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दृष्टिकोण

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13 May 2010
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एम्पैथी

कुर्सी के ठीक सिरे पर कूल्हा जमाये उसका बैठना वैसे भी कष्टप्रद था। ऊपर से सारा शरीर जैसे अंदर की ओर सिकुड़ा हुआ। जैसे गर्भाशय में,... अधेड़ उम्र,पके हुए बाल,माथा दोनो हाथों की उँगलियों से ढँका हुआ। उसने अचानक ही नज़र ऊपर की थी। शायद मेरे नीरिक्षण से ही
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मेलन्काली

पता नहीं कब से .....पर एकांत में अब रहा नहीं जाता। नि:शब्दता की स्थिरता से घबराता है मन। लगता है कहीं यूँ ही जड़ ना हो जाए। जाने अनजाने कितने ही शोर की आड़ में बैठती हूँ। इस शोर में भी अक्सर आवाज़ सुनाई देती है। आवाज़ जो मैं सुनना नहीं चाहती। बहुत धीमी
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रास्ते

रास्ते अपने आप में मुकाम होते हैं। पीले पड़ते पन्नों में,कुछ जानी पहचानी नज़्म की आधी अधूरी याद में, बहुत चाव से बैठे बतियाये बरामदे के कोने में.....थोड़ी थोड़ी सी पहचान छूट जाती है। अपने हिस्से की पहचान ना जाने कब कहाँ कहाँ गिरकर पनप जाती है। बहुत दूर
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मन का अरण्य

उनसे मिलना हुआ था जैसे किसी और महाद्वीप से आई हवा हो। मैं रुकी थी थोडी और गहरी साँस लेने के लिए। उसकी खुशबू में जैसे उस मिट्टी की सौंधी खुशबू थी जहाँ से मैं विस्थापित हुई थी। जानती थी मैं इस महाद्वीप का हिस्सा हूँ। मेरे पास अपनी ज़मीन थी, जिसका मौसम
Dec 29 2009 11:47 AM
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दृष्टिकोण

मैं जिस कोने पर खड़ी हूं वहाँ से ऐसा दिखता है। कैसा दिखता है?.... और जैसा भी दिखता है क्या जरूरत है दृष्टि के इस कोण को दिखाने की। मेरे और किसी के भी दृष्टिकोण का महत्व क्या है ....और इसे बिना पूर्वाग्रहों के देखना क्यों जरूरी? ....अगर सामने की चीज़
Dec 29 2009 11:47 AM
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कल के साथ कल...कुछ पल

पापा की कितनी बाते बिलकुल दादा जैसी है वो जब मुझसे मिलते हैं पापा जैसे लगते हैं..... दादी के थके चेहरे से ऐसे स्नेह उमड़ता है मुझे देखकर उनकी आँखों में सपना सा कुछ उगता है मेरे नाना सब बदमाशी समझते हैं रंगे हाथ पकड़ कर मुझको बस मन ही मन हँसते हैं माम
Dec 29 2009 11:47 AM
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अनकही बातें

बातें कहीं भी शुरु हो जाती है. जंगली घास की तरह थोडी सी नमी में पनप जाती है. कभी गोल गोल घूम कर वहीं आ खडी हो जाती है....कभी यूं ही बरसात की तरह बरस जाती है. कभी खेतों सी लहलहाती है.....और उन पर अनाज से लगतें हैं किस्से. बातों बातों में अफसाने उग आते
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सीमा

परिवेश,सोच,विकास,आज़ादी....सीमा हर चीज़ की होती है। सीमायें अचानक से आकर खड़ी नहीं हो जाती। पहले होता है शोध,संघर्ष,विमर्श और फिर धीरे से बनती हैं सीमायें। युद्ध लड़े जाते हैं, सभ्यता की दिशा का अनुमान लगाया जाता है,विचार की पराकाष्ठा तय की जाती है,
Aug 10 2009 11:49 AM
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मिट्टी और जंगल

वह मिट्टी थी। उस पर एक जंगल उगा था। जंगल जिसकी जड़ें बहुत भीतर उतर कर उसकी रूह को टटोलती थी। कहीं गहरे से नमी खोज लाती थी। ऐसी नमी जिससे जंगल पनपता था। फूल खिलते थे...फल लगते थे। हरियाली,वसंत,पँछी,पखेरू...। वह देना जानती थी। हल्की बारिश में सौंधी खुश
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तलाश

ऐसे लगता है जैसे किसी राह की तलाश में जीवन की चेतना पाई हो। और रास्तों के पड़ावों में ना रास्ता याद रहा ना तलाश। जैसे किसी सपने के उगने पर...जागी आँखों के सच धुँधले से पड़ जाते हैं। और सपने के ही मायने दिखाई देते हैं। ऐसे बँधता है मन लगावों के तारों
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विलीन

तुम उस खुशबू के समंदर सी हो जो लहर लहर सी उठ कर मुझे किनारे से उठा ले जाती है। मेरी साँसों मे घुल यह महक मेरे पोर पोर तक पहुँचती है। तुम्हारी पहचान है इसमें। मुझ तक यह तुम्हारा नाम बन कर आती है। मैने इसे जिस्म पहनते देखा है। और तुम्हारे जिस्म को खुशब
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विश्राम

रात थी। और सन्नाटा बिल्किल चुप्प। जैसे बहुत दिनों तक जागने के बाद अनायास ही रात की आँख लगी हो। पत्ते अपनी टहनियों से लटके खड़े थे। बिल्ली आँख मूँदे सो रही थी। उजालों का कहीं नामोनिशाँ नहीं था। सड़क सूनी थी। कोई बत्ती कहीं दूर तक नहीं टिमटिमा रही थी।
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दोपहरी

मार्च एप्रिल का महीना। घनी छाँव सी छनी धूप घर के पिछवाड़े पर पड़ती थी। धूप ,छाँव पहन थोड़ी सी ठंडी होकर गुनगुनी सी बदन को छूती थी। नींबू के पौधों से हल्की सी खट्टास ताज़गी की तरह उठती। मुझे यहाँ बैठना अच्छा लगता था। गर्म हवायें आम के पेड़ की साँसों क
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रंग

लाल, पीला, हरा , नीला...कैसे कैसे तो फीके...कैसे चटकीले...कितने सारे रंग। याद है जब टेसू के फूलों से पानी में घुलता था रंग....और हाथों में लगाई मेहंदी पर शक्कर के पानी से चढ़ता था रंग। हल्दी और बेसन....चेहरे पर कैसे कैसे तो निखरता था रंग। जब पहली बार
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हैप्पी बर्थड़े पापा

पापा, आप से लंबी बाते करना याद नहीं है। बल्कि साथ बैठ कर भी कब की है बातें। आज एक बच्चे को उठाये एक बेबस से पिता को डॉक्टर से जल्द से जल्द मिलने की झुँझलाहट देखी और आप फिर याद आ गये। आप को याद होगा जब टाई पकड़ कर भागते हुए एक कुत्ता पीछे पड़ गया था..
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इंतज़ार

आँखें कैसी तो थक जाती हैं राह तकते तकते। और फिर दरवाज़े पर खामोश आहटें सुनाई देने लगती हैं। चहल कदमी और किसी के आने का अंदेशा। बाहर साये रंग पहनने लगते हैं.....फिर जाने कैसे तो लगता है यह वही है जिसका इंतज़ार था। एक आशावाद, कि धुंधली लकीरे साफ होकर द
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अमल

कभी कैसे तो सबकुछ बहुत खूबसूरत हो जाता है। जैसे कोहरे के बीच से सवेरा बादलों को धकेलता हुआ निकलता है। हल्की बूंदाबांदी के बीच से किरण निकल रंगों सी बिखर जाती है। उदर में उठी पहली हलचल, किसी अनजान घबराये बच्चे का पूरे विश्वास से उँगली थाम लेना , बाबूज
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चिट्ठियाँ

बक्से को खोलते ही एक अजीब सी गंध कमरे में फैली थी। बहुत दिनों से बंद हवा के अलावा कुछ शब्द भी महक रहे थे। बक्से में छोटे छोटे पुलिंदों में बँधे कागज़ थे। नीले अँतर्देशीय ,पीले पोस्टकार्ड और सफेद, गुलाबी पन्नों में साँस लेती करवट बदलती लँबी चिट्ठियाँ।
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हमसफर

तुम्हारे साथ सफर तय करना मुझे अच्छा लगता है। पर मैं तुम्हारा साया नहीं हूँ। मैं तुम्हारे आगे या पीछे नहीं चलना चाहती। मैं चाहती हूँ हम अपनी राह चल सके। तुम्हारे लिए मैं जड़े बन नमी खोज लाऊँ, पत्तियों सा जादू रचाऊँ...तुम खिल सको....बिल्कुल अपने रंगों
Jan 23 2009 11:06 AM
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याद

याद का क्या है ... आ जाती है। कभी किसी रंग पर...तो कभी किसी ढंग पर सवार। किसी गाने की बीच की धुन की तरह...तो कभी उन गाते हुए शब्दों के जज़्बे की तरह। कभी मिल जाती है कोई आवाज़ बिल्कुल किसी और से ....और उसके जायके में आता है याद का स्वाद। हँसते समय ना
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सवाल...?

सवाल हर तरह के हो सकते हैं। ऐसे जिनके जवाब सबको पता है। जैसे,"सूरज कहाँ से उगता है ?!" ऐसे भी जिनके जवाब खोजे जा सकते हैं, जैसे पृथ्वी की गोलाई...सबसे अच्छे टेनिस प्लेयर का नाम....सबसे बड़े तरबूज की जगह...रूस की सबसे लज़ीज मिठाई। सवालों के जवाब ढूँढन
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विगत

समय रुकता नहीं है, चलता चला जाता है। पेड़ के तने में जैसे एक और गोला...एक वर्ष का जीवनचक्र बीते हुए जीवनकाल में अंकित होकर लुप्त हो जाता है। लोग ,संदर्भ, संजोग मिलते हैं और बिछड़ जाते हैं। सब कुछ हमेशा नाटकीय नहीं होता। कभी कभार हाँ...। जैसे किसी हाद
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गुजरता समय

गुजरा समय विदा होना चाहता है। जैसे मैं कोई ठहरा हुआ पड़ाव हूँ और वह मुझसे मिल कर आगे निकल जाना चाहता हो। जैसे हम चॉक और स्लेट की तरह मिले और कुछ शब्द, कुछ स्वर...कुछ खाके , कुछ लकीरें खींच कर फिर डस्टर से मिटा आगे के लिए साफ कर लें। समय को गुजर जाने
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आई हैव नो रिग्रैट्स

मुंबई के ब्लास्ट्स के शोक के बीचोबीच मेरा ध्यान खींचा उस नौजवान आतंकवादी ने जिसने कहा उसे किसी बात का अफसोस नहीं है। निहत्थे निर्दोष लोगों की बेवजह जान लेने का अफसोस उसे क्यूँ नहीं है?!! उसकी आत्मा मर गई है या उसका दिमाग काम नहीं करता?!! उसके आँखों स
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जिजीविषा

सुबह के तीन बजे थे। डॉ सुनीति पेशियन्ट देखकर लौटी थी...और मैं अपने पेशियन्ट के रिपोर्ट का इंतज़ार कर रही थी। केरल की डॉ सुनिति के चेहरे पर एक अलग सा नूर है। सुंदरता की परिभाषा में शायद वे खरी ना उतरें। किंतु संवेदना से भरा सौम्य चेहरा देखकर यू ही तस्
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मन की माटी

उर्वर ज़मीन....जिसकी कोख में कितने ही बीज निंद्रा में डूबे हुए । नमी की बरसात में...प्यार पला ...नये बीज हवा में चले आये ,सोये बीज आँख मल कर उठे...अंकुर फूटे.....नये कोंपल....। गीली मिट्टी में नन्हे जड़ो ने पाँव रखे... बात बनी, भाव बने, याद बनी, साथ
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टू टाई और नॉट टू टाई...

पश्चिमी संस्कृति की बहुत सी बातें हैं जो हमने गाँठ बाँध ली है,लेकिन टाई का जवाब नहीं। स्कूल के बच्चों से लेकर दूल्हे के गले पर...फिर स्मार्ट एक्सीक्यूटिव से लेकर न्यूस रीडर तक...टाई बिल्कुल गरदन के करीब है। हो सकता है अजित जी टाई का सफर ढूँढ़ निकाले.
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अपेक्षा

उस दिन भी माँ ने टोका था। दिनभर गलियों में घूमना अच्छी बात नहीं है। छोटी सी बिना बाँह की फ्रॉक पहन मैं माँ की बात अनसुना कर फुदक कर बाहर भागी थी। रस्सी कूदते कूदते अपनी दोस्त के घर। पता नहीं माँ को मेरे दोस्तों से क्या परेशानी थी। होमवर्क, क्लासवर्क
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मेरा गाँव मेरी आँखों से...

मेरी रूह यहाँ की मिट्टी में गूंदी नूर के बूंद सी है नदि के किनारे घने पेड़ों के साये ....... कहीं कमल भी खिले थे ..... किस्से कहानी नाव में सवार इसी किनारे से कई बार चले थे यूँ लगता है इन पेड़ों के पीछे वे साथी छिपे हैं जो बचपन की पगडंडियों में मिले
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केरल के एक गाँव में बारिश में भीगा सा...

बारिश में भीग सकता है मन आसमाँ से मिली नमी... उधार की बूंदों की तरह पँखुड़ियों में सहेजी जा सकती है.... नमी सोंकने के लिए जड़ों की जरूरत होती है....
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पतझड़

किताब पुरानी थी। कबाड़ में देते देते वापस उठा ली थी। ना जाने क्या सोचकर पन्ने पलट दिये। किताब में से कई सारे सूखे पत्ते नीचे उतर आये। मुड़े, सूखे छोटे बड़े..। नज़र बाहर गई थी। फिर पतझड़ था। था। हर