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18 Jun 2010
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ख्वाब

हर शुरुवात एक मौन खूबसूरती कापर्याय हुआ करती हैएक दुधमुंहे शिशु के जीवन के रुप मे हो या फिरतरोताजगी से भरी अधखिली गर्वितनई नवेली कली के प्रस्फुटन की या फिररात के अंधेरे मे धने काले मेधों केपर्दे से झांकती मदमाती मुस्कुराती सुबह कीकाल के इस जादुई सम्मोहन
 
वंदना शुक्ला
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चिंतन

ठान लोअन्याय के विरुद्ध कार्यवाहीजो नहीं की गई अब तकडर से, लिहाज से या फिर महज एकटी वी चैनल कीरोजमर्रा कीरोजी और स्वयं का टाइम पास समझबिसराने कीकोशिश की गईऔर इस कोशिश मेंबीत गई पीढियां,कुनबे औरयुगकभी सोचा?किअत्याचार बाकायदाएक जधन्य अपराध होता है?,चाहे
 
वंदना शुक्ला
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औरत

नारी, तुम नहीं अबला,आजाद हो तुम अब ।चीख-चीख कर कह रहे तमाम चैनल,मंत्री,संतरी और स्वयं तुम यही तो कह रही नारी दिवस पर,आयोजित वार्ताएं ।टीवी स्क्रीन पर एक से एक ताजातरीन,मुस्कराते चेहरे, चेहरों की नकल करते चेहरेऔर चेहरे, और जिस्मसच कहा तुमने,अब औरत आजाद है
 
वंदना शुक्ला
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चिंतन

 
वंदना शुक्ला
Jun 12 2010 11:16 AM
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चिंतन

 
वंदना शुक्ला
Jun 12 2010 11:12 AM
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अनुभूति 2

वे सूखा पत्ता ,जो कभी,विश्वसनीय हिस्सा हुआ करता थाउस विशालकाय पेड काआज,गर्म हवाओं की साजिश नेपतझड की आड लेकर दिया बेरहमी से,ध्वस्त उसेशाख से विलगशायद इसलिये क्योंकि,मर चुका था उसमें,हवा का रुख बदल देने का जज्बा,या चुक गई थी ताकत,तूफान के आगेबेखैाफ सीना
 
वंदना शुक्ला
Jun 08 2010 10:08 AM
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अनुभूति 1

जब देह थी उर्जा से लबरेज,और भावनाओं का समंदर मारता था हिलोरें कच्ची देह के भीतरचेहरा साफ साफ,व नाक नक्श थे,ठिकानों परदुनियां थी मुटठी में,मां बाप रिश्ते नातेसपनों से भरा था आसमानउडते उडते थकी देह तलाशतीएकांत को,जो हो जाया करताआधी रात का सूरज या फिरबेटी
 
वंदना शुक्ला
Jun 08 2010 10:02 AM
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मेरा परिचय

मेरा नाम वन्दना है ।मैं एक पब्लिक स्कूल में टीचर हूं ।कहानी लेखन में गहरी रुचि रखती हू।
 
वंदना शुक्ला
Apr 24 2010 08:54 PM