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एकोऽहम्

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04 Jun 2010
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तुम-हम नहीं पाल सकते कबूतर

तुम-हम नहीं पाल सकते कबूतर सूचना प्रौद्योगिकी के विस्फोट ने दुनिया को गाँव में बदल दिया। अंगुलियों के पोरों पर दुनिया सिमट आई। ‘सात समन्दर पार’ वाले जुमले आज के बच्चों के लिए चुटकुले से अधिक नहीं रह गए। किन्तु उलटबासियाँ शायद सर्वकालिक होती हैं। यह अलग
 
विष्णु बैरागी
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दुर्जनों का सम्मान

मैं समझ नहीं पा रहा हूँ कि अन्ततः हम लोग चाहते क्या हैं? हम सोचते कुछ हैं, बोलते कुछ हैं और करते कुछ और हैं। हमारे संकटों का कारण कहीं हमारी अस्थिरचित्तता तो नहीं?मेरे कस्बे से प्रकाशित हो रहे साप्ताहिक ‘उपग्रह’ में मैं मेरा स्तम्भ ‘बिना विचारे’
 
विष्णु बैरागी
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एक बार फिर बिना शर्त क्षमा याचना

पावती सहित पंजीकृत डाक से24 मई 2010, सोमवारद्वितीय वैशाख शुक्ल एकादशी, 2067प्रति,श्रीयुत हरीशजी बी. त्रिपाठी,उच्च न्यायालय वकील,63/1 सुमित अपार्टमेण्ट,स्नेहलतागंत,इन्दौरमहोदय,आपकी पक्षकार सुश्री गायत्री शर्मा पिता श्रीयुत लक्ष्मीनारायणजी शर्मा निवासी
 
विष्णु बैरागी
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हाट में सरस्वती

‘सात लाख?’ सुनकर मैं मानो धड़ाम् से गिरा। लगा, फोन के चोंगे में ज्वालामुखी फूट गया है और लावा बह कर मेरे कानों में समाए जा रहा है। मैं बहरा हो गया हूँ। कानों से बहता हुआ लावा मेरे मुँह में आ पहुँचा है। मेरी जबान जल गई है। मैं बहरा ही नहीं, गूँगा भी हो
 
विष्णु बैरागी
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परम नहीं, ईश्वर आया मेरे घर

‘काकू! देखो, फोन बन्द मत करना। मेरी पूरी बात सुनना। तीस सालों से आप मुझसे कन्नी काट रहे हो। मुझे टाल रहे हो। मेरे खिलाफ भले ही कुछ नहीं कहते हो किन्तु मेरा नाम सुनना, मेरी बात करना पसन्द नहीं करते हो। लेकिन आज मैं बिलकुल वैसा हो गया हूँ जैसा आपने तीस साल
 
विष्णु बैरागी
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हम सब, निहालसिंह

इन दिनों निहालसिंह चर्चा में हैं। शायद ही कोई अखबार और समाचार चेनल बचा हो जिसने निहालसिंह की चर्चा न की हो। किसी ने कम, किसी ने अधिक, किन्तु चर्चा की सबने। एक समाचार चैनल ने निहालसिंह पर आधे घण्टे का विशेष कार्यक्रम प्रस्तुत किया और थोड़े-थोड़े अन्तराल
 
विष्णु बैरागी
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वरुण के बच जाने से उपजी खुशी

रीमा और वरुण मुझे चमत्कृत किए जा रहे हैं। मेरी कुछ धारणाओं को झुठलाए जा रहे हैं। कोई तीन-साढ़े तीन वर्षों से दोनों को ध्यान से देख रहा हूँ। प्रतिदिन उनके साथ कुछ समय गुजारना पड़ रहा है। कभी आधा घण्टा तो कभी एक घण्टा तो कभी इससे भी अधिक। जब भी उनके पास से
 
विष्णु बैरागी
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हिन्दी-शील-रक्षा हेतु यह लिखना जरूरी हो गया था

03 मई 2010, सोमवार वैशाख कृष्ण पंचमी, 2067प्रिय सुश्री गायत्री शर्मा,प्रसन्न रहो,हम परस्पर अपरिचित हैं।तुम जलजजी को नहीं जानती होगी। उनका पूरा नाम डॉक्टर जयकुमार जलज है। वे रतलाम में ही रहते हैं। उनकी आयु इस समय 75 वर्ष के आसपास होगी। वे मूलतः हिन्दी के
 
विष्णु बैरागी
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वृद्धाश्रम: मकान या मानसिकता

‘काल बेल’ की आवाज से ही नींद खुली। घड़ी देखी, अभी साढ़े छः ही बजे थे। दरवाजा खोला तो विश्वास नहीं हुआ। काका साहब सामने खड़े थे! उन्हें कोई वाहन चलाना नहीं आता। सायकिल भी नहीं। याने, लगभग सत्तर वर्षीय काका साहब, त्रिपोलिया गेट से कोई तीन किलोमीटर पैदल चलकर,
 
विष्णु बैरागी
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एक बार फिर पितृ विहीन हो गया मैं

मैं एक बार फिर पितृ-विहीन हो गया, इसी नौ अप्रेल को। मेरे पूज्य पिताजी श्रीयुत पण्डित द्वारकादासजी बैरागी के देहावसान के कोई साढ़े सोलह बरस बाद।लेकिन आगे कुछ भी कहने से पहले स्पष्ट कर दूँ कि यह पोस्ट मैं पूरी तरह से केवल खुद के लिए लिख रहा हूँ। इसकी
 
विष्णु बैरागी
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इलाज की नई, ‘विकट पद्धति’

‘विकटजी’ कुपित हैं। नहीं। कुपित कम और क्षुब्ध अधिक। झुँझलाहट से उबले जा रहे हैं। उनके साथ ‘यह सब’ करनेवाले दोनों लोगों का ‘किंचित मात्र भी’ नहीं बिगाड़ पाने की झुंझलाहट से। क्रुद्ध, बिगड़ैल साँड की तरह फूँ-फूँ करते हुए कभी मोहल्ले की चाय की गुमटी पर बैठ
 
विष्णु बैरागी
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यूलिप पॉलिसियाँ: जन्नत की हकीकत

यूलिप पॉलिसियों पर ‘सेबी’ और ‘इरडा’( भारतीय बीमा विनिमायक एवम् विकास प्राधिकरण अर्थात् आई आर डी ए) के बीच मचे द्वन्द्व में कौन सही है और कौन गलत, इससे परे हटकर, यूलिप पॉलिसियों की संरचना और इनकी सामाजिक-आर्थिक भूमिका पर विचार करने का यह ठीक प्रसंग और
 
विष्णु बैरागी
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लोकतन्त्र के बाराती

हम सात-आठ थे। सबके सब पूरी तरह फुरसत में। करने को एक ही काम था - भोजन करना। सबको पता था कि छः बजते-बजते भोजन की पंगत लग जाएगी। याने प्रतीक्षा करने का काम भी नहीं था। सुविधा इतनी और ऐसी कि माँगो तो पानी मिल जाए, चाय मिल जाए-सब कुछ फौरन। नीमच के डॉक्टर
 
विष्णु बैरागी
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उन्होंने अनुचित का समर्थन किया

नीमच जाने के लिए मैं इन्दौर-उदयपुर रेल में यात्रा कर रहा था। मन्दसौर में ‘उन्हें’ अपने डिब्बे में चढ़ता देख तबीयत खुश हो गई। ‘वे’ मेरे आदरणीय तो हैं ही, समूचे मालवांचल के ख्यात और सुपरिचित पत्र लेखक हैं। कोई दिन ऐसा नहीं जाता जब ‘उनका’ कोई न कोई पत्र,
 
विष्णु बैरागी
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पत्रकारिता की बारात का बूढ़ा

प्रकाशजी ने एक बार फिर ‘नईदुनिया’ का काम-काज सम्हाल लिया। इस बार उनकी पदोन्नति भी हुई। पहले वे ‘नईदुनिया’ के, मेरे कस्बे के कार्यालय प्रमुख थे। अब वे पूरे जिले के सलाहकार के रूप में पदस्थ किए गए हैं। उनका पदनाम भले ही ‘सलाहकार’ दिया गया हो किन्तु मैं
 
विष्णु बैरागी
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देश? क्या होता है देश?

दन्तेवाड़ा में हुए नक्सली हमले के बाद एक बार फिर राष्ट्र भक्ति का ज्वार आ गया है। हर कोई सरकार को कोस रहा है, सरकार की असफलताएँ उजागर कर रहा है। शहीदों के परिजनों को आर्थिक सहायता दिए जाने का मखौल उड़ाते हुए कोई कह रहा है कि प्रधानमन्त्री और गृह मन्त्री
 
विष्णु बैरागी
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मुख्‍यमन्‍त्री : नौकरों का नौकर

‘यह दुर्भाग्य ही है कि आप लोगों को हड़ताल करनी पड़ रही है, धरना-प्रदर्शन करना पड़ रहे हैं। आज सरकार भले ही हठधर्मी कर, आपकी बात नहीं मान रही है किन्तु मुझे साफ नजर आ रहा है कि आपको यूजीसी वेतनमान मिलेगा। शिवराज सरकार सौ जूते भी खाएगी और सौ प्याज भी।’ गत
 
विष्णु बैरागी
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बिना पतेवाला पोस्टकार्ड

जब भी कोई पत्र लेकर महेन्द्र भाई की दुकान पर जाता हूँ तो पहले तो वे और उनका बेटा नितिन खुश होते हैं और अगले ही क्षण ताज्जुब में डूब जाते हैं। महेन्द्र भाई का पूरा नाम महेन्द्र जैन (पाणोत) है और नगर के प्रमुख व्यापारिक क्षेत्र में उनकी, स्टेशनरी की
 
विष्णु बैरागी
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अधर्मी और धर्म-विरोधी मैं

मेरे कस्बे में आए दिनों किसी न किसी साधु-सन्त के प्रवचन आयोजित होते रहते हैं। जब-जब भी ऐसा होता है, मेरी शामत आ जाती है।साधु-सन्त के अथवा/और उनके मत के अनुयायी आग्रह करते हैं कि मैं ऐसे प्रवचनों में नियमित रूप से अपनी उपस्थिति दर्ज कराऊँ। कोई पन्द्रह बरस
 
विष्णु बैरागी
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धर्म और चक्करदार जलेबी

यह निठल्ला चिन्तन है। एकदम रूटीन वाला। फुरसतिया चिन्तन। जब करने को कोई काम न हो तो फिर यही काम हो जाता है।हमारे जीवन में धर्म की भूमिका क्या है? वह हमें रास्ता दिखाता है या रास्ता रोकता है? बिना किसी बात के, गए कुछ दिनों से ये सवाल मेरी आँखों के आगे नाच
 
विष्णु बैरागी
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दादाजी का व्यवहार और मेरा भय

‘हाँ भई! हाँ, मुझे तो इस घर में होना ही नहीं चाहिए।’ अड़सठ वर्षीय दादाजी क्षुब्ध, कुपित और आक्रोशित होकर अपने, दस वर्षीय पोते पर कटाक्ष कर रहे थे-घर के बाहर, ऐन सड़क पर आकर। इतनी जोर से कि आसपासवाले और आने-जानेवाले, न चाहकर भी सुन लें। ऐसा ही हुआ भी। सुनकर
 
विष्णु बैरागी
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महिला दिवस का क्षेपक

यह घटना मेरे कस्बे में आठ मार्च को घटी। आठ मार्च याने अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस।इन दिनों यहाँ नौंवीं और ग्यारहवीं कक्षाओं की परीक्षाएँ चल रही हैं। ये परीक्षाएँ स्थानीय स्तर पर हो रही हैं, बोर्ड स्तर पर नहीं। जैसा कि चलन हो गया है, नकल करने (और अध्यापकों
 
विष्णु बैरागी
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हिन्दी का आश्वस्ति पुरुष

भगवान भला करे, कर सलाहकार इन्दरमलजी जैन वकील साहब का जो उन्होंने मुझे आयोजन का निमन्त्रण-पत्र दे दिया और मुझे अनामन्त्रित श्रोता होने से बचा लिया। यह निमन्त्रण-पत्र नहीं मिलता तो भी मैं उस आयोजन में जाता ही। आयोजन था - रतलाम चार्टर्ड अकाउण्टण्ट्स सोसायटी
 
विष्णु बैरागी
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मूर्तिभंजक शिल्पकारों का देश

देश के एक सौ सर्वाधिक विश्वसनीय लोगों की सूची बनाने के लिए, ‘रीडर्स डाइजेस्ट’ द्वारा कराए गए सर्वेक्षण के परिणामों वाला समाचार मैंने ध्यान से, एकाधिक बार पढ़ा। पढ़कर मुझे खुशी कम और हैरानी तथा चिन्ता अधिक हुई। इस सूची के प्रथम दस व्यक्तियों में एक भी
 
विष्णु बैरागी
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वे बताएँगे और मनवाएँगे हमारे त्यौहार

क्या धुलेण्डी और क्या रंग पंचमी! दोनों ही इस बार लगभग बेरंगी निकलीं। कोई दूसरा त्यौहार होता तो इतना नहीं खटकता किन्तु होली ही तो वह इकलौता त्यौहार है हमारा जिसमें सब एक रंग हो जाते हैं। बाकी सारे त्यौहार तो कहीं न कहीं सीमा रेखा खींचे रखते हैं। होली ही
 
विष्णु बैरागी
Mar 06 2010 05:00 AM
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उठावने का निमन्त्रण

चीजें अचानक नहीं बदलतीं। धीरे-धीरे ही बदलती हैं। इतनी धीरे-धीरे कि उनके बदलने का आभास भी नहीं होता। यह धीमापन, बदलाव को स्वाभाविकता प्रदान करता लगता है। किन्तु वह परिवर्तन ही क्या जो अपने होने की प्रतीति न कराए! सो, यह प्रतीति होती तो है किन्तु अचानक ही।
 
विष्णु बैरागी
Feb 20 2010 05:00 AM
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उत्सव: सरकार के या हमारे?

अपने उत्सव मनाने के लिए हम सरकार पर निर्भर हो गए हैं? अब सरकार तय करेगी कि हम अपने उत्सव मनाएँ या नहीं? हमारी सांस्कृतिक परम्पराएँ और लोकोत्सव किसी जिम्‍मेदारी हैं-हमारी या सरकार की? अपनी सांस्कृतिक परम्पराओं को बनाए रखने के लिए हम सरकार की कृपा के
 
विष्णु बैरागी
Feb 13 2010 05:00 AM
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मेरी ‘सच्ची-सच्ची’ भाभी

ईश्वर सब सुख एक साथ कभी नहीं देता। इसे चाहें तो ‘कोई न कोई कसर रख ही देता है’ कह दें या फिर यह कि वह किश्त-किश्त में सुख देता है। ऐसा ही इस बार मेरे साथ हुआ-तीन रात और लगभग सवा दो दिनों तक सुख सागर में गोते लगाने के बाद भी एक सुख की कसर रह गई।बरसों बाद
 
विष्णु बैरागी
Feb 12 2010 03:40 PM
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अकेला करता धर्म

अकेला करता धर्मकुछ बातें सुनने में तो तत्काल अच्छी लगती हैं किन्तु समझ में बाद में आती हैं। होना तो यह चाहिए कि दोनों ही स्थितियों में आनन्दानुभूति हो किन्तु आवश्यक नहीं कि ऐसा हो ही। कुछ ऐसा ही में गए कुछ दिनों से अनुभव कर रहा हूँ। जब भी यह बात मन में
 
विष्णु बैरागी
Feb 11 2010 07:11 AM
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परसाई के वानर और स्वदेशी लँगोटधारी

(यह पोस्ट मेरे बेटे वल्कल के एक कक्षापाठी मित्र ने लिखी है। बाबुल सुप्रियो इसका वास्तविक नाम नहीं है। यह देखकर कि बहुराष्ट्रीय कम्पनी में कार्यरत, 30 वर्षीय नौजवान को भी ऐसी बातों से पीड़ा होती है, उसके मन में क्षोभ उपजता है तो सच मानिए, मन को ठण्डक मिलती
 
विष्णु बैरागी
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छोटी-छोटी बातें

नहीं। वे तीनों परिहास नहीं कर रहे थे। उपहास तो बिलकुल ही नहीं कर रहे थे। मुझे आकण्ठ विश्वास और अनुभूति है कि वे तीनों मुझे भरपूर आदर और सम्मान देते हैं। हाँ, साप्ताहिक उपग्रह में मेरे स्तम्भ ‘बिना विचारे’ में मेरे लिखे पर तनिक विस्मित होकर
 
विष्णु बैरागी
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जैन साहब का पत्थर

जैन साहब जिस तटस्थ-भाव और अविचलित स्वर में बोल रहे थे, वह मुझे चकित ही कर रहा था। उनकी जगह मैं होता तो अपनी ‘वैसी’ सफलता पर पता नहीं क्या कर बैठता! पर जैन साहब अपनी व्यक्तिगत सफलता की सूचना सहज भाव से, संयत स्वरों में ऐसे दे रहे थे मानो किसी और के किए की
 
विष्णु बैरागी
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प्रतिभा पाटिल बनाम झमकू

मेरे जिले की, जनजातीय (भील) समाज की सागुड़ी, रुपली, भागूड़ी, झमकू, दरली, तीजड़ी, फुन्दी और ऐसी ही अन्य कई स्त्रियों ने अनायास और अचानक ही, राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा देवीसिंह पाटिल की बराबरी कर ली। इससे पहले वे एक मामले मे ही उनके बराबर थीं। अब दो मामलों
 
विष्णु बैरागी
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मालवा का महाकाल

याद नहीं आता कि निगम साहब से इस बार का मिलना कितने बरसों बाद हुआ। लेकिन मिलने पर पाया कि वे वैसे के वैसे ही हैं जैसे कि कुछ बरस पहले मिले थे। लगा, उन्होंने काल को अपनी मुट्ठी में बन्द कर नियन्त्रित कर लिया हो।मैं बात कर रहा हूँ उज्जैन निवासी डॉ। श्याम
 
विष्णु बैरागी
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गाँधी विचार पर पुनर्विचार: एक दृष्टिकोण

रोटरी अन्तरराष्ट्रीय के पूर्व मण्डलाध्यक्ष श्री आलोक बिल्लोरे का यह लेख मुझे श्री रमेश चोपड़ा (बदनावर, जिला धार, मध्यप्रदेश) ने ई-मेल से भेजा है। पढ़ें और विचार करें। गाँधीजी के विचार, ‘बुरा मत देखो, बुरा मत सुनो, बुरा मत कहो’ पर हम पुनर्विचार कर सकते
 
विष्णु बैरागी
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मैं अकेला तो नहीं?

जीवन में सब कुछ प्रिय और मनोनुकूल नहीं होता। आपका नियन्त्रण केवल आप पर ही होता है, अन्य पर नहीं। ऐसे में, आप कितने ही ‘समय-पालनकर्ता’ हों, दूसरे भी वैसे ही हों, यह अपेक्षा और आग्रह ही कर सकते हैं। इससे अधिक कुछ भी नहीं। किन्तु अपेक्षा तो दुःखों का मू
 
विष्णु बैरागी
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मोदी की प्रशंसनीय पहल

अब नरेन्द्र मोदी केवल, राज्य द्वारा प्रेरित, प्रोत्साहित ओर संरक्षित सामूहिक नस्लवादी नर संहार के लिए ही नहीं, भारतीय लोकतन्त्र की श्रेष्ठ सेवा के लिए भी याद किए जाएँगे। मैं उन लोगों में से एक हूँ जो नियमित और निरन्तर यह माँग करते रहे हैं कि मतदाताओं
 
विष्णु बैरागी
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सड़कछाप आदमी आदमी की बातें

जब खुद ही ऐसे प्रपंच करते हैं तो वे झूठ और भ्रष्टाचार का विरोध किस मुँह से करते हैं?’ यह सवाल दाग कर वह चला गया। यह सत्रह दिसम्बर की बात है। उससे तीन दिन पहले, चौदह दिसम्बर को मेरे कस्बे के नगर निगम के चुनावों के लिए मतदान हुआ था। सत्रह को मतगणना हो
 
विष्णु बैरागी
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एकान्त के बुनकर

उस दोपहर तेज बरसात हो रही थी। बरसात के तेवर देखने बाहर आया तो देखा-आचार्यजी सामनेवाले मकान के बरामदे में खड़े हैं। आचार्यजी याने सेवा निवृत्त प्राध्यापक डॉक्टर मणीशंकरजी आचार्य। हिन्दी के ज्ञाता, एकाधिक पुस्तकों के रचयिता, ऑरो आश्रम को समर्पित। आचार्य
 
विष्णु बैरागी
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धन्यवाद ब्लॉग! धन्यवाद मित्रों!

बाँटने से खुशी बढ़ती है और दुःख कम होता है। सो, अपनी खुशी में बढ़ोतरी के लालच के वशीभूत मैं, आज अपनी खुशी आप सबके साथ बाँट रहा हूँ। बरसों से मेरी इच्छा थी कि मैं ‘जनसत्ता’ में छपूँ। दसियों बार वहाँ अपना लिखा भेजा। एक बार भी नहीं छपा। कोई एक पखवाड़ा पहले
 
विष्णु बैरागी