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संयोग-वियोग

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14 Jun 2010
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स्वीकार है मुझे लेकिन ......

 अब आगे पढ़िये ..... दिन भर की तू-तू मैं-मैं अब रात के सायों को भी छूने लगी थी। सास-ननद के फैशन बढ़ते जाते हैं, प्रिया की किताबों में सिनेमा की टिकटें और किसी न किसी लड़के की फोटो अक्सर पाई जाती है। संतोष उसकी शिकायत अपने पति से करती है तो उसे
 
प्रकाश टाटा आनन्द
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स्वीकार है मुझे लेकिन ......

आगे पढ़िये ...... पटकथासंतोष एक मध्यम परिवार की लड़की है। घर की आय से संतुष्ट, सारा परिवार एक खुशहाल परिवार है। आदर्श और संसकृति कूट-कूट कर भरी है। एक ऐसा परिवार जहाँ सुबह सूर्य निकलने से पूर्व ही भोर हो जाती है तथा पक्षियों की चहचहाट के साथ आरती के स्वर
 
प्रकाश टाटा आनन्द
Jun 13 2010 06:23 PM
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राष्ट्र से विश्वास्घात...

प्रिय साथियों आज सुबह अश्विनी कुमार जी का सम्पादकीय पढ़ा मन को छू गया। भाई गुरूदास जी की एक अद्भुत रचना है, जिसमें इस बात का वर्णन किया गया है कि धरती किसके भार से पीड़ित है। धरती स्वयं पुकार कर कहती है.... "मैं उन पर्वतों के भार से पीडित नहीं हूँ,
 
प्रकाश टाटा आनन्द
May 30 2010 05:36 PM
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स्वीकार है मुझे लेकिन .....

 प्राक्कथनहम औरतों को सहना, रोना क्यों अच्छा लगता है? हम चाहे कितना भी पढ़-लिख जायें पर हमारे संस्कार हमें अपनी मिट्टी की सौंधी खुश्बू के पास रखते हैं। कुछ ही लड़कियाँ होती हैं जो अपने सपनों को सुनहरे पंख देकर इस खुश्बू से दूर जा पाती है, वरना अधिकतर
 
प्रकाश टाटा आनन्द
May 22 2010 05:57 PM
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संयोग – वियोग....

भावुक मन था रोक न पाई, सजा हुआ पलकों में सावन संयोग–वियोग की दीवारों पर, बरसे थिरक-थिरक श्याम् घन याद में तेरी इस बावरी ने, लाखों आँसू हैं बरसाये मरूथल में खोये अतीत के, संयोग स्मृति में उग आयेबारम्बार चीखता है मन, दृगों से निज कण्ठ मिलाकर देव तुझे सच पा
 
प्रकाश टाटा आनन्द
May 21 2010 03:34 PM
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एक अनुरोध...

आजकल गर्मियाँ अपने चरम पर हैं। उफ ऐसी भीषण झुलसा देने वाली गर्मी न कभी देखी न सुनी। माँए अक्सर इस चिंता में रहती हैं कि ऐसी झुलसती गर्मी में बच्चे बाहर न खेलें। और कभी मजबूरी में बाहर जाना भी पड़ जाए तो मुंह सिर आदि ढक कर पानी की बोतल साथ लेकर ही जाएं। अब
 
प्रकाश टाटा आनन्द
May 20 2010 04:30 PM
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जनप्रिय लेखक ओम प्रकाश शर्मा जी की याद में..

एक दिन मैं अपनी पुरानी डायरियों के पन्ने पलट रही थी कि अचानक मेरे हाथ 1983 की डायरी लगी। मन पुरानी यादों में खो गया। मेरे एक भाई बम्बई में पिताजी के साथ रहते थे और जब भी दिल्ली आते तो रेलवे स्टेशन से ओम प्रकाश शर्मा जी का उपन्यास रास्ते
 
प्रकाश टाटा आनन्द
टैग: यादें
May 09 2010 04:16 PM
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नया सफर है अता कर नई डगर मुझको

जुबाँ के साथ जुबाँ का, मिले असर मुझको तो फिर कहूँ कि मिला है, कोई गुहर मुझको सभी प गर्दिश-ए,-दौरां ने कहर ढाया है कि लग रहा है परेशान, हर बशर मुझकोचली ये कैसी हवाएँ, उजड़ गया सब कुछभरे चमन में कुछ आता, नहीं नज़र मुझकोख़िज़ाँ के आते ही मैं, फिर बिछड़ गई तुमसे
 
प्रकाश टाटा आनन्द
May 01 2010 02:27 PM
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चेहरे का प्रकाश

चेहरा बता रहा है कि, रोये हुये से हैंशायद वो मुश्किलात में खोये हुये हैंक्या असलियत है इसका, पता चल नहीं सकाआँखे बता रहीं हैं कि, सोये हुये से हैंबल खा के कह रही है, साहिल से मौज – मौजकश्ती भँवर में अपनी, डुबोये हुये से हैंदामन की बात है न ये, अश्कों की
 
प्रकाश टाटा आनन्द
May 01 2010 01:09 PM