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दिल की कलम से

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05 Jun 2010
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दिल की कलम से

ग़म अगर दिल को मिला होता नहींज़िंदगी में कुछ मज़ा होता नहींज़िंदगी में कुछ मज़ा होता नहींहर सफ़र में काफ़िला होता नहींहम सदा हालात को क्यों दोष देंक्या कभी इंसा बुरा होता नहींमैं हमेशा साथ रहता हूँ तेरेतू कभी मुझसे जुदा होता नहींएक इक पल बोझ-सा लगता है
 
पुरु मालव
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मायावती की मालाओं के बहाने से

मायावती की मालाओं के बहाने....... मायावती की मालाओ के बारे में काफ़ी कुछ लिखा- कहा जा रहा हैं. राजस्थान पत्रिका के २९ मई के सम्पादकीय में लिखा गया है कि उनके पास न कोई फ़ेक्ट्री, न शेयर बाज़ार में निवेश और न ही खेती-बाडी है फ़िर भी ३ साल में ३६ करोंड की
 
पुरु मालव
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उनसे यों जुदा होकर फिर क़रीब आने मेंदेर लगती हैं आखिर फ़ासले मिटाने मेंकितनी देर लगती है आसमाँ झुकाने मेंलोग-बाग माहिर है उँगलियाँ उठाने मेंकिस तरह भला उसने ये जहाँ बना डालादम निकल गया मेरा अपना घर बनाने मेंआजमाके तो देखूँ एक बार उसको भीजो य़कीन रखता हो
 
पुरु मालव
Mar 25 2010 02:21 PM
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दिल की कलम से

साहिय अकादेमी अवार्ड- हरीश भादनी क्यूं नही ? गत २३ दिसम्बर २००९ को २४ भारतीय भाषाओं के साहित्यकारों को साहिय अकादेमी पुरस्कार प्रदान किए गए. इसमे आठ पुस्तकें कविता की, छः पुस्तकें लघुकथाओं की, चार उपन्यास, चार आलोचना, एक निब्न्ध और एक नाटक की पुस्तक हैं.
 
पुरु मालव
Mar 04 2010 02:09 PM
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दिल की कलम से

ग़ज़लरिश्‍तों से अब डर लगता हैरिश्‍तों से अब डर लगता है।टूटे पुल-सा घर लगता है। चेहरों पे शातिर मुस्‍कानेंहाथों में खंज़र लगता है। संग हवा के उड़ने वालामेरा टूटा पर लगता है। हथियारों की इस नगरी मेंज़िस्‍म लहू से तर लगता है। जीवन के झोंकों पर तेरासाथ हमें
 
पुरु मालव
Mar 26 2009 05:06 PM
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दिल की कलम से

ख़यालमैं बाइक चला रहा था, वो पीछे बैठा था। सामने दो फ़ैशनेबल लड़कियां जा रही थीं। अपनी आदत के अनुसार वो आहें भरने लगा।-यार, क्‍या मस्‍त आइटम है। सॉलिड बॉडी, फिट कपड़े, लहराते बाल। चलने का स्‍टाइल तो देखो। और ये बाज़ू वाली लड़की। अबे देख। कितने मोटे-मोटे
 
पुरु मालव
Mar 09 2009 04:31 PM
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दिल की कलम से

-अपनी मां को कुम्‍भ के मेले में क्‍यूं नहीं ले जाते? पत्‍नी ने परम्‍परागत कारगर उपाय बताया।-इतना लम्‍बा सफ़र मैं कैसे तय कर पाउंगी बेटा ? बुढ़ापे में शरीर भी तो साथ नहीं देता। मेले में भीड़ भी तो कितनी होती है। बेकार में तुम्‍हे दिक्‍कत होगी। तुम दोनों
 
पुरु मालव
Mar 09 2009 04:26 PM
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दिल की कलम से

विकल्‍पपहली घटना--बेटा, बहू को भी अपने साथ ले जा। शादी ब्‍याह में साथ जाओ तो अच्‍छा लगता है।-मगर पिताजी। आपकी देखभाल कौन करेगा? वैसे भी दोस्‍त की बहिन की शादी है। मैं ही चला जाता हूं।-अरे बेटा। हम इतने भी बूढ़े नहीं हुए कि देखभाल की जरूरत पड़े। तू बहू को
 
पुरु मालव
Mar 09 2009 04:24 PM
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दिल की कलम से

तुम और मैं तुम किसी शुतुरमुर्ग़ की तरहलम्बे-लम्बे डग भरतेदौड़े चले जाते होऔर मैं चींटियों से सने केंचुएँ की भांतिरेंगता चला आता हूँ ,तुम्हारे पीछे-पीछेतुम ऊँचे नभ मेंकिसी गिद्ध की तरह तैरते होपर फैलाए ,सारी दुनिया पर नज़र गड़ाएऔर मैं अँधे कुएँ मेंकिसी
 
पुरु मालव
Mar 09 2009 04:21 PM
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दिल की कलम से

कपड़े झड़ रहे हैं कपड़े झड़ रहें हैं दोनों के बदन सेदोनों नंगे हुए जाते हैंमैं चिथड़ा-चिथड़ा जोड़करनाकाम कोशिशें करता हूंबदन ढांकने कीऔर तुमने कर दी चिथडे-चिथड़ेअपनी़ शर्मो-हयामेरे तार-तार कपड़ों सेझांक रही है मुफ़लिसीमेरी नीली शिराएं ,उभरी
 
पुरु मालव
Mar 09 2009 04:19 PM
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दिल की कलम से

ग़ज़लमुश्किलें आती रही, हादिसे बढ़ते गये ।मंज़ि़लों की राह में, क़ाफ़िले बढ़ते गये ।दरमियाँ थी दूरियाँ, दिल मगर नज़दीक़ थेपास ज्यूँ-ज्यूँ आये हम, फ़ासले बढ़ते गये ।राहरवों का होंसला, टूटता देखा नहींग़रचे दौराने-सफ़र, हादिसे बढ़ते गये ।साथ रह कर भी बहम हो
 
पुरु मालव
Feb 19 2009 02:58 PM
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दिल की कलम से

सैंकड़ों ग़म दिल पे अपने उठा कर चलते हैंज़िंदगी राह में फिर मुस्कुरा कर चलते हैंफ़ासले फिसलन भरे अब ख़त्म हो जायें यहींइक यहीं उम्मीद हम दिल से लगा कर चलते हैंकहने को हम मुस्कुराते ज़माने के लियेदर हक़ीक़त ख़ुद को हम ख़ुद से छुपा कर चलते हैंहर तरफ़ नफ़रत
 
पुरु मालव
Feb 19 2009 02:56 PM
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दिल की कलम से

क्यूँ ऐसा अक्सर लगता हैघर में भी इक घर लगता हैसब कुछ पाकर भी क्यूँ मुझकोकुछ खोने का डर लगता हैप्यास गहनतम यदि हो जाएक़तरा भी सागर लगता हैदुनिया मेरी, मैं दुनिया का मुझको ये क्यूँकर लगता हैक़ैद हुए हैं अपने घर मेंअब अपनों से डर लगता हैसच तो है पुरु ग़ुरबत
 
पुरु मालव
Feb 19 2009 02:40 PM
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दिल की कलम से

आपके हर गम को सीने से लगाना चाहता हूँखुश्क हैं आँखें मेरी आँसू बहाना चाहता हूँक्या करूँ पर विष वमन करती हुई इन चिमनियों का फूल तो हर चंद मैं हर सू खिलाना चाहता हूँछल रहे हैं जो निरन्तर चहरे दर चहरे चढ़ाकरउनके चहरों से सभी चहरे हटाना चाहता हूँआदमी इंसान
 
पुरु मालव
Feb 19 2009 02:35 PM
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दिल की कलम से

अब साथ भी उनका रहे या न रहेचलना है मुझे वो चले या न चलेपूछो अभी उससे बहारों का पतायूँ रू-ब-रू फिर वो रहे या न रहेतुम आज जी भर के सीसकने दो मुझेकल क्या पता ये ग़म रहे या न रहे हम तो कहेंगे जो भी कहना हैं हमउसकी है मरज़ी वो सुने या न सुनेमुझे मेरी बस राह आ
 
पुरु मालव
टैग: शायरी
Feb 19 2009 02:14 PM
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दिल की कलम से

पुरू मालव की लघुकथा : भुलक्कड़उनकी हदें बरदाश्त से बाहर हो रही थी। कोई भी चीज़ कहीं भी रखकर भूल जाते, फिर सारे कमरे में बड़बड़ाते हुए उसे ढूंढा करते। सारे सामानों को उथल-पुथल कर देते। बेटे-बहू ने कई बार ताक़ीद की -पिताजी अपनी चीज़े सम्‍भाल कर रखा कीजिए।
 
पुरु मालव
Feb 10 2009 03:32 PM
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दिल की कलम से

पाखी के दिसम्बर 2008 अंक में श्री रत्नकुमार साम्भरिया का एक लेख पूस की रात और प्रेमचंद की अज्ञानता प्रकाशित हुआ है। उसी संदर्भ में मेरा ये आलेख है।पूस की रात कहानी के माध्यम से रत्न कुमार सांभरिया द्वारा प्रेमचंद का बुद्वि-परीक्षण करना, निष्कर्ष स्वरुप
 
पुरु मालव
Feb 03 2009 01:59 PM
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दिल की कलम से

रचनाकार ब्लॉग स्पॉट पर पढिये मेरी रचनायेअगर किसी ने यहाँ दिल से दोस्ती कर लीयूँ जानिये कि जहां भर से दुश्मनी कर लीफ़रेब उसने किया जिसपे था यक़ीन मुझेकि रहनुमा था सरे-राह रहजनी कर लीअजब है बात मगर बर्क़ ने उड़ाई हैकि उसने ख़िरमने-हस्ती से दोस्ती कर लीवो
 
पुरु मालव
Jan 19 2009 02:32 PM
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दिल की कलम से

साहित्य कुञ्ज पर पढिये मेरी रचनायेग़ज़लग़म अगर दिल को मिला होता नहींज़िंदगी में कुछ मज़ा होता नहींज़ीस्त की रह में है दिल तनहा तो क्याहर सफ़र में काफ़िला होता नहींहम सदा हालात को क्यों दोष देंक्या कभी इंसा बुरा होता नहींमैं हमेशा साथ रहता हूँ तेरेतू कभी
 
पुरु मालव
Jan 19 2009 02:27 PM
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दिल की कलम से

ग़ज़लउनसे यूं ज़ुदा होकर फिर क़रीब आने मेंदेर लगती हैं आखिर फ़ासले मिटाने मेंकितनी देर लगती है आसमां झुकाने मेंलोग-बाग माहिर है उंगलियां उठाने मेंकिस तरह भला उसने ये जहां बना डालादम निकल गया मेरा अपना घर बनाने मेंआजमाके तो देखूं एक बार उसको भीजो य़कीन
 
पुरु मालव
Jan 19 2009 02:16 PM
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दिल की कलम से

दोहेंदुःख अपना किस से कहें,सभी यहाँ मशगूल। हमने भी रोते हुए, कर ली हँसी कबूल । कोलाहल में दिन गया, अवसादों में रैन । जीवन की घुड़ दोड़ में, मिला कही न चैन। विलासिता के चीर से, सज- धज गया शरीर ।तन के उजले हो गए,मन के रहे फकीर । कलयुग के इस दौर की, क्या
 
पुरु मालव
Jan 19 2009 02:04 PM