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11 Jun 2010
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गोंद तुम्हारी , प्यार तुम्हारा , आँचल का हो सार तुम्हारा |

निर्मल पावन कोमल शीतल ,कैसा है स्पर्श तुम्हारा |तन मन की कैसी पीड़ा हो ,हर लेता है प्यार तुम्हारा |जब भी जीवन में थकता हूँ ,तेज धुप में मैं तपता हूँ |जीवन का हर ताप मिटाताआँचल का इक सार तुम्हारा |मुझे खिला तुम भूखे रहती ,ढाल बनी सब सुख दुःख सहती |शब्दों
 
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