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16 Jun 2010
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इससे अच्छी तो बेइज्जती ठहरी।

16 साल का लड़का अपनी बहन के प्रेमी का कत्ल कर देता है। हम इसे ऑनर किलिंग कहते हैं। पिता, बेटी और उसके प्रेमी की हत्या कर देता है, ऑनर किलिंग है। ऑनर किलिंग को समझने में बहुत दिक्कत आ रही है। इस टर्म का इस्तेमाल इतना बढ़ गया
 
वर्षा
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varsha

यादों की बस्ती में रहना, भटकना, फिरना..कितना अच्छा लगता है। बीती बातों को बुहारने का अपना ही मज़ा है।बार-बार वही बात, वही घटना, वही मंजर,कभी ये नहीं लगता कितनी बार इसे याद कर चुके, इस पर कितनी बातें बनाई, कितनी हंसी उड़ाई, कितना चहके, कितना उदास ही
 
वर्षा
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सब रिश्ते पीछे, टीवी से रिश्ता पहले

मेरी मां टीवी देखती थी दोपहर में, जब हम स्कूल में होते, पापा ऑफिस और वो अकेली, हालांकि शाम मोहल्ले की औरतों से गुलजार हो जाती।मेरे सास-ससुर टीवी देखते हैं। एक ही सीरीयल बार-बार, वो एकता कपूर वाले। उनकी सुबह, दोपहर, शाम, रात सब टीवी के साथ होती है। मेरे
 
वर्षा
May 25 2010 09:48 PM
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ख़ूबसूरत थी इसलिये मीडिया ने कवरेज दी

निरुपमा भी उन कई नामों में से एक बन गई, जिससे जबरन ज़िंदगी छीन ली गई, मीडिया ने दिन रात लगकर उसका किस्स हर घर, हर ज़ेहन तक पहुंचा दिया, किसने मारा होगा निरुपमा को? मां ने, प्रेमी ने। एक नई हाईप्रोफाइल मर्डर मिस्ट्री।लेकिन एक बात बार-बार कौंध रही है,
 
वर्षा
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varsha

उकताई हुई औरतेंवो आटा गूंदती हैंखाना बनाती हैंबर्तन मांजती हैंझाड़ू लगाती हैंपोछा मारती हैंताउम्रगोदाम भर-भर जायेपूरी उम्र उनके गुंदे आटे सेसैंकड़ों एकड़ खेत में उगे गेहूं कीवो रोटियां पका चुकी हैंटनों बर्तन मांज चुकी हैं अबतकमीलों झाड़ू बुहार चुकींउकताई
 
वर्षा
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varsha

ये रोना रोने का बहुत मन कर रहा है। हम औरतों के अधिकारों को लेकर ख़बरें बनाते हैं। कभी कोई ऐसी ख़बर आ जाती है कि स्टोरी को इमोशनल टच देना होता है तो स्क्रिप्ट हमारी तरफ बढ़ा दी जाती है। औरतों की ख़बर बनाने के लिये ज्यादातर औरतों से ही उम्मीद की जाती है।
 
वर्षा
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देखने का सुख

मैंने कहीं पढ़ा था। अगर आपसे एक दिन के लिये आँखों की रोशनी छीन ली जाये तो पता चलेगा देखना कितना सुखद होता है, इसलिये हर चीज को इस तरह देखो जैसे आखिरी बार देख रहे हो, बोलो जैसे आखिरी बार बोल रहे हो, सुनो जैसे आखिरी बार सुन रहे हो, तब हम देखने-बोलने-सुनने
 
वर्षा
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varsha

test
 
वर्षा
Mar 08 2010 03:03 PM
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कुछ ऐसी प्रार्थना भी

हे प्रकृति मांतुमने मुझमे जो कोमलता दी हैउसके लिये शुक्रियापर मैं चाहती हूंतुम मुझसे थोड़ी कोमलता ले लोऔर कुछ निष्ठुरता भी दे दोहे प्रकृति मांतुमने मुझे जोप्रेमभरा ह्रदय दिया हैउसके लिये शुक्रियापर मैं चाहती हूं तुम प्रेम उसमें से थोड़ा कम कर दोथोड़ा
 
वर्षा
Mar 07 2010 03:09 PM
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कहां गये तारे वो

स्स्स्सालालालाये तो बड़ा गजब होइगामैं कहती हूंआसमान में अब नहीं दिखतेउतने तारे, उतने चमकीलेतोड़कर टांग दिये गये हों जैसेगगनचुंबी इमारतों की खिड़कियों मेंरात ढलेऔर सड़क पर चुपचाप खड़े खंभों पर भीमुंह चिढ़ाते निहत्थे आसमान कोलेकिन बड़ा बेशर्म है फिर भीचांद
 
वर्षा
Feb 27 2010 08:31 PM
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varsha

ग़ालिब छुटी शराब अभी पढ़कर छोड़ी है। रवींद्र कालिया साहब ने संस्मरण लिखा है। किताब के आखिर में उनकी पत्नी ममता कालिया के एक पत्र का ज़िक्र है, जो ममता कालिया जी को लिखा गया था, उपेंद्रनाथ अश्क साहब ने लिखा, जब ममता जी ने शादी की सालगिरह भूल जाने पर तूफान
 
वर्षा
Feb 27 2010 01:31 AM
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काहे को पकड़ना वहशत का रंग

कई बार किसी गाने का कोई ट्रैक दिमाग में अटक जाता है और ज़ुबान पर चढ़ जाता है। वो "मेरी भैंस को डंडा क्यों मारा भी हो सकता है" "पिया तू अब तो आ जा" टाइप्स भी। पता चलता है दो-दो दिन तक दिमाग़ उसी ट्रैक को बजाता रहता है,बार-बार फटकारते हुए भी आप उसे
 
वर्षा
Feb 21 2010 09:05 PM
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varsha

वेलेन्टाइन डे के सुअवसर पर टाइम्स ऑफ इंडिया में एक आर्टिकल है 'सकर्स फॉर रोमांस?' (अंग्रेजी में लिखने में कुछ दिक्कत आ रही है) औरतों के लिये। उसे पढ़कर मैंने भी मन ही मन एनलाइज किया। स्स्स्सालालाला...प्यार-रोमांस-इश्क-मुश्क ऐसी चीजें हैं जो सचमुच
 
वर्षा
Feb 14 2010 04:13 PM
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varsha

कैमरे का एंगल बदल इस चित्र को और खूबसूरत बनाया जा सकता था, पर बात तो यही कहनी थी, हाथ तो यूं ही थामना था, प्यार तो यही रहना था।
 
वर्षा
Feb 11 2010 10:01 PM
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varsha

घरकाटने को दौड़ता हैजब हम रहते हैंसिर्फ घर में*घरबहुत याद आता हैजब हम थक जाते हैंदुनियावी भागदौड़ में*घरछोड़ने का जी चाहता हैजब छिड़ी रहती है जंगआपस में*घरभूल जाता है कभीयार-दोस्तों की गप्पों मेंबीवी फोन कर बुलाती हैपति कोआ जाओ अबघर मेंबीवी रोज जिद करती
 
वर्षा
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varsha

स‌िर्फ पोछा मारने स‌े ही नहीं कार चलाने स‌े भी नॉर्मल डिलिवरी के आसार बढ़ते हैं। डायलॉग तो परफेक्ट था। हालांकि मैं इसका उदाहरण पेश नहीं कर पायी।साइकिल,स्कूटर,मोटरसाइकिल के बाद अपनी कार की कहानी भी तो बतानी है।मई-जून की चिलचिलाती धूप में दो पहिया वाहन पर
 
वर्षा
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बात पैसों की नहीं है

मैं उस समय खुद को बहुत असहज महसूस करती हूं जब कोई मेरे सामने हाथ फैलाए। भिक्षावृत्ति रोकने के लिए मेरी राय में भीख नहीं देनी चाहिए और जब भिखारी प्रोफेशनल हों। जैसे सड़कों-चौराहों पर बच्चे को गोद में लेकर उनके नाम पर भीख मांगती हट्टी-कट्टी औरतें। स्कू
 
वर्षा
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लाइफ को तो प्री-पेड कराओ

ये लाइफ टाइम प्री-पेड कार्ड है, वैलिडिटी खत्म होने की चिंता खत्म, बस पैसे डालो और टॉकिंग-शॉकिंग शुरु। जनाब इरफ़ान ख़ान साब भी टीवी पर ऐसा ही कुछ बांचते नज़र आते हैं। लेकिन लाइफ-टाइम प्री-पेड कार्ड बेचनेवाले की कॉल ने मेरी कज़न के लाइफ का बहुत सारा टा
 
वर्षा
Dec 29 2009 11:42 AM
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क्या हम खरे हैं ?

क्या हम चेकिंग के लिए लगी लंबी कतार देखकर झल्लाते नहीं। इससे बचने के उपाय नहीं ढूंढ़ते? क्या मॉल-सिनेमाहॉल जैसी भीड़भाड़वाली जगहों पर सिक्योरिटी वाले महज दिखावे की चेकिंग नहीं करते। क्या हम उसकी शिकायत करते हैं? क्या हम अपने ईर्द-गिर्द घट रही संदिग्ध
 
वर्षा
Dec 29 2009 11:42 AM
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चलो कुछ उम्मीद ले आएं

जो सर्जक हैं रचते हैं जीवन की बुनियादी शर्तें और गाते हैं चलो, उनसे उम्मीदों की उम्र सपनों की गहराई और उड़ान की ऊंचाई मांग लाएं अनाज की पूलियों की तरह लाद कर घर लाएं (ये कविता मैंने अपने कमरे की दीवार पर छपे पोस्टर से ली है। किसकी है ये पता नहीं। पर
 
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हम कहां जा रहे हैं?

नाइट शिफ्ट करके अभी-अभी घर पहुंची हूं। कम्प्यूटर देखते ही खुद को लिखने से नहीं रोक सकी। हालांकि मैं हमेशा ऐसे विषयों पर लिखने से बचती हूं। पर आज की सारी रात मुंबई हमलों में घायलों, मरनेवालों, बंधकों, रिहा होनेवालों के आंकड़े जुटाते-जुटाते खपी। इन पर
 
वर्षा
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'गर्ल्स जस्ट वाना हैव फन'

मोटरसाइकिल पर नाकामयाबी की पूरी दास्तान दिल्ली और नोएडा को जोड़ता डीएनडी फ्लाईओवर। इंसान की तरक्की के स‌पनों के फ्लाईओवर स‌रीखा। जहां गाड़ियों की रफ्तार हवा स‌े चंद कदम ही पीछे हो, आसमान से टकटकी बांध देखते तारों को खंभे पर टंगे स‌ीएफएल टक्कर देने की
 
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varsha

स्कूटर के छोटे पहियों पर आज़ादी की ऊंची उड़ान वो भी क्या दिन थे। हालांकि हर वक़्त, हर उम्र का, अपना मज़ा होता है, पर फिर भी स्कूटर के पहियों पर सवार होकर मानो मेरे पंख उग आए हों, ज़िंदगी की उड़ान भरने का वो सफ़र अब तक के अपने जीवन में मुझे सबसे ज्याद
 
वर्षा
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varsha

लाल परी और खुली हवा का पहला एहसास उसका नाम मैंने यही रखा था। आज़ादी का शायद पहला एहसास इस लाल परी के साथ ही हुआ था और खुद के बड़े होने का भी। आठवीं में थी मैं, जब मेरे पास मेरी अपनी साइकिल आयी। लाल रंग की। पसंद था उसका ये रंग मुझे। मेरी एक फ्रेंड के
 
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उसे प्यार करना आता है

वो खिन्न था खुद से, पूरी दुनिया से जबकि वो जानता था उसे प्यार करना आता है * वो अलसाता था अपनी दाढ़ी बनाने में पर दौड़ सकता था तुम्हारी एक आवाज़ पर * वो चाहता था सपनों की पतंग तानना पर तब वो ठोंकता था यूंही दीवार पर एक कील * पूरा होता था उसका सपना बहु
 
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varsha

so green
 
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varsha

सुबह की धुन सुबह की आस सुबह की ठंडक सुबह की ताजगी सुबह की चहचहाहट सुबह की ख़ुश्बू अभी सूरज निकला नहीं कल की बारिश के बाद धुली हुई रात से अंधेरे का पर्दा हटा सुबह आयी मुस्कुराती नाइट शिफ्ट का यही सबसे बड़ा फायदा है सुबह देखने को मिल जाती है सुबह-सुबह
 
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वह तोड़ती पत्थर

इस कविता को पोस्ट करने के लिए जो भूमिका पहले मैंने सोची थी वो ये कि मज़दूर दिवस है आज, धोती पहने, अंगोछा डाले, महिलाएं फटी पुरानी साड़ी पहने, मैले-कुचैले से दिखते लोग जिन्हें हम मज़दूर कहते हैं, उनकी नुमाइंदगी करता ये दिन। नहीं, मज़दूर तो हम भी हैं,
 
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तेरे वादे पे जिए हम, ये तू जान भूल जाना

तेरे वादे पे जिए हम, ये तू जान भूल जाना शेर तो जनाब मिर्जा ग़ालिब का है। सभी जानते हैं और जो लिखने जा रही हूं वो परसाई साहब की पोटली में से है। चुनाव की बहार है, हरिशंकर परसाई की "आवारा भीड़ के खतरे" किताब के एक चैप्टर पर नज़र चली गई। उससे कुछ लाइनें
 
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varsha

ऐसा लगता है हम सब सोते रहते हैं, कुंभकरण सरीखे, कभी-कभी जागते हैं, दिल में कुछ-कुछ चीजें हिलोरे मारती हैं, फिर रोज के कामों में खटती मशीनों की तरह सो जाते हैं, खुली आंखों के साथ। हमारे दिलों में जलती आग भी बुझ गई है। आग...अगर ये जलती रहे, तो घास भी ब
 
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varsha

एक कतरा ज़िंदगी कभी आंसू कभी हंसी * कोशिश उठे, चले, बढ़े खोया, खोया, पाया रुकते-रुकते पहुंचे वो रही मंज़िल * कल तुम हंसते थे मैं हंसती थी तुम रोते थे मैं रोती थी हम थे साथ-साथ अब भी हम हंसते-रोते हैं अब हम अलग-अलग * दो में दो जोड़ कर चार बना लिया कभी
 
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कल आंधी आयी थी

आंधी की ध्वनि कितनी गहरी होती है। सिर्फ सुनकर मन डर जाता है, जैसे प्रकृति नाराज़ हो रही हो या फिर रोमांच भरा कोई खेल चल रहा हो हवाओं का, हवा की तीव्रता, जिसमें सब कुछ उड़ा देने का आवेग हो, वृक्ष जैसे अपने पत्तों की सरसराहट से हवा को संदेश देते हों, क
 
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यादों के कौर

एक कौर शेर का, एक कौर चिड़िया का, एक कौर पापा का, एक कौर मां का। बचपन में जब खाना खाया नहीं जाता तो मां इसी तरह खाने को कुछ कौर में बांटकर थाली साफ करा देती थी। आज सुबह भी ऐसा ही हुआ। थाली में कुछ ज्यादा ही खाना परस लिया। छोले चावल थे। जी ललचा गया। प
 
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varsha

हाईवे ऑन माई व्हील्स कर के एक पोस्ट डाली थी। टिप्पणियों ने विश्वास डिगाने की पूरी कोशिश की। इस बार फोटुआ डाल रही हूं, अपनी भी, हाईईईईवे के साथियों की भी।
 
वर्षा
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औरत की ज़िन्दगी : रघुवीर सहाय

कई कोठरियाँ थीं कतार में उनमें किसी में एक औरत ले जाई गई थोड़ी देर बाद उसका रोना सुनाई दिया उसी रोने से हमें जाननी थी एक पूरी कथा उसके बचपन से जवानी तक की कथा
 
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बचपन के मास्टर

कभी-कभी मुझे बचपन के स्कूल टीचर्स का ख्याल आता है। उनसे जुड़ी तमाम यादें दिमाग की कोशिकाओं में छिपी हुई हैं। उनका पढ़ाना, उनके पढ़ाने का तरीका सबकुछ। टीचर अच्छा हो तो पढ़ाई भी अच्छी होती है, टीचर पर बहुत कुछ निर्भर करता है। छठी क्लास में हमारे एक 'सर
 
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varsha

प्रेम पर लिखी कोई कविता मैंने पहली बार पढ़ी है तो वो यही है। कुछ मायने तो मैंने समझे होंगे इसके, क्योंकि इसकी पहली लाइन में कभी नहीं भूली। मैं इसे प्रेम कविता मान रही हूं, वैसे इसका अर्थ ज्यादा बड़ा है। कबीर यहु घर प्रेम का, खाला का घर नाहिं सीस उतार
 
वर्षा
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प्रेम के पक्ष में.

अंग्रेजी गायिका हैं रॉग्जेट(roxette)। ये जरूर प्यार ही था, पर अब ये खत्म हो चुका है, ये जरूर अच्छा था, पर मैंने इसे खो दिया है। (It must have been love, but it's over now, It must have been good, but I lost it somehow)। प्रेम के पक्ष में इस गाने के ब
 
वर्षा
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प्रेम के पक्ष में

ये फ्रांसीसी कथाकार मोपासां की कहानी प्रेम का अंश है। कहानी शुरू होती है दो शिकारियों से,जिन्हें बहता हुआ नहीं बल्कि ठहरा हुआ पानी पसंद है। क्योंकि वहां पक्षी और दूसरे जीव रहते हैं, शिकार के लिए वो ऐसे ही एक दलदली इलाके में जाते हैं...बर्फ़ की चादर म
 
वर्षा
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हाईने ऑन माई व्हील्स

हालांकि मुझे लग नहीं रहा कि ये कोई बड़ी बात है, पर खुद को सुकून देनेवाली बात तो है ही। दिल्ली से देहरादून क़रीब ढाई सौ किलोमीटर का सफ़र तय करना था। नोएडा और दिल्ली के कुछ इलाकों को छोड़कर ज्यादा भीड़भाड़ वाली सड़कों पर ड्राइव करने से मैं कतराती थी। ज
 
वर्षा