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पिनाकपाणि

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14 Jun 2010
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कहीं 'वो' है तो नहीं !

उससे बहुत डरता हूँ मैं बचने के लिए मैंने खड़ी की हैं दीवारें भी लोग जिसे मेरा घर कहते हैं  पर आखिर सोने का पिंज़रा भी जेल होता हैजैसे ही बाहर आऊंमुड़ मुड़ के देखता हूँकहीं 'वो' है तो नहीं ! लोग पूछते हैं किससे डरते हो
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तलैया

जो भी आता है  कंकर फेंक ,धूर्त नज़रों से तौल  कंधे उचका कर चल देता है  निष्फल उर्मियाँ  आर्त कम्पन दुस्सह ! दीवारें ज़मीन की सीमा की विवश घुटन  दाल दो एक साथ ,सारे पत्थर  चलो सूख ही जाए ,फिर  मन की तलैया |
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पिनाकपाणि: जंगल

पिनाकपाणि: जंगल
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ताकती है मुझे

मेरी खिड़की के द्वार पर पेड़ की एक टहनी जब तब उल्लास से मेरी आँखों में झांकती है  हवा के झूले में पेंग बढाकमरे में आता है खुशबू का एक झोंकाऔर वहां होती है खुशबू मात्र  कभी दूर से स्थिर ताकती है मुझे नहीं
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उत्सव

आओ दिनों पर लगाएं ठप्पेऔर मनाएँ उत्सव बीवी की चूड़ी बिके तो छल्लों का क्या शराब पियें और नाचें ,क्योंकि कल के लिए नहीं है अपने पास कोई और ठप्पा कल से फिर रेतेंगे एक दूसरे के गले आओ आज तो गले मिल लें ,सहला लें
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सौंधी सी महक

बरसों से  तपती रेत पर  बरखा की पहली फुहार से उठी  सौंधी सी महक ,तुझे पाकर   बहुत डर गया हूँ मैं  बालू के महल भरभराते  ढहते टीलों के बियाबान समंदर में  तुम टिकोगी कैसे ! छेद गई है अंतस  तुम्हारी अल्पायु इयत्ता 
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कस्तूरीमृग

न जाने कौन  आवाज़ देता रहा कि 'हूँ' मैं,देख मुझे  सम्मोहित सा ढूँढा किया उसे  किताबों में,सुरों के सागर में तितली के परों में और  चिडिया की चहक में  हवाओं के साथ  पेड़ों के झूलने में  पत्तों से छन कर आती
May 31 2010 10:49 PM
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जंगल

बूढे पेड़ों की शाखों पर  अब  भी हलचल  कुछ  चिडियों के डेरे हैं  चीर  फ़कीर के  सदियों  तपे धूप में  फटे  ताने हैं  खोखल  कहो भले ही  जीवन  अमृत भरे कमंडल  पिए गिलहरी  अपनी जात
May 31 2010 10:47 PM
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चुप्पा

चुप्पा  घुन्ना  कह  कर  उसको  गाली  मत  दो  मौन  तो  उसकी  भाषा  बंधु  तुम  शब्दों  के  बाजीगर  सूख  न  पायें  ताजा  रक्खो  कील  फांस 
May 31 2010 10:46 PM
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दंश

तब , दिन थे बस दिन रातें थीं  बस रात  था सहारा का अनंत विस्तार  और "मैं "नहीं था  अब  दिन हैं पर नहीं हैं , रातें कभी कभी होती हैं  टुकड़े टुकड़े चमकीली  बहुत चुभता है ....कई बार  जुगनू का बाना  कभी कभी "होना
May 31 2010 10:43 PM
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बोध के सोपान

लगता ही है तुम्हें कि चुप हूँ भीतर है तुमुल कोलाहल कारों की पों पों दोपाये की भों भों, सुन नहीं पातातुम समझते हो ,बहरा हूँ युक्लिप्टस, यह शैतान गाछ  सर पर खड़े बालों वाला छोकरा /वो सफ़ेद टोपी वाला मेरी बेबसी पर हंसते हैं ,
May 30 2010 11:33 PM