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cinema- सिलेमा

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03 May 2010
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कुछ कुछ होता है.. ज़्यादा गरमी ही होती है..

पता नहीं ऐसी गरमी में लोग पहाड़ कैसे चले जा रहे हैं. जबकि मैं इन पहाड़ सदृश दिनों को अधिक से अधिक फ़ि‍ल्‍मों के पुल से पारने की कोशिश कर रहा हूं. मगर परा कहां रहे है? 'गोन विद द विंड' में तो पहाड़ का एक दृश्‍य भी नहीं है, अलबत्‍ता आग के बहुत सारे हैं,
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हूं, देख ली, निकल लिये..

हाल के दिनों की देखी कुछ फ़ि‍ल्‍में..इतालवी: अंग्रेजी में 'लाइक शेडोज़', फ्रेंच: 'ल वियों रोज़', इतालवी: 'इल पार्तिजानो जॉन्‍नी', चीनी मुख्‍यधारा की (अंग्रेजी में) 'वन फुट ऑफ़ द ग्राउंड', फ्रेंच, जुने की 'मिकमाक्‍स', जापानी: 'लव एंड पार्क होटेल'..
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जाने कहां गए वो दिन टाइप की चंद पुरानी यादें..

हाय रे ज़माना, कैसा बदला तेरा फ़साना. क्‍या थे क्‍या हो गए टाइप. हालांकि तब, पहले भी, यह नहीं ही रहा होगा कि आदर्शलोक के हम आदर्शलोग थे, फिर भी. मतलब इस एकता का प्रतीक वीडियो में ही ज़रा बाबू-बबुनी की आवाज़ की मिठाई और उसकी मासूमियत पर ग़ौर फ़रमाइए, यह
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ज़ोरबा द ग्रीक

मैंने पहले कोई देखी नहीं थी, मियालिस काकोजानिस की यह पहली फ़ि‍ल्‍म देख रहा था, सन चौंसठ की बनी 'ज़ोरबा द ग्रीक' और देखकर लाजवाब हो रहा था. कि जगह का, गांव-देहात के लोगों का, उनकी बदहाल सोच की कंगलई का, जीवन के उत्‍सव और उसके त्रासद अवसान का यूं लयकारी
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कुछ लिंक्‍स..

तो रिलीज़ के बाद आज यह पांचवा दिन है और अपनराम अभी तलक जो है 'एल एस और डी' का सेवन नहीं कर सके हैं, मतलब फ़ि‍ल्‍म नहीं देख सके हैं. घर पर बैठे हुए एलेम क्लिमोव की युद्ध-विभिषका के विहंगम, दु:स्‍वप्नी वृतांत (द हर्ट लॉकर मुझे पसंद है, लेकिन रुसी 1985 की
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दायें या बायें के सिवा और भी बहुत-बहुत कुछ..

कल रात रॉबर्ट आल्‍टमैन की एक अपेक्षाकृत कम चर्चित फ़ि‍ल्‍म ‘कुकीज़ फॉरच्‍यून’ देखकर अनजाने एक बार फिर चकित हो रहा था कि यह जीवटधनी बूढ़ा कलाकार आखिर क्‍या खाकर इतनी सहजता से ऐसी सघन बुनावट हासिल कर लेता है. ख़ैर, अचरच और ‘ऑ’ की कुर्सी पर ढहे उनके काम को
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रोड मूवी एंड एटसेट्रा..

थोड़ा अर्सा हुआ अलेक्‍सेई बालबानोव की एक फ़ि‍ल्‍म देखी थी, अंग्रेजी में रिलीज़ का नाम था- 'ऑफ़ फ्रीक्‍स एंड मेन', 1998 की बनी सीपिया रंगों की एक बड़ी ही अजीब दुनिया थी, पहचानी रुसी फ़ि‍ल्‍मों के अनुभवों से एकदम जुदा. फिर हुआ कि बालबानोव की एक और फ़ि‍ल्‍म
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हालिया कुछ दिखी फ़ि‍ल्‍में..

इसी को कहते होंगे डेस्टिनी, चीज़ों को कहां-कहां पहुंचाती है. या नहीं पहुंचाती. कि उदासियों के करीने से सजाये कंपोशिज़ंस और छोटे शहर के लंबे जारमुशी ट्रैक शॉट्स ‘लेक ताहो’ को बर्लिन पहुंचाते हैं, मगर अदरवाइस मैक्सिको के बाहर की बहुत यात्रायें नहीं करवाते.
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मुख्‍यधारा से बाहर के असुविधाजनक टेढ़े रास्‍ते..

देख रहा हूं, लिंक्‍स लपेट रहा हूं: जिया झ्यांगके की चीनी दुनिया , कॉमिक आर्टिस्‍ट से सिनेमा में हाथ आजमा रहे एनकी बिलाल की फ्रेंच बंकर पैलेस हॉटेल , और कॉंन्‍सतांतिन लॉपुशांस्‍क्‍ी की रूसी द अग्‍ली स्‍वान्‍स ..
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आकी, आमिर और दोस्‍त का गुस्‍सा..

हमारे मेलबॉक्‍स में हमारे एक कैमरामैन नौजवान मित्र हैं, उनका एक मेल पड़ा था. फि़नलैण्‍ड के फ़ि‍ल्‍मकार आकी काउरिसमाकी की एक फ़ि‍ल्‍म देख लेने का आह्लाद था- हम सबों को होता है- नीचे कैज़ुअल तरीके से एक गुस्‍सा भी ज़ाहिर था जिस कॉलोनाइज़्ड पीटी मानसिकत
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तीन फ़ि‍ल्‍में..

ज़्यादा नहीं कहूंगा. बस यही कि अच्‍छी फ़ि‍ल्‍में देखना एक भरोसा देती हैं कि बदलते समय के भभ्‍भड़ में अभी भी सिनेमा की संभावनाओं का अंत नहीं हो गया है. यह बात तब और दिलचस्‍प लगती है जब यह भेद किसी फ़ि‍ल्‍मकार की पहली ही फ़ि‍ल्‍म में दिखे. इज़रायली 'जे
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दु:ख की छंटती बदलियां..

पीटूपी की मेहरबानी कि रहते-रहते फ़ि‍ल्‍मी नगीने हाथ लगते रहते हैं, और यह बात, शिद्दत से, भूलती नहीं कि हिंदी फ़ि‍ल्‍में क्‍यों और कैसे इतनी अझेल हैं. आज सुबह की अच्‍छी शुरुआत फ़ि‍निश निर्देशक आकि कॉउरिसमाकी की ‘ला विये दि बोहेम’ (1992) और ‘ड्रिफ्टिंग
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तीन बंदर

आमतौर पर होता यह है कि काम लायक किसी निर्देशक की पहली फ़ि‍ल्‍म में स्‍पार्क होता है, बाद में, धीरे-धीरे फिर निर्देशक मियां फ़ि‍ल्‍म बनाने की नौकरी बजाने लगते हैं. तुर्की के नूरी चेलान की तीसरी व अपने लिए पहली फ़ि‍ल्‍म ‘ उज़ाक ’ मैंने कुछ वर्ष हुए देख
Dec 29 2009 11:43 AM
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दु:ख के रिसाव..

सामान्‍यतया, प्रकट तौर पर इतिहास हमेशा हमसे ज़रा दूर, कहीं बाहर चल रही परिघटना की तस्‍वीर बनी रहती है. वह अभागे लोग होते हैं जिनका जीवन सीधे उस भंवर की चपेट में आ जाए. क्‍लॉदिया ल्‍लोसा निर्देशित पेरु की फ़ि‍ल्‍म ' द मिल्‍क ऑव सॉरो ' कुछ ऐसे ही अभागे
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गोले, सामानों के शोले.. द स्‍टोरी ऑव स्टफ़

चीज़ों की ठीक-ठीक पहचान न होने से फिर चिरकुटइयां होती है. कल मुझसे हुई. लगा जैसे ड्रॉपबाक्‍स बता रहा है अपने पीसी का माल मैं उनके फॉल्‍डर में कॉपी करके चिपका दूं और फिर जिनसे कहूं वे ऑनलाइन उसे ड्रॉपबाक्‍स के फोल्‍डर में खोलकर पा लेंगे, डाउनलोड की ज़
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आयम यूअर मैन..

अच्‍छा लगता है कि बाज़ार के शोर और बेमतलब बकलोलियों के इस दौर में अब भी रहते-रहते ऐसी फ़ि‍ल्‍म से टकरा जायें कि मन में तरावट फैल जाये, फ़ि‍ल्‍म के खत्‍म हो चुकने के बाद भी देर तक मन में कैसी तो अच्‍छी शराब पिये का असर बना रहे.. कुछ दिनों पहले अभय की
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एक पुरानी रुसी फ़ि‍ल्‍म के स्‍नैप्‍स..

मालूम नहीं था ब्‍लादिमीर मोतिल नाम का कोई निर्देशक रहा है, या रुस में कभी कोई 'वेस्‍टर्न' बनी है. सधी नज़र की बड़ी सुलझी कारस्‍तानी (अंग्रेजी में जिसे 'कूल' कहते) देखने के बाद खबर हुई वेस्‍टर्न के जानर की सोवियत रुस में पहली कोशिश थी, और दस लटके, ज़्
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तीन फ़ि‍ल्‍में..

डॉक्‍यूमेंट्री थी, फ़ि‍ल्‍म देखे कुछ दिन हो गए लेकिन अवचेतन में अभी भी जैसे कहीं अटकी हुई है. कुछ ख़ास फ़ि‍ल्‍मों के साथ क्‍या होता है ऐसा कि एक अच्‍छी बितायी शाम की तरह स्‍मृति और संवेदना में कहीं कुछ छूटा रह जाता है? पियेर बोर्दू , पहले कभी नाम सुन
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द स्‍टेशन एजेंट

इस संशयभरे समय में अब कभी कैसा सुखद संयोग होता है कि फ़ि‍ल्म देखते हुए कोई चमकदार चालाकी देख रहे हों जैसी अनुभूति नहीं होती. सामान्य लोगों के लगभग घटनाविहीन जीवन-प्रसंगों के चित्र गरिमा के सुलगते बिम्बि बन जाते हैं, और मन उसमें धंसा देरतक चिटकता रहे,
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अप..

महाराज, आइए, आराम से नीचे आइये.. या फिर ऐसा है मुझी को ऊपर कहीं नीले में उड़वाइये.. अब जो करना है, जल्‍दी बताइये.. मैं बस राह तक रहा हूं (आप लव आज तक का तक रहे होंगे, मैं बुड्ढे को ही निरख रहा हूं, पिक्‍सार की नयी एनीमेशन है.. हालांकि पोस्‍टर के बाद अभी
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अंतर्लोक के झमेलों की कैसी तो फ़ि‍ल्‍में.. कैसे फ़ि‍ल्‍मकार..

झमेलाबझे (डिसफंक्‍शनल) परिवारों के दु:ख.. कैसे-कैसे दु:ख.. देखने लगो तो फिर क्‍या-क्‍या दिखने लगता है, कहां-कहां नहीं दिखता! घटक की ' मेघे ढाका तारा ' याद है? परिवारों के भीतर ' मुग़ले-आज़म ' होता है न ' हम आपके हैं कौन ', ज़्यादा कहानियां ' लिटिल मि
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जय ज़्यां..

कभी ऐसा संयोग नहीं बना कि रेनुआर की काफी फ़ि‍ल्‍में एक साथ देखी. सब अभी तक देखी भी नहीं. और अलग-अलग जब देखना हुआ तो लंबे अंतरालों में हुआ. यूनिवर्सिटी के फ़ि‍ल्‍म क्‍लब में उन्‍हें पहली बार देखा था, लेकिन जाननेवाले न जानें मायेस्‍त्रो साहब की फ़ि‍ल्‍
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खुद को समझायें बतायें क्‍या?..

भागाभागी में जीवन के कैसे दुर्योग हैं कि जिस दुनिया में आपका मन रमता है अब उसकी तक ज़रूरी नहीं खुद को ठीक-ठीक ख़बर रहे (वैसे मैं तो भागता भी कहां हूं? जो और जितना भागना है खुद से ही भागना है!). सिनेमा की रखता हूं फिर पता चलता है शायद नहीं रख सका हूं.
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वामोस, कॉम्‍पानियेरो

मुश्किल विषयों पर आसान-सी दिखती तरंगभरी फ़ि‍ल्‍म बना लेना कलेजे का काम होगा. लेकिन चिलीयन निर्देशक अलेहांद्रो अमेनबार शायद कलेजा जेब में लेकर घूमते हैं. उनकी ताज़ा फ़ि‍ल्‍म- चौथी शताब्‍दी के मिस्‍त्र में एक महिला दार्शनिक के गिर्द घूमती- ‘ अगोरा ’ से
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फ़ि‍ल्‍मी भटकानी: नई पुरानी

लीना वर्टमुलर की इटैलियन ‘ सेवेन व्‍यूटिज़ ’, अर्जेंटिनी लुचिया प्‍योंजो की ‘ XXY ’, जोकिम त्रायर की लेखकीय जीवन के सजीले भविष्‍य व दोस्तियों की महीन छानबीन करती नोर्वेजियन ' रिप्राइस ', यान कादर की प्‍यारी काली-सफ़ेद चेक फ़ि‍ल्‍म ' बड़ी सड़क की दूका
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जब हमारा घर तैयार होगा: बेला तार की दुनिया

की पैदाइश बेला तार हंगेरियन फ़ि‍ल्‍मकार हैं . भारत में तार की फ़ि‍ल्‍मों से लोगों की विशेष पहचान नहीं, और पहचान बनी भी है तो आमतौर पर सीधे अतिवादी धुरियों तक जाती है. ख़ास तौर पर उनके करियर की बाद की- डैमनैशन, सतानतांगो सी फ़ि‍ल्‍मों में फ़ॉर्म की जै
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टीवी पर आज शाम

वर्ल्‍डमूवीज़ चैनल पर आज शाम एक के बाद एक दो निहायत अच्‍छी फ़ि‍ल्‍में हैं, दोनों ईरानी, पहली पौने सात बजे जनाब जाफर पनाही की ' आईने ', दूसरी साढ़े आठ बजे माजिद मजीदी की ' द सॉंग ऑफ़ स्‍पैरोज़ '.. जिनसे लहे, ज़रूर देखें..
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आइ एम इज़ी..

सतह पर जो दिखता है तह में जाकर फिर कैसे-कैसे तो खोह नज़र आने लगते हैं, नहीं? ऐसे टेढ़े सवालों का बड़ा ही सीधा जवाब ऑल्‍टमैन से बेहतर कौन समझता होगा! 1975 में रिलीज़्ड रॉबर्ट ऑल्‍टमैन की मज़ेदार, परतदार फ़ि‍ल्‍म ‘ नैशविल ’ से कीथ कैराडाइन का उनका ऑस्‍
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फ़ि‍ल्‍में देखीं..

थाइलैण्‍ड के आदित्‍य अस्‍सारात की पहली- वंडरफुल टाउन , चेक यान रेबेक की पेलिस्‍की , और फ्रेंच ज़ाक ऑदियार की द बीट दैट स्किप्‍ड माई हार्ट .. जोड़े गये लिंक से फ़ि‍ल्‍मों की एक बेसिक रिव्‍यू पर नज़र जायेगी..
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तीन का एक: फिर एक बार हिंदी फ़ि‍ल्‍में..

हिंदी फ़ि‍ल्‍मों पर लिखना , लिखते रहना सचमुच कलेजे का काम है. ऐसा नहीं है कि हिंदी साहित्‍य पर लिखना कलेजे का काम नहीं है, लेकिन साहित्‍य के साथ सहूलियत है कि आप किताब बंद कर देते हैं चिरकुटई ओझल हो जाती है, जबकि हिंदी फ़ि‍ल्‍मों की रंगीनियां आपका पी
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देव डी, अनुराग, डैनी बॉयल और हमारा समय इत्‍यादि..

बॉलीवुड की ऐसी दुनिया में जो विश्‍व सिनेमा के बरक्स अभी तक अपना ककहरा भी ढंग से दुरुस्‍त नहीं कर पायी है, अनुराग में ढेरों खूबियां हैं. अपनी और अपनी से ज़रा ऊपर की पीढ़ी के बाकी सेनानायकों के उन नक़्शेकदमों- जिनमें लोग किसी अच्‍छी-खराब कैसी भी शुरुआत
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कैपिटलिज़्म एंड अदर किड्स स्‍टफ

दस-दस मिनट के पांच टुकड़े हैं, इस दुनिया का हिसाब-किताब कैसे चलता है जानने में आपकी बालसुलभ जिज्ञासा हो तो देख डालिये. मैंने नेट से डाऊनलोड करके पूरी डॉक्‍यूमेंट्री एक साथ देखी, बालसुलभ प्रसन्‍नता हुई. हमारे, अनिल व अभय जैसे पहुंचे हुए बुद्धिज्ञानी क