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दिल की बातें

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17 Jun 2010
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एक कदम पर्यावरण और हमारे लिए

   नन्हा पौधा  हरा हरा एक नन्हा पौधा , लगा  मेरे  उपवन में |  जिसे देख कर फूल ख़ुशी के  खिलते जाते मेरे मन में   |धूप यह खाता , पीता पानी
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हम ऐसे क्यों है ?

 लघुकथा मै और वह रसोई में काम  करती हुई पत्नी के चेहरे की खीझ साफ दिखाई दे रही थी |उस पर घड़ी की तेज चलती हुई सेकण्ड की सूई उसकी खीझ
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आम आदमी और महँगाई का संबंध

महँगाई बढती हुई महँगाई की चिंता अब हमें भी होने लगी है |क्योंकि हमारी फटी मैली क़मीज में ,लगे बदरंग बटनों का स्थान , आलपिन लेने  लगी है |यह महँगाई यूँ ही बढती जाएगी  और एक दिन आसमान को छू जाएगी  |तब
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यह कैसा रिश्ता ?

मै और तारा आसमान में लाखों तारे पर एक ही तारा मुझको भाया |और टूटा वह, एक ही तारा ,जो मेरी किस्मत में आया | चलो मान ही लेता हूँ मै ,यह मेरी किस्मत में लिखा हुआ था |मगर फिर क्या दोष था उसका , जो आसमान में में सजा हुआ था |हम दोनों की एक ही किस्मत
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एक परित्यक्ता को सांत्वना

  क्यों सहती हो ?कल कल बहती नदी यहाँ पर मंद पवन भी कुछ कहती है | फिर साँसों के रथ पर सवार हो कर, तुम गुमशुम सी क्यों रहती हो | थोड़ा सा ग़म बाँट लो तू भी तुम इतना ग़म क्यों सहती हो |तुमने उसको अपना माना,पर उसने, उसको अपना जाना जिसने
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सुनील कुमार की एक और कविता

कविता रेलगाड़ी हम सब मुसफ़िर है उस रेल गाड़ी के, जिसको भ्रष्टाचार  का इंजन, बेईमानी के कोयले से खींच रहा है |रास्ते में पड़ने वाले स्टेशनजैसे  ईमानदारी ,सदाचार और त्याग हमें 
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क्या व्यंग्यात्मक कविताएँ अपना सन्देश देने में सक्षम है ?

व्यंग्य आरक्षण हम थे चार यार, चारों थे बेरोजगार घूम रहे थे इधर उधर देखने पहुंचे चिड़ियाघर |तभी सामने एक  चिंपाजी  आया जिसे देख कर हमारा दोस्त  चिल्लाया |यही है हमारे  पूर्वज महानहम सब है इनकी संतान इस पर चिंपाजी गुर्राया
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पाठकों को तरसती एक प्रतीकात्मक कविता

मिटटी का प्रश्न गुँथी हुई मिटटी का प्रश्न घूमते हुए चाक से मुझे क्या बनना है |शीतल जल की गगरी या गर्म पेय का पात्र,मिटटी के प्रश्न पर चाक का भौचक्का रह जाना |चलते चलते रुक जाना गहरी सोंच में डूब जाना |क्षण  भंगुर जीवन और इतना गंभीर चिंतन अचानक चाक
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कविता

      यथार्थ झाँक कर देखा खिड़की से उमड़ते हुए बादलों को दौड़ कर आँगन में आया | और आकाश में बादलों का एक झुंड पाया | और शुरू हो गया तलाश का एक अंतहीन सिलसिला अचानक खिल उठा चेहरा |और प्रसन्न हुआ अंतर्मन क्योंकि मिल गयी थी
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ज़िंदगी और रोटी

हाँ तो मैं बात कर रहा था उस बच्चे की जिसके गले में एक रोटी बांध दी जाती थी  जो उसके खेलने और खाने के काम आती थी | कभी -कभी उसकी माँ यह समझाने के  लिए कि धरती ,सूरज ,चाँद आदि भी गोल है,उस रोटी को उदाहारण के रूप में
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मेरा परिचय

मै बह एक आम आदमी हूँ जिसके जीवन मे डर और समस्याओं के सिवा कुछ भी नहीं होता है | जब बह साइकल पर चल रहा होता है | तब बह स्कूटर से डरता है और जब बह स्कूटर पर चलता है तब बह कार से डरता है इस तथाकथित सभ्य और शिक्षित समाज में अपना स्थान बनाने के लिए
May 09 2010 01:25 PM
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कविताएँ

महँगाईबढ़ती हुई महंगाई की चिंताअब हमें भी होने लगी है |क्योंकि हमारी फटी मैली कमीज में लगे ,बदरंग बटनों का स्थान आलपिन लेने लगी हैयह यूँही बढ़ती जाएगी |यह एक दिन आसमान को छू जाएगी |तब ज़मीन और आसमान के बीच,का फासला कुछ भी नहीं रह जायेगाऔर आदमी ज़िन्दगी के