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श्री कृष्णम् समर्पयामी

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11 Mar 2010
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राधा कैसे न जले- 13

-तुम्हें जुकाम हो गया है.-कल भीग गया था- -कब?-जब पहली हिचकी आई थी रात को- उसके बात सोने नहीं दिया तुमने- बहुत बारिश हुई- तकिया गीला हो गया था--तो मैं नहीं आऊंगी आज तुमसे मिलने- पर तुम्हें तो बुखार हैं- तुम भी ना, जरा भी खयाल नहीं रखते अपना--पर वो काम तो
 
देवेश वशिष्ठ ' खबरी '
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राधा कैसे न जले- 14 (अंतिम)

हमेशा की तरह देव के कानों में कोई बाबरी धुन बज रही थी... देव लिखने में तल्लीन था... देव का हुलिया बिल्कुल बदल चुका था... आंखों पर बिना फ्रेम का मंहगा चश्मा था... नंबर कोई माइनस दो होगा... दूर की चीजें बिना चश्मे के धुंधली सी दिखती थीं... पिछले दस सालों
 
देवेश वशिष्ठ ' खबरी '
Mar 11 2010 01:47 PM
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एंकर का कोट

नमस्कार, मैं हूं राहुल शर्मा... और आप देख रहे हैं टेलीविजन इंडिया... इस वक्त की बड़ी खबर आ रही है आगरा के ताज महोत्सव से जहां भीषण आग लग गई है... आग में शिल्पियों के दो सौ से ज्यादा पांडाल जलकर खाक हो गए हैं... मौके पर दमकल की गाड़ियां पहुंच चुकी हैं
 
देवेश वशिष्ठ ' खबरी '
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वादियां... मेरी आवारगी की कहानी-12

देव तुम मुझसे शादी करोगे? कितना मजा आयेगा ना- मैं रोज तुम्हें सताऊंगी- और तुम रोज मुझे चुड़ैल कहा- मैं बिल्कुल बुरा नहीं मानूंगी- अच्छा एक काम करते हैं- सुरकंडा देवी के मंदिर चलते हैं- वहां पर हम शादी कर लेंगे- ठीक है ना- तुम दुल्हन बन जाना और मैं दू
 
देवेश वशिष्ठ ' खबरी '
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मेरा स्वर्गवास

एक सपना देखा अभी, आधी रात को और फिर नहीं लगी आंख... अब धुंधला सा याद है बस सीढ़ीदार खेत थे पहाड़ियों के... और एक ढलान पर एक गांव सीढ़ियों के रास्ते वाला गांव टूटी सीढ़ियां... पहाड़ी लाल पत्थरों की बीच में कुछ घर थे... बुरांश के पेड़ों से ढंके... एक ह
 
देवेश वशिष्ठ ' खबरी '
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गीली- गीली...

मुझे फेंक दिया किसी ने वहां से शायद चुक गये थे मेरे पुण्य पिछले जन्मों के या शायद मंहगा था वो स्वर्ग मिट्टी के कुल्हड़ों वाला... गर्म दूध वाला... चढ़े और ढ़ले रास्तों वाला... उस पहाड़ी का वो गीला मौसम बहुत याद आता है... और तुम भी, गीली- गीली... -----
 
देवेश वशिष्ठ ' खबरी '
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वादियां... मेरी आवारगी की कहानी-11

वादियां... मेरी आवारगी की कहानी (10) की पुरानी पोस्टें यहां से पढ़ना शुरू करें- देव घर लौट आया था. क्यों? उसने मुझे नहीं बताया- देव मुझसे सारी बातें छुपा जाता था. पर मुझे पता था. वो बहुत कुछ भूल आया था. भुलक्कड़ था देव. देव को कुछ भी याद नहीं आता था.
 
देवेश वशिष्ठ ' खबरी '
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एक हवेली, एक कहानी

पुरानी हवेलियां बूढ़ी औरतों की तरह होती हैं. इठलाते बचपन की तरह किसी ने उन्हें प्यार से उठाया. जवान अल्हड़ नक्काशियां की. उनकी चुनरी पर धानी, नीले, लाल, और चटख रंग भरे. उन नशीली हवेलियों ने वो दौर भी देखा जब बुढ़ापे में उनके दरवाजे की रौनक कम होने लग
 
देवेश वशिष्ठ ' खबरी '
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वादियां मेरी आवारगी की कहानी X

वादियां- मेरी आवारगी की कहानी की पिछली कड़ियां पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें- आगे पढ़ें- ठंडी होती चाय कितनी बेसब्र होती है. जैसे धीरे धीरे प्राण जा रहे हों और जिसके लिए जीवन लगा देने का व्रत लिया है वो बेपरवाह हो गया हो. देव नए दफ्तर जाता है और सवेरे
 
देवेश वशिष्ठ ' खबरी '
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वादियां... मेरी आवारगी की कहानी IX

वादियां- मेरी आवारगी की कहानी की पिछली कड़ियां पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें- ये ढलान है. दूसरी निगाह से देखो तो चढ़ाई भी कह सकते हो. दो रास्ते हैं और दोनों की ओर निगाहें भी लगी हैं. देव को लौटना है. बिट्टू को भी. देव अभी देहरादून जाएगा और फिर वहां से
 
देवेश वशिष्ठ ' खबरी '
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कॉन्ट्राडिक्शन-4

मैं दुनिया के सबसे वाहियात जोक सुनकर हंसना चाहता था, सबसे गंदी गाली किसी को देना चाहता था, और सबसे बुरी लड़कियों से मोहब्बत करना चाहता था… अक्सर लोग कहा करते थे कि दुनिया बिगड़ रही है, बूढ़े अक्सर इस बात का मलाल करते थे, और मुझे उनकी बातों पर आश्चर्य
 
देवेश वशिष्ठ ' खबरी '
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कॉन्ट्राडिक्शन- 5

उन दिनों में मां होना चाहता था और छत के पंखे के नीचे पसीने के तर तकिये को भूलकर घंटों दुनिया से बेहोश रहता था... दिमाग बाकी जिस्म से अलग होकर कहीं तैरने चला जाता था, या लगता था कि सिर्फ दिमाग सो गया है... बाकी बेहोश जिस्म देर तक जिंदा रहता था... और फ
 
देवेश वशिष्ठ ' खबरी '
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खबर में कॉन्ट्राडिक्शन

मैं प्रतिभा कटियार को नहीं जानता... लेकिन वो जानती हैं... उन्होंने मुझे मेरे नजरिये से पढ़ा है... ये भी नया कॉन्ट्राडिक्शन है... मुझे अनुमान है कि प्रतिभा आईनेक्ट में पत्रकार हैं... खबर ये है कि 11 अक्टूबर, आईनेक्स्ट के ब्लॉग श्लॉग कॉलम में कॉन्ट्राड
 
देवेश वशिष्ठ ' खबरी '
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वादियां... मेरी आवारगी की कहानी 13

-तुम्हें जुकाम हो गया है.-कल भीग गया था- -कब?-जब पहली हिचकी आई थी रात को- उसके बात सोने नहीं दिया तुमने- बहुत बारिश हुई- तकिया गीला हो गया था--तो मैं नहीं आऊंगी आज तुमसे मिलने- पर तुम्हें तो बुखार हैं- तुम भी ना, जरा भी खयाल नहीं रखते अपना--पर वो काम तो
 
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कॉन्ट्राडिक्शन- 2

दो आंखें हैं... एक जोड़ी होंठ... दो बाहें... कुल मिलाकर एक पूरा जिस्म है... कुछ और हिस्से हैं उस जिस्म के... कुछ उभरे हुए तो कुछ गहरे... जिस्म गीला है... मैं शायराना हूं... मैं रूहानी हूं... मैं जिस्मानी हूं... एक जोड़ी बाहें एक और जोड़ी चाहती हैं...एक
 
देवेश वशिष्ठ ' खबरी '
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कॉन्ट्राडिक्शन-1

कई निगाहे हैं... उनमें में एक पुराने गुलदस्ते के सूखे गुलाब पर टिकी है... लेकिन एक वहां से हटकर किताबों की बेतरतीब अलमारी में कुछ ढूंढ रही है... इस निगाह को वो लावारिस खत नहीं मिल पा रहे हैं जो आवारगी के दौरान लिखे गए और वो बंजारे खत इन किताबों के हुजूम
 
देवेश वशिष्ठ ' खबरी '
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मैं तेरा, तेरी दुनिया का

अंगडाई लेते मेरे मैले ख्वाबों को तूने छू लिया था हौले से...जैसे पहले चुंबन सा स्पर्श था वो...और मैं जी लिया था ज़िंदगी मेरी...वो मोतियों की दुनिया थी...हकीकत में ख्वाबों की दुनिया...आंखों से झरती थी...और गर्म पानी का फव्वारा बुझाता था उस शहर की प्यासमैं
 
देवेश वशिष्ठ ' खबरी '
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खोई हुई डायरियां नहीं मिलतीं... प्रेमिकाओं की तरह

डायरी नई है... किसी बात को कई हफ्ते बीत चुके हैं... किसी बात को शुरू होने में कई दिन हैं... हर लम्हा एक वक्त पुराना हो रहा है... अगला छण हर पल नया होना चाहता है... ऐसे में एक नई डायरी हाथ लगी है... कुछ लिखना चाहता हूं... काली स्याही से लिखूं... मेरी बात
 
देवेश वशिष्ठ ' खबरी '
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खबरी की पांच छहनिकाएं

मुझे बहुत ज्यादा छंद ज्ञान नहीं है- छणिकाओं में पंक्तियों की सीमा का खयाल नहीं होता पर मैंने ये क्षणिकाएं छह सूक्तियों के दायरे में लिखी हैं- सो इन्हें एक नाम छहनिकाएं दिया है, स्वीकार हो तो जरूर बताएं-) दीवार पर गढ़ी कील, दिल-दीवार, बाकी तुम..! बांस
 
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दाग झूठे हैं...

सच सुंदर होता है... और दाग अच्छे... आज तक यही कहा है मैंने... यही पढ़ा है... मैंने इन दागों पर सुंदर कविताएं लिखीं, और हर बार सुंदर धब्बों पर यकीन किया... मैं डूबा रहा रंगों में... गरारे करता रहा अपनी ही कविताओं के देर तक... मैंने इंद्रधनुष को सुंदर
 
देवेश वशिष्ठ ' खबरी '
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खबरी की एक गज़ल

हुनर भी सब चुक गया है, मुस्कुराने का अब जमाना लद गया है- दिल लगाने का छांव, बारिश, नीम, नदिया- सब पुरानी हो गयी जबसे चलन चला है- मेहमानखाने का फोन वाले प्यार की तासीर कम होती रही कब से वाकया नहीं हुआ- सपनों में आने का होली, दीवाली, ईद- सब दरिया में ज
 
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तुम डरो, तो डरो!

इश्क नहीं है कविता जैसा... तो? भाव नहीं है राधा जैसा... तो? तुम ढूंढो-फिरो... कन्हैया, राम, रसूल... मैं जानता हूं... मैं बना रहना! तुम खुदा बनो, तो बनो। मेरे पद डगमग हैं... तो? मेरी गति दुर्धर है... तो? तुम अपनी फिक्र करो, नसीहत मत दो... मैं जानता हू
 
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राष्ट्रपति भवन में कूड़ा डालना तथा पेशाब करना सख्त मना है...

जी हां... बात कुछ अटपटी लग सकती है... पर यकीन जानिये ये बात मैंने बिल्कुल बिना मोड़े-तोड़े और बिना शब्दों से खेले लिखी है... राष्ट्रपति भवन में वास्तव में कूड़ा डालने पर प्रतिबंध लगा हुआ है... और तो और कोई भारतीय सज्जन वहां दीवार की ओट लेकर या कोई को
 
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तुम खट्टी होगी...

तुम खट्टी होगी... पर सच्ची होगी... अभी छौंक रही होगी हरी चिरी मिर्चें... खट्टे करौंदों के साथ... या कच्ची आमी के... या नींबू के... या ना भी शायद... नाप रही होगी अपना कंधा... बाबू जी के कंधे से... या भाई से... और एड़ियों के बल खड़ी तुम्हारी बेईमानी बड
 
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नीली छांह...

नीली स्याही... नीला कागज... नीला बादल... नीला दु:ख... नीली आंखों वाली की हर याद बहुत नीली है... नीला सरगम... नीला पंचम... नीली बातें... नीला चुप... नीले-नीले जीवन की हर सांस बहुत नीली है... लिख-लिख कर कागज पर सपने, आग लगाए हाथों से... जलते नीले सपनों
 
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तुम गीत हो...

तुम गीत हो... तुम्हें मैंने नहीं लिखा, खुद लिख गए तुम, हर्फ-हर्फ अपने आप... मैंने तुम्हें नहीं गाया, तुम खुद रहे जुबान पर, मीठी-मीठी लोरी से... मैं बेसुरा था, तुम खुद बन गए सरगम, और निकलते रहे मेरी जुबान से... तुम गीत हो, वियोग का... जिसने मुझे सिखाय
 
देवेश वशिष्ठ ' खबरी '
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ये वादा रहा...

तुम्हारी याद को लिख लेता हूं सबके लिये ये सोचे बगैर कि सब सवाल करेंगे और निरुत्तर हो जाऊंगा मैं... तुम्हारी याद को रख लेता हूं बटुए की उस जेब में... जहां रखा है शगुन का सिक्का, कि पर्स खाली न रहे कभी... तुम्हारी घाव को सी लिया है आज फटे घाव के साथ...
 
देवेश वशिष्ठ ' खबरी '