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17 Jun 2010
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धर्म अनंता, धर्म कथा अनंता

कहां से शुरू करूं। परमात्मा से या आत्मा से। शरीर से या सोच से। ‘भगवान’ शब्द को हिंदी में अब पांचों पंचभूत तत्वों में बांटा जा चुका है। भ से भूमि, ग से गगन, व से वायु, अ से अंतरिक्ष और न से नीर। वैसे अंग्रेजी के गॉड को जेनेरेटर, ऑपरेटर और डिस्ट्रायर नाम
 
Bhavya
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हर दिन एक नया दिन....

हमारा माहौल हमें प्रभावित करता है। आज की दुनिया में काम करना हर दिन एक चुनौती है। एक लम्बे समय से हम ये जानते हैं कि अनुशासन और नियम से जीने के फायदे है। लेकिन शरीर की थकान और मानसिक बोझ के बाद अगला दिन नया महसूस करना हमारे लिए मुश्किल सा होता है।मुझे
 
Bhavya
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आपके बीच....मैं भी

अपनी मौजूदगी से हर कोई प्रभाव छोड़ना चाहता है। मैं भी। पत्रकार हूं। पेशा भी है शौक भी। लिखना पढ़ना जारी है। और ये कोशिश भी कि लिख पढ़कर कुछ किया जा सके। मैं नहीं जानता कि पत्रकार अब कोई राह बना पाएगा या नहीं। लेकिन खुद को इतना गुमान है कि पहचान के लि
 
Bhavya
Dec 29 2009 11:51 AM
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हे भारतमाता!

हे भारतमाता। अजर, अमर, अटल देश हो, हे भाग्यविधाता खिले हर कोख में एक दूर दृष्टिदाता प्रेम, माधुर्य, भाईचारे बनी रहे ये अविरल गाथा हे भारत माता हे भारत माता। बनी पड़ी मिसाल है, अखंड कथा निहाल है। धरा पर बिखरा तेज है, ये संस्कृति की सेज है। नदी की धार
 
Bhavya
Dec 29 2009 11:51 AM
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ब्लागों का कट-कापी-पेस्ट

बहुत दिनों से ब्लागों की दुनिया से दूरी रही। पता नहीं क्यो। मन नहीं करता था कि किसी एग्रीगेटर पर जाकर तलाशूं कि क्या पढ़ू, क्या छोड़ू। ये अजीब सा समय है। सुबह अखबार की खबरों से लेकर टीवी समाचार तक पसरी सूचनाओं की भीड़ में खुद को तलाशना कठिन है। अखबार
 
Bhavya
Dec 29 2009 11:51 AM
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"चजइ"- "क्या खुद को जानना है"?

अपने को जानने समझने के लिए अब तक भारतीय परंपरा में ध्यान ही सबसे बड़े माध्यम के तौर पर देखा जाता रहा है। लेकिन हाल के सालों में बाजार में आ गई है स्व-विकास, स्व- मूल्यांकन और लाइफ और प्रोफेशनल मैनेजमैंट की हजारों किताबें। तो क्या है इन किताबों में, ज
 
Bhavya
Dec 29 2009 11:51 AM
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A chapter on Media Law & Ethics.

मैं foryou2005@gmail.com पर मौजदू हूं...
 
Bhavya
Dec 29 2009 11:51 AM
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नगर नगर एक सफर - भाग 2

अलीगढ़ में रूकना कुछ ही घण्टे रहा। सो जानने समझने का पूरा वक्त मिल नहीं पाया ।आगे एक ऐसे शहर को जाना था, जहां रेल नहीं जाती है। मैं पूर्वोत्तर राज्यों या जम्मूकश्मीर में नहीं, अपने राज्य उत्तर प्रदेश के एक नगर की बात बता रहा हूं, जहां रेल नहीं जाती।
 
Bhavya
Dec 29 2009 11:51 AM
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नगर नगर एक सफर....

बीते दिनों पश्चिमी उत्तरप्रदेश के कुछ शहरों में जाना हुआ। खासकर आगरा। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिले उतनी ही दूरी पर बसते है जितनी दूरी पर द्वारका से आनंदविहार या कल्याण से छत्रपति शिवाजी टर्मिनल आने में लगते है। यानि एक घण्टे में एक जिले में तो दूसरे
 
Bhavya
Dec 29 2009 11:51 AM
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नीली पीली बसों का खौफ

दिल्ली में चलना है तो सभंलना जरूरी है। और अगर सड़क पर किसी ब्लूलाइन बस के आस पास है तो दूरी जरूरी है। सरकार भी दूरी के फार्मूले को अपना रही है। आज ही दिल्ली सरकार की मुखिया ने कहा कि धीरे धीरे सड़कों पर से साढ़े चार हजार ब्लू लाइन बसों को हटा दिया जा
 
Bhavya
Dec 29 2009 11:51 AM
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ब्लॉगों की एजेंसी

क्या आपको लगता है कि ब्लाग को बाजार के करीब लाने के लिए किसी नियामक या एजेंसी की जरूरत है। आपकी प्रतिक्रियाएं एक रास्ता सुझा सकती है। मैं foryou2005@gmail.com पर मौजदू हूं...
 
Bhavya
Dec 29 2009 11:51 AM
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गाड़ियों के बीच दिल्ली शहर

दिल्ली में रहना है तो आपको किसी न किसी दिन जरूरत पड़ेगी रेजिडेंस प्रूफ की। रेजिडेंस प्रूफ। एक ऐसा प्रमाण पत्र जो ये बताता है कि आप भला जगह के निवासी है। इसके होने से अपने आप एक सर्वाधिकारवाद के शिकार हो जाते है। ये ऐसा पेपर है जो आपको ये बताता है आप
 
Bhavya
Dec 29 2009 11:51 AM
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बाजार में बिकने के लिए तैयार ब्लाग-2

क्या किया जाए। कैसे बिना हाथ पांव मारे ही ब्लाग में प्रचारों की झड़ी लग जाए। रोजाना आप दो से चार घण्टे इंटरनेट से जूझते रहते है। दो चार लेखों को पढ़ते है। एक दो लिखकर छाप मारते है। और एक सामान्य ब्लागर हर घंटे ये देखने में ही बिता देता है कि कितने हि
 
Bhavya
Dec 29 2009 11:51 AM
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बाज़ार में बिकने के लिए तैयार ब्लाग-1

सवाल उठता है कि ब्लाग को बाजार में बेचा कैसे जाए। क्या प्रचार की बाट जोही जाए। कि गूगल के जरिए ये इंतजार किया जाए कि वो कमाए तो हम पाएं। आज जितने भी जनसंचार माध्यम है वे अपनी कमाई के लिए बाजार के प्रचार पर पूरी तौर पर निर्भर है। और जो सीमित जनसंचार क
 
Bhavya
Dec 29 2009 11:51 AM
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कूड़े में ब्लाग की पेशकश बंद करिए

मीडिया की नई सीमित विधा के पेंच जगजाहिर हो रहे हैं। ब्लाग । एक ऐसा माध्यम जो यूटोपिया में ज्यादा जीता है, अपने विस्तार से पहले अनजानी व्यक्तिगत बहसों में सिमटता जा रहा है। जानते हैं क्यों। क्योंकि संवाद के जिस माध्यम को ब्लाग की दुनिया सर्वव्यापक मान
 
Bhavya
Dec 29 2009 11:51 AM
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मैं एक पत्रकार हूं

मुझे जिंदा रहना है मुझे नौकरी करनी है। एक बार किसी बात में मां ने कहा कि जीवन में ऐसा करना जो नाम रोशन करने जैसा हो मैने छोड़ दी एक चैन की सरकारी नौकरी और अब हूं एक मोर्चे पर। मैं सैनिक नहीं हूं। होता तो घरवाले हर हादसे पर सिहर जाते पत्नी और बच्चे एक
 
Bhavya
Dec 29 2009 11:51 AM
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मजूर चाहिए का हजूर

आज सुबह की बात है। नोएडा का लेबर चौराहा। मैं बेल के शर्बत के लिए अपनी गाड़ी चौराहे पर लगे एक ठेले पर रोकता हूं। इधर उधर देखता हूं। बेल वाले को एक गिलास देने को कहता हूं। कि अचानक एक भीड़ मुझे घेर लेती है। मैं नोएडा से गाजियाबाद हाइवे पर बने लेबर चौरा
 
Bhavya
Dec 29 2009 11:51 AM
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चिल्लर की अर्थव्यवस्था

फुटकर नहीं है। कहां से लाए चिल्लर। भईया टाफी दे दें। देश में फुटकर की एक अर्थव्यवस्था है। रेजगारी के तौर पर सिक्कों को लोग जेब में रखना पसंद नहीं करते। सो चौराहों पर खड़े हाथ फैलाए भिखारियों की चांदी होती है। भिखारी शब्द भीख मांगने से बना। लेकिन बीते
 
Bhavya
Dec 29 2009 11:51 AM
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हाजमोला की चाय, गोरखपुर से - 2

चाय मेरे हाथ में थी। नमकीन काली चाय। मन में कई तरह के स्वाद पनप रहे थे। कैसी होगी ये सड़कछाप चाय। वैसे भारत में जो सबसे शानदार चाय बनती और पी जाती है, वो सड़क के किनारे ही बनती और पकती है। तो मैने चाय वाले युवक को बिना पैसे दिए एक नया स्वाद चखने का म
 
Bhavya
Dec 29 2009 11:51 AM
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हाजमोला की चाय, गोरखपुर से

चाय गरम चाय। नमकीन चाय। पेट को दुरूस्त रखे चाय। हाजमोला की चाय। चौदह मई की शाम। अपने शहर गोरखपुर में शाम को सब्जी मंडी में हरियाली देख रहा था। कान में ये आवाजें पड़ी। चौंका। देखा एक मध्यम साइज की केटली में एक बीस बाइस साल का लड़का ये पुकार लगा रहा था
 
Bhavya
Dec 29 2009 11:51 AM
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जलेंगे आप जलेंगे हम, जलेगा हमारा चमन

कोलाहल है मचा धरती रही उबल इंसान की फितरत में नहीं है सुधरने का शगल पृथ्वी तप रही है। इंसान को इसकी चिंता नहीं है। हो भी क्यों। उसके घर में एसी है, कूलर है, पंखा है। हिमखण्ड पिघल रहे है। नदियां उफान पर है। पर इंसान क्या करें। उसके घर, पानी है, फ्रिज
 
Bhavya
Dec 29 2009 11:51 AM
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सदी का सामान्य महानायक

सदी के महानायक ने जब कहा कि जुर्म यहां कम है, तो ये बात बहुतों को नागवार गुजरी। सदी के कालपुरुष ने जब मंदिर मंदिर जाकर अपने सुपुत्र और वधु के लिए दुआएं मांगी, तो ये बात उनके कद की नहीं लगी। और सदी के सबसे बड़े कार्यरत कलाकार ने मीडिया को जिस तरह से श
 
Bhavya
Dec 29 2009 11:51 AM
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ये छपा था....

ये छपा था....http://mohalla.blogspot.com/2007/04/blog-post_10.html लोग चुप रहे। बहसें तमाम हुईं। हम एक मजहब के हुए। जिंदगी आम हुई। मुसलमां होना क्या होता है? ये जानना-समझना केवल फैसलों की छांव में मुश्किल है। दरअसल इस देश की साझा विरासत को जीने के लि
 
Bhavya
Dec 29 2009 11:51 AM