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राष्ट्र सर्वोपरि

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17 Jun 2010
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आख़िर वो शख़्श कौन था

कल शाम एक बार फिर,मिला उससेफिर वही उसी गर्मजोशी के साथजैसे मिलता थापहले कभीएक बार फिर शुरू हुयी कुछ बातेंकुछ पुरानीकुछ नयी,कुछ कहीकुछ अनकही,फिर ऐसे ही उसमुलाकात के बादलौट आया अपने घरऔर फिर रात भर आँखों से नींद जाती रहीकेवल सोंचता रहाउस मुलाकात के बारे
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आज इच्छाएं मेरी उड़ रही है तितली बनकर

आज इच्छाएं मेरी उड़ रही है जैसे उडती तितलियाँ हो,वो ठहरती ही नहींकिसी पलकिसी एक फूल  पर और ये मेरा नादाँ मनकर रहा है कोशिश पकड़ने की उन तितली बनी इच्छाओं कोएक अबोध बालक की तरह और फिर चाहता की कैद कर ले उन्हेंजिससे वो न उड़ सके दुबारा,पर हर बार की तरह
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गाँधी जी का तीन बन्दर का सिद्धांत-एक नकारात्मक सिद्धांत

वैसे तो गाँधी जी ने अपनी जिंदगानी में कई सिद्धांत दिए है पर उनका एक ऐसा सिद्धांत  जिस पर आज तक देश विदेश में कई जगह उसका उपयोग कई लोंगो ने विभिन्न विभिन्न रूप में किया है...और वो सिद्धांत है गाँधी जी का तीन बंदरों का सिद्धांत.हम सभी  इस
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मेरा नाम अब मेरे पास था

शाम भी ढलने को थी मन हो रहा था बोझिल मेरा तो सोचा क़ि क्यूँ ना जाऊं समुंदर के तट पर और वहाँ डूब रहे सूरज को, निहारूं देर तक, खेलूँ ताजी हवा के संग फिर मैं वहाँ गया भी| पर अरे ये क्या, यहाँ तो मेरा नाम लिखा है किसी ने इस रेत के घरौंदे के पास, जो कि बनाया
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दोनो ही माँ थीं एकदम असहाय सी

सी क्यूंकी,एक माँ चाँद को खिलौना नही कर सकती थी,और दूसरी माँ चाँद को रोटी नही कर सकती थी...!!
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दानव दहेज से ग्रसित दो घटनाएँ...!!

पिछले तीन महीने मे मेरे साथ दो घटनाए घटी या यूँ कहूँ की दो मानसिक दुर्घटनाएँ घटी...वे दोनो घटनाए जिन्होने मुझे काफ़ी उद्वेलित किया उनका जिक्र आज मै  आपके सामने  रहा  हू...पहली घटना लगभग तीन महीने पहले जब मै  एक खिलौनों की दुकान मे था
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पर अफ़सोस! तुम नही आयीं...

शायद मेरे सुनने मे ही कमी होगी,या ये शाम बिन कहे ही ढल गयी होगी, तुम आ जाते तो ज़रूर कह ही देता,शायद कुछ देर दर्द सह ही लेता!तुमने ताज़ा किए जो जख्म सवेरे मे,शाम मरहम लगाने तो आ जाती,दर्द मे मेरे कुछ कमी आती,याद बरबस पुरानी आ जाती!पर अफ़सोस! तुम नही
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सुरक्षा व्यवस्था

आज एक बड़े नेता के आने की,तैयारी मे जुटा है,शहर का सारा प्रशासन,कई जिलों की फोर्स,की गयी है तैनात,सुरक्षा के सारे इंतज़ाम भी है,एकदम चाक-चौबंद,वहाँ कार्यक्रम स्थल पर,लगाया गया है एक,मेटल डिटेक्टर भी,पर मुझे यकीन है कि,यह मेटल डिटेक्टर भी,नही पहचान पाएगा
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*खूबी*

आज राकेश बहुत खुश था.पिछले कई दिनों से जब से उसे नौकरी के साक्षात्कार के लिए बुलावा पत्र मिला था,अपनी पढाई ख़त्म होने के बाद एकदम से गुमशुम सा रहने वाला राकेश अब फिर से अपने पढाई के दिनों की तरह ही चहकने लगा था|पूरे सप्ताह भर वो अपने शहर के लगभग सभी
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वन्दे मातरम

जय श्री राम Jai Shri Ram जय श्री राम Jai Shri Ram जय श्री राम Jai Shri Ram जय श्री राम Jai Shri Ram जय श्री राम Jai Shri Ram जय श्री राम Jai Shri Ram जय श्री राम Jai Shri Ram जय श्री राम Jai Shri Ram जय श्री राम Jai Shri Ram जय श्री राम Jai Shri Ram जय
May 21 2010 02:03 AM