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बतंगड़

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14 Jun 2010
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राजीव पर उंगली उठाते क्यों नहीं बनता

21 मई 1991 को राजीव गांधी की मौत हुई लेकिन, उसकी खबर देश भर में 22 मई की सुबह पहुंची। मुझे याद है कि इलाहाबाद में मेरे पढ़ाई के दिन थे। जब सोकर उठा तो, पता चला कि रात में जबरदस्त तूफान आया था। बारिश-तूफान की वजह से पानी-बिजली का संकट बन गया था। घर
 
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उत्तर प्रदेश में पावर फुल NDA

चौंकिए मत उत्तर प्रदेश में बहन मायावती की बहुजन समाज पार्टी भले ही सत्ता में है लेकिन, यहां चलती NDA की है। कम से कम सरकारी अधिकारियों के लिए तो सुकून का यही रामबाण है। दरअसल ज्यादा कमाई वाले विभागों में पोस्टिंग के लिए पैसे देना तो अभ पुरानी बात हो गई
 
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बंधक है लोकतंत्र

अमेरिकी सरकार के उप सचिव ने लगभग डांटने के अंदाज में उम्मीद जताई है कि भारत सरकार भोपाल गैस त्रासदी पर सीजेएम कोर्ट के फैसले के आधार पर फिर से ये केस नहीं खोलेगी। मेरा ये बहुत साफ भरोसा है कि भारतीय संविधान बड़ा बदलाव मांगता है जो, भारतीय लोकतंत्र को सही
 
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संविधान बदले बिना बात नहीं बनेगी

हजारों बेगुनाहों को मौत की नींद सुला देने वाले मामले पर आखिरकार 25 साल बाद भोपाल की सीजेएम कोर्ट ने फैसला सुना ही दिया। पंद्रह हजार से ज्यादा लोग भोपाल की यूनियन कार्बाइड से निकली जहरीली गैस से मारे गए। जबकि, अभी भी कम से कम से कम छे लाख लोग ऐसे हैं
 
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मीडिया का अछूत गांधी

 इस गांधी की चर्चा मीडिया में अकसर ना के बराबर होती है और अगर होती भी है तो, सिर्फ और सिर्फ गलत वजहों से। मीडिया और इस गांधी की रिश्ता कुछ अजीब सा है। न तो मीडिया इस गांधी को पसंद करता है न ये गांधी मीडिया को पसंद करता है। इस गांधी के प्रति मीडिया
 
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संविधान बदलने की बात दब क्यों गई

 1998 में हम लोगों ने इलाहाबाद के IERT यानी इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी परिसर में संविधान समीक्षा पर तीन दिन की संगोष्ठी कराई थी। उस समय विद्यार्थी परिषद (ABVP) पूरे देश में संविधान समीक्षा का मुद्दा जोर शोर से उठाए हुए था। वाराणसी में
 
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सोनिया मैडम, ये कौन सी पॉलिटिक्स है

शासन चलाने के साथ विपक्षी भूमिका भी अपने पास रख लेने की कला कांग्रेस से बेहतर किसी के पास नहीं है। नक्सलियों से निपटने पर केंद्रीय गृह मंत्री पी चिदंबरम का ताजा बयान कुछ इसी नीति को पुख्ता करता है। वैसे इस काम के लिए कांग्रेस अलग-अलग समय पर अलग-अलग
 
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नक्सलियों से आखिरी लड़ाई जरूरी

अब एक नया राग शुरू हुआ है कि पहली बार नक्सलियों ने आम लोगों की जान ली है। नक्सल आंदोलन की प्रबल पैरोकार अरुंधती रॉय कह रही हैं कि अगर दंतेवाड़ा से सुकमा जा रही बस में सचमुच पुलिस अधिकारियों के साथ आम लोगों की भी जान गई है तो, इसे किसी भी कीमत पर जायज
 
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और भी खेल हैं देश में क्रिकेट के सिवाय

फटाफट क्रिकेट का आधुनिकतम संस्करण इंडियन प्रीमियर लीग फटाफट घोटाले की सबसे आधुनिकतम मशीन बन गया है। वो, भी मशीन ऐसी कि समझ में नहीं आता कि आखिर कौन सा तरीका है जो, एक क्रिकेट टीम खरीदने के लिए करीब दो हजार करोड़ रुपए के निवेश पर मुनाफा कमाने की गारंटी दे
 
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प्रतिबद्ध कार्यकर्ता, भ्रमित नेता

भारतीय जनता पार्टी ने बुधवार को आज दिल्ली में जो रैली की वो, अपने आप में एतिहासिक कई मायनों में है। सबसे बड़ी बात तो ये कि भारतीय जनता पार्टी की इस 42 डिग्री की गर्मी में दिल्ली में हुई इस रैली ने साबित कर दिया कि घर बैठे कांग्रेस सरकार के राज में महंगाई
 
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इस अपराध बोध से मुक्ति कैसे मिले

 दरअसल मैं कुछ गलत नहीं कर रहा हूं लेकिन, फिर भी मुझे अपराध बोध हो रहा है। पानी पीते वक्त ले में अंटक जाता है। लगता है कि जितना पानी मैं पी रहा हूं उससे कई गुना ज्यादा पानी बर्बाद करने का दोषी भी मैं बन रहा हूं।मुंबई से जब दिल्ली आया था तो, महीने-
 
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अर्थ आवर पर मैंने बत्ती नहीं बुझाई

दुनिया को बचाने की तथाकथित अर्थ आवर मुहिम में भारत भला कैसे पीछे रहता। और, दिल्ली-मुंबई हमेशा की तरह ऐसी प्रतीकात्मक मुहिम में इस बार भी देश में सबसे आगे रहे। कम से कम इलेक्ट्रॉनिक-प्रिंट मीडिया के जरिए तो ऐसा ही दिखा। हमेशा ही ऐसा दिखता है। लेकिन, मैं
 
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एनसीपी में जा रहे हैं अमर सिंह?

ये सवाल फिर से खड़ा हो रहा है। हालांकि, इसकी कहीं भी चर्चा नहीं हो रही है। मीडिया में चर्चा सिर्फ इस बात की हो रही है कि अमिताभ बच्चन का अपमान कांग्रेस क्यों कर रही है। लेकिन, इस बात की तरफ शायद जानबूझकर लोग ध्यान नहीं दे रहे हैं कि अचानक अमिताभ बच्चन को
 
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रामनवमी के बहाने

रामनवमी के दिन हमारे पूरे सेक्टर में इसी तरह से छोटी बच्चियों का हुजूम घूमता दिख रहा था। ये हमारे सेक्टर की लड़कियां नहीं थीं। ये नोएडा के अतसंपन्न सेक्टरों के अगल-अगल बसे गांवों के परिवारों की बच्चियां थीं। जिन्हें अभाव की आदत होती है। ये बच्चियां हर घर
 
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मुलायम ने हराया डिंपल यादव को!

 अब तो ये सबको पता चल चुका है कि मुलायम सिंह यादव नहीं चाहते थे कि उनके घर की बहू डिंपल यादव संसद में चुनकर पहुंचे। दरअसल मुलायम को डर ये था कि संसद में डिंपल के पहुंचने पर लड़के डिंपल को देखकर सीटी बजाएंगे और भला ये नेता जी को कैसे बर्दाश्त होता।
 
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मैं महिला आरक्षण का विरोधी क्यों हूं?

आखिरकार जैसी आशंका सबको थी वही हुआ और एक बार फिर मुश्किल बाधा दौड़ पार करने के बाद आम सहमति के नाम पर कांग्रेस ने महिला आरक्षण बिल की आसान बाधा दौड़ पूरी करने से इनकार कर दिया। ज्यादातर लोग यही कहेंगे कि ये तो होना ही था। लेकिन, क्यों। इसका जवाब ज्यादातर
 
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हरामखोर, कमीने सिर्फ एक गर्लफ्रेंड, ब्वॉयफ्रेंड के साथ जिंदगी ... नामुमकिन है

किसी भी समाज की पहचान वहां के साहित्य और आसपास के माध्यमों की रंगत देखकर पहचाना जा सकता है। अकसर हम इस बात की चर्चा तो करते रहते हैं कि देश में हर क्षेत्र में गिरावट आ रही है। क्या नेता, क्या पत्रकार, क्या न्यायपालिका, क्या प्रशासन, व्यापारी और क्या ..
 
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बीजेपी ने अरसे बाद सही राह पकड़ी है

 इंदौर के राष्ट्रीय अधिवेशन से लौटने के बाद उत्तर प्रदेश के एक युवा बीजेपी नेता ने मुझसे कहाकि गडकरी जी अलग तो हैं। पार्टी सही रास्ते पर जाएगी। उस युवा नेता की आंखों की चमक नए अध्यक्ष नितिन गडकरी में भरोसा साफ दिखा रही थी। इसकी वजहें भी साफ हैं।
 
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देश की भगदड़ का जिम्मेदार कौन खोजेगा

अमेरिकन आइडल की नकल पर बने इंडियन आइडल रियलिटी शो के नोएडा ऑडीशन में इंडियन आइडल बनने की चाह रखने वालों की ऐसी भीड़ उमड़ी कि आयोजकों के सारे इंतजाम धरे के धरे रह गए। अनियंत्रित भावी इंडियन आइडल्स ने जमकर हंगामा किया, भगदड़ में रौंदे गए कई आइडल अस्पताल
 
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ममता जी इस बार नई ट्रेन मत देना

आज आने वाले रेल बजट में ममता बनर्जी कई नई दुरंतो ट्रेनों के अलावा दूसरी कई नई गाड़ियों के शुरू होने का एलान कर सकती हैं। हो सकता है किराया भी जस का तस ही रहे। दरअसल, हर रेल बजट में जनता को दो ही प्रमुख उम्मीदें रहती हैं कि रेल किराया न बढ़े और उनके इलाके
 
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Feb 24 2010 07:36 AM
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गलत नीति से सही समाधान की उम्मीद

केंद्र सरकार ने राज्यों से कहा है कि वो, टीचरों के रिटायरमेंट की उम्र बढ़ाकर 65 साल कर दें। साथ ही प्रोफेसरों को 70 साल तक पढ़ाने दिया जाए। केंद्र सरकार का ये निर्देश राज्यों को इस वजह से आया है कि देश के स्कूलों में पढ़ाने वालों की बेहद कमी है और अगर
 
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बेवजह नर्वस नहीं हैं शीला दीक्षित

ज्यादातर सरकारी नीतियां शहरों को ही ध्यान में रखकर बनाई जा रही हैं। पिछले बजट में सबसे ज्यादा पैसा जिन मदों में आवंटित किया गया, उनमें शहरों की बेहतरी प्रमुख है। देश की राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में रहते हुए लगता भी है कि सरकार शहरों की बेहतरी के लिए हर
 
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शहर तो हमने बनाए ही नहीं

सात साढ़े सात परसेंट की ग्रोथ का भरोसा हमारे प्रधानमंत्री-वित्त मंत्री को फिर होने लगा है। सब ठीक हो रहा है। शहरी अर्थव्यवस्था, शहरी उपभोक्ता पर फिर भरोसा जग रहा है। कंज्यूमर (जिसकी जेब में पैसे हैं और जो सबकुछ खरीद सकता है) फिर महत्व पाने लगा है। लेकिन,
 
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हम कुछ जुगाड़ तो खोज ही लेंगे

सर्दी के मौसम में भी इस बार बिजली की काफी किल्लत हो रही है। दिल्ली से लेकर इलाहाबाद कुछ घंटे की बिजली कटौती पक्की रही। नोएडा में 1-2 घंटे गई तो, इलाहाबाद में 10-1 का बिजली कटौती का कोटा पक्का रहा। बिजली बनाई ही नहीं जा पा रही है लोगों की जरूरत भर का।फिर
 
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ये हाईवे तो तरक्की के हैं लेकिन, ...

तरक्की की कई नई इबारतें साफ दिखने लगी हैं। इबारतें अभी पूरी कॉपी में 2-4 पन्नों पर ही लिखी हैं। इसलिए इन इबारतों का असर अभी खास नहीं दिखता। लेकिन, ये इबारतें पूरी कॉपी भर दें तो, सचमुच तरक्की के हाईवे पर हमारी रफ्तार तेज हो जाएगी।अटल बिहारी वाजपेयी जीवित
 
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अथातो घुमक्कड़ जिज्ञासा

भारत देख समझ लिया जाए तो, जीवन सफल हो जाए। अभी मेंहदीपुर के बालाजी हनुमान के दर्शन के लिए गया था। आगरा-जयपुर के शानदार हाईवे से होकर वहां के लिए रास्ता जाता है। मथुरा से इसके लिए रास्ता कटता है। आगरा-जयपुर हाईवे पर घुसने के कुछ ही देर में हमारी नजर
 
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क्या सलीके से दर्शन होने पर भगवान का महत्व कम हो जाता है

वैसे तो अकसर धार्मिक स्थलों पर अराजकता के किस्से अकसर देखने-सुनने को मिल जाते हैं। लेकिन, अभी राजस्थान के दौसा जिले के एक धार्मिक स्थल पर अराजकता का जो नजारा दिखा वो, सब पर भारी था। दौसा जिले के मेंहदीपुर में स्थित बालाजी हनुमान का मंदिर कुछ ऐसी ही अ
 
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दलित-ब्राह्मणवाद को रामबाण बनने से रोकना होगा

ये नए तरह का मनुवाद है। इसको नए तरह का ब्राह्मणवाद भी कह सकते हैं। फर्क बस इतना है कि इस ब्राह्मणवाद का कवच दलित होने पर ही मिलता है। ये दलित ब्राह्मणवाद इतना अचूक नुस्खा हो गया है कि बस एक बार हुंकारी लगाने की जरूरत है फिर पीछे-पीछे लाइन लग जाती है।
 
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मराठी भाजपा अध्यक्ष की चुनौतियां

भारी भरकम शरीर वाले नितिन गडकरी का भाजपा अध्यक्ष बनना कई मायनों में एतिहासिक है। वैसे तो नितिन गडकरी संघ के पूर्ण आशीर्वाद की वजह से ही उस कुर्सी पर बैठ पाए हैं जिस पद के जरिए अटल बिहारी वाजपेयी-लाल कृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जैसे भाजपा के दिग्गजों
 
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अब कितनी सनसनी होती है

रात के करीब साढ़े दस बजे थे। दफ्तर की छत पर खुले में बैठकर हम खाना खाने जा ही रहे थे। पहला कौर उठाया ही था कि संपादक जी का फोन आ गया। हर्ष, कोई गोलीबारी की खबर है क्या। नहीं सर, ऐसे ही कुछ हल्की-फुल्की झगड़े की खबर थी मैंने देखा था लेकिन, शायद हमारे
 
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ऐसा चमत्कार कैसे हो जाता है

हिंदी-अंग्रेजी का व्यवहार-बोलचाल हमें गजब का बदल रहा है। हिंदी के जिन शब्दों, क्रिया कलापों को हम हिंदी में सुनना नहीं चाहते वही अंग्रेजी भाषा में तब्दील होते ही अरुचिकर नहीं लगता। और, ये ऐसे घुस रहा है हमारे घर, परिवार, समाज में कि जाने-अनजाने हम भी
 
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ये हिंदी की लड़ाई थी ही नहीं

इसे हिंदी की लड़ाई कहा जा रहा था। कुछ तो हिदुस्तान की लड़ाई तक इसे बता रहे थे। देश टूटने का खतरा भी दिख रहा था। लेकिन, क्या सचमुच वो हिंदी की, हिंदुस्तान की लड़ाई थी। दरअसल ये राजनीति की बजबजाती गंदगी को हिंदी की पैकिंग लगाकर उस बजबजाती राजनीति को सह
 
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ये सोचकर करना-होना जरा मुश्किल था

कुछ बदलाव ऐसे होते हैं जिन्हें बहुत पहले से सोचकर करना शायद ही संभव हो। यहां तक कि कई बार जो बुराई दिख रही होती है उसी में छिपे बदलाव कुछ मायनों में बड़े सुखद होते हैं। मैं ये बदलाव महसूस तो पहले भी कर रहा था। लेकिन, अभी जब बिटिया के साथ इलाहाबाद में
 
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ढोंगी बाबाओं के अमीर भक्त

सत्यसाईं बाबा के चरणों में गिरे महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण की तस्वीरें ज्यादा दिन नहीं हुआ जब मीडिया में लगातार छाई हुईं थीं। मेरे मन में इसे लेकर कुछ सवाल उठे थे। वैसे सत्यसाईं के चरणों में गिरने वालों में अशोक चव्हाण ही नहीं थे। ICICI बै
 
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इलाहाबाद का रिक्शा बैंक

उत्तर भारत से तरक्की के विचार, आइडियाज हमेशा देश की तरक्की के काम आते रहे हैं। लेकिन, इसने एक बुरा काम ये किया कि उत्तर भारत के राज्य खासकर उत्तर प्रदेश-बिहार बस विचार भर के ही रह गए। और, यहां के लोग विचार और श्रम के साथ तालमेल नहीं बिठा सके। लेकिन,
 
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कहिए कि इसी वजह से गरीब रथ इतनी बची हुई है

गरीब रथ की दुर्दशा पर मेरी कल की पोस्ट पर विनीत ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया कि हमारे जैसे लोग गरीबों का हक मार रहे हैं। विनीत की टिप्पणी मैं यहां जस का तस चिपका रहा हूं। "इस ट्रेन के बारे में आपको इस बात पर भी लिखना चाहिए था कि किस दर्जे के लोगों के
 
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अब लगने लगा है कि गरीब रथ है

दिल्ली से राजेंद्र नगर पटना को जाने वाली राजधानी नई दिल्ली स्टेशन से छूटती है और करीब इसी समय शाम को चार बजकर पचास मिनट पर दिल्ली से राजेंद्र नगर पटना को जाने वाली गरीब रथ हजरत निजामुद्दीन स्टेशन से छूटती है। राजधानी में टिकट वेटिंग था और गरीब रथ में
 
हर्षवर्धन
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बिटिया के बहाने

हमारी बिटिया हुई तो, थोड़ा सा एक जो समाज में बेटा होने की खुशी होती है उससे थोड़ी सी कम खुशी के साथ लोग मिलते दिखे। जमकर जो खुश भी थे वो, लक्ष्मी के आने की बधाई दे रहे थे और साथ ही ये भरोसा भी कि अरे पहली लड़की हो या लड़का कोई फर्क नहीं पड़ता। अच्छी
 
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Nov 10 2009 11:15 PM
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निजी जिंदगी की अहम पदोन्नति

ये बड़ा प्रमोशन है। हर प्रमोशन की तरह इसमें भी जिम्मेदारी, अधिकार सब बढ़ गए। हमारी बिटिया आ गई है। अभी इलाहाबाद में ही हूं। अभी सिर्फ तस्वीरें डाल रहा हूं
 
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अमर प्रभाष जोशी

इलाहाबाद में हूं और खबरों से कटा हुआ हूं इसलिए अभी थोड़ी देर पहले प्रभाष जी के न रहने की खबर पता चली। जीवन रहते निजी मुलाकात का कभी मौका नहीं लगा था। लेकिन, ये खबर पता चली तो, लगा जैसे कुछ शून्य सा हो गया हो हिंदी पत्रकारिता में कौन भरेगा इस शून्य को
 
हर्षवर्धन