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निठल्ला चिन्तन

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31 Dec 2009
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सेक्स, पैसा और प्रमोशन

इन तीनों का साथ एक खतरनाक कंबीनेशन है और अलग अलग होने पर भी ये एक दूसरे से टकरा ही जाते हैं। आजकल यहाँ एक कामेडियन के ऐसे ही खिलाये कुछ गुल एक बहस का सबब बने बैठे हैं - अपने सहयोगी साथियों के साथ सेक्सुअल संबंध बनाने चाहिये या नही। बहस का नतीजा चाहे
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सिमटती हिंदी ब्लोगिंग का बढ़ना जारी है

आह वाह से उठकर पढ‌़ने वालों को हो सकता है इस पोस्ट के टाईटिल में विरोधाभास नजर आये, इसलिये आगे कुछ कहने से पहले टाईटिल के फर्क को जान लें। बढ़ने और सिमटने में वो ही फर्क है जो किसी भी ग्राफ के x-Axis और y-Axis में यानि बढ़ना vertically होता है और सिमटना
Sep 01 2009 05:09 AM
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डेमोक्रेसी कैसी कैसी

डेमोक्रेसी की जब बात की जाती है तो देशों का जिक्र जरूर आता है, एक भारत और दूसरा अमेरिका। अमेरिका की पुलिस ने अमेरिका के एयरपोर्ट में एक नान अमेरिकी नागरिक को पूछताछ के लिये कुछ देर रोका तो उस पर भारतीय मीडिया और शायद जनता भी हलकान परेशान हो बेमतलब की बहस
Aug 26 2009 08:53 AM
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आज पंद्रह अगस्त है

आज पंद्रह अगस्त यानि भारत की स्वतंत्रता की सालगिरह के मौके पर पंद्रह अगस्त पर लिखी कुछ पंक्तियाँ राष्ट्र को समर्पित है। सभी देशवासियों को स्वतंत्रता दिवस की बहुत बहुत बधाई। आज पंद्रह अगस्त है वो दिन जब हमने पहली बार खुली हवा में साँस ली थी वो दिन जिसकी
Aug 15 2009 08:15 AM
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आया है मुझे फिर याद वो जालिम

अभी कुछ दिनों पहले मैं लाइब्रेरी गया था अपने बेटे के लिये कुछ कॉमिक्स लेने, ना जाने कितने सालों बाद फिर से कॉमिक्स की शक्लें देखीं। इनमें से एक थी अवतार जो कि एशियन करेक्टर पर बनी कहानी है जो कि भारतीय मूल के एम नाइट श्यामलन की अगली फिल्म की विषय वस्तु
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फिल्म समीक्षाः Ice Age 3 - Dawn of the Dinosaurs

सिड, मेनी और डियेगो आर बैक इन आइस ऐज ३ एंड दिस टाईम बिगर एंड बैटर, बिगर बोले तो डायनासोर और बैटर बोले तो एनीमेशन। आइस ऐज का थर्ड वर्जन दूसरे वर्जन से बेहतर है स्टोरी आयडिया में भी और ग्राफिक्स में भी। साथ ही साथ बोनस के रूप में ये थ्री-डी वर्जन में भ
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एक टिप्पणी गलत पड़ी थी कुछ नये हिंदी ब्लोगस में

एक परेशान दिल से निकली आह की कराह जानकर बतायें आप किस जमात में शामिल है, सताये हुए की या सताने वाले की। आजकल जिंदगी बहुत व्यस्त चल रही है, कई कई दिनों तक ब्लोगिंग में उपयोग लायी ई-मेल चैक नही हो पाती और आज जब थोड़ा फुरसत में चैक की तो देखकर दिल से [.
Jun 05 2009 08:00 AM
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चलते-चलते लड़खड़ा गयी दिल्ली - Six

शुक्रवार के दिन पहले IPL 2009 का सेमी फाईनल मुकाबला देखा जिसमें दिल्ली की दिलेरी को लड़खड़ाते देखा और फिर उसके बाद अगले दिन दिल्ली -६ का वो ही हस्र होते देखा। शनिवार के दिन एक फिल्म हमको देखनी पड़ी, दूसरी हमने देखी। जो देखनी पड़ी उसका नाम था Night at
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जूता संस्कृतिः “बहस”

अभी पिछली पोस्ट जल्दी-जल्दी में मैंने जूतम-बजारी पर लिखी थी और कल ही पराशर गौड़ जी ने अपनी खुद की लिखी ये कविता मेल से भेजी, जिसमें जूते और चप्पलों की बहसबाजी है इस बात की कि कौन बड़ा? जूते चप्पलो में हो गई बहस छिड गई लड़ाई लगे करने दोनों अपनी अपनी बड
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हम लोगों ने जगह जगह थूकना छोड़ जूता फेंकना शुरू कर दिया क्या?

एक ईराकी पत्रकार ने जूता क्या फेंका भारत में जूते यूँ फेंके जाने लगे जैसे कुछ समय पहले डाक्टरों (अस्पताल या मेडिकल स्कूलों) की हड़ताल हुआ करती थी। अगर ऐसे ही चलता रहा तो एक दिन ऐसा आयेगा जब पब्लिक चाहे लंच बॉक्स रखना भूल जाये लेकिन बैग में एक जोड़ी ज
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इस विज्ञापन में लड‌़के और लड़कियों दोनों के लिये कुछ है

कुछ दिनों से ये विज्ञापन यहाँ टीवी में आ रहा है, बनाने वाले ने दिमाग का अच्छा इस्तेमाल किया है लेकिन हकीकत में ये कितनों को मिल पाता है वो दूसरी बात है, इन्जॉय Share and Enjoy:
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सेक्सटिंगः गलती किसकी है? लड़की की, उसके दोस्त की या फिर माँ-बाप की

आजकल अमेरिका में ये समस्या बढ़ती जा रही है और इसी कड़ी में ताजातरीन घटना अभी कुछ समय पहले घटी जब एक मीडिल स्कूल की लड़की ने अपनी खुद की एक नग्न तस्वीर खिंच अपने मोबाइल फोन से अपने दोस्त को भेजी। उसके उस दोस्त ने वो ही फोटो अपने मोबाइल से अपने कुछ दोस
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कान की बालियों का माला में पिरोया जाना फिर टूट के बिखर जाना

माइक्रो पोस्ट के रूप में एक छुटपुट विचारः कान की बालियाँ (या बुंदें) तो आपने देखी होंगी, दोनों कानों में अलग-अलग रहती हैं। (ईकोनामी के) ग्लोबलाईजेशन से पहले लगभग हर देश की ईकोनॉमी कुछ ऐसी ही थी, फिर बालियाँ माला में पिरोयी गयी यानि ईकोनॉमी एक दूसरे स
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मेरे बेटे की लिखी पहली हाइकू कविताः बर्फ

कविताओं के जानकारों का क्या कहना है एक छोटे से बच्चे की लिखी इस हाईकू कविता के बारे में। आज अभी जब मैं उसकी टीचर से मिलने गया तो सबसे बड़ा सरप्राईज मुझे मिला उसकी लिखी हाईकू कविता देखकर। वैसे उसने २ लिखी थीं लेकिन मैं ये वाली ही टिप पाया। मेरा बेटा ज
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ख्वाब की दस्तक ने खोले बंद यादों के किवाड़ - 2

स्कूल के दिनों में दूरदर्शन के बेहतरीन टीवी सीरियलस को याद करते हुए मैने कुछ सीरियलस पिछली बार बताये थे, आज उसी श्रृंखला को आगे बढ़ाते हुए कुछ और सीरियलस को याद करते हैं। शरद जोशी का लिखा हुआ एक बहुत ही सरल और सरस कामेडी सीरियस आता था, “ये जो ह
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ख्वाब की दस्तक ने खोले बंद यादों के किवाड़ - 1

एक रोज काम के बोझ से थका ट्रेन में आंखें मूँदे बैठ वापस लौट रहा था तब अचानक मुझे सुनायी दिया, “ताना ना न न ना, ताना ना न न ना”। ऐसा लगा जैसे किसी ने घंटी बजायी हो उठा किवाड़ खोले, सामने कोई नही था। इधर उधर झाँक कर देखा एक बच्ची खिलखिलाकर
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बेस्ट फोटोः शब्द गौण हैं, भाव मौन हैं

ये फोटो मुझे ईमेल से मिला और कुछ लिखने की जगह इतना ही कह सकता हूँ - शब्द गौण हैं, भाव मौन हैं। आप कुछ कहना चाहेंगे? Share and Enjoy:
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वो मेरा पहला कवि सम्मेलन

अभी रविवार के दिन यहाँ प्रिंसटन में एक कवि सम्मेलन था जिसका आयोजन अनूप भार्गव जी ने किया था, हमें भी न्यौता मिला तो हम भी जा पहुँचे। इससे पहले कि कुछ गलतफहमी हो जाये मैं बताता दूँ हम छोटे से स्टेज में नही बड़ी सी दर्शक दीर्घा में बैठने के लिये गये थे
Mar 16 2009 07:56 AM
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होली पर लिखी एक कविता और एक विडियो

हमेशा की तरह इस बार भी होली आ ही गयी, ये होली भी ना, कभी आना नही भूलती, देखिये तो हर तरफ कैसे कैसे रंग बिखेरे हुए हैं इस ने। आप लोग तो होली होली के दिन ही मनायेंगे, हम तो हर त्यौहार की तरह इसे भी यहाँ वीकेंड में ही मनायेंगे। निठल्ला चिंतन पढने वाले [
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इंडियन कहाँ हैं?

एक अमेरिकन इंडिया घूमकर वापस अमेरिका आया और जब वो अपने इंडियन दोस्त से मिला तो उस इंडियन दोस्त ने उससे इंडिया के बारे में जानना चाहा। उसने अमेरिकन से पूछा, तो मेरा देश तुम्हें कैसा लगा? अमेरिकन ने जवाब दिया, इंडिया इज ग्रेट कंट्री विद सोलिड एंसियेंट
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ब्लोगिंग के 5 सालः कुछ फायदे कुछ नुकसान

विगत १५ फरवरी २००९ को ब्लोगिंग करते अपने को ५ साल पूरे हो गये, मंदी के इस दौर में ये बताने की रफ्तार भी कितनी मंद रही ये इसी से दिखता है कि हम ये बात आज ४ मार्च को बता रहे हैं। सोचा आज क्यों ना थोड़ा पीछे मुड़ कर देखा जाये और जानने [...]
Mar 04 2009 07:33 AM
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भारतीय संस्कृति भी कोई दूध की धुली नही है

मैने अपनी पिछली पोस्ट में एक टीन प्रीगनेंसी का जिक्र किया था जो कि हमारे समाज (क्या पश्चिम क्या पूर्व) की विफलता का ही शायद नतीजा है। उसमें शास्त्रीजी की एक टिप्पणी आयी थी, जिसे पढ़कर ही मुझे कहना पड़ रहा है भारतीय संस्कृति (या सभ्यता या समाज) भी कोई
Feb 18 2009 08:08 AM
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छोटी सी आशा पिता बने 13 साल के बच्चे के लिये

ब्रिटेन के अखबारों में ये बात सुर्खियां बनी थी (हैं), सही गलत की बहस अभी जारी है। 13 साल का एक बच्चा अभी अभी पिता बना है, माँ बनी लड़की की उम्र है 15 साल। अमेरिका के सी एन एन की मानें तो इसका एक तीसरा एंगल भी है और वो है 16 साल का [...]
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अगर मुन्नाभाई फूलों की जगह चड्ढी भेजता तो…

ध्यान रहे मैने गुलाबी नही कहा, क्यों? वो बाद में बताऊंगा पहले चड्ढी की कबड्डी से संबन्धित तीन पोस्ट का जिक्र करना चाहूँगा जो मैने पिछले १-२ दिन में पढ़ी थी। पहली पोस्ट थी सुरेश चिपलूनकर की जिन्होंने शुरूआत तो गुलाबी चड्डी भेजने के विरोध से की लेकिन फ
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मेरा वाला जेनेरिक: सूर्य अस्त शराबी मस्त

आप सोच में तो नही पड़ गये कि ये क्या बला हुई, ज्यादा मत सोचिये पहले मैं आपको ये बताऊँगा ये क्या है और उसके बाद जेनेरिक शेर भी सुनाऊँगा। आपने ये शायद ही कभी पहले सुना हो क्योंकि अभी अभी हमने ये बिल्कुल ताजा अपने दिमाग की भट्टी से निकाला है, शब्द तो पु
Feb 11 2009 09:12 AM
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“सुर्पनखा बन नाक कटाये”,, क्या इसे कहावत बना सकते हैं?

ये तो सभी जानते हैं कि त्रेता युग में विभिषण ने रावण को हरवाने में भगवान राम की मदद की थी जिसके फलस्वरूप इस तरह के केस के लिये ही ये कहावत बनी है - घर का भेदी लंका ढाये। उसी त्रेता युग में सुर्पनखा भी हुई थी, जो पहले राम पर लट्टू हुई लेकिन राम [...]
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एक मीडिया, एक गाली, एक ब्लोगर और बचेखुचे भारतीय

कुछ लिखने से पहले ही बता दूँ मेरी समझ से ‘बचेखुचे’ कहना गाली में नही आता, अगर आता है तो बता दें मेरा भी थोड़ा ज्ञान बढ़ जायेगा। अभी पिछले कुछ दिनों में ही पत्रकार बनाम ब्लोगर प्रकरण पढ़ने में आया। कुछ लोग खासकर मीडिया वाले पत्रकार (बरखा द
Feb 02 2009 08:40 AM
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क्या ये नैतिक है? - सात बच्चे सोचे थे लेकिन वो आठ थे

यहाँ अमेरिका में एक ३३ साल की औरत ने आठ बच्चों को एक साथ जन्म दिया, उसके पहले से ही ६ बच्चे थे। एक ही उम्मीद में ये सब किया गया लेकिन हो गये आठ, यहाँ तक की डाक्टर भी ७ बच्चे समझ के डीलिवरी करवा रहे थे। ऐसा पढ़ने में आया कि वह औरत [...]
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आते जाते खुबसूरत आवारा सड़कों पे - 1

इस सीरिज में हिंदी के कुछ ऐसे ब्लोगरस (या ब्लोग) की बात करेंगे जो मुझे पसंद हैं, इनमें से कुछ साथ चलते चलते कब दोस्त बन गये पता ही नही चला। इस सफर के लिये इस गीत की चंद लाईने बहुत उपयुक्त हैं - "आते जाते खुबसूरत आवारा सड़कों पे, कभी कभी इत्तेफाक से,
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समस्या स्लम से है या डॉग से या उसे मिलेनियर बनाने वाले से

स्लमडॉग ऐसी फिल्म नही जिस पर इतनी ज्यादा क्रिया प्रतिक्रिया की जाये, कुछ इसे फिल्म से हटकर सोचते हैं और वहाँ पर सवाल या समस्या उठ खड़ा होता है। अब सवाल ये है कि समस्या स्लम से है या डॉग से या उसे मिलेनियर बनाने वाले से? समस्या स्लम से तो होनी नही चाह
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चेतावनीः कुछ हिंदी ब्लोगस आपके कंप्यूटर के लिये खतरनाक

सर्व साधारण को ये सूचना दी जाती है कि कुछ ब्लोगस जिन्हें आप बड़े चाव से पढ़ते हैं वो आपके कंप्यूटर की ऐसी तेसी करने का सामान मुहया कराते हैं। मुझे नही लगता कि उन ब्लोगस के मालिकों को इसका जरा भी इल्म होगा। आप सोच रहे होंगे ऐसा कैसे? तो ऐसा होता है या
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जाको राखे साईंया - क्या वाकई में?

हमारी और आसपास के लोगों की जिंदगी में अक्सर ऐसा कुछ ना कुछ घटित हो जाता है जिससे सभी का ‘जाको राखे साईंया’ कहावत पर यकीन बना रहता है। सवाल ये भी उठ सकता है जब बचाना उसी ने ही है तो वो क्यों ऐसी परिस्थिति आने देता है जहाँ उसे बचाने आना पड़
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फिल्म समीक्षाः Slumdog Millionaire

स्लमडॉग मिलेनियर को अभी तक हाल में ही संपन्न हुए गोल्डन ग्लोब समेत काफी पुरस्कार मिल चुके हैं। स्लमडॉग मिलेनियर की कहानी एक भारतीय विकास स्वरूप के द्वारा लिखी किताब (Q & A) पर आधारित है। स्लमडॉग मिलेनियर की कहानी स्लम में अपने भाई सलीम के साथ रह
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ट्रेडिंगः हम करेंगे सालसा और वो करेंगे बल्ले बल्ले

आजकल देश में डांसरों में सालसा का बड़ा क्रेज है लेकिन वो लेतिनोज लोग शायद उन स्टेपस से उकता गये हैं इसलिये उन्होंने बल्ले बल्ले पर थिरकने की सोची और सोल्जर फिल्म की ‘तेरा रूप बल्ले बल्ले‘ पर थिरकने लगे। यानि कि जल्दी ही हम तो नाचेंगे ही द
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वो भांगे की चटनी, वो नौले का पानी

जगजीत सिंह की गायी मशहूर गजल से २-३ लाईनें उधार लेकर अपने बचपन की यादों को इस गीत गजल में समेटने की कोशिश की है। आज ऐसे ही कुछ सफाई कर रहा था तो २-३ साल पहले लिखी ये गजल मुझे मिल गयी। पहाड़ों में बिताये उन अनमोल पलों को समेटने की कोशिश जो अब [...]
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Incredible India: स्टोरी आफ इंडिया

प्रसिद्ध इतिहासकार, लेखक, प्रसारक और प्रस्तुतकर्ता माइकल वुडस की लिखी किताब In Search of Myths and Heroes अभी खत्म ही की थी कि इन्हीं की इंडिया पर बनायी 6 एपिसोड की डॉक्यूमेंट्री देखने का अवसर मिल गया। ये इन्होंने बीबीसी के लिये बनायी थी और आजकल इसका
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हिंदी ब्लोगिंग का समाचार पत्रों में उल्लेख रामखिलावन की भैंस की खबर जैसा है

पिछले एक साल में हिंदी ब्लोगरस या ब्लोगिंग का हिंदी समाचार पत्रों में कई बार उल्लेख हुआ है अगर एक या दो लेखों को छोड़ दें तो ज्यादातर आलेख पढ़कर लगा कि ये उसी तरह से छपे हैं जैसे रामखिलावन की भैंस की खबर। ज्यादातर सभी आलेखों में अगर मगर करके गिने-चुन
Jan 06 2009 08:33 AM
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एक और दिन एक और विस्फोट

इस पोस्ट से किसी भी तरह की शालीनता और सयंम की उम्मीद ना करें। सपने में भी गैर हिन्दुओं के धार्मिक आकाओं को छुने की हिम्मत ना कर सकने वाली सरकार, उसकी पुलिस और रिपोर्टर जब एक साध्वी को मारमार कर ये कबुलवाने में तुली थी कि वो आतंकवादी है। ठीक उसी समय ह
Nov 27 2008 04:07 AM
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माइनस डिग्री तापमान, फुटबाल मैच और कुछ अधनंगे लड़के लड़कियाँ

आज सुबह यहाँ का तापमान था जीरो डिग्री, जिसे ठंडी हवाओं ने माइनस सात डिग्री (-7 सेंटिग्रेट) पहुँचा दिया था और ऐसे में हमें जाना था अपने बेटे के आखिरी फुटबॉल मैच के लिये। ठंड का अनुमान तो फील्ड में पहुँचने पर ही लगा, लेकिन ये कमाल के बच्चे थे ऐसी ठंड म
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आदमी को क्या चाहिये

क्या आप जानते हैं कि एक आदमी को क्या चाहिये? अगर नही और जानना चाहते हैं तो हमारी शब्दों के साथ खेलने की कोशिश पर नजर दौड़ाईये। आदमी को चाहिये चबाने को दाँत और पेट में आँत नेता को चाहिये कुछ घूँसे और संसद में चलाने को लात। आदमी को चाहिये दो वक्त की रो