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मैं अकेला हो गया हूँ
रो रहा क्यों व्यर्थ रे मनकौन अपना है यंहा पर .मिट गयी हस्ती बड़ों की है हमारी क्या यंहा पर . सबको अपनी ही पड़ी हैचल रहे सब भावना मेंस्वप्न सब बिखरे पड़े जबहै कान्हा कुछ कल्पना में . . स्वर्ग-सुख के मोह में आनरक में मैं बस गया हूँ . आज जग के जाल में कुछ
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Jun 18 2010 01:56 PM


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