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एक शाम मेरे नाम

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14 Jun 2010
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आप आए तो खयाल ए दिले नाशाद आया........

कल जगजीत सिंह की गाई एक ग़ज़ल की तलाश में यूट्यूब पे निकला था कि भटकते भटकते ये गीत सामने आ गया। अब इसे सुने एक अर्सा हो गया था। दोबारा सुना तो इसकी गिरफ़्त से निकलना मुश्किल था। आजकल कितने गीतों में ये माद्दा है कि वो पाँच मिनट के अंदर ही दर्शकों को
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साली से जब पूछनीं, काहो दूल्हा कतहूँ सेट भइल, कहली उ मुस्कात, खोजाइल बाटे इंटरनेट पर !

मनोज भावुक की लिखी किताब 'तस्वीर जिंदगी के' केबारे में पिछली पोस्ट में मैंने आपको बताया था कि इस किताब की अधिकांश ग़ज़लों में उनके आस पास का समाज झलकता है। ज़ाहिर है कोई भी ग़ज़लकार अपनी जिंदगी से जो अनुभव समेटता है वही अपनी ग़ज़लों में उड़ेलता है।खुद
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मनोज भावुक का पठनीय भोजपुरी ग़ज़ल संग्रह 'तस्वीर जिंदगी के' : आदमी के स्वप्न के खेल कुछ अजीब बा,जी गइल त जिंदगी, मर गइल तो ख्वाब हऽ

भोजपुरी में ग़ज़लों की किताब, सुनने में कुछ अज़ीब लगता है ना ? मुझे भी लगा था जब दो महिने पहले हिन्द युग्म के संचालक शैलेश भारतवासी ने दिल्ली में मुलाकात के दौरान इस पुस्तक हाथ में पकड़ाते हुए कहा था कि इसे पढ़िएगा जरूर आपको पसंद आएगी। वेसे तो शैलेश ने
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गोपालदास 'नीरज' का जीवन दर्शन : उनके चार विचारों के साथ !

जिंदगी को देखने और महसूस करने के हमारे मापदंड समय और हमारी सोच में हो रहे निरंतर विस्तार से बदलते रहते हैं। वक़्त से आगे देख पाने की सोच, एक आम मानव की प्रकृति में नहीं है। दरअसल हमारे अपने जीवन में जो घटित होता रहता है उसे ही जीवन का सच मानने के लिए हम
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गीतकार राजा मेंहदी अली खाँ और उनका लिखा ये प्यारा नग्मा ' इक हसीन शाम को..'

राजा मेंहदी अली खाँ, जब भी ये नाम सुना तो लगा भला इतने रईस खानदान के चराग़ को गीत लिखने का शौक कैसे हो गया? गोकि ऍसा भी नहीं कि हमारे राजे महाराजे इस हुनर से महरूम रहे हों। तुरंत ही जनाब वाज़िद अली शाह का ख्याल ज़ेहन में उभरता है। पर उनकी मिल्कियत दिल्ली
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तुम ना मानो मगर हक़ीकत है, इश्क़ इंसान की जरूरत है...

अस्सी का दशक मेरे लिए हमेशा नोस्टालजिया जगाता रहा है। फिल्म संगीत के उस पराभव काल ने ग़ज़लों को जिस तरह लोकप्रिय संगीत का हिस्सा बना दिया वो अपने आप में एक अनूठी बात थी। उस दौर की सुनी ग़ज़लें जब अचानक ही ज़ेहन में उभरती हैं तो मन आज भी एकदम से पच्चीस
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पटना, मौर्य लोक और मिलना गौतम राजरिशी से : भाग 2

पिछली दफ़ा आपने पढ़ा गौतम से पटना में हुई मुलाकात का पहला भाग। आज बात को वहीं से आगे बढ़ाते हैं जहाँ से वो पिछली बार खत्म हुई थी... वो पुणे चले गए पर प्रेम का जज़्बा भी बना रहा। बस मुलाकात की जगह बदल गई.. शहर बदल गया...पर एक कठिन पर रोमांचकारी जीने की
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पटना, मौर्य लोक और मिलना गौतम राजरिशी से : भाग 1

वक्त आ गया है अपनी पिछली से पिछली पोस्ट में किए अपने वायदे को पूरा करने का यानि गौतम राजरिशी से पटना में हुई मुलाकात का लेखा जोखा प्रस्तुत करने का। लखनऊ से पटना तो दस की शाम को मैं आ गया। गौतम भी वहाँ चौदह को ट्रेन से पहुँचने वाले थे। चौदह को रात मुझे
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अपने आप रातों में चिलमनें सरकती हैं,चौंकते हैं दरवाज़े, सीढियाँ धड़कती हैं...

याद है ना गर्मी के दिनों की वो रातें जो आपने छत पर अकेले किसी का इंतज़ार करते हुई बिताई थीं। पर ये इंतज़ार किसका ? सबसे अज़ीब बात तो यही होती थी कि हमें ख़ुद पता नहीं होता था कि हम आख़िर हैं किसकी प्रतीक्षा में ? पर उस इंतज़ार की कैफ़ियत दिल में तारी
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लखनऊ डॉयरी : रेल का उलटफेर, ब्लॉगरों की साजिश और एक छोटी सी मुलाकात...

बात फरवरी की है। लखनऊ में एक रिश्तेदार की शादी में जाना था। शादी का दिन चूंकि बहुत पहले से तय था लिहाज़ा मैंने दो महिने पूर्व ही रिजर्वेशन करवा रखा था। पर चाहे कितनी भी तैयारी आप क्यूँ ना कर लें जब तक ऊपरवाले के यहाँ से अर्जी पास ना हो, हम जैसे तुच्छ
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मोड़ पे देखा है वह बूढ़ा-सा इक पेड़ कभी? - प्रकृति से हमारे रिश्तों की पड़ताल करते गुलज़ार

अप्रैल का मौसम कभी इतनी कड़ी धूप का तलबदार ना था। खासकर उस प्रदेश में जिसका नामाकरण ही जंगल और झाड़ियों के नाम पर किया गया हो। पहले देश का सर्वाधिक तापमान देखने के लिए राजस्थान के शहरों के तापमान पर नज़र दौड़ानी होती थी पर अब तो इतनी मशक्क़त करने की ज़रा सी
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आइए भ्रमण करें संवेदना के संसार में : एक मुलाकात रंजना जी के साथ !

बात पिछली चौदह जनवरी यानि तीन महिने पहले की है। दोपहर का समय रहा होगा कि अचानक ही मोबाइल की घंटी घनघना उठी। नंबर जाना हुआ ना था सो मैंने सोचा जरूर किसी साथी चिट्ठाकार का ही फोन होगा जिसने जन्मदिन की मुबारकबाद देने के लिए फोन किया हो। फोन कनेक्ट हुआ तो
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अमौसा का मेला : हर इक मेले की कहानी कहते कैलाश गौतम

भारत की ग्रामीण और कस्बाई संस्कृति में मेलों का एक प्रमुख स्थान है। और अगर वो मेला कुंभ जैसे मेले सा वृहद हो तो फिर उसका महत्त्व और भी बढ़ जाता है। फिलहाल हरिद्वार की पवित्र नगरी में कुंभ मेला चल रहा है और परसों यानि 14 अप्रैल को मेष संक्रांति के अवसर पर
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'एक शाम मेरे नाम' ने पूरे किए अपने चार साल और दो लाख पेजलोड्स !

लगभग दस दिन पहले यानि २६ मार्च को एक शाम मेरे नाम के हिंदी संस्करण ने अपने चार साल पूरे कर लिये। साथ ही पिछले हफ्ते ही इस चिट्ठे के दो लाख पेजलोड्स भी पूरे हो गए।अगर आप स्टैटकांउटर द्वारा दिए गए आंकड़ों पर ध्यान देंगे तो पाएँगे कि प्रथम दो सालों तक ब्लॉग
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वार्षिक संगीतमाला 2009 सरताज गीत - क्या करे ज़िन्दगी, इसको हम जो मिले, इसकी जाँ खा गये, रात दिन के गिले ..

तीन महिनों के इस सफ़र को पूरा करते हुए वक़्त आ पहुँचा है वार्षिक संगीतमाला 2009 के सरताजी बिगुल के बजने का। जैसा कि मैंने पहले भी कहा है कि वार्षिक संगीतमाला के प्रथम पाँचों गीत का आपसी फ़ासला बेहद मामूली था। साल के सरताज गीत के आसन पर मैंने उस गीत को
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वार्षिक संगीतमाला 2009 पुनरावलोकन (Recap) : कौन बने हिंदी फिल्म संगीत के धुरंधर ?

वार्षिक संगीतमाला 2009 में बचा है सिर्फ शिखर पर बैठा सरताज गीत। पर इससे पहले कि उस गीत की चर्चा की जाए एक नज़र संगीतमाला के इस संस्करण की बाकी पॉयदानों और उन पर आसीन हिंदी फिल्म संगीत के धुरंधरों पर। बतौर संगीतकार शंकर-अहसान-लॉय और प्रीतम ने इस साल की
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वार्षिक संगीतमाला 2009 रनर्स अप : बीड़ा दूजी थाली का लगे बड़ा मसालेदार... रेखा भारद्वाज

लगभग तीन महिनों का सफ़र तय कर वार्षिक संगीतमाला 2009 जा पहुँची है दूसरी पायदान पर। और वार्षिक संगीतमाला 2009 के रनर्स अप गीत का सेहरा बँधा है उस गीत के सर जो बड़ी ठेठ जुबान में हम सबमें पाई जाने वाली मनोवृति को अपने खूबसूरत बोलों के माध्यम से उभारता है।
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वार्षिक संगीतमाला 2009 : एक नज़र उन गीतों पर जो गीतमाला में आते आते रह गए...

वार्षिक संगीतमाला के लिए गीतों का चयन करते समय बहुत सारे गीत ऐसे थे जो कुछ हद तक पसंद आते हुए भी अंतिम पच्चीस में अपना स्थान नहीं बना पाए। इसलिए इससे पहले कि इस साल के रनर्स अप और सरताज गीत से आपकी मुलाकात कराई जाए एक नज़र उन गीतों पर जो आखिरी वक़्त में
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वार्षिक संगीतमाला 2009 - प्रथम पाँच- तेरा होने लगा हूँ खोने लगा हूँ..

तो चलिए वार्षिक संगीतमाला 2009 की तीसरी पॉयदान पर आज विशुद्ध बॉलीवुड रोमांटिक मेलोडी का स्वाद चखने। ये गाना पिछले साल के अंत में आया और हर जगह छा गया और आज भी इसे सुनने पर एक मीठा मीठा सा अहसास मन में तारी रहता है और आप इसे गुनगुनाने का लोभ संवरण नहीं कर
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वार्षिक संगीतमाला 2009 - प्रथम पाँच- गूँजा सा है कोई इकतारा इकतारा..कविता सेठ

वार्षिक संगीतमाला की चौथी पॉयदान पर विराजमान हैं अमित त्रिवेदी। अमित त्रिवेदी एक शाम मेरे नाम की वार्षिक संगीतमाला के लिए कोई नए संगीतकार नहीं हैं। पिछले साल की संगीतमाला में आमिर में उनके संगीतबद्ध इक लौ इस तरह क्यूँ बुझी मेरी मौला को साल के सरताज गीत
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वार्षिक संगीतमाला 2009 - प्रथम पाँच- बड़े नटखट हैं मोरे कँगना..श्रेया घोषाल

भाइयों और बहनों वक्त आ गया है वार्षिक संगीतमाला के शीर्ष में बैठे पिछले साल के मेरे पाँच सबसे पसंदीदा गीतों के बारे मे बातें करने का। ये पाँचों गीत अलग अलग मिज़ाज के हैं और इनकी सापेक्षिक वरीयता कोई खास मायने नहीं रखती। हाँ पाँच में चार गीतों में मुख्य
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वार्षिक संगीतमाला 2009 : पॉयदान संख्या 6 - ऐ सुरमयी आँखों के प्यालों की दुनिया ओ दुनिया...

वार्षिक संगीतमाला की छठी पॉयदान पर एक बार फिर है फिल्म गुलाल का एक और गीत। इस गीत के तीनो पक्षों यानि बोल, संगीत और गायिकी में जान डालने वाला एक ही शख़्स हैं और वो हैं पीयूष मिश्रा!ग्वालियर में जन्मे और पले बढ़े पीयूष मिश्रा, बहुमुखी प्रतिभा के धनी एक
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वार्षिक संगीतमाला 2009 : पायदान संख्या 7 - मन बावरा तुझे ढूँढता ..शाहाब के बोलों पर राहत का स्वर

वार्षिक संगीतमाला की सातवीं पॉयदान पर बड़ा ही खूबसूरत नग्मा है जो पिछले साल जनवरी में प्रदर्शित हुई फिल्म आसमाँ sky is the limit... का हिस्सा था। युवा कलाकारों को लेकर बनाई गई ये फिल्म ज्यादा तो नहीं चली पर इसने हिन्दी फिल्म संगीत में संगीतकार और गीतकार
Mar 05 2010 02:11 PM
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वार्षिक संगीतमाला 2009 : पायदान संख्या 8 - जरा बताइए ना ये ससुराल 'गेंदा फूल' सा क्यूँ है ?

होली की वज़ह से वार्षिक संगीतमाला 2009 ने लिया था एक विश्राम! तो एक बार फिर बाकी की सीढ़ियों का सफ़र शुरु करते हैं पॉयदान संख्या 8 से, जहाँ पर है एक छत्तिसगढ़ी लोकगीत जिसके बोलों को प्रसून जोशी द्वारा थोड़ा बहुत परिवर्तित करके फिल्म दिल्ली ६ में इस्तेमाल
Mar 03 2010 08:35 PM
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होली की पूर्वसंध्या पर सुनिए जनाब प्रदीप चौबे की आवाज़ में उनकी ये मज़ेदार हास्य कविता...

होली का मौसम आते ही उन हास्य कविताओं की याद आ जाती है जिनका हम कवि सम्मेलनों या पत्र पत्रिकाओं के माध्यम से सुनने या देखने का बेसब्री से इंतज़ार किया करते थे। उस वक्त यानि अस्सी के दशक में आज की तरह टीवी चैनलों की भरमार नहीं थी। ले देकर एक दूरदर्शन था जो
Feb 28 2010 07:28 PM
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होली के रंग इब्ने इंशा के संग : जले तो जलाओ गोरी, पीत का अलाव गोरी..

एक पाकिस्तानी शायर का गीत और वो भी होली के माहौल के अनुरूप । कुछ अटपटा सा नहीं लगता । बिल्कुल लगता अगर वो शायर इब्ने इंशा की जगह कोई और होते।इब्ने इंशा को उनके गद्य और पद्य दोनों के लिए याद किया जाता है। जालंधर में जन्मे इब्ने इंशा ने स्नातक की पढ़ाई
Feb 25 2010 05:22 PM
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वार्षिक संगीतमाला 2009 : पायदान संख्या 9 - बड़े से शहर में छोटे छोटे घर में...

गीतमाला की नवीं सीढी पर स्वागत करें इस प्यारे से गीत का जिसमें मेलोडी है, सुकून देने वाला संगीत है, दिल छूने वाला मुखड़ा है और साथ ही है एक नए गायक का स्वर। मुझे यकीं है कि इस गीत को आप में से ज्यादातर ने नहीं सुना होगा। जैसा कि मैंने पिछली पोस्ट में
Feb 23 2010 11:42 PM
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वार्षिक संगीतमाला 2009 : पायदान संख्या 10 - कैसे बताएँ, क्यूँ तुझको चाहें, यारा बता न पाएँ...

वक्त आ गया है वार्षिक संगीतमाला की अंतिम दस सीढियों को चढ़ने का। ये दसों नग्मे सुनने में बहुत प्यारे हैं। ये जरूर है कि इनमें से कुछ एक खास मूड में ज्यादा भले लग सकते हैं। इन दस में से छः गीत ऐसे हैं जो आप सब ने पिछले साल खूब सुने होंगे और बाकी ऐसे
Feb 21 2010 01:12 PM
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वार्षिक संगीतमाला 2009 : पॉयदान संख्या 11 -बावली सी प्रीत मोरी अब चैन कैसे पावे,आजा रसिया मोहे अंग लगा ले ...

वार्षिक संगीतमाला की ग्यारहवीं पॉयदान का गीत एक ऐसा गीत हे जिससे शायद आप अभी तक अनजान हों। वैसे तो ये गीत जिस फिल्म से है उसका विभिन्न चैनलों पर काफी प्रमोशन किया गया था। पर प्रमोशन के दौरान इस गीत के बजाए अन्य गीतों को ज्यादा तरज़ीह दी गई। इस गीत की
Feb 19 2010 06:06 PM
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वार्षिक संगीतमाला 2009 : पॉयदान संख्या 12 -जैसे के दिन से रैन अलग है,सुख है अलग और चैन अलग है

पहले लखनऊ और फिर पटना में शादियों में शिरकत करने और कुछ ब्लॉगर दोस्तों से दिलचस्प मुलाकातों के सिलसिले को निबटाते हुए वापस आ गया हूँ अपनी इस वार्षिक संगीतमाला की ऊपर की 12 सीढ़ियों को चढ़ने। इस क्रम में पहला यानि 12वीं पॉयदान का गीत एक ऐसा गीत है जो कि राग
Feb 16 2010 10:05 PM
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वार्षिक संगीतमाला 2009 : पॉयदान संख्या 13 - दिलों की दूरियों की गहराई नापते मोहित चौहान

वार्षिक संगीतमाला का सफ़र तय करते करते हम आ पहुँचे हैं ठीक इसके बीचो बीच। यानि 12 पॉयदानों का सफ़र पूरा करके गीतमाला की 13 वीं पॉयदान तक। अभी भी सबसे ऊपर की 12 सीढ़ियों की चढ़ाई बाकी है। आज की पॉयदान पर का गीत एक ऐसा गीत है जिसे इस साल काफी लोकप्रियता
Feb 11 2010 12:21 PM
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वार्षिक संगीतमाला 2009 : पॉयदान संख्या 14 - ज़मीन से उखड़े लोगों में उम्मीद जगाते प्रसून जोशी

वार्षिक संगीतमाला 2009 में आज बारी है 14 वीं पॉयदान पर के गीत की। ये एक ऐसा गीत है जो हफ्ते दर हफ्ते मेरे मन में घर बनाता जा रहा है और मेरी आरंभिक सोच से छः पॉयदानों की छलाँग लगा कर ये आ पहुँचा है इस पॉयदान पर। पहली बार जब इसे सुना था तो लगा था कि एक
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वार्षिक संगीतमाला 2009 :पॉयदान संख्या 15 - धूप खिली जिस्म गरम सा है, सूरज यहीं ये भरम सा है..

फिल्म जगत में बहुत से तो नहीं, पर कुछ पटकथा लेखक जरूर हुए हैं जिन्होंने बतौर गीतकार भी नाम कमाया है। गुलज़ार से तो हम सब वाकिफ़ हैं ही। जावेद साहब ने भी सलीम के साथ कई यादगार पटकथाएँ लिखी पर अपने गीतकार वाले रोल में तभी आए जब पटकथा लेखन का काम उन्होंने
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वार्षिक संगीतमाला 2009 :पॉयदान संख्या 16 - उम्मीद अब कहीं कोई दर खोलती नहीं..जलने के बाद शमा और बोलती नहीं !

वार्षिक संगीतमाला 2009 की 16 वीं पॉयदान स्वागत कर रही है पिछले साल की एकमात्र फिल्मी ग़ज़ल का जो इस साल के मेरे पच्चीस मनपसंद गीतों में अपनी जगह बना सकी है। नंदिता दास द्वारा निर्देशित फिल्म फिराक़ की इस ग़ज़ल की रचना की है एक बार फिर गुलज़ार साहब ने।
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वार्षिक संगीतमाला 2009 :पॉयदान संख्या 17 - भँवरा भँवरा आया रे, कान में इतर का फाहा रे

वार्षिक संगीतमाला 2009 का एक महिने का सफ़र तय करते हुए आज हम आ पहुँचे हैं 17 वीं पॉयदान पर। पिछली पॉयदान पर आपने देखा की किस तरह पीयूष मिश्रा ने अपने गीत को तत्कालीन राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मसलों को जनता के सामने पेश करने का माध्यम बनाया था। आज का ये
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वार्षिक संगीतमाला 2009 :पॉयदान संख्या 18 - पीयूष मिश्रा के व्यंग्यों की मार झेलते 'अंकल सैम'

वाराणसी यात्रा और घर में शादी की व्यस्तताओं की वज़ह से संगीतमाला में लगे इस ब्रेक के लिए क्षमाप्रार्थी हूँ। तो चलिए फिर शुरु करते हैं संगीतमाला की पॉयदानों पर क्रमवार ऊपर बढ़ने का सिलसिला।वार्षिक संगीतमाला की 18 वीं पॉयदान पर का गीत थोड़ा अलग हट कर है। आज
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वार्षिक संगीतमाला 2009 : पॉयदान संख्या 19 - शंकर की मस्ती और प्रसून का जादू मन को अति भावे..

तो हो जाइए थिरकने को तैयार क्यूँकि आ रहा है वार्षिक संगीतमाला की 19 वीं पॉयदान पर एक ऐसा गीत जो ना केवल आपको झूमने पर विवश करेगा बल्कि साथ ही हिंदी के उस रूप की भी आपको याद दिला दे जाएगा जिसे आज के हिंग्लिश माहौल में लगभग आप भूल चुके हैं।लंदन ड्रीम्स के
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वार्षिक संगीतमाला 2009 : पायदान संख्या 20 - जहाँ शंकर महादेवन और श्रेया साथ हैं मेलोडी के इस सफ़र में

कहते हैं प्यार की शुरुआत आँखों की देखा देखी से शुरु होती है। वो गीत याद है ना आपको नैन लड़ जहिएँ तो मनवा मा कसक होइबे करी....। अब इन आँखों पर शायरों ने एक से एक उम्दा शेर कहे हैं तो भला गीतकार कैसे पीछे रहें। हर साल किसी ना किसी की प्यारी आँखों का जिक्र
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वार्षिक संगीतमाला 2009 : पायदान संख्या 21 - क्या आपकी जिंदगी से भी कोई शख्स गुमशुदा है?

हिंदी फिल्म संगीत में कई बार ऍसा होता है कि जब आप किसी गीत को सिर्फ सुनते हैं तो वो आप पर जबरदस्त प्रभाव डालता है पर फिल्म को देखते समय वो गीत कहानी में घुलता मिलता नज़र नहीं आता। पर दूसरी ओर परिस्थितिजन्य गीत होते हैं जो कहानी की पटकथा के अनुसार अपने आप
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वार्षिक संगीतमाला 2009 : पायदान संख्या 22 - ये जिंदगी भी क्या क्या हमको दिखलाती है..

तो भाइयों और बहनों वार्षिक संगीतमाला की 22 वीं पायदान पर गाना वो जिसे लिखा जावेद अख्तर साहब ने धुन बनाई एक संगीतकार तिकड़ी ने और गीत को गाया एक दूसरे संगीतकार ने। प्रतिस्पर्धा के इस युग में आजकल ये स्वस्थ परंपरा चली है कि संगीतकार कुछ दूसरे संगीतकारों को