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क्या करूँ मुझे लिखना नहीं आता...

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09 Apr 2010
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इलज़ाम का डर...

हर बात ज़ुबाँ पे लाते हैं सोच समझ कर,जाने किस लफ्ज़ का मतलब क्या क्या निकले,बेवजह हँसने का ईलज़ाम दिया सबने,जब भी हम लबों पे मुस्कान सजा निकले,निकले थे हम तो देने दिल से खुशी सबको,ये सोचकर कि हम हैं हिस्सा उन की ज़िन्दगी का,दिल टूट गया जब ये देखा,अन्जान हैं
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एक वीरान घर...

गली के इस मोड़ से तीसरा घर,खड़ा है आज बिल्कुल वीरान सा,इसकी पौने तीन दीवारें भी लगती हैं,जैसे कर रही हो किसी पे ऐहसान सा,दीवारों के फीके रंग, और उनमें कई दरारें,खिड़कियाँ भी आधी खुली सी हैं,जैसे आज भी कोई किसी का रास्ता निहारें,छत भी एक बार ऐसी टूटी की
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पागल दिल

अपने दिल के पागलपन को,किसे बताऊँ, किस-किस से छुपाऊँ,इस भोलेपन के मारे को,क्या-क्या कहूँ? कैसे समझाऊँ?बस यूँ हि ये किसी के आगे,रो पड़ता है, हँस देता है,एक दो मीठे बोल मिलें तो,उसी को अपना कह देता है,नहीं समझता बात ये इतनी,दिल का हँसना, दिल का रोना ठीक
Apr 05 2010 11:10 AM
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मेरे निश्बदों को पढ़ के दिखा

लिखे को तो सब पढ़ लेते हैं,तू वो पढ़ जो अब तक मैनें ना लिखा,शब्दों की गहराई नापना सबके बस की बात नहीं,ग़र हो सके तो मेरे भावों के तल को छूकर दिखा,अपनी हर कविता मे से जाने कितने शब्द मिटा दिए,दिल की बात ज़ाहिर ना कर दें, ये सोच कर सब छिपा दिए,ढक दिया उन्हे
Feb 17 2010 10:18 AM
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यूँ ना मिल मुझसे कि ख़फा हो जैसे...

यूँ ना मिल मुझसे,कि ख़फा हो जैसे,चल ना यूँ साथ मेरे,आसमाँ मे बस एक घटा हो जैसे,एक अन्जान मुसाफिर सी जाने कब बन गई तू,तेरी बातें भी यूँ लगती है कि कोई एहसान हो जैसे,तेरी मौजूदगी नहीं, साथ चाहिए मुझे तेरा,अभी तो लगता है कि हवाओं से बातें हो रही हो
Feb 11 2010 02:19 PM
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मैं कविता लिखा करता था

तारों भरी रात में,चाँदनी की बरसात में,शब्दों के जुगनुओं से,आने वाली काली रातों को भी रोशन करता था,मैं कविता लिखा करता था,लिखता था मैं कुछ अपने लिए,दिल की बातें खुद से बोला करता था,बस कागज़ कलम थे साथी मेरे,मैं उनसे खेला करता था,मैं कविता लिखा करता था,अपने
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केवल कुछ परम् मित्रों के लिए

यादो का एक कंकर जो मन की झील में फेंका,ठहरे पानी सा रुका दिल मेरा भी मचल उठा है,उठ के देखा मैने खुद को जब आईने में अपने,अपने अक्स मे चेहरा मुझे इक ओर दिखा है,चेहरा था वो मुझसा मगर मुस्कान थी तेरी,आँखों मे मेरी ख्वाब, ऐ दोस्त, तेरा ही दिखा है,मिलते हैं कई
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कविता लिखनी हो तो खुशी की लिख

कविता लिखनी हो तो खुशी की लिख, इनको बीती यादों मे ना डुबोया कर, बहुत कुछ है आज में लिखने के लिए, इस आज की खुबसूरती को शब्दों में पिरोया कर, घर से बाहर निकल, देख गली मे कितनी चेहल पेहल है, हर चेहरे की एक अलग कहानी, उस कहानी के रंगीन किरदारों की मुस्का
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एक माँ जैसी कलम

एक माँ जैसी है मेरी ये कलम, पालती है मेरे शब्दों को अपनी कोख में, वहीं उन्हे सीँचती है जाने कितने ही भावों से, और फिर जन्म देती है किसी गीत, किसी कविता को, जब भी रोते बिलखते हैं मेरे गीत, उन्हें कागज़ की कोरी सेज पर थपकियाँ देकर सुलाती है, उन्हे भेज द
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जाने क्या हुआ अचानक

कुछ रास्तों पर मैं चलता था, वो राहें जानी अन्जानी सी, ना मेरी मन्ज़िल की ख़बर उन्हें, मेरे लिए भी रही वो हमेशा बेगानी सी, फिर एक मोड़ मुड़ा, एक राह मिली, जिस से एक पुराना नाता था, कुछ देर को मैं भी ठहर गया, कब से इधर उधर भटकता जाता था, पहले बिठाया अपन
Oct 14 2009 07:36 PM
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बनावटी हक़

क्यों फिक्र हो हमे उन लोगों की, जो पल में रुप बदल जाते हैं, हँसते हैं किसी की हँसी मे शामिल होने के लिए, और रोता हुआ देख कर उनसे मुँह फेर जाते हैं, किसी की ज़िन्दगी का हिस्सा बनने के लिए, अपने अकेलेपन और दुखों को उनके जैसा बताते हैं, कहते हैं बिना कहे
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जब वो मिले

मैनें पूछा कैसे हो, बदले हो या वैसे हो, कहते हो अब भी दोस्त हमे, या इक अन्जान मुसाफिर जैसे हो, रुप वही, आवाज़ वही, मेरी बातों का तो अन्दाज़ वही, वैसा ही हूँ जैसे छोड़ा था, और तुमसे मिलने को दिल बेताब वही, पर तुम मे कुछ तो अलग सा है, तुम्हारी आँखो मे वो
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तुम और ये बारिश

घिर आया सावन, शायद आज तू मुस्कुराई है, लम्बी खामोशी की तेज़ धूप के बाद, बारिश मेहमान बन के आई है, हवा का एक झोंका चला, शायद तेरे सकुचाने से, फिर अचानक धीमी हो गई बरसात, शायद किसी बात पे तू शर्माई है, मिट्टी से सौंधी सी खुशबू आई, पेड़ों पर सब पत्ते धुल
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बहुत !!!

हैं लिखने वाले बहुत, हैं सुनने वाले बहुत, हर दिल मे है छुपी अनकही कहानियाँ बहुत, कहानियों के कई किरदार हैं, कहीं बेरुखी तो कहीं प्यार है, दो साँसों जितना वक्त है सबके पास, पर सब कुछ पाने की हसरतें हैं बहुत, आँखों में कई सपने हैं, कई अन्जाने भी लगते अ
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मेरी कलम के आरोप - भाग २

मैं खुद से लड़ता रहता हूँ भाग 1 अपनी कलम के रुठ जाने के बाद, कुछ शब्दों के लिए कई लोगों से उम्मीद लगाई थी, हाथ तो ना फैलाये थे किसी के आगे मैने, बस मन ही मन अपने दोस्तों को पुकार लगाई थी, हैरान हुआ कि सबने मेरी कलम का ही साथ दिया, बिना सुने मेरी किसी
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मेरी कलम के मुझ पर आरोप

आज कुछ लिखने बैठा तो अचानक मेरी कलम रुक गई, कहा कि बस, अब मैं और ना सह पाऊँगीं, बहुत समय से तुम्हारे दिखावे का साथ दे रही हूँ, अब मैं सबको तुम्हारी असलियत बताऊँगीं, खुद को कवि कहते हो, पर इसका मतलब तक तुम नहीं जानते, सबकी भावनाएँ समझने का दावा करते ह
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ऐ भोली लड़की

ऐ भोली लड़की! ना लोगो की बातों से मन अपना दुखा तू, इक पत्थर बन कर रह जाएगी, तेज़ बहुत है वक्त का दरिया, तू भी इस में बह जाएगी, कोई आँधी तूफान भी अगर चलते हैं, तू अपनी आहों को दोष देती है, कोई देखे ना देखे तेरी इन नम आँखों को, तू अपने आँसुओं में खुद ही
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ज़रा सा शक़

एक छोटी सी नादानी हम हर बार करते हैं, दिल दुखाते हैं उनका, जो हम पर ऐतबार करते हैं, हर रिश्ता टिका होता है विश्वास की बुनियाद पर, और हपने शक से उसी नीँव पर हम वार करते हैं, लाख दुहाई देते हैं रिश्तों में गहराई की, इक दूसरे को समझाने का दावा तो हर बार
Jun 05 2009 10:04 AM
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हमारी ज़िद्द

मंज़िल पर सबसे पहले पहुँचने की ज़िद्द है, हर काम को सबसे बेहतर करने की ज़िद्द है, अपनी ज़िन्दगी तो हम कल परसों ही जियेंगें, आज तो बस कल का इन्तज़ार करने की ज़िद्द है, कल की यादों में, कल की चिन्ता मे, देखते ही नहीं कि ये आज हमारे लिए क्या लाया है, कभी सोचा
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मैं आज एक कविता लिखना चाहता हूँ

मैं आज एक कविता लिखना चाहता हूँ, कविता के शब्दों से अपनी आवाज़ सबको सुनाना चाहता हूँ, सबकी तरह मेरे पास भी कुछ कहने सुनने का वक्त ही कहाँ है, फिर भी कुच लिख रहा हूँ, पता नहीं मन की बात कह पाऊँगा या नहीं, इसलिए पहले बोलना सीख रहा हूँ, सीख रहा हूँ क्यों
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एक अन्जाना पथिक

आधी रात और सूनी सड़क, मैं अन्वरत चला जा रहा था, एक अन्भिग्य पथभ्रष्ट पथिक की तरह, जैसे अगले चौराहे पर कोई अपना सा मिल जाएगा, जैसे वो मुझ जैसे एक भटके हुए राहगीर को एक रास्ता दिखाएगा, मेरी मंज़िल तक ले जाएगा, और अचानक मुझे मिला भी, मिला मुझे समय, कुछ ज
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तू क्यों लिखता है?

लोग पूछते हैं कि तू क्यों लिखता है? आखिर क्या कहना चाहता है, किसके लिए लिखता है, लिखता हूँ कि किसी के लिए कि शायद उसका दिल बेकरार हो, और कहे मुझसे वो कि मेरी साँसों मे तू बसता है, रोज़ शाम को लिखता हूँ एक कविता अपनी पूरी भावनाओं के साथ, जाने कौन मेरी
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प्यार को मजबूर मत करो

रेत हाथ मे हो तो मुट्ठी बंद मत करो, रिश्तों को खुद से बंधे रहने पर मजबूर मत करो, अन्जलि को कसने से पानी नहीं टिकता, वहीं ओस की बूँदें चिकने पत्तों पर भी ठहर जाती हैं, रिश्तों में ज़रुरत है एक दूसरे के दिल की बात सुनने की, बस अपनी बात मनवा कर अपना हक़
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रंगो का विवाद

इक दिन लड़ पड़े सब रंग आपस में, कौन किस से बेहतर, कौन सबसे प्यारा है, कौन है जिसके सब दीवाने हैं, किस रंग में डूबा से जग सारा है, हरे रंग ने अपनी बात रखी, कहा कि मैं तो जीवन का प्रतीक हूँ, पेड़ों, पत्तों फलों सबज़ियों में हूँ मैं, चारो ओर की हरियाली औ
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उदासी क्यों है?

कुछ पूछ रहा है ये आलम सारा, आज सुहाने चाँद से मुख पर तुम्हारे उदासी क्यों है, रोज़ सबको खुशियाँ देती है तुम्हारी मुस्कान, तो आज ये फिज़ा उस मुस्कान की प्यासी क्यों है? तुम्हे खुश देख कर तो मौसम भी खुश हो जाता है, कहानियों के कई किरदारों की जान हो तुम,
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बस एक बार

बस एक बार मैं तुमसे मिलना चाहता हूँ, बस एक बार अपने बारे में कुछ कहना चाहता हूँ, बहुत कुछ है बताने को मेरे पास, बस एक बार दिल खोल कर बोलना चाहता हूँ, कई बार सोचता हूँ कि तुम क्या सोचती हो, मेरी बातों और मेरे ऐहसासों के बारे में, कुछ पाक़ जज़्बात हैं त
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अब नीँद नहीं आती

इन सपनों की वजह से अब नीँद नहीं आती, कहीं खोया रहता हूँ, कोई चीज़ मुझे नहीं भाती, हर सपने में कुछ यादें, कुछ तस्वीरें हैं, जो धकेलती हैं मुझे बीते दिनों में, तो कुछ राहें इतनी बुरी हैं कि, आने वाली मंज़िलों के बारे में कुछ नहीं बताती, सुना है कहीं एक अ
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कभी यूँ भी आ मेरी आँखों मे

कभी यूँ भी आ मेरी आँखों मे, कि मेरी नज़र को भी ख़बर ना हो, मुझे एक ऐसी रात नवाज़ दे, जिसकी कोई सेहर ना हो, गीली आँखों मे कुछ गीले से ख्वाब हैं, आराम से उठाना उन्हें, कहीं टूट ना जाएँ वो, दिन की धूप में सुखा कर तय कर के रख देना, कि फिर इन आँसुओं से भीग
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सच्चाई और सपने

एक दिन सपने और सच्चाई मे अलग सा ही संवाद हुआ, कौन है किस से बेहतर, इस बात को लेकर विवाद हुआ, कहा सच्चाई ने कि तुम तो एक धोखा हो, एक दिखावा हो, कुछ सच नहीं तुम मे, तुम बस एक छलावा हो, तुम सबकी खुशियों के रेत के महल बनवाते हो, उन को पल भर की झूठी तस्सल
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मैं...

मैं साहिल पर उकेरा कोई नाम नहीं जो एक लहर से मिट जाऊँगा, मैं वो बादल भी नहीं जो बरस कर खत्म हो जाऊँगा, मैं एक पवन का झोंका नहीं जो आ के बह जाऊँगा, ना ही मैं चाँद हूँ जो बादलों के पीछे छुप जाऊँगा, नहीं मैं वो पानी जो गर्मियों मे सूख जाऊँ, ना मैं हूँ व
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चलो आज एक अच्छी सी कविता लिखता हूँ

चलो आज एक अच्छी सी कविता लिखता हूँ, दुख नहीं, उदासी नहीं, आज अपनी कलम से खुशी का एक पैगा़म लिखता हूँ, पंक्तियाँ, जिसे पढ़ कर कोई अफसोस ना करे, आज मैं भी कुछ ऐसा किसी के नाम लिखता हूँ, लिखुँगा आज बसंत की एक सुनहरी सुबह के बारे में, आखिर हर बार मैं दुख
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आज तेरी हर कोशिश तेरी तक़दीर बनना चाहती है

आज तेरी हर कोशिश तेरी तक़दीर बनना चाहती है, तेरी कही हर बात तेरे हाथ की लकीर बनना चाहती है, एक कदम उठाने की देर है, हर डगर तेरी हमसफर बनना चाहती है, हर सफर की शुरुआत पहले कदम से ही होती है, एक चिंगारी ही आग को भड़काती है, जो कर रहे हो, गर उस पर और खु
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कितनी नादान है वो लड़की

कितनी नादान है वो लड़की, जो मेरे ख्यालों मे रहती है, कहती है कि तुम ही मेरे सब कुछ हो, मेरे दिल मे बस तुम्हारी ही तसवीर रहती है, कितनी नादान है वो लड़की, जो मेरी किताबों मे रहा करती है, सोचती है कि सच होते हैं लैला मजनू की मोहब्बत के फसाने, कहे कोई उ
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एक पागल सी लड़‌की

एक पागल सी लड़‌की, दिल टूटने से डरती थी, हर पल, हर लम्हा खुद से वो झगड़ती थी, आँसू क्यों आए किसी की आँख में, मुजरिम खुद को वो समझती थी, सबको खुश रखना चाहती थी, खुद घुट-घुट के रहती थी, सौ बार समझाया उसे, कहा कि ऐ नादान लड़की, दुनिया को देखना छोड़ दे,
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इस पल को जी लो

साथ रहते रहते यूँ ही वक्त गुज़र जाएगा, दूर होने के बाद कौन किसे याद आएगा, जी लो ये पल जब तक साथ है, कल का क्या पता वक्त कहाँ ले जाएगा, क्या हुआ गर कुछ मुश्किलें आ गई, क्यों तुम इनसे घबरा गए, हाथ में हाथ हो तो, ये सफर तो बस यूँ ही कट जाएगा, अकेले नहीं
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सोचता रहता हूँ

जब भी अकेला होता हूँ कुछ सोचता रहता हूँ, बस किसी के बारे मे कुछ सोचता रहता हूँ अपनी ज़िन्दगी के हर अच्छे बुरे पल सोचता हूँ, कभी सोचता हूँ....क्यों इतना सोचता रहता हूँ वैसे तो मुझे ज़िन्दगी से कोई ग़म नहीं, कुछ खोया तो बहुत कुछ पाया है मैने, फिर भी ना ज
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तुम्हारे लिए कुछ लिखना चाहता हूँ

जब से तुम्हे देख है दिल करता है तुम्हारे लिए कुछ लिखूँ, सिर्फ तुम्हारे लिए, तुम्हारी आँखों को झील लिखूँ, बालों को काली घटा लिखूँ, तुम्हारे गालों को पर्वतों की चोटियाँ कहूँ, या तुम्हारी गर्दन को सुराही लिखूँ, तुम्हारी चाल की तुलना मोर से करूँ या, तुम्
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कोई तुम्हे चाहता है...

सागर के किनारे छोटे से घर मे वो रहता था, अकेला खाता, अकेला जीता और खुद की किस्मत को कोसा करता था, लगता था उसे कि कोई उसे चाहने वाला नहीं, कभी हँसा नहीं, बस अकेला रोया करता था, यहाँ वहाँ भटकता, पर मन मे बस उदासी थी, जैसे टकराती लहरों के नीचे अजीब सा ठ
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जो हम नहीं, हमे वही चाहिए....

धूप को छाया और छाया को सूरज जी तेज़ धूप चाहिए, हम जो नहीं, हमे बस वही चाहिए, खुद मे जो है उसे कोई नहीं ढूढँना चाहता, बाहर की हर चीज़, हर बात अपने अन्दर चाहिए, मंज़िल की नज़रें टिकी हैं रास्तों पर, रास्तों को उन पर चलने वाले मुसाफिर चाहियें, जलते सूरज को