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दिल की दासतां
ये सुलगते हुवे दिल की दास्तां है, , मेरे रग रग में यारों धुआं धुआं है ।दर्द ग़म तीरगी से सजी है महफ़िल , आज तनहाई ही मेरा पासबां है।चांदनी का मुझे इंतज़ार तो है , पर घटाओं से लबरेज़ आसमां है ।कांच का घर बनाकर परीशां हूं मैं , शहर वालों के हाथों में गिट्टियां
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Jun 17 2010 09:09 AM


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