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हिन्दी ब्लाग "क्या लिखूं १"

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10 Jun 2010
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वाक्यों में छिपे रंग पहचानिए

1- राम बहरा है .2- चंपक मनीला गया है.3- कालाकांकर का राजभवन ऐतिहासिक धरोहर है.4- अनुत्तीर्ण होने का मलाल मत करो.5- जपी लाभ में रहा.6- गुलगुला बीना को पसंद नहीं है.7- पुस्तक के पहले सफे दबाकर नहीं रखना चाहिए.8- राम ने कहा- जा मुनी के पास ज्ञान लेकर आ.9-
 
बालमुकुन्द अग्रवाल,पेंड्रा
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"यूं करें अपना विरोध प्रदर्शन"

भारत एक प्रगतिशील राष्ट्र है. राष्ट्र की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए सतत् प्रयास करने के बावजूद हमें अपेक्षित सफलता नहीं मिली है. अत: भारत को संपन्न एवं आत्मनिर्भर राष्ट्र बनाने के लिए अदम्य आत्मविश्वास,कठोर परिश्रम, ईमानदारी एवं उपयोगी और
 
बालमुकुन्द अग्रवाल,पेंड्रा
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हिन्दी ब्लाग "क्या लिखूं १"

पति -हर सफल पुरूष के पीछे एक स्त्री होती है.पत्नि (चिढकर)-हां, और यह भी जान लो हर असफल स्त्री के पीछे एक पुरूष होता है.
 
बालमुकुन्द अग्रवाल,पेंड्रा
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" तो फिर बात बने'"

आज की रात बडी देर के बाद आयी है,रात जो देर से बीते, तो फिर बात बने....बीत जाती है घडी मिलने की बहुत जल्दी,वक्त रूक जाए उनके आते, तो फिर बात बने....गिले शिकवे में बीतते हैं कीमती लम्हे,आंखो-आंखों में जो हो बात, तो फिर बात बने....बातें रहती हैं ढेरों उनसे
 
बालमुकुन्द अग्रवाल,पेंड्रा
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"घडी"

टिक-टिक करती घडी हमारी,समय बताती जाती है.रंग-बिरंगी प्यारी घडियां,हमें खूब ही भाती हैं.बच्चे बूढे सभी पहनते,काम बहुत ये आती है.लापरवाही दूर भगाकर,समय की कद्र सिखाती है.बिना रूके चलती है हरदम,जीना हमें सिखाती है.चलते जाना ही जीवन है,घडी हमें बतलाती है.आलस
 
बालमुकुन्द अग्रवाल,पेंड्रा
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हाथी दादा

हाथी दादाहाथी दादा,उठा के बस्तापढने को स्कूल गए,गुल्ली-डंडा,आँख-मिचौलीपतंग उडाना भूल गए.बच्चे उनको खूब चिढातेमोटू-मोटू कहते थे,हाथी दादा कुछ न कहतेचुपचाप सुनते रहते थे.हाथी दादा पढते खूबकभी न जाते देर से,परीक्षा में पास हुए और नंबर लाए ढेर से.मैडम ने की
 
बालमुकुन्द अग्रवाल,पेंड्रा
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युवा लडकी

युवा लड़की भी चाहती है तितलियों की तरह उडना कोयल की तरह कूकना झरने की तरह बहना पर घर से गंतव्य तक नजरे झुकाए रास्ते पर चलती है युवा लड़की नेत्र रहकर भी नेत्रहीन हो जाती है,युवा लड़की. सूनसान रास्तों पर अकेले नहीं जा सकती युवा लड़की पदयुक्त होकर भी पदहीन
 
बालमुकुन्द अग्रवाल,पेंड्रा
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उम्मीद

चिथडों में किसी तरह अपना तन छुपाये 11 वर्षीय राजू सेठ दीनदयाल के यहाँ जूठे बर्तन साफ कर रहा था.वह दो वर्षों से दीनदयाल जी के यहाँ काम कर रहा था.दीपावली नजदीक आ रही थी और उसके पास बेहतर कपडे नहीं थे. सहसा उसे सेठ जी के बेटे निसर्ग की आवाज सुनायी दी,जो
 
बालमुकुन्द अग्रवाल,पेंड्रा
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खण्डहर

खण्डहर पुकार रहे हैंमैं बीता हुआ कल हूंअतीत की लाश हूंमुझे हटाओनया बनाओ पर मुझे उनकी आवाज सूनाई नहीं देती और आंखों के सामने खुली सच्चाई दिखाई नहीं देती मैं खण्डहर भक्त हूं खण्डहर के शत्रु मूझे समाज के शत्रु प्रतीत होते हैं यद्यपि मैं अंधा हूं और शायद