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अनामदास का चिट्ठा

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17 Jan 2010
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पॉलिश जैसी स्याह क़िस्मत

नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के चौदह नंबर प्लेटफार्म पर सैकड़ों जूतों को स्कैन करता बारह साल का एक लड़का मेरे सामने रुका, "पॉलिश, साहब?"मेरे चेहरे और जूतों की रंगत को अनुभवी आँखों से एक-एक बार देखने के बाद उसने सवाल पूछा था, उसका अंदाज़ा सही था. मेरे जूतों को
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व्यवस्था के अंदर, बाहर और ऊपर

मैं इस व्यवस्था से ख़ुश नहीं हूँ लेकिन इसका हिस्सा हूँ. जीवन और परिवार चलाना है तो इस व्यवस्था के भीतर ही चलाना होगा. सारे क़ानून मानने होंगे, जिन्हें उन लोगों ने लिखा है जिन्होंने क़ानून लिखते वक़्त उसका जवाब भी अलग से लिख लिया था, ठीक वैसे ही जैसे
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अजित भाई, हिम्मत जवाब दे रही है

आपका बकलमख़ुद सरकलमख़ुद जैसा ही है. कई लोग हिम्मत जुटा लेते हैं, एक हफ़्ते से चिंता में घुला जा रहा हूँ कि आत्मकथानुमा क्या लिखूँ. आपका रिमाइंडर आने ही वाला होगा, दुनिया में शायद आप ही हैं जिसे मेरे सरकलमख़ुद न करने पर मलाल होगा. सच मैं लिख नहीं सकता
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Dec 29 2009 11:44 AM
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खिलौना बंदूक और असली ख़ौफ़

हिंसा का पारसी थिएटर हमने आपने ही नहीं, मेरे साढ़े तीन साल के बेटे ने भी खूब देखा है. मगर हिंसा का परिणाम किसने, कहाँ और कितनी बार देखा है. एक्सीडेंट एंड इमरजेंसी के डॉक्टरों, पुलिसवालों और कुछ दूसरे बदक़िस्मत लोगों को पता है कि गोली लगने पर ख़ून कैस
Dec 29 2009 11:44 AM
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क्या करें, कहाँ जाएँ, क्या बन जाएँ?

मैं एक भूरा आदमी हूँ. गोरों के देश में कुछ लोग मुझसे नफ़रत करते हैं, मुझे अल क़ायदा वाला समझते हैं, पाकिस्तानी मान लेते हैं, जबकि मैं भारत का हूँ. किसी ने कहा परदेस जाकर क्यों बसे, अपने देश में रहते तो अच्छा था. कहाँ रहता, आप ही बताइए, बिहारी हूँ, मु
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मी मंदबुद्धि मुंबईकर बोलतो आहे

मैं अकेला नहीं है, मेरे साथ 'ठोक रे' जी की सशक्त विचारधारा है, हमारे साथ तोड़फोड़कर है, काँचफोड़े है, माचिसमारे है, भाईतोड़े है. हमने बहुत अन्याय सहा है, अब नहीं सहेंगे, झुनका-भाखर आधा पेट खाके हम पहले ढोकला-थेपला वालों से लड़े, फिर इडली-सांभर वालों
Dec 29 2009 11:44 AM
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दुख ने दुख से बात की बिन चिट्ठी बिन तार

गरम-गरम ख़बरों को साफ़-सुथरा करके आगे बढ़ाने में अब हथेलियाँ नहीं जलतीं, सालों हो गए, आदत पड़ गई है. धमाका, धुआँ, लाशें, आँसू, बिलखते बच्चे... सब होते हैं लेकिन वे अब बेचैन नहीं करते. इराक़, अफ़ग़ानिस्तान और इसराइल की ख़बरों ने नहीं, अफ्रीकी देश आइवर
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Dec 29 2009 11:44 AM
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बिहार और बिहारी अच्छे लगने लगेंगे...

बिहारी सिर्फ़ वही हैं जो बिहार में रह गए हैं या बिहार से बाहर निकलकर भी ग़रीब हैं या फिर जिनकी बोली चुगली कर देती है, बाक़ी लोगों का बिहारी होना या न होना स्वैच्छिक है. जिन्होंने पद पा लिया है, पैसा कमा लिया है, अँगरेज़ी साध ली है... उन्हें बिहारी कौ
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उम्रेदराज़ के चारों दिन कटे

महीने भर की छुट्टी का महीनों से इंतज़ार था. बहुत सारे वादे-इरादे थे, अपनों से और अपने-आप से भी. दस साल से हर बार यही होता है, मंसूबे बनाए जाते हैं, कुछ पूरे होते हैं और ज्यादातर धरे रह जाते हैं. भारत से जाते हुए हर बार अजब सी कसक होती है, ये सोचकर कि
Dec 29 2009 11:44 AM
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उदासी के भूरे चुभते कंबल में लिपटे दिन-रात

हरे पेड़ नंगे हो गए हैं, दो महीने पहले तक अधनंगे घूम रहे लोग लबादे लादे डोल रहे हैं. लाल, पीले, गुलाबी फूलों और हरियाली पर धूसर पेंट की बाल्टी उलट दी है किसी ने. यूरोप में सर्दी सांकल खड़का रही है. सड़क पर डाल से बिछड़े पत्तों का अंबार है जो ठंडी हवा
Dec 29 2009 11:44 AM
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पहला नशा, उम्र भर का ख़ुमार

मौसम यही था, बस उमर कुछ और थी. दीवाली से पहले की हल्की ठंड, बारिश की टिपिर-टिपिर से राहत. अच्छी-सी धूप, मीठा-मीठा गन्ना बिकने लगा था. बारिश में जमी काई धूप से सूखकर झड़ गई और सारे काले-भूरे भुए तितलियाँ बनकर उड़ गए, बरसों बाद हासिल ज्ञान से पता चला क
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नवरात्र में शेर और स्कूटर पर सवार माताएँ

नवरात्र चल रहा पुण्यभूमि भारत में. नारी शक्ति की अराधना उत्कर्ष पर है. एक ऐसे देश में जहाँ शाम ढलने के बाद बाहर निकलने में महिलाओं को डर लगता है. भारत विडंबनाओं और विरोधाभासों का देश है, इसकी सबसे अच्छी मिसाल नवरात्र में देखने को मिलती है जब लोग हाथ
Dec 29 2009 11:44 AM
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सतरंगे देश को ब्लैक एंड व्हाइट मत बनाइए

अनगिनत रंगो-बू का देश, अनेकता में एकता का देश, रंग-बिरंगे फूलों का गुलदस्ता, इंद्रधनुष की छटा बिखेरना वाला भारत अचानक ब्लैक एंड व्हाइट हो गया है. तुलसी, सूर, तानसेन, कबीर, रसखान, खुसरो के देश में सिर्फ़ दो छंद, दो सुर, दो ही बातें...या तो ऐसा या फिर
Dec 29 2009 11:44 AM
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अर्थ की तलाश व्यर्थ की तलाश

अजीब-सा सपना देखा, मैं ज़ोर से बोल रहा था लेकिन अपने ही शब्द सुन नहीं पा रहा था. नींद में मेरे होंठ हिल रहे थे लेकिन कान और दिमाग़ मिलकर कोई अर्थ नहीं, सिर्फ़ बेचैनी रच रहे थे. यह गिने-चुने सपनों में था जो पूरे दिन याद रहा. रिप्ले कर-करके कितने ही अर
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आर्यभट मस्ट बी प्राउड

काल का पहिया 1510 साल में पूरा घूम गया. बिहार में जहाँ तरेगना है, वहाँ तारों को तरेगन कहते हैं. मिसाल- 'अइसा झापड़ मारेंगे कि दिन में तरेगन लउकने लगेगा'.शून्य देने वाले वाले गणितज्ञ, दार्शनिक और खगोलशास्त्री आर्यभट ने जब तारों की गति को समझने के लिए इस
Jul 23 2009 04:53 AM
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माँ सारदेSS कहाँ तू बीना बजा रही हैSS

हम बच्चों की पुकार माँ सारदे क्यों सुनतीं, लक्ष्मी ने हमारी प्रार्थना को पहले ही अनसुना जो कर दिया था. बाल विकास इस्कूल के बच्चे रोज़ाना माँ सारदे से पूछते थे कि वो कहाँ बीना बजा रही हैं. नीली कमीज़, खाकी हाफ़पैंट और बहती नाक बाले बच्चों को दून स्कूल
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आमिर-उल-बॉलीवुड

समाज, संस्कृति, सरोकार, समझदारी...जैसे जितने शब्द हैं उनका विलोम है हमारा समायिक हिंदी सिनेमा. भडैंती, भेड़चाल और भौंडापन, तीन भकार हैं जो बॉलीवुड पर राज करते हैं. डेढ़ महीने के अंतराल पर, अपनी पेशेवर-पारिवारिक ज़िम्मेदारियों के बावजूद बड़ी मुश्किल स
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सोच-समझ वालों को थोड़ी नादानी दे मौला...

समझदार होना सहज है और कठिन भी, जैसी फ़ितरत वैसी समझदारी. मैं समझता हूँ कि समझदार हूँ, आप भी होंगे, किसी से ज्यादा, किसी से कम. समझदारी इसी में है कि नासमझी को भी समझा जाए. 'समझ समझ के जो न समझे वही नासमझ है...' को फ़िल्मी मानकर मामूली न समझिए. अपनी न
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दिल्ली में रात-दिन की ऑडियो डायरी

चौकीदार की लाठी की ठक-ठक और सीटी की गूँज. बेमतलब की वफ़ादारी निभाते आवारा कुत्तों का कोरस. चर्र चूँ...ऊपर की मंज़िल पर खुला या बंद हुआ दरवाज़ा. बहुत रात हो गई अब सो जाना चाहिए. गाड़ी रुकी है मेन गेट पर, कोई कॉल सेंटर वाला आ या जा रहा होगा. पीएसपीओ वा
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गाय खाने वाले हिंदू, सूअर खाने वाले मुसलमान

ब्रैंडिंग बी स्कूलों की उपज नहीं है, सबसे पहले आदमी की ही ब्रैंडिंग हुई. वह हिंदू बना, मुसलमान बना, ईसाई बना, यहूदी बना...फिर सब-ब्रांडिंग हुई, शिया-सुन्नी, कैथोलिक-प्रोटेस्टेंट... धर्म के नियमों का पालन करना ज़रूरी नहीं, पहला धर्म यही कि आदमी जल्द स
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सावन सुहाना, भादो भद्दा, आख़िर क्यों?

सावन चला गया. पूरे महीने 'बरसन लागी सावन बूंदियाँ' से लेकर 'बदरा घिरे घिरे आए सवनवा में' जैसे बीसियों गीत मन में गूंजते रहे. राखी के अगले दिन से भादो आ गया है, भादो भी बारिश का मौसम है लेकिन ऐसा कोई गीत याद नहीं आ रहा जिसमें भादो हो. भादो के साथ भेदभ
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मुड़ी-तुड़ी पर्चियाँ मन के कोनों दबी हुईं

एक डरावना सपना देखा. चारों तरफ़ कचरा है, कचरे के अंबार से घिरा हूँ, कचरे में धंसा जा रहा हूँ, छटपटा रहा हूँ, कचरा लपककर अपने आगोश में लेना चाहता है. किसी एनिमेशन फ़िल्म की तरह. सपने अक्सर याद नहीं रहते लेकिन कचरे को छोड़कर पूरे दिन कुछ नहीं सूझा, कचर
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निम्न मध्यवर्गीय चौमासे का एक अध्याय

टिप टिप.. टुप टुप...बारिश के दिन कितने सुहाने होते हैं, तवे की तरह तपती ज़मीन के लिए. देश में कितनी छतें टपकती हैं इसके पुख़्ता आंकड़े कहीं उपलब्ध होंगे, ऐसा लगता तो नहीं है. इस बीच कोई राष्ट्रीय टपकन निदेशालय बन गया हो और मुझे पता न हो तो माफ़ी चाहत
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पोते के नाम थर्डवर्ल्ड के अम्मा-बाबा का संदेश

अगले शनिवार को मेरा बेटा चार साल का हो जाएगा, हम ख़ुश हैं कि वीकेंड है, बच्चों की कोई छोटी सी पार्टी कर लेंगे. बच्चे के बाबा-अम्मा (दादा-दादी) कई हज़ार किलोमीटर दूर बैठे तीन हफ़्ते से हलक़ान हो रहे हैं कि पोते का जन्मदिन आ रहा है, टाइम पर कार्ड मिलना
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आम बगइचा आदर्श विद्यालय

दू एकम दू, दू दुनी चार, दू तिया छै, दू चौके आठ...हिल-हिल के याद किया है, नए ज़माने के टू टू जा फ़ोर वाले बच्चे तो हिलते ही नहीं हैं.अब सिर्फ़ अलीफ़ बे वाले बच्चों को हिलता हुआ देखता हूँ जबकि हमारा इस्कूल पंडित जी चलाते थे, उनमें और मदरसा वाले म
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वसंत की वीकेंड डायरी

ऋतुराज वसंत आता है, चला जाता है, हम अपनी धुन में चले जाते हैं. थोड़ा रुकें तो पता चले, कौन आया, कौन गया. न अपने क़स्बे में, न दिल्ली में पता चला कि वसंत क्या होता है. लंदन में मेरे लिए दस साल से वसंत आता है, ठंड से सिहरे मन की कोंपले खिलती हैं लेक