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17 Jun 2010
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जी रहा हूँ मैं?

जी रहा हूँ मैं,जीने के लिए या मरने के लिए?ये ‘मैं’ जी रहा हूँ या कोई ‘और’?स्वयं को कितना पीछे छोड़ आया हूँ आज मैं?इस हद तक कि,आज मैं लगभग ‘मैं’ रह ही नहीं गया.मेरे जीवन की सारी गतिविधियांउस ‘शून्यता’ को दूर करने के लिए होती हैंजो मेरे अस्तित्व का अंग बन
 
असीम
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“तम”

कभी कभी हम अंधकार के दौर से गुजरते हैं, तम के दौर से गुजरते हैं. कुछ समझ नहीं आता, कुछ दिखाई नहीं पड़ता – आगे, पीछे, ऊपर, नीचे हर तरफ अंधकार ही अंधकार..हमारी आँखें प्रकाश की एक कण को तलाशती रहती हैं, रेगिस्तान के मृग की तरह...काली अँधेरी रात है.सर्वत्र तम
 
असीम
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हमारा नेता कैसा हो

अभी कुछ दिनों पहले मैंने प्रकाश झा की “राजनीति” देखी..आज की राजनीति की भयावह वास्तविकता को बड़ी बेबाकी और निडरता से प्रदर्शित किया है उन्होंने. फिल्म देखने के बाद एक सवाल बार बार कौंध रहा था मन मे “हमारा नेता कैसा होना चाहिए”.असल मे ये प्रश्न तो आजादी के
 
असीम
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‘चिर प्रश्न’

कुछ प्रश्न जिनका जवाब हम सदियों से ढूंढते आये हैं ........ कौन हूँ मैं? क्यूँ आया हूँ?इस जग में किसने जाना है.जीवन क्यूँ है? क्या है इसका अर्थ?किसने इसे पहचाना है.कौन लाता है, कौन उठाता है?कौन हंसाता है, कौन रुलाता है?कौन बिगाड़ता है और कौन बनाता है?ये
 
Aseem
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कविता

एक 'कविता' के सृजन पर पर कुछ पंक्तियाँ....जब सृजनात्मकता 'दिल' से फूट कर 'दिमाग' तक पहुँचती है,जब उसे व्यक्त करने के लिए एक 'बेचैनी' सी पनपती है,जब मन की कल्पना लेने लगती है शब्दों का आकार,तब मेरे दोस्त, होता है एक "कविता" का साक्षात्कार!
 
Aseem
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‘क्लास’

क्लास मे पिछली बेंच पर बैठने का मजा ही कुछ और होता है. मन को एक अजीब सी शांति मिलती हैं. हम विभिन्न प्रकार के कार्यकलाप कर सकते हैं, खेल खेल सकते हैं, चित्र बना सकते हैं या कागज़ के गोले से सहपाठी को निशाना बना सकते हैं.वहां रचनाशीलता उमड़ उमड़ के आती है.
 
Aseem
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नहीं आया पत्र

  यह एक बीते हुए ज़माने की कविता है. पत्रों के ज़माने की. एक ज़माने मे पत्र हमारी जिंदगी का हिस्सा हुआ करते थे. मोबाइल और ई-मेल रहित वो दुनिया संजीदगी, अपनेपन और संवेदनाओं से परिपूर्ण हुआ करती थी जब हम कलम उठा कर अपनी हैण्ड रायटइंग मे अपने किसी अपने को
 
Aseem
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नाक का औचित्य

हमारे जीवन में “नाक” क्या स्थान है ? अक्सर स्नानोपरांत जब मैं अपने चेहरे का दैनिक अवलोकन करता हूँ तो बरबस मेरी निगाहें चेहरे के बीचोबीच उस उठे हुए छिद्रयुक्त मांस व् हड्डियों से युक्त उस आकृति पर ठहर जाती है जिसे हम “नाक” कहते हैं. नाक के इस अजीब आकार पर
 
Aseem
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इम्तिहान

एक अजीब सा है भय व्याप्त,एक अनजानी सी है घहबड़ाहाट.किसी को किसी से नही है मतलब,दिल मे है सब के एक अकुलाह्ट.हृदय मे है जो ,वो हो ना जाए विस्मृत,इस विचार से दिल हो रहा है विचलित.मष्तिश्क पर पड रहा है ख़ासा ज़ोर,उसकी क्षमता का हो रहा है पूरा प्रयोग.शनेः
 
Aseem
May 29 2010 08:22 PM
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आज रात्रि है 'मधुशाला' : बच्चन की मधुशाला से प्रेरित

निद्रा बन जाती है साकी लगी पिलाने स्वाप्नों की हाला,नही रोक पता ये मन भी इन आँखों का मोहक प्याला.प्रतीक्षण पाश मे जकड़ रही है सम्मोहित करती ये मधुबाला,किसी के वश मे ना अब आएगी आज रात्रि है 'मधुशाला'.(बच्चन की मधुशाला से प्रेरित)
 
Aseem
May 29 2010 08:19 PM
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Virtues

I hold hands, who are in the need,Old, miserable, deprived and diseased.A blind man crossing the road,I will go and give him support.A lame , limping down,I will prevent him from falling down.A poor child crying, nothing to eat,I will not hesitate,
 
Aseem
May 21 2010 12:52 AM
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याद आता है.....

कुछ धुंधली सी यादों मे,अक्सर तुम्हारा ख़याल आता है.कहीं कोई छूटा हुआ,अनज़ाना सा दयार याद आता है.उन छोटी छोटी बातों का,उन अकस्मात मुलाक़ातों का,उन अनकहे जज़्बातों का,उस इंतज़ार, उस उम्मीद,उन कुछ नवीन प्रयासों का.प्रायः मन की किताब केअधखूले किसी पन्ने
 
Aseem
May 21 2010 12:50 AM
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ज़रा मुड के तो देखो

ज़रा मुड के तो देखोखुशियों को कितना पीछे छोड़ आए हो !पैसे तो कमा रहे हो;क्या सुकून कमा पाए हो?
 
Aseem
May 21 2010 12:48 AM
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बीता हुआ ज़माना

याद आता है वो बीता हुआ ज़माना,बिना बात के हँसना और बिना बात के रोना!रूठना और झट से मान जाना.पर आज ! रोने और हँसने के वजहें ढूंढता हूँ,और ख़ुद को नही पता किससे और किस बात पे रूठता हूँ.
 
Aseem
May 21 2010 12:47 AM
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क्यूं?

क्यूं एक ठहराव सा आ गया है;क्यूं ज़िंदगी आज थम सी गयी है;क्यूं जिज़ीविशा खो गयी है;क्यूं चेतना विलुप्त हो गयी है;इस 'क्यूं' का उत्तर क्यूं नही मिलता आज ?
 
Aseem
May 16 2010 08:59 PM
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“सपने में मौत”

कल मैंने एक सपना देखा,सपने में कोई अपना देखा,उस अपने का तडपना देखा,तड़प तड़प के मरना देखा.ए के ४७ और ग्रेनेड देखे,उनको चलाने वाले चेहरे देखे,हर चेहरा था बिलकुल एक सा....पर नाम थे अलग अलगअल्लाह, गाड और भगवान.और मरने वाला था “इंसान”.
 
Aseem
May 16 2010 08:48 PM