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हर सन्डे लाइफ के नए फंडे

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नयी प्रविष्टी लिखी
12 Jun 2010
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अबे ओये ....मैं वापिछ आ दया ( मैं वापस आ गया )

फ़िल्मी टाइम लाइन के अनुसार समय ... धूम (२) रिलीज होने के तुरंत बाद का    बच्चे खेल रहे हैं , आवाजें सुनिए इनकी....." ढिशक्यूं    .... ढिशक्यूं    ... .... ढिशक्यूं " गोली चलने की आवाज मुह से निकली जा रही है  "अबे
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खबर से पहले की खबर ((( लघु कथा )))

कल  रात  घर में पार्टी थी , उसको मार्क्स अच्छे मिले है आज उसके पापा उसके लिए हर वो नयी चीज ले आये है जो उनके बजट में आती है अरे हाँ मैं तो बताना ही भूल  गया , पहले घर पर कबले कनेक्शन नहीं था , आज ले लिया है सुबह उठ कर उसने अपने कमरे में
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धीरे धीरे सब समझ जाएँगे ((लघुकथा ))

आज मालिक और ड्राइवर दोनो उदास और परेशन से नज़र आ रहे हैं . दोनो कुछ अपने ही सोच मे डूबे हुए हैं . दोनों के चेहरे पर चिंता की सिलवटें एक जैसी है (राज बाद में खुलेगा .. पढ़ते रहिये ) .२० मिनिट की लंबी यात्रा तक कोई बात नही हुई. दोनों का पूरा दिन बहुत बुरा
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(मदर्स डे पर महिलाओं के लिये निशुल्क टेस्ट ड्राइव) टाइम मशीन (कल्पनाशील ही आएँ)

पहले ही बता दूं कि ये टाइम मशीन समझदार व्यक्ति  को ही दिखती है ......समझ गये ना....???आइए चलते है  टाइम मशीन में, .......कहाँ जा रहे हैँ ??? अरे, चलिए तो सही हम जा रहे हैँ .... सन  ............हाँ , हम जा रहे हैँ, सन 1920 से 1930 के बीच
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कारतिक प्लीज कॉल श्री कृष्ण

हम में से कितने ही लोग ऐसे हैं जो ये मानते है कि जब सप्ताह भर कि मसरूफियत और शारीरिक और मानसिक थकान के बाद एक अवकाश का सामना हो तो बस किसी मल्टी-प्लेक्स में जा कर मनोरंजन करना है । सच तो ये है कि मन में थकान है इस लिए शरीर थका है इस समय मन को रंजन कि
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सस्ती सी पाठशाला (फिल्म)

नयी फिल्म पाठशाला शिक्षा के व्यवसायीकरण पर तीखा व्यंग्य कर रही है. शुरुआत में अखबारी कतरनें दिखा कर डराती इस फिल्म  के कुछ दृश्य बड़े ही प्रभावी है. एक दृश्य में चपरासी शिक्षकों के सामने अपनी पांचवी पास शिक्षा पाने में की मेहनत को एक
Apr 26 2010 07:53 PM
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सकारात्मक सोच कितनी सकारात्मक (part 1)

हम अनेकों बार सुनते है कि सकारात्मक सोच हमें तनाव मुक्त बनाती है और हमारी सफलता में सहायक होती है । पर क्या हम सच में सकारात्मक ही सोचते हैं ?आईये ये जानने के लिए हम क्रिकेट के हरे मैदान में चलते है । क्या क्रिकेट के मैदान में आपने कभी रिक्की पोंटिंग कि
Apr 22 2010 05:10 PM
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क्यों पैसा पैसा करते हो ???????

जरा सोचिए कैसा लगेगा आपका "किसी व्यक्ति का टोकन सिस्टम वाली शॉप पर जाकर उस शॉप के टोकन की महिमा के गुण गाना". जबकि हम जानते कि वही टोकन अगली शॉप पर अपनी एक्सचेंज शकती पूरी तरह या अंशतः खो देगा. (शॉप = देश , टोकन = करेंसी). कुछ कस्टमर तो टोकन अपने
Apr 14 2010 05:12 PM
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रेलवे स्टेशन पर अध्यात्म

मैंने बचपन में एक कहानी पढ़ी थी, शीर्षक था "देशभक्त "। इस कहानी में एक देशभक्त जीवन के आखरी पलों रंगमच के एक दृश्य के तरह प्रस्तुत किया गया था जिसे ऊपर से भगवान् देख रहे है । अंत बड़ा ही अद्भुद था , इस कहानी में मृत्यु को उत्सव कि तरह मनाया जा रहा था ।
Apr 05 2010 05:23 PM