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गाने-साने

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13 Jun 2010
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बाज़ीचा-ए-अत्फाल है दुनिया मेरे आगे - ग़ालिब और जगजीत सिंह

ग़ालिब  की गज़ल और जगजीत सिंह की आवाज़..इससे बेहतर क्या हो सकता है.सुनते हैं ग़ालिब के दो गज़ल..पहले दूरदर्शन पे मिर्ज़ा ग़ालिब दिखाया जाता था, जिसे गुलज़ार साहब ने डाईरेक्ट किया था.उसी के २ गज़ल आज आपके सामने ला रहा हूँ.बाज़ीचा-ए-अत्फाल है दुनिया मेरे
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निशब्द सदा..ओ गंगा तुम, बहती हो क्यूँ

जब मैं पहली बार ये गीत सुना था तो मैं तो बिलकुल स्‍तब्‍ध रह गया था.मुझे याद तो नहीं पहली बार ये गीत कब सुना था लेकिन हाँ, उस दिन से लेकर आज तक ये गीत मैं अक्सर सुनते आ रहा हूँ.एक नयी ताकत जैसे आ जाती हो इस गीत को सुनने के बाद.भूपेन हज़ारिका की आवाज़ में
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आज यूं मौज दर मौज गम थम गया

आज इस गीत को सुनने के लिए आपसे मैं समय मांगता हूँ.. यह मांग मेरी नहीं, इस गजल की है.. चैन से बैठ कर सुनने में ही यह गजल सुकून देगा.. मेरा यह दावा है की इसे सुनने के बाद आप भी दाद दिए बिना नहीं जायेंगे.. :)आज यूं मौज दर मौज गम थम गया इस तरह गमजदों को करार
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ओ रात के मुसाफिर

आज दो गाने आपके सामने पेश कर रहा हूँ, अभी ये दो गाने मेरे लैपटॉप पे कल से लगातार बज रहे हैं..उम्मीद है आपको पसंद आएगी :)पहला गाना "ओ रात के मुसाफिर,चंदा ज़रा बता दे..", रफ़ी साहब और लता जी द्वारा गाया हुआ और हेमंत कुमार जी का संगीत..फिल्म का नाम "मिस
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Jun 10 2010 11:02 AM
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दूरदर्शन के तीन पुराने गीत

एक समय था जब दूरदर्शन ही मनोरंजन का एक साधन था.टी.वी का मतलब ही दूरदर्शन ही होता था.कितना कुछ जानने सीखने को मिलता था दूरदर्शन से..प्रोग्राम भी एक से एक होते थे, सामाजिक,पारिवारिक और ज्ञान देने वाले प्रोग्राम.अब तो सीरियल के नाम पे पता नहीं क्या दिखाते
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नन्ही इशिता से सीखिए वंदे मातरम...

आज कल के आधुनिक युग में जहाँ देशप्रेम महज एक शब्द बन रह गया है, वहीँ ये नन्ही पारी इशिता से हमें सीखना चाहिए, कुछ जो सो-काल्ड मोडर्न युवक, युवतियां हैं जिन्हें अपने देश का राष्ट्र गान, गीत पाता नहीं वो सीखें इस नन्ही सी प्यारी सी इशिता से...इशिता 
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जन-गण-मन

आज अपना राष्ट्रगान ही सुनाये जाता हूँ आपको इस बच्ची(YouTube पर इसे बच्ची ही बताया गया है) द्वारा..
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गुलाम अली की दो ग़ज़लें..

गुलाम अली के बारे में मुझे मेरे एक दोस्त "सुदीप" से मालूम चला था जब मैं बारहवीं में था..उस समय गज़ल से ज्यादा लगाव नहीं था, गज़ल के नाम के पंकज उधास और जगजीत सिंह के कुछ चर्चित फ़िल्मी गज़ल सुनता था, उससे ज्यादा कुछ नहीं.उस समय डी.वी.डी नहीं आती थी, विडियो
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पल दो पल हैं प्यार के - नुसरत और राहत कि आवाज में एक ही गीत, मगर दो अलग अंदाज

एक ही धुन पर बुने हुए यह दो गीत दो ना होते हुए भी दो हैं.. दोनों ही गानों में सिर्फ एक पैराग्राफ का अंतर है और सिर्फ आवाजों का.. वैसे यह मेरी अपनी राय है कि मुझे राहत कि आवाज ऐसी सुन कर कुछ निराशा हुई थी, उससे कुछ अधिक ही उम्मीद जो हम अक्सर लगा बैठते
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कबाड़ी के कबाड़ से निकला यादों का पुलिंदा

पटना की गलियों फिर से पहूंच गया लगता हूँ जैसे.. जब मैंने इन गीतों को पहली बार सुना था उस समय मैं तुरंत ही मैट्रिक पास किया था.. कैसेट खरीदने का जिम्मा भैया के हाथों में होता था.. भैया मुझसे बस दो साल बड़े हैं, मगर उस छोटी उम्र में भी ना जाने कहां से
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आया है मुझे फिर याद - कुछ ख़ास बचपन के पलों को याद दिलाता ये खूबसूरत गीत

इस ब्लॉग में मेरा ये पहला पोस्ट है.तो सोचा क्यों न आप सभी के सामने वो गीत पेश करूँ जो मैं अक्सर सुनता हूँ.इस गीत की सबसे बड़ी खासियत ये है की आप अपने बचपन के दिनों में घुमने लगेंगे गीत सुनने के बाद ;)फिल्म देवर का ये गीत के गायक थे मुकेश. और संगीत दिया
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फेंको ये किताबें...

हाँ  हाँ  यादों  में  है  अब  भी, क्या  सुरीला  वो  जहाँ  था,हमारे  हाथों  में  रंगीन  गुब्बारे  थे,और  दिल  में  महकता  समां  था,यारा  हो 
 
Pankaj Upadhyay (पंकज उपाध्याय)
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नुसरत को समेटे हुए पांच पोस्टों का जिक्र कुछ इस तरह

शुरुवात करते हैं हिंदी युग्म कि इस पोस्ट से.. नुसरत जी से शुरू कर यहाँ गजब का समां बाँधा गया है सूफी संगीत का.. यह दो भागों में बनता हुआ है, पहले भाग से एक वाक्य कोट कर रहा हूँ यहाँ जिसमे हाफ़िज़ ने सूफी के बारे में कहा है :"सूफ़ी कवि वह होता है जो एक
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कार्लोस संटाना का एक गीत

अगर कोई मुझसे मेरे सबसे प्रिय गिटार वादक के बारे में पूछे तो मैं "कार्लोस संटाना" का ही नाम लूँगा.. सच पूछे तो मुझे इनके गिटार में एक मदहोशी सी महसूस होती है.. कभी-कभी सोचता हूँ की काश मैं भी इनके जैसा गिटार बजा पाता.. फिलहाल तो यह गीत सुने..Songwriters:
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शहर के दुकानदारों, कारोबार-ए-उलफ़त में

जावेद अख्तर जी का लिखा हुआ और नुसरत जी द्वारा गया गया यह गीत मेरे सबसे पसंदीदा गीतों में से एक है..शहर के दुकानदारों कारोबार-ए-उलफ़त मेंसूद क्या ज़ियाँ* क्या है, तुम न जान पाओगेदिल के दाम कितने हैं ख़्वाब कितने मँहगे हैंऔर नकद-ए-जान** क्या है तुम न जान
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किया है प्यार जिसे, हमने जिंदगी की तरह

कहीं कुछ मन नहीं लग रहा था.. रात बहुत हो चली थी.. एक कश मारने कि इच्छा बहुत हो रही थी.. मगर नहीं मारा.. शायद घर में होता तो लगा भी लिया होता.. मगर ना लगाऊं इस कारण से रखता ही नहीं हूं घर में.. मोबाईल उठा कर देखा.. कुछ मैसेज दोस्तों को फॉरवार्ड भी किये..
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वक्त ने किया क्या हसीं सितम

कागज के फूल का गीत, गीताबाली द्वारा गया हुआवक्त ने किया क्या हसीं सितम,तुम रहे ना तुम, हम रहे ना हम..बेक़रार दिल, इस तरह मिले,जिस तरह कभी हम जुदा न थे..तुम भी खो गए, हम भी खो गए..एक राह पर चल के दो कदम..वक्त ने किया क्या हसीं सितम,तुम रहे ना तुम, हम रहे
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