मैंने कहा - अच्छा लगता है... तुम इतने खुश हो.. खुशी लिखते हो.. हंसी बांट सकते हो... उसने अपनी नज़रें उठाई.. कलम रो
Dec 29 2009 11:49 AM
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हे भारत मां!... मैं धन्य-धन्य.....

ये धरती कितनी सुंदर.. इतना स्नेह इसके भीतर.. जैसे मां का आंचल... हे भारत मां! ... मैं धन्य-धन्य तेरी बनकर.. तेरी हवा बहती मेरी सांसों में.. तेरे ही धान्य से हुआ पालन.. ये मेरी देह.. सब तेरा ही... बहता है जो नसों में लहू बनकर.. हे भारत मां!... मैं धन्
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हां वो एक वेश्या है...... और तुम????

तुम उसे 'वेश्या' कहते हो... क्योंकि उसने बेची है..अपनी देह.. अलग-अलग लोगों के साथ.. हर बार संबंध बनाये हैं उसने... उसे हक नहीं समाज में..रहने का.. सम्मानित कहलाने का.. वो अलग है..तुम्हारी बहू-बेटियों से.. क्योंकि वो जैसे जीती है... वो जीवन नरक है...
Dec 29 2009 11:49 AM
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"बांझ कौन है ?"

शादी के दो वर्ष बीत गये.... और वो 'मां' नहीं बन पाई... वंश को एक चिराग ना दे पाई.... आस-पड़ोस, नाते-रिश्तेदारों में.... कानाफ़ूसी,सुगबुगाहटें होने लगीं.. बांझ , निपूती, अपशकुनी जैसे.. अलंकारों से उसे नवाजा जाने लगा... केवल ससुराल वालों ने ही नहीं... अब
Dec 29 2009 11:49 AM
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ढाई आखर मेरे प्रेम के सांवरे.....कब समझोगे तुम...

ढाई आखर मेरे प्रेम के सांवरे ....कब समझोगे तुम... समझ गयी ये दुनिया सगरी... पर कब समझोगे तुम.... तुम बिन मैं भयी जोगन... कुछ रूक के.. कुछ थम के... हर पल बरसे... मेरे नयन.... सब कहने लगे मुझे... दीवानी... पर जाने कब.... कुछ कहोगे तुम.... ढाई आखर मेरे
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तुम ठूंठ नहीं हो....

मत कहो स्वयं को ठूंठ तुम... क्योंकि मैं जानती हूं.... तुम ठूंठ नहीं हो.... तुम भी एक छायादार.... घने पेड़ हो.... बस वक्त की कड़ी धूप... और गरम हवाओं के थपेड़ों ने... सुखा दिया तुम्हारी नमी को.... और तुमने अपने पत्ते गिरा दिये... और बन गये तुम छायाविहीन.
Dec 29 2009 11:49 AM
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बारिश.... अजीब सी....

कई दिनों बाद आज फ़िर बारिश हो रही है..... काले घनघोर बादल छाये हुये हैं.... और अनवरत हो रही है बारिश.... बहुत तेज नहीं... पर बहुत मद्धम भी नहीं..... यूं तो मुझे बारिश बेहद पसंद है.... बारिश होते ही.... मेरा मन करता भींग जाउं... आसमान से गिरती बूंदों क
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क्षितिज के उस पार.............

उनका मिलना एक अजीब इत्तफ़ाक था... शायद कभी सपने में भी सोचा नहीं होगा दोनों ने की किसी से यों भी मिलना होगा....... पर मिले तो सही... मिलना तय था मानो.... पहली बार मिल के लगा ही नहीं की.... पहली बार ! मिले हों......... क्या सचमुच पहली बार मिले थे? हां
Dec 29 2009 11:49 AM
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तुम से ...

रात अमावस की है.... मगर याद की वादी में.... तेरे प्यार का चांद खिला है.... उसी चांदनी से ... भीगा मेरा मन.... रूप सुनहरा मेरा खिला है... तेरे ही प्रेम का सोलह- श्रृंगार है... तुझे छूकर ही... ’मन’ बहका-बावरा हुआ है.... नैना -चंचल.. ठहरे हैं तेरी राह प
Dec 29 2009 11:49 AM
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एक बार तुम भी..............!!!!

एक रात अचानक... नींद से उठो तुम... याद आये तुम्हें मेरी.... हर तरफ़ मुझे ढूंढो तुम... ना खुद का... ना वक्त का होश हो तुम्हें... मैं तुम्हारी नहीं... ये भी भूल जाओ तुम... बस मेरी ही मेरी तड़प... बस मेरी ही मेरी याद... और बेचैन रहो तुम.... तुम पुकारो मुझ
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एह्सास की तलाश......

साथ होकर भी जाने क्यूं.... तन्हाई का एह्सास है... हाथ थामे रहता है कोई... फ़िर भी लगता खाली हाथ है... जाने कैसा सूनापन गहराया..... चलती हूं जिस भीड़ में.... इंसानों का नहीं.... बस परछांईयों का साथ है..... 'सच'... में जीने को जाने क्यूं.... दिल करता ही
Dec 29 2009 11:49 AM
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सवाल?????? जिंदगी???????जाने क्या????

रूके हैं कुछ खारे से पल.... पलकों की दहलीज़ पर... देते हैं दस्तक हर पल.... कैसे दूं इज़ाज़त.... ज़मीन नहीं पैरों तले... साया नहीं आसमां का... सर पर.. जाने किस ज़मीन पर... चलते हैं कदम... दिन कभी ढलता नहीं.... ना कभी होती है सहर... जाने किस घड़ी की... सूईयो
Dec 29 2009 11:49 AM
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कुछ इस तरह... जिंदगी मिली मुझसे...

कुछ इस तरह... जिंदगी मिली मुझसे... जैसे मिला हो कोई.... अजनबी...अचानक.. यूं ही... साथ निभाये दो पल का... और दूर चला जाये.... कुछ इसी तरह.... जिंदगी मिली मुझसे.... कहा कुछ नहीं....उसने... बस दो निगाहें..उसकी... करती रही हजार सवाल... खामोशी मेरी कहती र
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वादा....

समंदर.... साहिल... बलखाती मौजें... भीगे अलसाये पत्थर.. सिंदूरी शाम.... थका-थका सा सूरज.. लौटते पंछी.... गीली पोली सी रेत... धंसते हैं तेरे-मेरे कदम... बनाते हैं निशां... हम हाथ थामे.. चलते हैं.. नंगे पैर... आगे... कभी.. जब.. पीछे मुड़ के देखती हूं...
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बस यूं ही..........

ख्वाब आंखों में लिये... रतजगे करता है कोई... पूछती हूं... बंजर हुई नींदों की वजह... कहता है.. बस यूं ही......... कभी बे-साख्ता शेर.. कहे जाता है.. कभी ग़जलें लिखता है... पूछती हूं.. हवाओं पे सज़दे की वजह.. तो.. बस यूं ही... मेरा दीदार किया करता है...
Dec 29 2009 11:49 AM
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मेरी जान भी बस वहीं से रूखसत होती है.....

यूं किसी चीज़ से डर लगता नहीं मुझको.. बस एक तेरी नज़रों से दहशत होती है... किसी और की ख्वाहिश अब नहीं मुझको.. पर जाने क्यों तुझसे मोहब्बत होती है... सारे जिस्म को मेरे अब कोई एह्सास होता नहीं... लेकिन तेरे नाम से दिल में अब भी हरकत होती है... मैंने तो
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मैं भी अब जीना जानती हूं.....

एक लड़्की ..हूं मैं... बंधनों से बंधी हूं... जन्म से ही... बेटी..बहन.... ये सुन-सुन बड़ी हुई.. राखी के बंधन बांधे मैंने..... पर जाने कितने बंधनों में मै जकड़ी गई.... ईज्ज्त... आबरू.... हया..शर्म..... जाने कितने परदों से मुझे ढका गया...... बाली.... झुमके
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खाली - खाली दिल...

खाली - खाली दिल.... कभी - कभी... भर आता है.. आंख में.... पलकें झपकती हैं जब... चुभता है.. ख्वाब का .... कोई टुकड़ा आंख में... खिला करते होंगे फूल... फिर बहार के आने पे... टूट के कब... जुड़ा है... कोई पत्ता... फिर... शाख से..... रेत के घरौंदे... टूटे...
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खोया सा.. एक रिश्ता..

एक रिश्ता तेरा - मेरा.......एक रिश्ता कुछ पूरा.... कुछ अधूरा......कुछ तुम सा... कुछ मुझ सा...एक रिश्ता... हम सा....यादों के नर्म लिहाफ़ में लिपटा....तेरी मेरी उंगलियों में उलझा...कभी सुबह की करवटों में.....कभी शाम के झुरमुटों से...हर कोने से पुकारता... एक
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कहो ना...

क्या सुनाई देती है.... तुम्हें मेरी आवाज़ आज भी...कहीं हवा में घुली- घुली सी....जब गुजरते हो तुम... यादों के गलियारे से.. क्या मेरी परछांईयां... तुम्हें वहां आज भी मिलती है...कहो ना... क्या आज भी शामिल है कहीं..मेरा संग तुम्हारी राह में..... क्या अब भी...
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Dard..............

जाने कैसा दर्द है... की मुझे दर्द का एह्सास नहीं.. जले ज़ख्मों पे नमक कौन छिड़कता है... जिस्म छिलने से मुझे कहां दर्द होता है... मेरे रिसते जख्मों को मरहम की तलाश नहीं.... सूनी वीरान आंखें... अब बंजर हो चली हैं.. होने दो अब दर्द की बारिश.... ज़िंदा रहने
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RHYTHM OF LIFE...listen it from heart.

सोचती हूं तुम्हें.... की कैसे हो तुम.... अजीब सवाल है न... जब तुम्हें महसूस करती हूं.... एक अजीब सा सुकून..... एक अजीब सी कशिश.... दौड़ती है... मेरी रगों में..... लगता है क्या मेरे दिल में... बसे अहसासों जैसे हो तुम..... जाने कैसे हो तुम........ सांवल